12/31/2010
विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता
शिव पार्वती विवाह का एक कारण तारकासुर का बध भी था क्योकि उसने वरदान में शिव पुत्र के द्वारा म्रत्यु मांगी थी. इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है की हम सदैव समाज में भलाई करे. व अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा करे. अगर समाज के हित में कोई भी नियम तोडना पड़े तो कोई दोष नहीं होता.
विवाह के बाद भगवान् आशुतोष व माँ पार्वती ने कैलाश पर निवास किया. यह बात आज की गृहणियो को यह सन्देश देती है की अपने पति के सुख में ही उसका वास्तविक सुख निहित है. विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता उक्त उदगार आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने शिवपुराण कथा के चौथे दिन के प्रवचन में कही.
ढाना, सागर में चल रही श्री शिव पुराण कथा का आनंद लेने क्षेत्र की अपार भीड़ उमड़ रही है. अपने चौथे दिन के प्रवचन में वृन्दाबन धाम से पधारे अष्टादश पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने आज कार्तिकेय के जन्म का वृतांत सुनते हुए कहा की उनका जन्म देवताओं की पीड़ा हरने के लिए हुआ था.
वरिष्ठ पत्रकार श्री दीपक तिवारी के निवास पर विगत वर्ष की तरह इस वर्ष भी आचार्य व्रजपाल शुक्ल के द्वारा धर्म की धारा ढाना ग्राम में शिवपुराण के माध्यम से बह रही है.
अपने सारगर्भित प्रवचनों में आचार्य जी ने समाज में आज माता-पिता एवं गुरु के प्रति उपेक्षा के भाव पर प्रकाश डालते हुए कहा की गुरु और पिता में एक समानता जरूर होती है और वह है की गुरु अपने शिष्य के वैभव व प्रसिद्धि को देखते हुए प्रसन्न होते है वैसे ही एक पिता अपने पुत्र के ऊचा बढ़ने एवं सम्रद्धि को देखते हुए प्रसन्न होता है.
धन के विषय में आचार्यजी ने कहा की धन से सच्चा यश नहीं मिलता अगर उससे सद्बुद्धि और विवेक शामिल न हो. भगवान् गजानंद का वृतांत सुनते हुए आचार्यजी ने कहा की किस तरह उनका जन्म हुआ और कैसे वे गणेश बने व उनके तेजमय गुणों के कारण ही उन्हें प्रथम पूज्यदेव का वरदान भगवान् भोलेनाथ से मिला.
12/24/2010
उड़ियाबाबा जी महाराज के उपदेश
तत्वज्ञ के जीवन में ब्रह्माकार वृत्ति निरंतर बनी रहती है. तत्वज्ञ पुरुष को यह अनुभव नहीं होता की अविद्या निवृत्ति हो गयी है. ऐसा तो तब होता जब अविद्या नाम की वस्तु पहले कोई सत्य होती और बाद में निवृत्त होती . तत्वज्ञ का अनुभव तो यह है की अविद्या कभी थी ही नहीं.
निरंतर अभ्यास करते रहने और वासनाओं का पूर्णतया नाश कर देने पर ही अनुभव की प्राप्ति होती है. केवल शस्त्र पढने से कुछ नहीं होता. वासना के रहते चित्त में शांति नहीं आ सकती. वासना रहित चित्त ही परम तत्व के चिंतन का अधिकारी होता है. निरंतर अभ्यास करते रहने से ही वासनाओं का निर्मूलन होता है और तत्व की उपलब्द्धि होती है. वासनाओं के उच्छेद के लिए विषयों से सर्वदा वैराग्य रखे और सर्वदा भाग्वादाकर वृत्ति रखे .
वैराग्य का फल बोध और बोध का फल उपरति.
दोनों में अंतर यही है की वैराग्य होने पर विषयों में ग्लानी होने के कारण उन्हें भोगा नहीं जाता. उपरति होने पर वस्तु सामने रहें पर भी उसे भोगने की प्रवृत्ति नहीं होती. इसके उपरांत उपरति का फल है आनंद और आनंद का फल है शांति.
राग-यदि किसी वस्तु से मन इस प्रकार फस जाय की किसी भी प्रकार का अपमान निरादर या दुःख होने पर भी न हटे तो मानना चाहिए की उसमे राग है.
द्वेष-यदि किसी वस्तु से मन ऐसा हट जाय की उसमे दोष ही दोष दिखाई दे कोई भी गुण न दीख पड़े तो मानना चाहिए की उसमे द्वेष है.
राग-द्वेष की उत्पत्ति गुण-दोष या निंदा-स्तुति के चिंतन से ही होती है. राग-द्वेष से मुक्ति, निंदा-स्तुति के न करने की प्रतिज्ञा से एवं पूर्ण ग्यानी या भक्त जो राग-द्वेष से मुक्त होते है, उनका ध्यान करने से राग-द्वेष छूट सकते है. राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष वाला व्यक्ति उन्नति की सुनहली पगडंडी पर नहीं बढ़ सकता. हा, राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष से छुटकारा पाने की कुंजी मिल जाती है. उसकी पूर्ण निवृत्ति होती है. भगवत्प्रेम और आत्मप्रेम से.
प्रतिष्ठा और गर्व माया मोह में भटकाएगा उससे क्या लाभ होने वाला है ?
जिह्वा का स्वाद ही सारे अनर्थो की जड़ है.
जीवन्मुक्ति क्या है ? जो जिस प्रकार अज्ञात भासा में तुम्हारी निंदा या स्तुति की जाय तो तुम्हारा चित्त तनिक भी डावाडोल नहीं होगा, उसी प्रकार यदि तुम्हारी परिचित भाषा में तुम्हारी निंदा या स्तुति की जाय तब भी तुम्हे क्षोभ न हो तो मानना चाहिए की तुम जीवन्मुक्त हो.
स्वामी अखंडा नन्द सरस्वतीजी महाराज के आनंद रास रत्नाकर से साभार
निरंतर अभ्यास करते रहने और वासनाओं का पूर्णतया नाश कर देने पर ही अनुभव की प्राप्ति होती है. केवल शस्त्र पढने से कुछ नहीं होता. वासना के रहते चित्त में शांति नहीं आ सकती. वासना रहित चित्त ही परम तत्व के चिंतन का अधिकारी होता है. निरंतर अभ्यास करते रहने से ही वासनाओं का निर्मूलन होता है और तत्व की उपलब्द्धि होती है. वासनाओं के उच्छेद के लिए विषयों से सर्वदा वैराग्य रखे और सर्वदा भाग्वादाकर वृत्ति रखे .
वैराग्य का फल बोध और बोध का फल उपरति.
दोनों में अंतर यही है की वैराग्य होने पर विषयों में ग्लानी होने के कारण उन्हें भोगा नहीं जाता. उपरति होने पर वस्तु सामने रहें पर भी उसे भोगने की प्रवृत्ति नहीं होती. इसके उपरांत उपरति का फल है आनंद और आनंद का फल है शांति.
राग-यदि किसी वस्तु से मन इस प्रकार फस जाय की किसी भी प्रकार का अपमान निरादर या दुःख होने पर भी न हटे तो मानना चाहिए की उसमे राग है.
द्वेष-यदि किसी वस्तु से मन ऐसा हट जाय की उसमे दोष ही दोष दिखाई दे कोई भी गुण न दीख पड़े तो मानना चाहिए की उसमे द्वेष है.
राग-द्वेष की उत्पत्ति गुण-दोष या निंदा-स्तुति के चिंतन से ही होती है. राग-द्वेष से मुक्ति, निंदा-स्तुति के न करने की प्रतिज्ञा से एवं पूर्ण ग्यानी या भक्त जो राग-द्वेष से मुक्त होते है, उनका ध्यान करने से राग-द्वेष छूट सकते है. राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष वाला व्यक्ति उन्नति की सुनहली पगडंडी पर नहीं बढ़ सकता. हा, राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष से छुटकारा पाने की कुंजी मिल जाती है. उसकी पूर्ण निवृत्ति होती है. भगवत्प्रेम और आत्मप्रेम से.
प्रतिष्ठा और गर्व माया मोह में भटकाएगा उससे क्या लाभ होने वाला है ?
जिह्वा का स्वाद ही सारे अनर्थो की जड़ है.
जीवन्मुक्ति क्या है ? जो जिस प्रकार अज्ञात भासा में तुम्हारी निंदा या स्तुति की जाय तो तुम्हारा चित्त तनिक भी डावाडोल नहीं होगा, उसी प्रकार यदि तुम्हारी परिचित भाषा में तुम्हारी निंदा या स्तुति की जाय तब भी तुम्हे क्षोभ न हो तो मानना चाहिए की तुम जीवन्मुक्त हो.
स्वामी अखंडा नन्द सरस्वतीजी महाराज के आनंद रास रत्नाकर से साभार
12/20/2010
नारायण आपके साथ है
स्वामी अखान्दनान्दजी सरस्वती के आनंद रास रत्नाकर से
जो नारायण को अपने जीवन का संचालक बनाकर व्यवहार के रणक्षेत्र में अवतीर्ण होता है, वह सफल होता है और जो अकेले आता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है.
यह आपके दैनिक जीवन की बात है. मालवीयजी कहा करते थे की आप घर से कोई काम करने के इए चले तो चार बार नारायण, नारायण, नारायण, नारायण बोलकर निकले. इससे क्या होगा की जिस प्रकार कोई नदी बहती है, कोई नहर चलती है और उसके मूल उद्गम से उसका सम्बन्ध बना रहता है तो वह नदी, वह नहर सूखती नहीं है. लेकिन यदि ऎसी कोई नदी या नहर हो जिसका अपने मूल उद्गम से कोई सम्बन्ध नहीं रहे तो वह नदी, वह नहर सूख जाएगी. ठीक इसी प्रकार जीवन की बात है. इसका मूल उद्गम है, नारायण परमेश्वर. यदि यह परमेश्वर के सम्बन्ध रखकर संसार के व्यवहार करेगा तो उसकी शक्ति बनी रहेगी.
परमेश्वर से सम्बन्ध बनाये रखने से तीन बात आपको हमेशा
मिलती रहती है -
१ आपकी जीवन धारा कभी विछिन्न नहीं होगी.
२ आपकी बुद्धि कभी समाप्त नहीं होगी,
३ आपके जीवन में हमेशा आनंद आता रहेगा.
और इसके विपरीत यदि आप ईश्वर के साथ सम्बन्ध तोड़ देगे तो जीवन की धारा कट पिट जायेगी आपके ज्ञान की धारा, बुद्धि की धारा, आपकी प्रज्ञा क्षीण हो जाएगी और आपको भीतर से आनंद आता है वह बंद हो जाएगा और आप उधर आनंद लेने लग जायेगे. तब आप जीवन लेने लगेगे दवाओं से, बुद्धि लेने लगेगे किताबो से और दूसरे लोगो से तथा आनंद लेने लगेगे विषय भोगो से यह इस बात का नमूना है की हमारे भीतर जो जीवन का , ज्ञान का और आनंद का मूल स्त्रोत है, उससे हम कट गए है.
हम और सब बाते भूल जाए तो भूल जाए परन्तु यह बात भूलने लायक नहीं है की यह जो हमारा मनुष्य शरीर दिखलायी पड़ता है, इसके भीतर जो समष्टि स्वामी है वह पमेश्वर बैठा हुआ है.
जो बड़े-बड़े लोग है, बड़े-बड़े व्यापारी है, बड़े-बड़े विचारक है, वे नारायण को भूल जाते है.. दुर्योधन गया रणभूमि में, तो नारायण को साथ लेकर नहीं गया, पर अर्जुन रणभूमि में नारायण को साथ
लेकर गया हम आपसे यह निवेदन करते है की आप कोई भी काम करे तो अकेले, असहाय, दीन-हीन नर के रूप में न करे, नारायण को अपना साथी बनाकर उसकी मदद से अपना काम प्रारंभ करे. आप असहाय है, यह मत समझे, यह समझे की आप जो भी काम करने जा रहे है, नारायण आपके साथ है.
जो नारायण को अपने जीवन का संचालक बनाकर व्यवहार के रणक्षेत्र में अवतीर्ण होता है, वह सफल होता है और जो अकेले आता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है.
यह आपके दैनिक जीवन की बात है. मालवीयजी कहा करते थे की आप घर से कोई काम करने के इए चले तो चार बार नारायण, नारायण, नारायण, नारायण बोलकर निकले. इससे क्या होगा की जिस प्रकार कोई नदी बहती है, कोई नहर चलती है और उसके मूल उद्गम से उसका सम्बन्ध बना रहता है तो वह नदी, वह नहर सूखती नहीं है. लेकिन यदि ऎसी कोई नदी या नहर हो जिसका अपने मूल उद्गम से कोई सम्बन्ध नहीं रहे तो वह नदी, वह नहर सूख जाएगी. ठीक इसी प्रकार जीवन की बात है. इसका मूल उद्गम है, नारायण परमेश्वर. यदि यह परमेश्वर के सम्बन्ध रखकर संसार के व्यवहार करेगा तो उसकी शक्ति बनी रहेगी.
परमेश्वर से सम्बन्ध बनाये रखने से तीन बात आपको हमेशा
मिलती रहती है -
१ आपकी जीवन धारा कभी विछिन्न नहीं होगी.
२ आपकी बुद्धि कभी समाप्त नहीं होगी,
३ आपके जीवन में हमेशा आनंद आता रहेगा.
और इसके विपरीत यदि आप ईश्वर के साथ सम्बन्ध तोड़ देगे तो जीवन की धारा कट पिट जायेगी आपके ज्ञान की धारा, बुद्धि की धारा, आपकी प्रज्ञा क्षीण हो जाएगी और आपको भीतर से आनंद आता है वह बंद हो जाएगा और आप उधर आनंद लेने लग जायेगे. तब आप जीवन लेने लगेगे दवाओं से, बुद्धि लेने लगेगे किताबो से और दूसरे लोगो से तथा आनंद लेने लगेगे विषय भोगो से यह इस बात का नमूना है की हमारे भीतर जो जीवन का , ज्ञान का और आनंद का मूल स्त्रोत है, उससे हम कट गए है.
हम और सब बाते भूल जाए तो भूल जाए परन्तु यह बात भूलने लायक नहीं है की यह जो हमारा मनुष्य शरीर दिखलायी पड़ता है, इसके भीतर जो समष्टि स्वामी है वह पमेश्वर बैठा हुआ है.
जो बड़े-बड़े लोग है, बड़े-बड़े व्यापारी है, बड़े-बड़े विचारक है, वे नारायण को भूल जाते है.. दुर्योधन गया रणभूमि में, तो नारायण को साथ लेकर नहीं गया, पर अर्जुन रणभूमि में नारायण को साथ
लेकर गया हम आपसे यह निवेदन करते है की आप कोई भी काम करे तो अकेले, असहाय, दीन-हीन नर के रूप में न करे, नारायण को अपना साथी बनाकर उसकी मदद से अपना काम प्रारंभ करे. आप असहाय है, यह मत समझे, यह समझे की आप जो भी काम करने जा रहे है, नारायण आपके साथ है.
12/18/2010
ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था
द्वितीय स्कंध के अंतिम दसवे अध्याय में शुकदेवजी महाराज परीक्षित को यह बताते है की इस भागवत महापुराण में दस वस्तुओ द्वारा परमात्मा के स्वरुप का वर्णन किया गया है. वे दस वस्तुए क्या है ?
यह स्रष्टि कैसे हुई ?
स्रष्टि में विविध योनिया कैसे बनी ?
एक ही तत्व. एक ही पंचभूत है फिर उसमे मानुष, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि कैसे बन जाते है ?
विविधता कहा से आ जाती है ?
स्रष्टि किस स्थान में टिकी है ?
स्रष्टि के सूखने पर इसको सीचनेवाला कौन है ?
वासनाए कैसे-कैसे होती है ?
काल का विभाग कैसे होता है ?
भक्तो के चरित्र कैसे होते है ?
भगवान् के प्रेम में मनका निरोध कैसे होता है ?
मुक्ति क्या है ?
सबसे अधिष्ठान परमात्मा का स्वरुप क्या है ?
इन दस वस्तुओ के निरूपण द्वारा सारे श्रीमद्भागवत में एक ही तत्व, एक ही परमात्मा का वर्णन है.
पहले स्कंध में बताया गया है की भागवत के अधिकारी वक्ता-श्रोता सूत-शौनक, नारद-व्यास और शुकदेव-परीक्षित कैसे है तथा दूसरे स्कंध में यह प्रतिपादित किया गया है की भगवत्प्राप्ति के लिए श्रवण ही मुख्य साधन है और उसके इतने अंग है.
भागवत के तीसरे स्कंध में तैतीस अध्याय है. इनमे विसर्ग के द्वारा परमात्मा का वर्णन है विसर्ग का अर्थ है स्रष्टि की विविधता. ब्रह्म के प्रकाश में गुणों की विषमता से जो विविध प्रकार की स्रष्टि होती है, उसको विसर्ग कहते है.
परन्तु यहाँ विसर्ग शब्द का अर्थ बहुत विलक्षण है आपने गीता में पढ़ा है की इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग होते है-एक देव सर्ग और दूसरा आसुर सर्ग-
इसलिए तीसरे स्कंध के पूर्वार्द्ध के उन्नीस अध्यायों में आसुर विसर्ग का और उत्तरार्द्ध के चौदह अध्यायों में देव विसर्ग का वर्णन है. आसुर विसर्ग में हिरण्याक्ष, हिरान्य्कशिपू की कथा है और देव विसर्ग में मनु-शतरूपा, कर्दम-देवहूति तथा कपिल-अदिति की वंश परंपरा का वर्णन है.
बात उस समय की है जब कौरव-पांडवो की ओर से महाभारत युद्ध की तैयारी हो रही थी. विदुर जी ध्रतराष्ट्र के पास बुलाये गए. क्यों बुलाये गए ? इसलिए बुलाये गए की ध्रतराष्ट्र को चिन्ता के मारे नीद नहीं आ रही थी. उनको चिंता सता रही थी की अब कौरव पांडवो में युद्ध होगा और वंश का नाश हो जाएगा ऐसी श्तिति में हमें क्या करना चाहिए ?
ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था. उन्होंने दुनिया को बड़े जोर से पकड़ रखा था. उनको परमात्मा तो सूझता ही नहीं था, केवल दुनिया सूझती थी. वे परमात्मा के न सूझने के कारण अंधे थे और दुनिया को पकड़ रखने के कारण ध्रतराष्ट्र थे.
विदुरजी साक्षात् ज्ञान की मूर्ती और धर्मराज के अवतार थे. आप लोगो ने सुना होगा की जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवो के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे तब दुर्योधन ने उनके लिए अपने महल सजा दिए, उनको भेट में देने के लिए बहुमूल्य हीरे मोतियों का ढेर लगा दिया और उनसे प्रार्थना की की आप हमारे यहाँ विश्राम कीजिये और भोजनपर पधारिये.
परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया की दुर्योधन मुझे कोई प्रेम से खिलाता है तो मै उसके घर अवश्यखाता हूँ. यदि भूखा होऊ तो कही मांगकर भी खा लेता हूँ लेकिन तुम न तो मुझे प्रेम से खिलाना चाहते हो और न मै भूखा हूँ इसलिए मै तुम्हारे घर में न तो ठहरूगा और न ही भोजन करूगा.
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण बिना बुलाये ही विदुर के घर चले गए. भागवत के इसी तीसरे स्कंध के प्रारंभ में श्रीशुकदेवजी महाराज ने परीक्षित से कहा की भगवान् विदुर के घर को अपना ही घर समझते थे इसलिए वे दुर्योधन के निमंत्रण को ठुकराकर अपने आप वहा चले गए.
वही विदुरजी जब बुलाये जाने पर ध्रतराष्ट्र के पास गए तब उन्होंने उनको न्याय की, सत्य की, निष्पक्षता की बात समझाई और कहा की तुम्हे अपने तथा पांडू के पुत्रो के साथ विषमता का व्यवहार नहीं करना चाहिए. तुम्हारे घर में दुर्योधन रूपी कलियुग का अवतार हुआ है और यह वंश का नाश करने के लिए आया है.
यह बात जब दुर्योधन को मालूम हुई तब वह विदुरजी पर बहुत नाराज हुआ इस पर विदुरजी ने अपना धनुष बाण वही ध्रतराष्ट्र के दरवाजे पर रख दिया, जिससे की कोई यह न समझे की मै पांडव पक्ष में मिलकर कौरवो के साथ युद्ध करूगा और फिर वे घर नगर छोड़कर तीर्थाटन के लिए निकल पड़े. विभिन्न तीर्थो का भ्रमण करते हुए जब वे यमुना तट पर पहुचे तब वहा उनकी भेट उद्धव जी से हो गयी उनसे विदुरजी ने द्वारका का कुशल मंगल पूछा.
तबतक भगवान् श्रीकृष्ण अंतर्धान हो चुके थे. सिर्फ उद्धवजी ही बचे थे. उद्धवजी विदुरजी द्वारा कुशल मंगल पूछने पर श्रीकृष्ण के स्मरण में मग्न हो गए, उनकी आखो से आँसू गिरने लगे और उनके शरीर में रोमांच हो गया.
यह स्रष्टि कैसे हुई ?
स्रष्टि में विविध योनिया कैसे बनी ?
एक ही तत्व. एक ही पंचभूत है फिर उसमे मानुष, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि कैसे बन जाते है ?
विविधता कहा से आ जाती है ?
स्रष्टि किस स्थान में टिकी है ?
स्रष्टि के सूखने पर इसको सीचनेवाला कौन है ?
वासनाए कैसे-कैसे होती है ?
काल का विभाग कैसे होता है ?
भक्तो के चरित्र कैसे होते है ?
भगवान् के प्रेम में मनका निरोध कैसे होता है ?
मुक्ति क्या है ?
सबसे अधिष्ठान परमात्मा का स्वरुप क्या है ?
इन दस वस्तुओ के निरूपण द्वारा सारे श्रीमद्भागवत में एक ही तत्व, एक ही परमात्मा का वर्णन है.
पहले स्कंध में बताया गया है की भागवत के अधिकारी वक्ता-श्रोता सूत-शौनक, नारद-व्यास और शुकदेव-परीक्षित कैसे है तथा दूसरे स्कंध में यह प्रतिपादित किया गया है की भगवत्प्राप्ति के लिए श्रवण ही मुख्य साधन है और उसके इतने अंग है.
भागवत के तीसरे स्कंध में तैतीस अध्याय है. इनमे विसर्ग के द्वारा परमात्मा का वर्णन है विसर्ग का अर्थ है स्रष्टि की विविधता. ब्रह्म के प्रकाश में गुणों की विषमता से जो विविध प्रकार की स्रष्टि होती है, उसको विसर्ग कहते है.
परन्तु यहाँ विसर्ग शब्द का अर्थ बहुत विलक्षण है आपने गीता में पढ़ा है की इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग होते है-एक देव सर्ग और दूसरा आसुर सर्ग-
इसलिए तीसरे स्कंध के पूर्वार्द्ध के उन्नीस अध्यायों में आसुर विसर्ग का और उत्तरार्द्ध के चौदह अध्यायों में देव विसर्ग का वर्णन है. आसुर विसर्ग में हिरण्याक्ष, हिरान्य्कशिपू की कथा है और देव विसर्ग में मनु-शतरूपा, कर्दम-देवहूति तथा कपिल-अदिति की वंश परंपरा का वर्णन है.
बात उस समय की है जब कौरव-पांडवो की ओर से महाभारत युद्ध की तैयारी हो रही थी. विदुर जी ध्रतराष्ट्र के पास बुलाये गए. क्यों बुलाये गए ? इसलिए बुलाये गए की ध्रतराष्ट्र को चिन्ता के मारे नीद नहीं आ रही थी. उनको चिंता सता रही थी की अब कौरव पांडवो में युद्ध होगा और वंश का नाश हो जाएगा ऐसी श्तिति में हमें क्या करना चाहिए ?
ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था. उन्होंने दुनिया को बड़े जोर से पकड़ रखा था. उनको परमात्मा तो सूझता ही नहीं था, केवल दुनिया सूझती थी. वे परमात्मा के न सूझने के कारण अंधे थे और दुनिया को पकड़ रखने के कारण ध्रतराष्ट्र थे.
विदुरजी साक्षात् ज्ञान की मूर्ती और धर्मराज के अवतार थे. आप लोगो ने सुना होगा की जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवो के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे तब दुर्योधन ने उनके लिए अपने महल सजा दिए, उनको भेट में देने के लिए बहुमूल्य हीरे मोतियों का ढेर लगा दिया और उनसे प्रार्थना की की आप हमारे यहाँ विश्राम कीजिये और भोजनपर पधारिये.
परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया की दुर्योधन मुझे कोई प्रेम से खिलाता है तो मै उसके घर अवश्यखाता हूँ. यदि भूखा होऊ तो कही मांगकर भी खा लेता हूँ लेकिन तुम न तो मुझे प्रेम से खिलाना चाहते हो और न मै भूखा हूँ इसलिए मै तुम्हारे घर में न तो ठहरूगा और न ही भोजन करूगा.
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण बिना बुलाये ही विदुर के घर चले गए. भागवत के इसी तीसरे स्कंध के प्रारंभ में श्रीशुकदेवजी महाराज ने परीक्षित से कहा की भगवान् विदुर के घर को अपना ही घर समझते थे इसलिए वे दुर्योधन के निमंत्रण को ठुकराकर अपने आप वहा चले गए.
वही विदुरजी जब बुलाये जाने पर ध्रतराष्ट्र के पास गए तब उन्होंने उनको न्याय की, सत्य की, निष्पक्षता की बात समझाई और कहा की तुम्हे अपने तथा पांडू के पुत्रो के साथ विषमता का व्यवहार नहीं करना चाहिए. तुम्हारे घर में दुर्योधन रूपी कलियुग का अवतार हुआ है और यह वंश का नाश करने के लिए आया है.
यह बात जब दुर्योधन को मालूम हुई तब वह विदुरजी पर बहुत नाराज हुआ इस पर विदुरजी ने अपना धनुष बाण वही ध्रतराष्ट्र के दरवाजे पर रख दिया, जिससे की कोई यह न समझे की मै पांडव पक्ष में मिलकर कौरवो के साथ युद्ध करूगा और फिर वे घर नगर छोड़कर तीर्थाटन के लिए निकल पड़े. विभिन्न तीर्थो का भ्रमण करते हुए जब वे यमुना तट पर पहुचे तब वहा उनकी भेट उद्धव जी से हो गयी उनसे विदुरजी ने द्वारका का कुशल मंगल पूछा.
तबतक भगवान् श्रीकृष्ण अंतर्धान हो चुके थे. सिर्फ उद्धवजी ही बचे थे. उद्धवजी विदुरजी द्वारा कुशल मंगल पूछने पर श्रीकृष्ण के स्मरण में मग्न हो गए, उनकी आखो से आँसू गिरने लगे और उनके शरीर में रोमांच हो गया.
12/17/2010
सच क्या है यह मुझे मालूम नहीं है
जो चीज न हो उसको दिखानेवाली और जो चीज हो उसको ढकनेवाली माया ही तो है. ये जितने भी पुतले बने हुए है जैसे मनुष्य के] पशु के] पक्षी के] वृक्ष के] लता के इन सबमे पंचभूत भरे हुए है. मिटटी में पानी है, पानी में आग है, आग में वायु है और वायु में आकाश है. जब हम शांत बैठे रहते है तब आकाश में स्थित रहते है, जब हम दौड़ते है तब गति उत्पन्न होने के कारण शरीर में गरमी आती है, गर्मी से पसीना आता है और पसीना जमकर मिटटी हो जाता है. समग्र विश्व स्रष्टि पंचभूत में कल्पित है और बड़े भूत छोटे भूतो में कल्पित रहते है. आकाश वायु को, वायु अग्नि को और अग्नि तेज को धारण करता है. इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व स्रष्टि में मै भरपूर हूँ मेरे अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं है.
यहाँ उस व्यक्ति की बात नहीं है जो केवल यह जानना चाहता है की खाने-पहनने की, पद अधिकार की चीज क्या है ? जिसके ह्रदय में धन चले जाने से , रोग हो जाने से म्रत्यु की कल्पना से भय लगता है और जिसकी द्रष्टि सत्य अनुसंधान करने की ओर नहीं जाती, उसका जीवन तो नशे में बीत रहा है.
यहाँ बात की जा रही है उस एक जिज्ञासु की जो सत्य की असलियत को जानना चाहता है, जिसके ह्रदय में यह वेदना है की हाय-हाय मुझको इतना अच्छा जीवन प्राप्त हुआ, बुध्धि प्राप्त हुई लेकिन सच क्या है यह मुझे मालूम नहीं है. इस प्रकार अज्ञान की पीड़ा जिसके ह्रदय में है, उसके लिए भगवान् ब्रह्मा जी को निमित्त बनाकर कहते है-जो चीज हर समय, हर जगह, हर रूप में मौजूद है, जिसके होने से सब मालूम पड़ता है और सबके विना भी जो मालूम पड़ता है उस चीज को तू जान ले . उसको जान लेने पर तुम देखोगे की वह वस्तु तुम्हारी आत्मा से एक है और उसी से वही सत्य का साक्षात्कार होता है.
इस प्रकार चतुह्श्लोकी भागवत में भगवान् ने ब्रह्माजी को निमित्त बनाकर समस्त जिज्ञासुओ को अपने अनंत विस्तार का अपनी माया के खेल का, स्रष्टि की उत्पत्ति का और जीव जगत के अंतिम ज्ञातव्य का वर्णन किया है.
जैसे चतुह्श्लोकी भागवत है वैसे ही चतुह्श्लोकी महाभारत भी है. चतुह्श्लोकी महाभारत को महाभारत की गायत्री अथवा सावित्री भी बोलते है. जिस प्रकार चार श्लोको में समग्र श्रीमद्भागवत के ज्ञान का वर्णन है उसी प्रकार चार श्लोको में महाभारत जैसे विशालकाय महाग्रंथ के प्रतिपाद्य का भी वर्णन है.
अनन्तश्री स्वामी अखंडानंद सरस्तीजी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार
यहाँ उस व्यक्ति की बात नहीं है जो केवल यह जानना चाहता है की खाने-पहनने की, पद अधिकार की चीज क्या है ? जिसके ह्रदय में धन चले जाने से , रोग हो जाने से म्रत्यु की कल्पना से भय लगता है और जिसकी द्रष्टि सत्य अनुसंधान करने की ओर नहीं जाती, उसका जीवन तो नशे में बीत रहा है.
यहाँ बात की जा रही है उस एक जिज्ञासु की जो सत्य की असलियत को जानना चाहता है, जिसके ह्रदय में यह वेदना है की हाय-हाय मुझको इतना अच्छा जीवन प्राप्त हुआ, बुध्धि प्राप्त हुई लेकिन सच क्या है यह मुझे मालूम नहीं है. इस प्रकार अज्ञान की पीड़ा जिसके ह्रदय में है, उसके लिए भगवान् ब्रह्मा जी को निमित्त बनाकर कहते है-जो चीज हर समय, हर जगह, हर रूप में मौजूद है, जिसके होने से सब मालूम पड़ता है और सबके विना भी जो मालूम पड़ता है उस चीज को तू जान ले . उसको जान लेने पर तुम देखोगे की वह वस्तु तुम्हारी आत्मा से एक है और उसी से वही सत्य का साक्षात्कार होता है.
इस प्रकार चतुह्श्लोकी भागवत में भगवान् ने ब्रह्माजी को निमित्त बनाकर समस्त जिज्ञासुओ को अपने अनंत विस्तार का अपनी माया के खेल का, स्रष्टि की उत्पत्ति का और जीव जगत के अंतिम ज्ञातव्य का वर्णन किया है.
जैसे चतुह्श्लोकी भागवत है वैसे ही चतुह्श्लोकी महाभारत भी है. चतुह्श्लोकी महाभारत को महाभारत की गायत्री अथवा सावित्री भी बोलते है. जिस प्रकार चार श्लोको में समग्र श्रीमद्भागवत के ज्ञान का वर्णन है उसी प्रकार चार श्लोको में महाभारत जैसे विशालकाय महाग्रंथ के प्रतिपाद्य का भी वर्णन है.
अनन्तश्री स्वामी अखंडानंद सरस्तीजी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार
12/14/2010
जब ईश्वर की द्रष्टि से देखेगे तब जान सकेगे इस स्रष्टि का रहस्य
जब अनंत नारायण की नाभि से एक कमल निकला और उस कमल पर ब्रह्मा उत्पन्न हुए तब ब्रह्मा ने चारो ओर देखने का प्रयास किया. उनके चार मुह हो गए. उनको यह विचार हुआ की उनके सिवाय तो और कुछ है ही नहीं. फिर वह कौन है, जिससे मै प्रकट हुआ हूँ.
उन्होंने ढूढने का प्रयास किया लेकिन उनको अपना कारण न बाहर मिल और न भीतर मिला. भला अपने पिता का जन्म कोई कैसे जान सकता है ? ब्रह्माजी को प्रयास करने पर कुछ पता नहीं लगा.
इसके बाद ब्रह्मा जब अपनी उत्पाती का आधार जानने के लिए व्यग्र हो गए तब उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई पड़ी की तप,तप,तप !
वर्णों में जो सोलहवे और इक्कीसवे अक्षर त तथा प है, वे दोनों उनको सुनाई पड़े. उन्होंने आलोडन करके देखा की जो व्यापक विश्व तत्व है, नारायण है, परमेश्वर है वह और कही नहीं, यही है. फिर ब्रह्माजी को भगवान का दर्शन वही हो गया. उनपर भगवान प्रसन्न हो गए और बोले की ब्रह्माजी, तुमने बहुत तप किया अब तुम्हारी जो इस्च्छा हो वह वर मुझसे मांग लो.
यहाँ देखो, अंतःकरण का आधिदैव है , इसमें चार प्रकार की वृत्तिया होती है. यदि आपको आधिदैव का साक्षात्कार करना हो तो पहले अध्यात्म का साक्षात्कार करना होता है. हमारे ह्रदय के भीतर जो चीजे है उनको तो हम देखते नहीं, बाहर की चीजो को देखने के लिए निकल पड़ते है. जिस चीज को आपने अपने घर में नहीं पहुचाना उसको बाहर जाकर कैसे पहचानेगे ?
पहचानिए, ब्रह्माजी का रंग लाल है. स्रष्टि के करता है, इसलिए उनमे राजस की प्रधानता है. फिर बिना ज्ञान के स्रष्टि नहीं हो सकती इसलिए ज्ञान विवेक का पक्षी हंस उनका वाहन है. चारो वेद उनके चारो मुख है. उनके अंतःकरण की वृत्तिया है संकल्परूप मन, विकल्परूप चित्त, निश्च्यरूप बुद्धि और अहमक्रिया रूप अहंकार. इन सबसे संपन्न होकर ब्रह्माजी स्रष्टि का निर्माण करते है.
जब भगवान ने ब्रह्माजी को दर्शन दिया तब उन पर प्रसन्न होकर उनसे हाथ मिलाया. ब्रह्माजी ने भगवान् को प्रणाम किया और बोले - महाराज मुझे तो तत्वविज्ञान चाहिए. इस पर भगवान ने उनको चतुह्श्लोकी भागवत का उपदेश किया, चार श्लोको में पूरा भागवत सुना दिया, उनमे प्रवेश करने के लिए शुद्ध बुद्धि चाहिए. बह्माजी ने जब तप किया तब उनको भगवान के दर्शन हुए और उन्होंने उनके उपदेश को समझा.
आप जो कुछ देखते या मानते है, उसको भगवान की द्रष्टि से मिलाईये और फिर देखिये की आपका देखना मानना भगवान की द्रष्टि से थी है या नहीं ? आप सोचिये की ईश्वर सब कुछ देख रहा है तब जैसा ईश्वर को दीखता है वह सच है या जैसा आपको दीखता है, वह सच है ?
आपकी इन छोटी-छोटी अक्षम आखो से तो फर्लांग-दो-फर्लांग की चीज भी ठीक-ठीक नहीं दिखाई देती, सूक्ष्म कड भी नहीं दिखाई पड़ते, फिर इन आखो से जो दिखाई देता है, उसी को सच मानकर आप उसमे क्यों फस जाते है ? पूर्णता की द्रष्टि से क्या सत्य होता है इस पर आपका ध्यान क्यों नहीं जाता ? अरे, जिसमे पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण और ऊपर-नीचे नहीं है, भूत, भविष्य, वर्तमान तीनो नहीं है, उसका आदि किसी ने देखा है ? भविष्य का अंत किसी ने देखा है ? वर्तमान में ही तो जो बीतता जाता है उसका नाम भूत होता जाता है और जो आने वाला होता है उसका नाम भविष्य होता जाता है. और जो आने वाला होता है उसका नाम भविष्य होता है.
जहा मै है वहा काल के आदि अथवा अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसी प्रकार देश के आदि अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसलिए जब आप ईश्वर को द्रष्टि से देखेगे, इश्वर के साथ एक हो जायेगे, तदात्म्यापन्न हो जायेगे तभी इस स्रष्टि का स्वरुप समझ सकेगे, अभी तो आपका कोई है और कोई नहीं है कोई अपना है, कोई पराया है कोई मित्र है और कोई शत्रु है, कोई अच्छा है, कोई बुरा है, किन्तु जब आप ईश्वर की द्रष्टि से देखेगे तब यह जान सकेगे की इस स्रष्टि का रहस्य क्या है ?
उन्होंने ढूढने का प्रयास किया लेकिन उनको अपना कारण न बाहर मिल और न भीतर मिला. भला अपने पिता का जन्म कोई कैसे जान सकता है ? ब्रह्माजी को प्रयास करने पर कुछ पता नहीं लगा.
इसके बाद ब्रह्मा जब अपनी उत्पाती का आधार जानने के लिए व्यग्र हो गए तब उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई पड़ी की तप,तप,तप !
वर्णों में जो सोलहवे और इक्कीसवे अक्षर त तथा प है, वे दोनों उनको सुनाई पड़े. उन्होंने आलोडन करके देखा की जो व्यापक विश्व तत्व है, नारायण है, परमेश्वर है वह और कही नहीं, यही है. फिर ब्रह्माजी को भगवान का दर्शन वही हो गया. उनपर भगवान प्रसन्न हो गए और बोले की ब्रह्माजी, तुमने बहुत तप किया अब तुम्हारी जो इस्च्छा हो वह वर मुझसे मांग लो.
यहाँ देखो, अंतःकरण का आधिदैव है , इसमें चार प्रकार की वृत्तिया होती है. यदि आपको आधिदैव का साक्षात्कार करना हो तो पहले अध्यात्म का साक्षात्कार करना होता है. हमारे ह्रदय के भीतर जो चीजे है उनको तो हम देखते नहीं, बाहर की चीजो को देखने के लिए निकल पड़ते है. जिस चीज को आपने अपने घर में नहीं पहुचाना उसको बाहर जाकर कैसे पहचानेगे ?
पहचानिए, ब्रह्माजी का रंग लाल है. स्रष्टि के करता है, इसलिए उनमे राजस की प्रधानता है. फिर बिना ज्ञान के स्रष्टि नहीं हो सकती इसलिए ज्ञान विवेक का पक्षी हंस उनका वाहन है. चारो वेद उनके चारो मुख है. उनके अंतःकरण की वृत्तिया है संकल्परूप मन, विकल्परूप चित्त, निश्च्यरूप बुद्धि और अहमक्रिया रूप अहंकार. इन सबसे संपन्न होकर ब्रह्माजी स्रष्टि का निर्माण करते है.
जब भगवान ने ब्रह्माजी को दर्शन दिया तब उन पर प्रसन्न होकर उनसे हाथ मिलाया. ब्रह्माजी ने भगवान् को प्रणाम किया और बोले - महाराज मुझे तो तत्वविज्ञान चाहिए. इस पर भगवान ने उनको चतुह्श्लोकी भागवत का उपदेश किया, चार श्लोको में पूरा भागवत सुना दिया, उनमे प्रवेश करने के लिए शुद्ध बुद्धि चाहिए. बह्माजी ने जब तप किया तब उनको भगवान के दर्शन हुए और उन्होंने उनके उपदेश को समझा.
आप जो कुछ देखते या मानते है, उसको भगवान की द्रष्टि से मिलाईये और फिर देखिये की आपका देखना मानना भगवान की द्रष्टि से थी है या नहीं ? आप सोचिये की ईश्वर सब कुछ देख रहा है तब जैसा ईश्वर को दीखता है वह सच है या जैसा आपको दीखता है, वह सच है ?
आपकी इन छोटी-छोटी अक्षम आखो से तो फर्लांग-दो-फर्लांग की चीज भी ठीक-ठीक नहीं दिखाई देती, सूक्ष्म कड भी नहीं दिखाई पड़ते, फिर इन आखो से जो दिखाई देता है, उसी को सच मानकर आप उसमे क्यों फस जाते है ? पूर्णता की द्रष्टि से क्या सत्य होता है इस पर आपका ध्यान क्यों नहीं जाता ? अरे, जिसमे पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण और ऊपर-नीचे नहीं है, भूत, भविष्य, वर्तमान तीनो नहीं है, उसका आदि किसी ने देखा है ? भविष्य का अंत किसी ने देखा है ? वर्तमान में ही तो जो बीतता जाता है उसका नाम भूत होता जाता है और जो आने वाला होता है उसका नाम भविष्य होता जाता है. और जो आने वाला होता है उसका नाम भविष्य होता है.
जहा मै है वहा काल के आदि अथवा अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसी प्रकार देश के आदि अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसलिए जब आप ईश्वर को द्रष्टि से देखेगे, इश्वर के साथ एक हो जायेगे, तदात्म्यापन्न हो जायेगे तभी इस स्रष्टि का स्वरुप समझ सकेगे, अभी तो आपका कोई है और कोई नहीं है कोई अपना है, कोई पराया है कोई मित्र है और कोई शत्रु है, कोई अच्छा है, कोई बुरा है, किन्तु जब आप ईश्वर की द्रष्टि से देखेगे तब यह जान सकेगे की इस स्रष्टि का रहस्य क्या है ?
12/13/2010
जो नहीं है वह दिखाई पड़ने लगे और जो है उसका दिखना बंद हो जाय
भगवान् की माया से यह श्रष्टि उत्पन्न हुई है. माया माने लोक व्यवहार में बोला जानेवाला जादू खेल. जहा जो चीज न हो उसको वहा दिखा देना, जहा जो चीज हो उसको ढक देना, देखनेवाले की आख बांध देना यही जादू है. इसी तरह जो नहीं है वह दिखाई पड़ने लगे और जो है उसका दिखना बंद हो जाय इसी का नाम माया होता है.
माया के बिना अद्वितीय अनंत परमात्मा में यह श्रष्टि दिखाई नहीं पड़ सकती . उपासक लोग माया को ब्रह्मज्ञान की अचिन्त्य शक्ति कहते है और वेदांती लोग देहात्म भ्रम के कारण श्रष्टि की. संगती लगाने के लिए भगवान में माया को अध्यारोपित मानते है लेकिन चाहे अध्यारोपित मानो, चाहे भगवान् की अचिन्त्य शक्ति मानो यह जो समग्र श्रष्टि पैदा हुई है, भगवान् की माया ही है, भगवान् के जादू का खेल ही है.
जो अनित्यवस्तु होती है, उसी का जन्म होता है. यह श्रष्टि आने जानेवाली है. पैदा होने के कारण मरने वाली है और परिवर्तनशील है. किन्तु इसमें जो जीव है वह नित्य है.
दुनिया में ऐसा कोई माई का लाल नहीं है जो यह अनुभव कर ले की मै नहीं हूँ. ऐसा कोई व्यक्ति न हुआ है न है और न आगे होने वाला है. यह भौतिक विज्ञानं नहीं है की इसमें न जाने क्या-क्या आविष्कार होने की सम्भावना है. यह तो अनुभवका क्षेत्र है. यहाँ सर्वथा सुनिश्चित है की कोई भी मै नहीं हूँ - ऐसा अनुभव नहीं कर सकता. कोई भी वस्तु चाहे वह ज्ञान हो, चाहे अज्ञान हो, ज्ञान ही विदित होती है. ज्ञान बिना सुषुप्ति भी प्रकाशित नहीं होती, समाधी भी प्रकाशित नहीं होती, प्रलय भी प्रकाशित नहीं होता. यहाँ तक की ज्ञान का लोप भी ज्ञान से ही मालूम पड़ता है.
यह एक बात पर आप ध्यान दीजिये. पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण की जो चारो दिशाए है, कहा से पैदा होती है ? क्या आप बता सकते है की पूर्व से पूर्व, पश्चिम से पश्चिम कहा से शुरू हुआ है ? इसी तरह पूर्व-पश्चिम का कहा अंत होता है, कोई बता नहीं सकता है. ऊपर और नीचे कहा-कहा से प्रारंभ होता है, किसी को मालूम है ? उसका एक मात्र उत्तर यही है की किसी को भी पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाओं के आदि-अंत का पता नहीं है.
लेकिन अध्यात्म इसका उत्तर देता है. वह कहता है की जहा आपका मै है, वही से पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाए शुरू होती है. यदि आप इनको दूसरी जगह ढूढने जायेगे तो ये आपको कही भी नहीं मिलेगी. केवल आपको अज्ञान मिलेगा, और आप उसके अन्धकार में डूब जायेगे. इसलिए आपको पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे की दिशाओं तथा इतिहास का आदि ढूढने के लिए कही बाहर जाने की जरूरत नहीं है. आपका जहा मै है, वही सच्चा आदि है, वही अनादी बैठा हुआ है और वही उसी ज्ञानस्वरूप मै में परमात्मा है. फिर आपको अज्ञान में भटकने की क्या जरूरत है ?
यदि आप कहे की श्रष्टि की उत्पत्ति मै से कैसे होती है. क्योकि मै तो साक्षी है, ज्ञानस्वरूप है, उसके द्वारा किस प्रकार श्रष्टि होगी, तो इसका उत्तर है की श्रष्टि इस प्रकार नहीं होती माया से श्रष्टि होती है. जबतक श्रष्टि दिखाई पड़ती है, उसके कारण ही कल्पना करनी पड़ती है.
भागवत में श्रष्टि की उत्पत्ति का निरूपण क्रम से किया गया है और फिर बताया गया है की भगवान् का जन्म कैसे होता है ? जो अनित्य है, उसी की उत्पत्ति होती है. जो नित्य और परिच्छिन्न जीव है, उसका अनित्य से समागम होता है तथा जो नित्य अपरिच्छिन्न परमात्मा है, उसमे सारी की सारी श्रष्टि माया से आविर्भूत होती है. इस प्रकार उत्पत्ति के प्रसंग का निरूपण द्वितीय स्कंध के पांच, छेह और सात इन तीन अध्यायों में किया गया है. पहले माया से जगत की उत्पत्ति, फिर जीव का समागम और तत्पश्चात भगवान् के अवतार का वर्णन.
श्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की भाग्वाताम्रत से साभार
माया के बिना अद्वितीय अनंत परमात्मा में यह श्रष्टि दिखाई नहीं पड़ सकती . उपासक लोग माया को ब्रह्मज्ञान की अचिन्त्य शक्ति कहते है और वेदांती लोग देहात्म भ्रम के कारण श्रष्टि की. संगती लगाने के लिए भगवान में माया को अध्यारोपित मानते है लेकिन चाहे अध्यारोपित मानो, चाहे भगवान् की अचिन्त्य शक्ति मानो यह जो समग्र श्रष्टि पैदा हुई है, भगवान् की माया ही है, भगवान् के जादू का खेल ही है.
जो अनित्यवस्तु होती है, उसी का जन्म होता है. यह श्रष्टि आने जानेवाली है. पैदा होने के कारण मरने वाली है और परिवर्तनशील है. किन्तु इसमें जो जीव है वह नित्य है.
दुनिया में ऐसा कोई माई का लाल नहीं है जो यह अनुभव कर ले की मै नहीं हूँ. ऐसा कोई व्यक्ति न हुआ है न है और न आगे होने वाला है. यह भौतिक विज्ञानं नहीं है की इसमें न जाने क्या-क्या आविष्कार होने की सम्भावना है. यह तो अनुभवका क्षेत्र है. यहाँ सर्वथा सुनिश्चित है की कोई भी मै नहीं हूँ - ऐसा अनुभव नहीं कर सकता. कोई भी वस्तु चाहे वह ज्ञान हो, चाहे अज्ञान हो, ज्ञान ही विदित होती है. ज्ञान बिना सुषुप्ति भी प्रकाशित नहीं होती, समाधी भी प्रकाशित नहीं होती, प्रलय भी प्रकाशित नहीं होता. यहाँ तक की ज्ञान का लोप भी ज्ञान से ही मालूम पड़ता है.
यह एक बात पर आप ध्यान दीजिये. पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण की जो चारो दिशाए है, कहा से पैदा होती है ? क्या आप बता सकते है की पूर्व से पूर्व, पश्चिम से पश्चिम कहा से शुरू हुआ है ? इसी तरह पूर्व-पश्चिम का कहा अंत होता है, कोई बता नहीं सकता है. ऊपर और नीचे कहा-कहा से प्रारंभ होता है, किसी को मालूम है ? उसका एक मात्र उत्तर यही है की किसी को भी पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाओं के आदि-अंत का पता नहीं है.
लेकिन अध्यात्म इसका उत्तर देता है. वह कहता है की जहा आपका मै है, वही से पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाए शुरू होती है. यदि आप इनको दूसरी जगह ढूढने जायेगे तो ये आपको कही भी नहीं मिलेगी. केवल आपको अज्ञान मिलेगा, और आप उसके अन्धकार में डूब जायेगे. इसलिए आपको पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे की दिशाओं तथा इतिहास का आदि ढूढने के लिए कही बाहर जाने की जरूरत नहीं है. आपका जहा मै है, वही सच्चा आदि है, वही अनादी बैठा हुआ है और वही उसी ज्ञानस्वरूप मै में परमात्मा है. फिर आपको अज्ञान में भटकने की क्या जरूरत है ?
यदि आप कहे की श्रष्टि की उत्पत्ति मै से कैसे होती है. क्योकि मै तो साक्षी है, ज्ञानस्वरूप है, उसके द्वारा किस प्रकार श्रष्टि होगी, तो इसका उत्तर है की श्रष्टि इस प्रकार नहीं होती माया से श्रष्टि होती है. जबतक श्रष्टि दिखाई पड़ती है, उसके कारण ही कल्पना करनी पड़ती है.
भागवत में श्रष्टि की उत्पत्ति का निरूपण क्रम से किया गया है और फिर बताया गया है की भगवान् का जन्म कैसे होता है ? जो अनित्य है, उसी की उत्पत्ति होती है. जो नित्य और परिच्छिन्न जीव है, उसका अनित्य से समागम होता है तथा जो नित्य अपरिच्छिन्न परमात्मा है, उसमे सारी की सारी श्रष्टि माया से आविर्भूत होती है. इस प्रकार उत्पत्ति के प्रसंग का निरूपण द्वितीय स्कंध के पांच, छेह और सात इन तीन अध्यायों में किया गया है. पहले माया से जगत की उत्पत्ति, फिर जीव का समागम और तत्पश्चात भगवान् के अवतार का वर्णन.
श्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की भाग्वाताम्रत से साभार
12/12/2010
भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान है.
असल में पवित्र वही है जिसके स्मरण से अपवित्र पवित्र हो जाते है, पतित पावन हो जाते है, पिछड़े हुए आगे बढ़ जाए है और ऊपर उठ जाते हो.
भगवान् के स्मरण से उनका आश्रय ग्रहण करने से किरात, हूड, आंध्र, पुलिंद, पुल्कस माने कसाई सब के सब पवित्र हो जाते है. इसीलिए श्रीशुकदेवजी महाराज भगवान् को नमस्कार करके उनसे प्रार्थना करते है की प्रभो पधारो. मेरी इस वाणी पर बैठ जाओ और इसे अलंकृत करो.
सूतजी ने स्पष्ट कर दिया है की भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान ही है. जिस तरह शरद ऋतू आती है तो सारा जल अपने आप स्वच्छ हो जाता है उसी तरह कान के रास्ते से भगवान् हमारे ह्रदय में प्रवेह करते है तो सारे कल्मष दूर हो जाते है-
प्रविष्टिः कर्ण रंध्रेड स्वनाम भावसरोरुहम.
धुनोति शमलम कृष्णः सलिलस्य यथा शरत.
कोई सज्जन अपने एक मित्र के यहाँ मिलने गए. मित्र के घर का दरवाजा भीतर से बंद था उन्होंने बहुत पुकारा-खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. दूसरी ओर एक खिड़की खुली दिखाई पड़ी. सज्जन उसी खिड़की के रस्ते किसी प्रकार भीतर घुसे तो उन्होंने देखा की उनका मित्र बीमार है, छत पर बेहोश पड़ा है, घर में कई दिनों से झाड़ू नहीं लगी है, खाने -पीने का भी साधन नहीं है.
सज्जन ने पहले घर की सफाई की, मित्र का हाथ मुह साफ़ किया, उसके कपडे बदले, उसको दवा दी, पथ्य दिया और इस प्रकार उस मित्र को स्वस्थ्य कर दिया, मित्र ने पूछा की भाई तुम घर में आये कैसे ? न दरवाजा खुला था और न मैंने तुमको कोई सूचना दी थी. सज्जन ने कहा की मुझे बुलाने के लिए तुम्हारे निमंत्रण की जरूरत नहीं थी, इसलिए बिना बुलाये आ गया और जब मैंने तुम्हारा दरवाजा बंद देखा तो उस खुली खिड़की से भीतर आ गया.
इसी तरह भगवान् करते है. जैसे कोई नकाब लगाकर किसी के घर में घुस आता है उसी तरह भगवान संसार की भावनाओं से भरे हुए मनुष्य के ह्रदय में उसके काम के छिद्र से प्रविष्ट हो जाते है और उसके सारे दोष दूर कर देते है.
श्रवण में एक तो चाहिए तत्व का ज्ञान, दूसरा चाहिए नियम, तीसरा चाहिए ह्रदय की निर्मलता और चौथा चाहिए भगवान् का स्तवन. भगवान् सबसे बड़े है, उनसे बड़ा कोई नहीं है-ऐसा समझकर भगवान् के उत्कर्ष का मन में चिंतन, वाणी से भगवान् के चरित्र का वर्णन और कान से भगवान के गुणों का श्रवण ह्रदय को निर्मल बनाता है.
जब तत्व ध्यानपूर्वक निर्मल ह्रदय से भगवान् के सम्बन्ध में मनन किया जाता है तभी श्रवण पूरा होता है.
मनन दो तरह से होता है-एक तो उत्पत्ति के द्वारा और दूसरा उपपत्ति के द्वारा. उपपत्ति द्वारा किये जानेवाले मनन के प्रसंग में नारदजी ब्रह्माजी से कहते है-पिताजी, मै तो समझता हूँ की दुनिया में आप सबसे बड़े है. फिर आप ध्यान किसका करते है ? क्या आपसे बड़ा भी दूसरा कोई है, जिसका आप खयान करते है ? यह सुनकर ब्रह्मा जी हंस पड़े और बोले की बेटा, तुमको अभी मालूम नहीं है. एक ऎसी वस्तु है जो मुझसे, मेरी सारी श्रष्टि से, अनंत कोटि ब्रह्मांडो से और समग्र प्रकृति से भी निराली है. उसी से हम लोग पैदा होते है.
इसके बाद ब्रह्माजी ने उत्पत्ति क्रम का वर्णन करते हुए बताया की किस प्रकार भगवान् की माया द्वारा यह श्रष्टि हुई.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार
भगवान् के स्मरण से उनका आश्रय ग्रहण करने से किरात, हूड, आंध्र, पुलिंद, पुल्कस माने कसाई सब के सब पवित्र हो जाते है. इसीलिए श्रीशुकदेवजी महाराज भगवान् को नमस्कार करके उनसे प्रार्थना करते है की प्रभो पधारो. मेरी इस वाणी पर बैठ जाओ और इसे अलंकृत करो.
सूतजी ने स्पष्ट कर दिया है की भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान ही है. जिस तरह शरद ऋतू आती है तो सारा जल अपने आप स्वच्छ हो जाता है उसी तरह कान के रास्ते से भगवान् हमारे ह्रदय में प्रवेह करते है तो सारे कल्मष दूर हो जाते है-
प्रविष्टिः कर्ण रंध्रेड स्वनाम भावसरोरुहम.
धुनोति शमलम कृष्णः सलिलस्य यथा शरत.
कोई सज्जन अपने एक मित्र के यहाँ मिलने गए. मित्र के घर का दरवाजा भीतर से बंद था उन्होंने बहुत पुकारा-खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. दूसरी ओर एक खिड़की खुली दिखाई पड़ी. सज्जन उसी खिड़की के रस्ते किसी प्रकार भीतर घुसे तो उन्होंने देखा की उनका मित्र बीमार है, छत पर बेहोश पड़ा है, घर में कई दिनों से झाड़ू नहीं लगी है, खाने -पीने का भी साधन नहीं है.
सज्जन ने पहले घर की सफाई की, मित्र का हाथ मुह साफ़ किया, उसके कपडे बदले, उसको दवा दी, पथ्य दिया और इस प्रकार उस मित्र को स्वस्थ्य कर दिया, मित्र ने पूछा की भाई तुम घर में आये कैसे ? न दरवाजा खुला था और न मैंने तुमको कोई सूचना दी थी. सज्जन ने कहा की मुझे बुलाने के लिए तुम्हारे निमंत्रण की जरूरत नहीं थी, इसलिए बिना बुलाये आ गया और जब मैंने तुम्हारा दरवाजा बंद देखा तो उस खुली खिड़की से भीतर आ गया.
इसी तरह भगवान् करते है. जैसे कोई नकाब लगाकर किसी के घर में घुस आता है उसी तरह भगवान संसार की भावनाओं से भरे हुए मनुष्य के ह्रदय में उसके काम के छिद्र से प्रविष्ट हो जाते है और उसके सारे दोष दूर कर देते है.
श्रवण में एक तो चाहिए तत्व का ज्ञान, दूसरा चाहिए नियम, तीसरा चाहिए ह्रदय की निर्मलता और चौथा चाहिए भगवान् का स्तवन. भगवान् सबसे बड़े है, उनसे बड़ा कोई नहीं है-ऐसा समझकर भगवान् के उत्कर्ष का मन में चिंतन, वाणी से भगवान् के चरित्र का वर्णन और कान से भगवान के गुणों का श्रवण ह्रदय को निर्मल बनाता है.
जब तत्व ध्यानपूर्वक निर्मल ह्रदय से भगवान् के सम्बन्ध में मनन किया जाता है तभी श्रवण पूरा होता है.
मनन दो तरह से होता है-एक तो उत्पत्ति के द्वारा और दूसरा उपपत्ति के द्वारा. उपपत्ति द्वारा किये जानेवाले मनन के प्रसंग में नारदजी ब्रह्माजी से कहते है-पिताजी, मै तो समझता हूँ की दुनिया में आप सबसे बड़े है. फिर आप ध्यान किसका करते है ? क्या आपसे बड़ा भी दूसरा कोई है, जिसका आप खयान करते है ? यह सुनकर ब्रह्मा जी हंस पड़े और बोले की बेटा, तुमको अभी मालूम नहीं है. एक ऎसी वस्तु है जो मुझसे, मेरी सारी श्रष्टि से, अनंत कोटि ब्रह्मांडो से और समग्र प्रकृति से भी निराली है. उसी से हम लोग पैदा होते है.
इसके बाद ब्रह्माजी ने उत्पत्ति क्रम का वर्णन करते हुए बताया की किस प्रकार भगवान् की माया द्वारा यह श्रष्टि हुई.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार
12/11/2010
हम जिन वस्तुओ को महत्वपूर्ण समझते है वे महत्वपूर्ण नहीं
अद्भुत है भागवत का दर्शन. यह किसी एक जाती या राष्ट्र की संपत्ति नहीं है, भगवान के जितने भी बालक है, बच्चे है, उन सबके लिए श्रीमद भागवत है. भागवत में वृक्ष भी भक्त है, पक्षी भी भक्त है, लताये भी भक्त है, जल में कमल खिलते है और नदियों का प्रवाह रुक जाता है. भगवान् की भक्ति में यहाँ की सारी श्रष्टि ओतप्रोत है.
बुरा देखने से बुरी वस्तु अपने ह्रदय में आजाती है और उससे अपना ह्रदय गन्दा हो जाता है. इसलिए तत्व का न करके
अन्वय-व्यतिरेक द्वारा यह निश्चित करना चाहिए की परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है.
जन्म भी वही, मरण भी वही, रोग भी वही, आरोग्य भी वही, वियोग भी वही, संयोग भी वही उसके अतिरिक्त दूसरी कोई बस्तु है ही नहीं.
आपके ह्रदय में भक्ति होनी चाहिए. आप अकाम है की सकाम है इससे कोई मतलब नहीं . भगवान् जब आपके ह्रदय में आयेगे तब उसमे पूर्णता का प्रकाश हो जाएगा.
इस संसार में हम जिन वस्तुओ को बहुत महत्वपूर्ण समझते है वे वस्तुतः महत्वपूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण तो केवल भगवान् ही है. आप उनके रूप का ध्यान कीजिये, आपका मन शुद्ध हो जाएगा, आप यदि चाहे की आपकी क्रममुक्ती हो, आप ब्रह्मलोक में जाए तो भी जा सकते है. यदि आपकी इच्छा यहीं भक्त होने की है तो आपको यहीं सद्योमुक्ति मिल सकती है. भागवत में क्रम मुक्ति और सद्योमुक्ति इन दोनी के मार्ग बताये गए है.
परन्तु कोई भले ही ब्रह्मलोक में चला जाए, वहा जाने पर भी उसको दुःख होता है. उसे यह दुःख होता है की वहा जाने पर यह धरती दिखाई पड़ती है, धरती के लोग दिखाई पड़ते है और यह दिखाई पड़ता है की संसारी लोग केवल धन के कारण दुखी है. जब की दुःख नाम की चीज श्रष्टि में कही नहीं है. केवल उनकी अपनी बुद्धि का यह भ्रम है की इसमें उनको दुःख मालूम पड़ता है.
संसार के लोग बारम्बार इसीलिए दुखी हो रहे है की वे सचाई को जानते नहीं, सत्य को समझते नहीं और संसार के चक्र में फसे हुए है.
शोक्स्थान सहस्राणि भय्स्थान्शतानी च
दिवसे-दिवसे मूध्माविशंती न पंडितम
दिन भर में सैकड़ो हजारो बार भय-शोक से ग्रस्त होना मनुष्य की विद्या बुद्धि की पहचान नहीं है. मूर्खता की ही पहचान है. क्योकि शोक-भय तो इस संसार में आते-जाते रहे है. इनसे अपने चित्त को दुखी नहीं करना चाहिए.
जब जीव ब्रह्मलोक में जाने पर जब धरती के लोगो को दुखी देखता है, तब उसके मन में आता है की इन सबको छोड़कर मेरा अकेला ब्रह्मलोक में आना ठीक नहीं हुआ. फिर तो वह जीव ब्रह्मलोक से कूद पड़ता है और इस धरती पर आकर उससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है. वह अनुभव करता है की सम्पूर्ण प्रथिवी का सुख-दुःख मेरा अपना सुख-दुःख है.
पहले उसका तादात्म्य जड़ से होता है फिर अग्निसे, वायु से, आकाश से, समग्र प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने के बाद वह अपने को साक्षात् परमात्मा के रूप में अनुभव करता है.
श्रीमद्भागवत की यही प्रडाली है.
बुरा देखने से बुरी वस्तु अपने ह्रदय में आजाती है और उससे अपना ह्रदय गन्दा हो जाता है. इसलिए तत्व का न करके
अन्वय-व्यतिरेक द्वारा यह निश्चित करना चाहिए की परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है.
जन्म भी वही, मरण भी वही, रोग भी वही, आरोग्य भी वही, वियोग भी वही, संयोग भी वही उसके अतिरिक्त दूसरी कोई बस्तु है ही नहीं.
आपके ह्रदय में भक्ति होनी चाहिए. आप अकाम है की सकाम है इससे कोई मतलब नहीं . भगवान् जब आपके ह्रदय में आयेगे तब उसमे पूर्णता का प्रकाश हो जाएगा.
इस संसार में हम जिन वस्तुओ को बहुत महत्वपूर्ण समझते है वे वस्तुतः महत्वपूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण तो केवल भगवान् ही है. आप उनके रूप का ध्यान कीजिये, आपका मन शुद्ध हो जाएगा, आप यदि चाहे की आपकी क्रममुक्ती हो, आप ब्रह्मलोक में जाए तो भी जा सकते है. यदि आपकी इच्छा यहीं भक्त होने की है तो आपको यहीं सद्योमुक्ति मिल सकती है. भागवत में क्रम मुक्ति और सद्योमुक्ति इन दोनी के मार्ग बताये गए है.
परन्तु कोई भले ही ब्रह्मलोक में चला जाए, वहा जाने पर भी उसको दुःख होता है. उसे यह दुःख होता है की वहा जाने पर यह धरती दिखाई पड़ती है, धरती के लोग दिखाई पड़ते है और यह दिखाई पड़ता है की संसारी लोग केवल धन के कारण दुखी है. जब की दुःख नाम की चीज श्रष्टि में कही नहीं है. केवल उनकी अपनी बुद्धि का यह भ्रम है की इसमें उनको दुःख मालूम पड़ता है.
संसार के लोग बारम्बार इसीलिए दुखी हो रहे है की वे सचाई को जानते नहीं, सत्य को समझते नहीं और संसार के चक्र में फसे हुए है.
शोक्स्थान सहस्राणि भय्स्थान्शतानी च
दिवसे-दिवसे मूध्माविशंती न पंडितम
दिन भर में सैकड़ो हजारो बार भय-शोक से ग्रस्त होना मनुष्य की विद्या बुद्धि की पहचान नहीं है. मूर्खता की ही पहचान है. क्योकि शोक-भय तो इस संसार में आते-जाते रहे है. इनसे अपने चित्त को दुखी नहीं करना चाहिए.
जब जीव ब्रह्मलोक में जाने पर जब धरती के लोगो को दुखी देखता है, तब उसके मन में आता है की इन सबको छोड़कर मेरा अकेला ब्रह्मलोक में आना ठीक नहीं हुआ. फिर तो वह जीव ब्रह्मलोक से कूद पड़ता है और इस धरती पर आकर उससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है. वह अनुभव करता है की सम्पूर्ण प्रथिवी का सुख-दुःख मेरा अपना सुख-दुःख है.
पहले उसका तादात्म्य जड़ से होता है फिर अग्निसे, वायु से, आकाश से, समग्र प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने के बाद वह अपने को साक्षात् परमात्मा के रूप में अनुभव करता है.
श्रीमद्भागवत की यही प्रडाली है.
9/27/2010
भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता
सूतजी कहते है- हे शौनक ! उसी समय युधिष्ठिर ने शरशय्या पर लेटे भीष्मसे अपने मन की शांति के लिए विविध धर्मो को पूछा. भीष्मजी ने बहुत से आख्यानो एवं इतिहासों द्वारा वर्णधर्म, आश्रमधर्म, भाग्वाद्धर्म , स्त्रीध्रम आदि का उपायों के सहित गंभीर विवेचन किया और कहा - हे राजन ! तुम अपने को करता मानकर क्यों शोकाकुल होते हो. भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तब क्या तुम इन अक्षौहिणी सेनाओं का संहार करने वाले हो सकते हो ? तुम्हारा सामर्थ्य ही क्या है ? स्वयं भगवान ने श्रीमुख से गीता में जो कहा है उसे भी तुम भूल रहे हो. उसका स्मरण करो , भगवान ने कहा है -
द्रोण, भीष्म आदि सेनाओं के समस्त वीरो को मैंने ही मारा है. तुम व्यर्थ शोक क्यों करते हो इत्यादि कहकर समझाया, जिससे युधिस्ठिर का शोक निवृत्त हुआ और उनके मन को पूर्ण शांति मिली. धर्म का उपदेश करते हुए जब उत्तरायण का समय आया तब भीष्म ने अपने वाणी रोक कर सामने खड़े चत्रभुज भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए उनमे अपने मन लगा दिया.
इस विसुद्ध धारणा से उनकी सब वासनाए और भगवान के कृपा कटाक्ष से शस्त्रों की पीड़ा भी दूर हो गयी. वे शरीर का त्याग करते हुए प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति करने लगे.
द्रोण, भीष्म आदि सेनाओं के समस्त वीरो को मैंने ही मारा है. तुम व्यर्थ शोक क्यों करते हो इत्यादि कहकर समझाया, जिससे युधिस्ठिर का शोक निवृत्त हुआ और उनके मन को पूर्ण शांति मिली. धर्म का उपदेश करते हुए जब उत्तरायण का समय आया तब भीष्म ने अपने वाणी रोक कर सामने खड़े चत्रभुज भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए उनमे अपने मन लगा दिया.
इस विसुद्ध धारणा से उनकी सब वासनाए और भगवान के कृपा कटाक्ष से शस्त्रों की पीड़ा भी दूर हो गयी. वे शरीर का त्याग करते हुए प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति करने लगे.
8/20/2010
जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है.
प्रजा का नाश करने से भयभीत युधिष्ठिर सब धर्मो को जानने की इच्छा से कुरुक्षेत्र गए. जहा भीष्म पितामह स्वर्ग से च्युत देवताके सामान शरसय्यापर पड़े थे. युधिशिथिर के पीछे उनके भाई भी रथ पर चढ़कर वहा पहुचे . नारद, व्यास आदि बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि भी भीष्म के दर्शनार्थ वहा गए. अर्जुन के साथ भगवान् श्रीकृष्ण भी वहा उपस्थित हुए और उन्होंने भीष्म पितामह को प्रणाम किया. भीष्म ने उपस्थित सभी का मन ही मन पूजन किया. लीलाविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन भी उन्होंने बड़े भक्तिभाव से अपने ह्रदय में ही किया.
जब पांडवो पर उनकी द्रष्टि पड़ी तब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और बोले - आप लोग बड़े धर्मात्मा है, आप लोगो के साथ बड़ा अन्याय हुआ, बड़ा कष्ट दिया गया. जहापर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सहायक विद्यमान हो, वहा आपत्ति का होना बड़ा आश्चर्य है. पर काल की गति का कोई लंघन नहीं कर सकता और न उसका विधान कोई जान ही सकता है. बड़े-बड़े विद्वानों को भी इस विषय में मोह हो जाता है. संसार के सुख-दुःख सब देव के अधीन है ऐसा विचार कर आप प्रजा का पालन करे.
यह जो सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े है इनके प्रभाव को भगवान शिव, कपिल, नारद कुछ ही लीग जानते है. यह तुम्हारे लिए सारथि, मंत्री, दूत आदि सब कुछ बने. यद्यपि इनमे विषमता नहीं है, फिर भी हे राजन इनके जो अनन्य भक्त है उनपर इनकी कैसे कृपा रहती है यह प्रत्यक्ष देखो मेरे प्राणत्याग के समय दर्शन देने को स्वयं उपस्थित हो गए.
भक्ति से इनमे मन लगाकर वाणी से इनमे नाम का कीर्तन करता हुआ जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है. ये बड़े ही भक्तवत्सल है, मेरी हार्दिक इच्छा है, जब तक मेरा शरीर न छूते, तब तक इसी चतुर्भुज स्वरूप का मुझे दर्शन होता रहे.
शेष अगले अंक में .............
जब पांडवो पर उनकी द्रष्टि पड़ी तब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और बोले - आप लोग बड़े धर्मात्मा है, आप लोगो के साथ बड़ा अन्याय हुआ, बड़ा कष्ट दिया गया. जहापर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सहायक विद्यमान हो, वहा आपत्ति का होना बड़ा आश्चर्य है. पर काल की गति का कोई लंघन नहीं कर सकता और न उसका विधान कोई जान ही सकता है. बड़े-बड़े विद्वानों को भी इस विषय में मोह हो जाता है. संसार के सुख-दुःख सब देव के अधीन है ऐसा विचार कर आप प्रजा का पालन करे.
यह जो सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े है इनके प्रभाव को भगवान शिव, कपिल, नारद कुछ ही लीग जानते है. यह तुम्हारे लिए सारथि, मंत्री, दूत आदि सब कुछ बने. यद्यपि इनमे विषमता नहीं है, फिर भी हे राजन इनके जो अनन्य भक्त है उनपर इनकी कैसे कृपा रहती है यह प्रत्यक्ष देखो मेरे प्राणत्याग के समय दर्शन देने को स्वयं उपस्थित हो गए.
भक्ति से इनमे मन लगाकर वाणी से इनमे नाम का कीर्तन करता हुआ जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है. ये बड़े ही भक्तवत्सल है, मेरी हार्दिक इच्छा है, जब तक मेरा शरीर न छूते, तब तक इसी चतुर्भुज स्वरूप का मुझे दर्शन होता रहे.
शेष अगले अंक में .............
8/09/2010
भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं
कुंती कहती है भगवान् आप आज हम लोगो को छोड़कर जा रहे है, आपके सिवा हमारा कोई दूसरा रक्षक नहीं है. आप ऐसी कृपा करे की मेरा मन आपमें ही सदा लगा रहे. मै आपके मंगलमय दिव्य नामो को स्मरण कर बार-बार प्रणाम करती हूँ, मुझपर आपकी दया सदा बनी रहे. इस प्रकार कुंती भावपूर्ण छब्बीस श्लोको से स्तुति कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण को निहारती हुई चुप हो गई.
कुंती की प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान मुस्कराते हुए बोले- बुआ जी ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, यह कहकर श्रीकृष्ण फिर हस्तिनापुर लौट आये.
इधर युधिष्ठिर की विलक्षण दशा थी. वह अपने सुह्रद और बंधुओ के वध का चिंतन करते हुए बड़े मोहपाश में बंध गए थे. वे कहा करते थे मैंने इस नश्वर शरीर के लिए कितनी अक्षौहिणी सेनाओ का नाश कर डाला. मेरी क्या गति होगी ? करोडो वर्षों तक भी मेरा नरक से उद्धार होना संभव नहीं है.
व्यास आदि महार्षियो ने तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत से इतिहासों द्वारा युधिष्ठिर को समझाया किन्तु उनका शोक निवृत्त नहीं हुआ. कारण भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य भक्त भीष्म पितामह की महिमा लोक में अभिव्यक्त करने के निमित्त उनके मुख से निकले उपदेशाम्रत से उनका मोह निवृत्त कराना चाहते थे.
एक दिन महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने उनके निवासस्थान पर गए, वहा उन्होंने भगवान कोनेत्र बंदकर ध्यानमग्न देखा, कुछ देर बाद जब भगवान ने नेत्र खोले , तब युधिष्ठिर ने प्रणाम कर पूछा-भगवान आप किसका ध्यान कर रहे थे ?
यह सुनकर भगवान के नेत्रों में अश्रु छलक आये, उन्होंने उदास होकर कहा-राजन! म्रतुशय्या पर लेटे भीष्म बड़े ही आर्त भाव से मेरा ध्यान कर रहे थे. उनसे आकृष्ट होकर मै वहा उन्ही के पास चला गया था. अब भरत वंशी सूर्य अस्त होने ही वाला है. आपको जो कुछ सीखना हो उनसे सीख लीजिये.
महान योद्धा परमज्ञानी मेरे अनन्य भक्त भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं है, उनके समीप जाकर आप समस्त धर्मो का श्रवण करे. मेरा विश्वास है की उनके उपदेश से आपके सब संदेह निवृत्त हो जायेगे.
कुंती की प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान मुस्कराते हुए बोले- बुआ जी ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, यह कहकर श्रीकृष्ण फिर हस्तिनापुर लौट आये.
इधर युधिष्ठिर की विलक्षण दशा थी. वह अपने सुह्रद और बंधुओ के वध का चिंतन करते हुए बड़े मोहपाश में बंध गए थे. वे कहा करते थे मैंने इस नश्वर शरीर के लिए कितनी अक्षौहिणी सेनाओ का नाश कर डाला. मेरी क्या गति होगी ? करोडो वर्षों तक भी मेरा नरक से उद्धार होना संभव नहीं है.
व्यास आदि महार्षियो ने तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत से इतिहासों द्वारा युधिष्ठिर को समझाया किन्तु उनका शोक निवृत्त नहीं हुआ. कारण भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य भक्त भीष्म पितामह की महिमा लोक में अभिव्यक्त करने के निमित्त उनके मुख से निकले उपदेशाम्रत से उनका मोह निवृत्त कराना चाहते थे.
एक दिन महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने उनके निवासस्थान पर गए, वहा उन्होंने भगवान कोनेत्र बंदकर ध्यानमग्न देखा, कुछ देर बाद जब भगवान ने नेत्र खोले , तब युधिष्ठिर ने प्रणाम कर पूछा-भगवान आप किसका ध्यान कर रहे थे ?
यह सुनकर भगवान के नेत्रों में अश्रु छलक आये, उन्होंने उदास होकर कहा-राजन! म्रतुशय्या पर लेटे भीष्म बड़े ही आर्त भाव से मेरा ध्यान कर रहे थे. उनसे आकृष्ट होकर मै वहा उन्ही के पास चला गया था. अब भरत वंशी सूर्य अस्त होने ही वाला है. आपको जो कुछ सीखना हो उनसे सीख लीजिये.
महान योद्धा परमज्ञानी मेरे अनन्य भक्त भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं है, उनके समीप जाकर आप समस्त धर्मो का श्रवण करे. मेरा विश्वास है की उनके उपदेश से आपके सब संदेह निवृत्त हो जायेगे.
8/08/2010
मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे.
मृत बंधुओ को जल देने के लिए पांडव श्रीकृष्ण तथा गांधारी, कुंती आदि के साथ गंगातट पर गए. वहा उन्होंने सबको जल दिया और विलाप कर गंगा के पवित्र जल में स्नान किया. वहा बैठे शोकसंतप्त ध्रतराष्ट्र, युधिष्ठिर, विदुर, गांधारी, कुंती आदि को श्रीकृष्ण ने प्राणियो में काल की गति को बलवती बतलाते हुए नाना प्रकार से समझाया.
श्रीकृष्ण ने युधिस्ठिर को राज्य दिलाकर तीन अश्वमेध यग्य कराये, जिनसे युधिस्ठिर का सुयश सब दिशाओ में फ़ैल गया. फिर सात्यकी और उद्धव को साथ लेकर श्रीकृष्ण द्वारका को जाने का विचार कर रथ पर बैठ ही रहे थे की सामने से आती उत्तरा दिखरी दी, जो रोती हुई दौड़ी आ रही थी.
उसने कहा-हे भगवान, रक्षा कीजिये. यह देदियामन तीखा वाण मेरी ओर आ रहा है, यह मुझे भले ही भस्म कर दे, इसकी मुझे चिंता नहीं, किन्तु मेरा गर्भ न गिरा सके. उत्तरा के ऐसे करुण वचन सुनकर एवं यह अस्त्र जगत को पांडव शून्य करने के लिए अश्वत्थामा दारा छोड़ा गया है, यह जानकर भगवान् ने तुरंत योग द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया और सुदर्शन चक्र से उसके गर्भ की रक्षा की.
इधर पांडवो ने भी प्रथक-प्रथक पांच बादो को अपनी ओर आते देखकर उनके निवारणार्थ अपने ब्रह्मास्त्र ग्रहण किये किन्तु उनके संधान में प्रयोग का विलम्ब होता देखकर प्रतिज्ञापूर्वक न्यस्त शस्त्र होने पर भी अपनी प्रतिज्ञा को भंगकर, पांड्वो की भी सुदर्शन चक्र से रक्षा की और अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक किया. यद्यपि ये ब्रह्मास्त्र अमोघ थे फिर भी वैशनव तेज सुदर्शन चक्र से वे सर्वथा शांत हो गए.
इसके पश्चात् भगवान जब जाने के लिए पुनः उद्यत हुए तब कुंती आकर भगवान किस्तुती करती हुई बोली- हे भगवान बड़ी-बड़ी आप्तात्तियो से अपने हम लोगो की रक्षा की. विष भरे मोदको से लाक्षा भवन की दाह से, वन में देखे गए हिडिम्ब आदि भीषण दैत्यों से, द्यूत सभा से, वन में प्राप्त हुए नाना प्रकार के क्लेश से तथा संग्राम में अनेक महारथियो के दिव्यास्त्रो से आपने ही हमारा त्राण किया. कहाँ तक कहू इस समय अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमें बचाया, आपको बार-बार नमस्कार है. मै आपकी शरण में हूँ.
मेरी एक प्रार्थना है कृपया उसे स्वीकार करे-भगवान मै जहा कही भी राहू मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे. कारण उन विपत्तियों में मुझे आपका दर्शन होया रहेगा, जिससे दुखमय संसार सदा के लिए निवृत्त हो जायेगा.
श्रीकृष्ण ने युधिस्ठिर को राज्य दिलाकर तीन अश्वमेध यग्य कराये, जिनसे युधिस्ठिर का सुयश सब दिशाओ में फ़ैल गया. फिर सात्यकी और उद्धव को साथ लेकर श्रीकृष्ण द्वारका को जाने का विचार कर रथ पर बैठ ही रहे थे की सामने से आती उत्तरा दिखरी दी, जो रोती हुई दौड़ी आ रही थी.
उसने कहा-हे भगवान, रक्षा कीजिये. यह देदियामन तीखा वाण मेरी ओर आ रहा है, यह मुझे भले ही भस्म कर दे, इसकी मुझे चिंता नहीं, किन्तु मेरा गर्भ न गिरा सके. उत्तरा के ऐसे करुण वचन सुनकर एवं यह अस्त्र जगत को पांडव शून्य करने के लिए अश्वत्थामा दारा छोड़ा गया है, यह जानकर भगवान् ने तुरंत योग द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया और सुदर्शन चक्र से उसके गर्भ की रक्षा की.
इधर पांडवो ने भी प्रथक-प्रथक पांच बादो को अपनी ओर आते देखकर उनके निवारणार्थ अपने ब्रह्मास्त्र ग्रहण किये किन्तु उनके संधान में प्रयोग का विलम्ब होता देखकर प्रतिज्ञापूर्वक न्यस्त शस्त्र होने पर भी अपनी प्रतिज्ञा को भंगकर, पांड्वो की भी सुदर्शन चक्र से रक्षा की और अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक किया. यद्यपि ये ब्रह्मास्त्र अमोघ थे फिर भी वैशनव तेज सुदर्शन चक्र से वे सर्वथा शांत हो गए.
इसके पश्चात् भगवान जब जाने के लिए पुनः उद्यत हुए तब कुंती आकर भगवान किस्तुती करती हुई बोली- हे भगवान बड़ी-बड़ी आप्तात्तियो से अपने हम लोगो की रक्षा की. विष भरे मोदको से लाक्षा भवन की दाह से, वन में देखे गए हिडिम्ब आदि भीषण दैत्यों से, द्यूत सभा से, वन में प्राप्त हुए नाना प्रकार के क्लेश से तथा संग्राम में अनेक महारथियो के दिव्यास्त्रो से आपने ही हमारा त्राण किया. कहाँ तक कहू इस समय अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमें बचाया, आपको बार-बार नमस्कार है. मै आपकी शरण में हूँ.
मेरी एक प्रार्थना है कृपया उसे स्वीकार करे-भगवान मै जहा कही भी राहू मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे. कारण उन विपत्तियों में मुझे आपका दर्शन होया रहेगा, जिससे दुखमय संसार सदा के लिए निवृत्त हो जायेगा.
8/05/2010
जब अश्वत्थामा मिला अभी जीवित है
जब महाभारत संग्राम में कौरव और पांड्वो की sena के बड़े-बड़े बीर मारे गए एवं भीम के गदा प्रहार से दुर्योधन के उरुदंड भी टूट गए तब अश्वत्थामा ने दुर्योधन के संतोषार्थ द्रौपदी के सोये हुए पुत्रो का सर कट डाला. यह देखकर विलाप करती हुई द्रौपदी को अर्जुन ने समझाया की तू शोक न कर, मै अश्वत्थामा का सर काटकर लाता हूँ. ऐसा कहकर अर्जुन ने अश्वत्थामा का पीछा किया. अश्वत्थामा पीछा कर रहे अर्जुन को देखकर बहुत घबडाया और रथ पर चड़कर बड़ी तेजी से भगा.
जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थित हो गता, चारो ओर हाहाकार मच गया/ तब भगवान के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को बांधकर अपने डेरे पर ले गए.
मार्ग में भगवान ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र जानकर ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बढे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली-इसे छोड़ दो यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही पूज्य गुरु है जिसकी कृपा से तुमने सारी धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र रूप में यह साक्षात् द्रोणाचार्य ही विद्यमान है, इसे मत मरो, छोड़ दो. मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ,
द्रौपदी के इन वचनों क युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बढ़ कारण ही श्रेयस्कर है.
यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले, इधर द्रौपदी उसे बचने चली. तब चार भुजा धारण कर भगवान ने दो भुजाओ से भीम को और दो से द्रौपदी को रोका और अर्जुन से कहा - हे अर्जुन अधम ब्रह्मण भी वधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी वध योग्य है, ये दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और वह करो जिससे द्रौपदी को सांत्वना देते हुए तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझ को भी प्रिय हो. अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकर अश्वत्थामा के केश सहित मणि खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. शास्त्र में अधम ब्रह्मण का यही वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं, इस तरह सभी के वचनों दी रक्षा हो गयी. अश्वत्थामा के प्राण भी बच गए और बढ़ भी हो गया.
मुंडन कर देना, धन छीन लेना तथा स्थान से निकल देना, यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं. बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांड्वो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि परलौकिक कर्म किये.
जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थित हो गता, चारो ओर हाहाकार मच गया/ तब भगवान के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को बांधकर अपने डेरे पर ले गए.
मार्ग में भगवान ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र जानकर ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बढे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली-इसे छोड़ दो यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही पूज्य गुरु है जिसकी कृपा से तुमने सारी धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र रूप में यह साक्षात् द्रोणाचार्य ही विद्यमान है, इसे मत मरो, छोड़ दो. मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ,
द्रौपदी के इन वचनों क युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बढ़ कारण ही श्रेयस्कर है.
यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले, इधर द्रौपदी उसे बचने चली. तब चार भुजा धारण कर भगवान ने दो भुजाओ से भीम को और दो से द्रौपदी को रोका और अर्जुन से कहा - हे अर्जुन अधम ब्रह्मण भी वधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी वध योग्य है, ये दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और वह करो जिससे द्रौपदी को सांत्वना देते हुए तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझ को भी प्रिय हो. अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकर अश्वत्थामा के केश सहित मणि खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. शास्त्र में अधम ब्रह्मण का यही वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं, इस तरह सभी के वचनों दी रक्षा हो गयी. अश्वत्थामा के प्राण भी बच गए और बढ़ भी हो गया.
मुंडन कर देना, धन छीन लेना तथा स्थान से निकल देना, यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं. बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांड्वो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि परलौकिक कर्म किये.
8/02/2010
भागवत से 6 - जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है
नारदजी कहते है मै अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुनाता हूँ. मै पूर्वजन्म में एक दासी का पुत्र था. मेरी माता ने मुझे चातुर्मास्य व्रत करनेवाले महात्माओ की सेवा में लगा किया था. मेरी पांच वर्ष की अवस्था थी, मै और बालको के सामान खेलता कूदता नहीं था. कम बोलता था. यथा समय महात्माओं की सेवा करता था. दिन में एक बार महात्माओं का उच्छिष्ट प्रसाद ग्रहण करत था.
नोच्छिश्तम कस्यचिद दद्यात, उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
इसके अनुसार जो पाक भांडो में बच जाता था वह प्रसाद ग्रहण करता था.
जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है. नारद जी के इस व्यव्हार से महात्माओं की कृपा हुई जिससे उनकी भगवद भक्ति में रूचि हो गई. वे महात्मा प्रतिदिन भगवान की कथा का गान किया करते था. नारद जी ने भी वह कथा सुनी. उससे सूतजी का चित्त शुद्ध हो गया और भगवान में निश्चल भक्ति हो गई. चातुर्मास्य के बाद जब महात्मा लोग जाने लगे तब उन्होंने भगवान के दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया , जिससे नारदजी पर भगवान की माया का प्रभाव कैसे पड़ता है इस रहस्य को जान गए.
संसार में तीनो तापो की यही एकमात्र औषधि है की जो कुछ कर्म करे वह सब भगवान को अर्पण कर दे. आप तो बहुश्रुत है, इसलिए भगवान का यश इस प्रकार वर्णन करे. जिससे विद्वानी को भी जानने की कोई वस्तु शेष न रह जाए. संसार में पीड़ित मनुष्यों की शांति के लिए भगवच्चरित्र से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है.
इस प्रकार नारदजी के जन्म और कर्म का वृतांत सुनकर व्यासजी ने उनसे फिर पूछा-जब आपको उपदेश देकर महात्मा लोग चले गए तब आपने क्या किय? आपकी शेष आयु किस तरह व्यतीत हुई ? अन्तकाल में आपने शरीर का त्याग कैसे किया ? आपको पूर्जन्म की स्मृति कैसे रह गयी?
नारदजी बोले-मुझे उपदेश देकर जब महात्मा लोग चले गए तब मैंने जो कुछ किया उसे सुने. मेरी माता दासी थी. मै उसका अकेला पुत्र था. वह मुझसे बड़ा स्नेह रखती थी. मै चाहता था की माता का स्नेह कम हो और मुझसे छुट्टी मिले. एक समय रात्रि में मेरी माता गौ दुहने के लिए घर से बाहर निकली. मार्ग में सर्प ने उसे डस लिया और मर गयी. माता के मरण को भगवान का अनुग्रह मानकर मै उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा. मार्ग में बहुत से देश, नगर, ग्राम वन, उपवन पार करता एक निर्जन वन में जा पंहुचा. उस समय मै बहुत थका और भूख प्यास से व्याकुल था. एक नदी के तट पर जाकर विश्राम किया और स्नानकर जल पिया, उससे मेरी थकावट दूर हो गई. तब मै एक पीपल के नीचे बैठा और महात्माओ के उपदेस के अनुशार वहा ध्यान करने लगा. सहसा मेरे ह्रदय में भगवान प्रगट हो गए.
भगवान के दर्शन करते ही मै आनंद समुद्र में डूब गया मेरे नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी, शरीर में रोमांच हो आया और मुझे अपने पराये का कुछ भी ज्ञान न रहा. थोड़ी देर बाद भगवान की मूर्ती मेरे ह्रदय से अन्तर्हित हो गई और मेरी समाधी टूट गई, मेरा चित्त अत्यंत व्याकुल हो गया. जब फिर दूसरी बार मन को स्थिर कर भगवान के दर्शन की इच्छा की तो वह रूप मुझे दिखाई नहीं दिया. तब अतृप्त की तरह मै व्याकुल हो उठा.
तब मुहे लक्ष्य कर आकाशवाणी हुई की अब इस जन्म में तुमको मेरा दर्शन नहीं होगा, कारण अभी तुम्हारी वासनाए निवृत्त नहीं हुई है. इस शरीर का त्याग करने के पश्चात् तुम मेरे पार्षद बनोगे और तब प्रलयकाल में भी तुम्हारी स्मृति नष्ट नहीं होगी. यह कहकर आकाशवाणी विरत हो गई, मैंने उसको सर से प्रणाम किया और भगवान के नामो का गान करता हुआ प्रथ्वी पर भ्रमण करने लगा. मै सदा काल की प्रतीक्षा मै रहता था एक दिन अकस्मात् बिजली की तरह काल सामने आया और मेरा पांचभौतिक शरीर प्रथ्वी पर गिर पड़ा. मै तत्क्षण भगवान का पार्षद बन गया.
कल्पान्त में ब्रह्मा के साथ ही मै जलशायी नारायण के शरीर में प्रविष्ट हो गया. फिर श्रष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा से मै उत्पन्न हुआ. मेरी गति कही रूकती नहीं. भगवान की सेवा से चित्त जैसा शांत होता है, वैसा योग आदि साधन से नहीं होता. हे व्यासजी आपने जो पूछा था उसका उत्तर मैंने दे दिया और आपके अपरितोश का कारण भी बता दिया
. सूतजी कहते है - हे शौनक यह कहकर देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुन गाते चले गए. अहो देवर्षि नारद धन्य है जो भगवान की कीर्ति गाते हुए क्लेशाक्रांत जीवो को अपनी वीणा के सुमधुर स्वर से आनंदित करते है.
नोच्छिश्तम कस्यचिद दद्यात, उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
इसके अनुसार जो पाक भांडो में बच जाता था वह प्रसाद ग्रहण करता था.
जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है. नारद जी के इस व्यव्हार से महात्माओं की कृपा हुई जिससे उनकी भगवद भक्ति में रूचि हो गई. वे महात्मा प्रतिदिन भगवान की कथा का गान किया करते था. नारद जी ने भी वह कथा सुनी. उससे सूतजी का चित्त शुद्ध हो गया और भगवान में निश्चल भक्ति हो गई. चातुर्मास्य के बाद जब महात्मा लोग जाने लगे तब उन्होंने भगवान के दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया , जिससे नारदजी पर भगवान की माया का प्रभाव कैसे पड़ता है इस रहस्य को जान गए.
संसार में तीनो तापो की यही एकमात्र औषधि है की जो कुछ कर्म करे वह सब भगवान को अर्पण कर दे. आप तो बहुश्रुत है, इसलिए भगवान का यश इस प्रकार वर्णन करे. जिससे विद्वानी को भी जानने की कोई वस्तु शेष न रह जाए. संसार में पीड़ित मनुष्यों की शांति के लिए भगवच्चरित्र से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है.
इस प्रकार नारदजी के जन्म और कर्म का वृतांत सुनकर व्यासजी ने उनसे फिर पूछा-जब आपको उपदेश देकर महात्मा लोग चले गए तब आपने क्या किय? आपकी शेष आयु किस तरह व्यतीत हुई ? अन्तकाल में आपने शरीर का त्याग कैसे किया ? आपको पूर्जन्म की स्मृति कैसे रह गयी?
नारदजी बोले-मुझे उपदेश देकर जब महात्मा लोग चले गए तब मैंने जो कुछ किया उसे सुने. मेरी माता दासी थी. मै उसका अकेला पुत्र था. वह मुझसे बड़ा स्नेह रखती थी. मै चाहता था की माता का स्नेह कम हो और मुझसे छुट्टी मिले. एक समय रात्रि में मेरी माता गौ दुहने के लिए घर से बाहर निकली. मार्ग में सर्प ने उसे डस लिया और मर गयी. माता के मरण को भगवान का अनुग्रह मानकर मै उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा. मार्ग में बहुत से देश, नगर, ग्राम वन, उपवन पार करता एक निर्जन वन में जा पंहुचा. उस समय मै बहुत थका और भूख प्यास से व्याकुल था. एक नदी के तट पर जाकर विश्राम किया और स्नानकर जल पिया, उससे मेरी थकावट दूर हो गई. तब मै एक पीपल के नीचे बैठा और महात्माओ के उपदेस के अनुशार वहा ध्यान करने लगा. सहसा मेरे ह्रदय में भगवान प्रगट हो गए.
भगवान के दर्शन करते ही मै आनंद समुद्र में डूब गया मेरे नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी, शरीर में रोमांच हो आया और मुझे अपने पराये का कुछ भी ज्ञान न रहा. थोड़ी देर बाद भगवान की मूर्ती मेरे ह्रदय से अन्तर्हित हो गई और मेरी समाधी टूट गई, मेरा चित्त अत्यंत व्याकुल हो गया. जब फिर दूसरी बार मन को स्थिर कर भगवान के दर्शन की इच्छा की तो वह रूप मुझे दिखाई नहीं दिया. तब अतृप्त की तरह मै व्याकुल हो उठा.
तब मुहे लक्ष्य कर आकाशवाणी हुई की अब इस जन्म में तुमको मेरा दर्शन नहीं होगा, कारण अभी तुम्हारी वासनाए निवृत्त नहीं हुई है. इस शरीर का त्याग करने के पश्चात् तुम मेरे पार्षद बनोगे और तब प्रलयकाल में भी तुम्हारी स्मृति नष्ट नहीं होगी. यह कहकर आकाशवाणी विरत हो गई, मैंने उसको सर से प्रणाम किया और भगवान के नामो का गान करता हुआ प्रथ्वी पर भ्रमण करने लगा. मै सदा काल की प्रतीक्षा मै रहता था एक दिन अकस्मात् बिजली की तरह काल सामने आया और मेरा पांचभौतिक शरीर प्रथ्वी पर गिर पड़ा. मै तत्क्षण भगवान का पार्षद बन गया.
कल्पान्त में ब्रह्मा के साथ ही मै जलशायी नारायण के शरीर में प्रविष्ट हो गया. फिर श्रष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा से मै उत्पन्न हुआ. मेरी गति कही रूकती नहीं. भगवान की सेवा से चित्त जैसा शांत होता है, वैसा योग आदि साधन से नहीं होता. हे व्यासजी आपने जो पूछा था उसका उत्तर मैंने दे दिया और आपके अपरितोश का कारण भी बता दिया
. सूतजी कहते है - हे शौनक यह कहकर देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुन गाते चले गए. अहो देवर्षि नारद धन्य है जो भगवान की कीर्ति गाते हुए क्लेशाक्रांत जीवो को अपनी वीणा के सुमधुर स्वर से आनंदित करते है.
8/01/2010
मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है
खिन्न चित्त व्यासजी को देखकर देवर्षि नारद मुस्कुराते हुए बोले - आप अपने को अपूर्ण सा मानकर उदास क्यों है ? व्यासजी बोले-हे नारदजी!आपने जो कुछ कहा, वह सब सत्य है. फिर भी मुझे संतोष नहीं हो रह है. इसका कारण कृपया आप बताये ? मुझमे क्या न्यूनता रह गयी है ? इसे भी अपनी दिव्य दृष्टि से देखने की कृपा करे.
नारदजी बोले-हे मुनिवर! सब कुछ करने पर भी आपने भगवान के निर्मल यश का प्रधान रूप से वर्णन नहीं किया. इसीसे आपकी आत्मा में परितोष नहीं है यही आपमें न्यूनता रह गयी है. हे मुने महाभारत में जिस प्रकार आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन किया, उस प्रकार भगवान की महिमा का वर्णन आप नहीं कर सके.
जिस मानुष की वाणी भगवान के जगत पवित्र यश का वर्णन नहीं कर करती, वह मनुष्य कूड़ा घर के सामान है. ज्ञानी पुरुष उससे वैसे ही संपर्क नहीं रखते जैसे मानसरोवर में विहार करनेवाले हंस काकतीर्थ में नहीं रमते. भगवान के निर्मल गुणों का वर्णन करनेवाली रचना आदि अशुद्ध भी हो तो भी वह जनता की पापराशी को भस्म कर देती है, कारण उससे भगवान के मंगलमय नामो का स्मरण होता है, जिनका भक्तजन ह्रदय से अभिनन्दन करते है, अधिक क्या कहे, मोक्ष देनेवाला जो नैष्कर्म्य ज्ञान है, वह भी यदि भगवान की भक्ति से रहित हो, तो उसका भी मूल्य कुछ नहीं वह बंधन निवृत्ति नहीं कर सकता.
ऐसी स्थिति में भगवद्भक्ति से हीन सकाम और निष्काम कर्म का तो कहना ही क्या है ? इसलिए हे महाभाग जीवो की बंधन निवृत्ति के लिए समाधी द्वारा आप भगवान के चरित्रों का स्मरण कर उनका वर्णन कर. भगवान के चरित्रों को छोड़कर मनुष्य जो कुछ वर्णन करता है उससे उसकी बुद्धि कही सुस्थिर नहीं रहती बायु के वेग से कम्पित नौका के सामान डगमगाती ही रहती है, जिस प्रकार मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है उसी प्रकार विषय सुख भी प्राप्त होता है, उसके लिए प्रयत्न करना उचित नहीं, निवृत्ति मार्ग से कोई विरला ही ज्ञानी पुरुष भगवत सम्बन्धी सुख प्राप्तकर सकता है. सब इसके अधिकारी नहीं है, इसलिए सर्व साधारण के कल्याणार्थ आप भगवान की लीलाओ का ही विशेष रूप से वर्णन करे.
नारदजी बोले-हे मुनिवर! सब कुछ करने पर भी आपने भगवान के निर्मल यश का प्रधान रूप से वर्णन नहीं किया. इसीसे आपकी आत्मा में परितोष नहीं है यही आपमें न्यूनता रह गयी है. हे मुने महाभारत में जिस प्रकार आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन किया, उस प्रकार भगवान की महिमा का वर्णन आप नहीं कर सके.
जिस मानुष की वाणी भगवान के जगत पवित्र यश का वर्णन नहीं कर करती, वह मनुष्य कूड़ा घर के सामान है. ज्ञानी पुरुष उससे वैसे ही संपर्क नहीं रखते जैसे मानसरोवर में विहार करनेवाले हंस काकतीर्थ में नहीं रमते. भगवान के निर्मल गुणों का वर्णन करनेवाली रचना आदि अशुद्ध भी हो तो भी वह जनता की पापराशी को भस्म कर देती है, कारण उससे भगवान के मंगलमय नामो का स्मरण होता है, जिनका भक्तजन ह्रदय से अभिनन्दन करते है, अधिक क्या कहे, मोक्ष देनेवाला जो नैष्कर्म्य ज्ञान है, वह भी यदि भगवान की भक्ति से रहित हो, तो उसका भी मूल्य कुछ नहीं वह बंधन निवृत्ति नहीं कर सकता.
ऐसी स्थिति में भगवद्भक्ति से हीन सकाम और निष्काम कर्म का तो कहना ही क्या है ? इसलिए हे महाभाग जीवो की बंधन निवृत्ति के लिए समाधी द्वारा आप भगवान के चरित्रों का स्मरण कर उनका वर्णन कर. भगवान के चरित्रों को छोड़कर मनुष्य जो कुछ वर्णन करता है उससे उसकी बुद्धि कही सुस्थिर नहीं रहती बायु के वेग से कम्पित नौका के सामान डगमगाती ही रहती है, जिस प्रकार मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है उसी प्रकार विषय सुख भी प्राप्त होता है, उसके लिए प्रयत्न करना उचित नहीं, निवृत्ति मार्ग से कोई विरला ही ज्ञानी पुरुष भगवत सम्बन्धी सुख प्राप्तकर सकता है. सब इसके अधिकारी नहीं है, इसलिए सर्व साधारण के कल्याणार्थ आप भगवान की लीलाओ का ही विशेष रूप से वर्णन करे.
7/31/2010
भगवन शंकर द्वारा वर्णित वह अमरकथा श्रीमद्भागवत ही है,
एक समय पार्वतीजी ने भगवन शिव से निवेदन किया-भगवन ! मेरा आपसे कभी वियोग न हो और मुझे सर्वदा आत्मज्ञान बना रहे, कृपया इसका कोई उपाय बताये. इस पर शिवजी ने कहा-प्रिये ! प्रश्न तो तुमने बहुत अच्छा किया, पर पहले बाहर जाकर देख आओ की हमारी बाते कोई दूसरा सुन तो नहीं रहा है. पार्वती ने बहार जाकर चतुर्दिक द्रष्टि डाली किन्तु उन्हें शुक के एक विगलित अंडे के सिवा वहा अन्य कोई जीव दिखाई न दिया. ऐसी स्थिति में पार्वती ने तुरंत ही लौटकर भगवान शिवजी से निवेदन किया नाथ! बहार कोई नहीं है. तब भगवान शिव ने सानंद ध्यानस्थ मुद्रा में अमरकथा का अमृत प्रवाह आरम्भ किया और पार्वतीजी बीच-बीच हुंकारी भारती रही. भगवन शंकर द्वारा वर्णित वह अमरकथा श्रीमद्भागवत ही है,
कथा का क्रम प्रथम स्कंध से दशम स्कंध पर्यंत पहुचने तक पारवती बराबर हुंकारी भारती रही पर ग्यारहवे स्कंध के आरम्भ में उन्हें निद्रा आ गई और इस बीच उस विगलित अंडे से बहार हिक्ला हुआ शुक्षावक हुंकारी भरता गया. बारहवे स्कंध की समाप्ति पर पार्वतीजी की जब निद्रा भंग हुई तब उन्होंने शिवजी से कहा-भगवन! कृष्ण उद्धव संबाद तो मै नहीं सुन सकी. देव ! क्षमा कीजिये, बीच में मै निद्रा ग्रस्त हो गई थी. इस पर शिवजी ने पूछा - तब हुंकारी कौन भर रहा था ? यह कहकर वे वास्तविकता जानने के लिए स्वयं ही बाहर आये और वहा उन्होंने सुग्गे का एक सुन्दर बच्चा बैठा देखा.
शुक-शावक को देखते ही भगवान शिव ने व्यग्र होकर पार्वतीजी से प्रश्न किया-आखिर यह यहाँ कैसे ? क्या तुमने इसे देखा नहीं ? पार्वतीजी ने सुविनीत भाव से म्रदुल स्वर में उत्तर दिया - देव! यह तो यहाँ विगलित अंडे के रूप मे पड़ा था. मालूम होता है, यह भागवत रुपी अमृत पान से जीवित हो गया. आप इस पर क्रोध न करे.
किन्तु शिवजी इतनेसे ही शांत नहिः हुए. अमरकथा का इस प्रकार फूट जाना उनकी द्रष्टि में कोई साधारण घटना न थी, अतः तुरंत वे बड़े वेगसे उस शुक शावक को पकड़ने की इच्छा से उस पर झपटे. शुक-शावक भी शिवजी की यह मुद्रा देखकर भगा और जम्हाई लेती हुई व्यासजी की पत्नी पिंगला के मुख में प्रविष्ट हो गया. इधर उसे न पाकर निराश हो शंकरजी अपने आश्रम में लौट आये. वही शुक शावक श्रीव्यासजी के पुत्र शुकदेव के रूप में उत्पन्न हुआ.
श्री शुकदेवजी के प्रसंग में अन्य पुरानो की कथा है की वे गोलोक में श्रीराधाजी के लीलाशुक थे. भगवन श्रीकृष्ण के अवतरण काल में श्रीराधाजी ने स्वयं भी लीला विग्रह धारण के समय अपने इस प्रिय शुक से साथ चलने को कहा था. वही शुक श्री राधाजी के वियोग के कारण उक्त विगलित अंडे के रूप में भगवन श्रीशंकर के आश्रम के निकट आ पड़ा था जहा उसे इस अमृतमयी कथा का अनुपम रसास्वाद स्वयं भगवन शिव के श्रीमुख से प्राप्त हुआ.
श्रीव्यासजी की पत्नी के मुख से उदर में प्रविष्ट हुआ वह शुक बारह वर्षों तक वही स्थित रह गया. इस दशा पर व्यग्र होकर एक दिन व्यासजी कह बैठे-बेटा बहार क्यों नहीं आते ? देखो तो इस स्थिति में तुम्हारी माता को कितना अधिक कष्ट हो रहा है. शुकदेवजी ने कहा-पिताजी, मेरे उदर में रहने के कारण माता को कुछ कष्ट नहीं हो रहा है, मेरे बहार आने पर माया मुझ पर आक्रमण करेगी, तब मुझे कष्ट ही नहीं, कष्ट राशी झेलनी पड़ेगी इसलिए मेरा बाहर न आना ही अच्छा है.
ऐसी मर्म मई वाणी सुनकर व्यासदेव चकित हो उठे. उन्होंने प्रश्न किया - तुम्ही बतलाओ, किस दशा में तुम्हारा बाहर आना संभव हो सकता है ? इस पर शुक ने कहा- पिताजी, द्वारकाधीश भगवन श्रीकृष का यदि यह आश्वासन मिले की माया का आक्रमण मुझपर न होगा, तभी में इस प्रथ्वी पर आ सकता हूँ, अन्यथा नहीं. जब श्रीव्यास देव ने भगवान श्रीकृष्ण से शुक्पर माया का आक्रमण न होने कात्रिवाचिक आशीर्वाद सुलभ करा दिया तब श्रीशुकदेवजी प्रथ्वी पर अवतीर्ण हुए और आशिर्वाद्दाता भगवान श्रीकृष्ण एवं माता पिता के श्रीचरणों में सादर प्रणाम कर वन की ओर चल पड़े. व्यासजी पुत्र्वात्सल्य से उनके पीछे-पीछे हे पुत्र! हे पुत्र! कहते उन्हें बुलाते रहे -
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव
किन्तु शुकदेवजी लौटे नहीं. एक पर्वत की कन्दरा में जाकर समाधिस्थ हो गए. व्यासजी विरह से व्याकुल होकर पुत्र के संस्कार को जाग्रत करने वाले भागवत के भावपूर्ण श्लोको का बार-बार उच्चारण करने लगे. उन श्लोको में प्रथम श्लोको में प्रथम श्लोक यह था-
अहो बाकि यम स्तान्काल्कूतम जिन्घान्स्या पायायादाप्य्साध्वी
लेभे गतिम् धत्र्युचितम तातोंयम कम व दयालुम शरणम वृजेम
आश्चर्य ! भगवान् की दयालुता का मै कहा तक वर्णन करू. दुष्ट राक्षसी पूतना ने मरने की इच्छा से अपने स्तनों में कालकूट विष भरकर भगवान को पिलाया किन्तु भगवन ने उसे माता की सी उचित गति अपना लोक दे दिया. विष देने वाले को भी जो अमृत प्रदान कर, ऐसा दयालु दूसरा देवता कौन है, जिसकी मै शरण लू.
यह श्लोक सुनते ही शुकदेवजी की समाधी टूट गई. वह विह्वल होकर कन्दरा से बहार आये और उन्मत्त की तरह उस श्लोक की ध्वनि का अनुसरण कर व्यासजी के समीप जा पहुचे. वहा उनके चरणों पर गिरकर आंसू बहाते हुए बोले- बेटा ! आश्रम पर चलो, वहा हम तुम्हे ऐसे ही बहुत से श्लोक सुनायेगे. शुकदेवजी भगवन के गुणों से आकृष्ट होकर उनके साथ आश्रम पर वहा उन्होंने व्यासजी के श्री मुख से सम्पूर्ण भागवत का अध्ययन किया.
कथा का क्रम प्रथम स्कंध से दशम स्कंध पर्यंत पहुचने तक पारवती बराबर हुंकारी भारती रही पर ग्यारहवे स्कंध के आरम्भ में उन्हें निद्रा आ गई और इस बीच उस विगलित अंडे से बहार हिक्ला हुआ शुक्षावक हुंकारी भरता गया. बारहवे स्कंध की समाप्ति पर पार्वतीजी की जब निद्रा भंग हुई तब उन्होंने शिवजी से कहा-भगवन! कृष्ण उद्धव संबाद तो मै नहीं सुन सकी. देव ! क्षमा कीजिये, बीच में मै निद्रा ग्रस्त हो गई थी. इस पर शिवजी ने पूछा - तब हुंकारी कौन भर रहा था ? यह कहकर वे वास्तविकता जानने के लिए स्वयं ही बाहर आये और वहा उन्होंने सुग्गे का एक सुन्दर बच्चा बैठा देखा.
शुक-शावक को देखते ही भगवान शिव ने व्यग्र होकर पार्वतीजी से प्रश्न किया-आखिर यह यहाँ कैसे ? क्या तुमने इसे देखा नहीं ? पार्वतीजी ने सुविनीत भाव से म्रदुल स्वर में उत्तर दिया - देव! यह तो यहाँ विगलित अंडे के रूप मे पड़ा था. मालूम होता है, यह भागवत रुपी अमृत पान से जीवित हो गया. आप इस पर क्रोध न करे.
किन्तु शिवजी इतनेसे ही शांत नहिः हुए. अमरकथा का इस प्रकार फूट जाना उनकी द्रष्टि में कोई साधारण घटना न थी, अतः तुरंत वे बड़े वेगसे उस शुक शावक को पकड़ने की इच्छा से उस पर झपटे. शुक-शावक भी शिवजी की यह मुद्रा देखकर भगा और जम्हाई लेती हुई व्यासजी की पत्नी पिंगला के मुख में प्रविष्ट हो गया. इधर उसे न पाकर निराश हो शंकरजी अपने आश्रम में लौट आये. वही शुक शावक श्रीव्यासजी के पुत्र शुकदेव के रूप में उत्पन्न हुआ.
श्री शुकदेवजी के प्रसंग में अन्य पुरानो की कथा है की वे गोलोक में श्रीराधाजी के लीलाशुक थे. भगवन श्रीकृष्ण के अवतरण काल में श्रीराधाजी ने स्वयं भी लीला विग्रह धारण के समय अपने इस प्रिय शुक से साथ चलने को कहा था. वही शुक श्री राधाजी के वियोग के कारण उक्त विगलित अंडे के रूप में भगवन श्रीशंकर के आश्रम के निकट आ पड़ा था जहा उसे इस अमृतमयी कथा का अनुपम रसास्वाद स्वयं भगवन शिव के श्रीमुख से प्राप्त हुआ.
श्रीव्यासजी की पत्नी के मुख से उदर में प्रविष्ट हुआ वह शुक बारह वर्षों तक वही स्थित रह गया. इस दशा पर व्यग्र होकर एक दिन व्यासजी कह बैठे-बेटा बहार क्यों नहीं आते ? देखो तो इस स्थिति में तुम्हारी माता को कितना अधिक कष्ट हो रहा है. शुकदेवजी ने कहा-पिताजी, मेरे उदर में रहने के कारण माता को कुछ कष्ट नहीं हो रहा है, मेरे बहार आने पर माया मुझ पर आक्रमण करेगी, तब मुझे कष्ट ही नहीं, कष्ट राशी झेलनी पड़ेगी इसलिए मेरा बाहर न आना ही अच्छा है.
ऐसी मर्म मई वाणी सुनकर व्यासदेव चकित हो उठे. उन्होंने प्रश्न किया - तुम्ही बतलाओ, किस दशा में तुम्हारा बाहर आना संभव हो सकता है ? इस पर शुक ने कहा- पिताजी, द्वारकाधीश भगवन श्रीकृष का यदि यह आश्वासन मिले की माया का आक्रमण मुझपर न होगा, तभी में इस प्रथ्वी पर आ सकता हूँ, अन्यथा नहीं. जब श्रीव्यास देव ने भगवान श्रीकृष्ण से शुक्पर माया का आक्रमण न होने कात्रिवाचिक आशीर्वाद सुलभ करा दिया तब श्रीशुकदेवजी प्रथ्वी पर अवतीर्ण हुए और आशिर्वाद्दाता भगवान श्रीकृष्ण एवं माता पिता के श्रीचरणों में सादर प्रणाम कर वन की ओर चल पड़े. व्यासजी पुत्र्वात्सल्य से उनके पीछे-पीछे हे पुत्र! हे पुत्र! कहते उन्हें बुलाते रहे -
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव
किन्तु शुकदेवजी लौटे नहीं. एक पर्वत की कन्दरा में जाकर समाधिस्थ हो गए. व्यासजी विरह से व्याकुल होकर पुत्र के संस्कार को जाग्रत करने वाले भागवत के भावपूर्ण श्लोको का बार-बार उच्चारण करने लगे. उन श्लोको में प्रथम श्लोको में प्रथम श्लोक यह था-
अहो बाकि यम स्तान्काल्कूतम जिन्घान्स्या पायायादाप्य्साध्वी
लेभे गतिम् धत्र्युचितम तातोंयम कम व दयालुम शरणम वृजेम
आश्चर्य ! भगवान् की दयालुता का मै कहा तक वर्णन करू. दुष्ट राक्षसी पूतना ने मरने की इच्छा से अपने स्तनों में कालकूट विष भरकर भगवान को पिलाया किन्तु भगवन ने उसे माता की सी उचित गति अपना लोक दे दिया. विष देने वाले को भी जो अमृत प्रदान कर, ऐसा दयालु दूसरा देवता कौन है, जिसकी मै शरण लू.
यह श्लोक सुनते ही शुकदेवजी की समाधी टूट गई. वह विह्वल होकर कन्दरा से बहार आये और उन्मत्त की तरह उस श्लोक की ध्वनि का अनुसरण कर व्यासजी के समीप जा पहुचे. वहा उनके चरणों पर गिरकर आंसू बहाते हुए बोले- बेटा ! आश्रम पर चलो, वहा हम तुम्हे ऐसे ही बहुत से श्लोक सुनायेगे. शुकदेवजी भगवन के गुणों से आकृष्ट होकर उनके साथ आश्रम पर वहा उन्होंने व्यासजी के श्री मुख से सम्पूर्ण भागवत का अध्ययन किया.
7/30/2010
श्रीमद्भागवत का श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
भागवत 4 स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ महाभारत की रचना हुई
शुकदेवजी ने यह कथा परीक्षित को सुनाई थी. यह कथा किस स्थान में, किस कारण और किस युग में आरम्भ हुई ? किससे प्रेरति होकर व्यासजी ने यह संहिता बनायीं ?
व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी समदर्शी और योगी थे. उनकी कही आसक्ति और भेद्द्रष्टि नहीं थी. वह उत्पन्न होते ही सब कुछ त्यागकर वन में जा रहे थे. मार्ग में एक सरोवर था . उसमे अप्सराये नग्न होकर जलविहार कर रही थी. शुकदेव को देखकर उन अप्सराओ को न तो लज्जा हुई और न उन्होंने वस्त्र धारण किये . शुकदेवजी के हे पुत्र ! हे पुत्र! हे पुत्र ! कहते जब वृद्ध अनग्न व्यासजी आये, तब उन स्त्रियों को बड़ी लज्जा हुई. जल से निकलकर उन्होंने तुरंत अपने-अपने वस्त्र पहन लिए. यह देखकर व्यासजी को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने इसका कारण अप्सराओ से पूछा , तब वे बोली-
भगवन आपकी द्रष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है. किन्तु आपके पुत्र की पवित्र द्रष्टि में वह भेद नहीं है, व्यासजी यह सुनकर चकित हो मौन हो गए.
ऐसे निर्लिप्त अनासक्त, ज्ञानी शुकदेवजी के साथ परीक्षित का संवाद कैसे हुआ ? जो उन्मत्त और मूक के सामान अवधूत वेश में हस्तिनापुर के आस-पास इधर-उधर विचर करते थे. उन्हें लोगो ने कैसे पहचाना इसके अतिरिक्त जब वह घूमते-फिरते कभी किसी गृहस्थ के यहाँ चले जाते, तो गोदोहन काल तक ही ठहरते थे, अधिक नहीं. तब परीक्षित को सात दिनों तक उन्होंने कथा कैसे सुनाई ? हमारे इस संदेह को कृपया आप निवृत्त करे.
शुकदेव सा वक्ता होना कठिन है और श्रोता परीक्षित सा होना भी कठिन है, क्योंकि दोनों के जन्म और कर्म आश्चर्यमय ही है. महाराज परीक्षित ने किस कारण राज्य का परित्याग किया ? अन्न-जल का परित्याग कर वे गंगातट पर क्यों गए ? और वही उन्होंने प्राणों का परित्याग भी क्यों किया ? आप हमारे इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करे.
व्यासजी द्वापर में महर्षि पराशर से उत्पन्न हुए. वह एक दिन सरस्वती नदी के तट पर आचमन कर बैठे थे. सूर्य का उदय हो रहा था, इसी समय ब्यासजी के मन में विचार आया की आगे कलियुग आनेवाला है. इसमें मनुष्य अल्पायु, दुर्बुद्धि, अश्रद्धालु और नास्तिक होगे. दिव्य चक्षु से यह सब देखकर समस्त वर्ण और आश्रमों के हित का विचार कर उन्होंने एक वेद को चार भागो में विभक्त किया और अपने चार शिष्य पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को उन्हें पढ़ा दिया. उन्ही की कृपा से मेरे पिता रोमहर्षण इतिहास पुराण के ज्ञाता हुए. स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ उन्होंने महाभारत की रचना की. यह सब करने पर भी प्राणियों के कल्याणार्थ सर्वदा तत्पर व्यासजी के ह्रदय में संतोष नहीं हुआ. उन्होंने विचार किया की मैंने दृढ संकल्प से वेद, गुरु और अग्नि की शुश्रूषा करते हुए सदा उनका आदर और आज्ञापालन किया है. फिर भी खेद है की मेरी आत्मा में संतोष नहीं हुआ. इसका कारण क्या है ?
अगले अंक में शुकदेव जी की जन्म कथा पढ़े
व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी समदर्शी और योगी थे. उनकी कही आसक्ति और भेद्द्रष्टि नहीं थी. वह उत्पन्न होते ही सब कुछ त्यागकर वन में जा रहे थे. मार्ग में एक सरोवर था . उसमे अप्सराये नग्न होकर जलविहार कर रही थी. शुकदेव को देखकर उन अप्सराओ को न तो लज्जा हुई और न उन्होंने वस्त्र धारण किये . शुकदेवजी के हे पुत्र ! हे पुत्र! हे पुत्र ! कहते जब वृद्ध अनग्न व्यासजी आये, तब उन स्त्रियों को बड़ी लज्जा हुई. जल से निकलकर उन्होंने तुरंत अपने-अपने वस्त्र पहन लिए. यह देखकर व्यासजी को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने इसका कारण अप्सराओ से पूछा , तब वे बोली-
भगवन आपकी द्रष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है. किन्तु आपके पुत्र की पवित्र द्रष्टि में वह भेद नहीं है, व्यासजी यह सुनकर चकित हो मौन हो गए.
ऐसे निर्लिप्त अनासक्त, ज्ञानी शुकदेवजी के साथ परीक्षित का संवाद कैसे हुआ ? जो उन्मत्त और मूक के सामान अवधूत वेश में हस्तिनापुर के आस-पास इधर-उधर विचर करते थे. उन्हें लोगो ने कैसे पहचाना इसके अतिरिक्त जब वह घूमते-फिरते कभी किसी गृहस्थ के यहाँ चले जाते, तो गोदोहन काल तक ही ठहरते थे, अधिक नहीं. तब परीक्षित को सात दिनों तक उन्होंने कथा कैसे सुनाई ? हमारे इस संदेह को कृपया आप निवृत्त करे.
शुकदेव सा वक्ता होना कठिन है और श्रोता परीक्षित सा होना भी कठिन है, क्योंकि दोनों के जन्म और कर्म आश्चर्यमय ही है. महाराज परीक्षित ने किस कारण राज्य का परित्याग किया ? अन्न-जल का परित्याग कर वे गंगातट पर क्यों गए ? और वही उन्होंने प्राणों का परित्याग भी क्यों किया ? आप हमारे इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करे.
व्यासजी द्वापर में महर्षि पराशर से उत्पन्न हुए. वह एक दिन सरस्वती नदी के तट पर आचमन कर बैठे थे. सूर्य का उदय हो रहा था, इसी समय ब्यासजी के मन में विचार आया की आगे कलियुग आनेवाला है. इसमें मनुष्य अल्पायु, दुर्बुद्धि, अश्रद्धालु और नास्तिक होगे. दिव्य चक्षु से यह सब देखकर समस्त वर्ण और आश्रमों के हित का विचार कर उन्होंने एक वेद को चार भागो में विभक्त किया और अपने चार शिष्य पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को उन्हें पढ़ा दिया. उन्ही की कृपा से मेरे पिता रोमहर्षण इतिहास पुराण के ज्ञाता हुए. स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ उन्होंने महाभारत की रचना की. यह सब करने पर भी प्राणियों के कल्याणार्थ सर्वदा तत्पर व्यासजी के ह्रदय में संतोष नहीं हुआ. उन्होंने विचार किया की मैंने दृढ संकल्प से वेद, गुरु और अग्नि की शुश्रूषा करते हुए सदा उनका आदर और आज्ञापालन किया है. फिर भी खेद है की मेरी आत्मा में संतोष नहीं हुआ. इसका कारण क्या है ?
अगले अंक में शुकदेव जी की जन्म कथा पढ़े
7/28/2010
श्रीमद्भागवत से - 3 - मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ
भगवान ने पहले लोक रचना की इच्छा से पुरुष अवतार ग्रहण किया था. उस समय भगवान, जिनके नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए एवं जिनके शरीर के अवयवो से समस्त लोक रचना संभव हुई, योग निद्रा का विस्तार कर जल में शयन कर रहे थे. विशुद्ध सत्त्वमय भगवान के इसी प्रधान रूप का योगी जन ज्ञान चक्षु से दर्शन करते है, इसमें भगवान के अनंत पैर, उरु, भुजा, मुख, शिर, कर्ण, नेत्र, नासिका आदि सुशोभित हो रहे है. यह रूप बहुत से मुकुट, कुंडल आदि आभूश्नो से देदीप्यमान है.
इसी रूप से भगवान के नाना अवतार होते है और फिर इसी में उनका लय हो जाता है, इसी के अंशांश ब्रह्मा, मरीचि तथा कश्यप से देवता, पशु पक्षी तथा मानुश्यादी योनिया उत्पन्न होती है. इसी रूप से जिन चौबीस अवतारों का प्रादुर्भाव हुआ था, उनके मंगलमय नामो का आप लोग श्रवण करे -
१-सनकादी महर्षियों का अवतार, २-बारह अवतार , ३-नारदावतार, ४-नर narayan अवतार, ५-कपिल अवतार, ६-दत्तात्रेय अवतार, ७-यग्य अवतार, 8- रिषभ अवतार, ९-प्रथू का अवतार, १०-मत्यस्य अवतार, ११- कूर्म अवतार, १२-धन्वन्तरी का अवतार, १३-मोहिनी का अवतार, १४-नरसिंह अवतार, १५-वामन अवतार, १६-परशुराम अवतार, १७-व्यास अवतार, १८-राम अवतार, १९-बलदेवता अवतार, २०-श्री कृष्ण अवतार, २१-हरी अवतार, २२-हंस अवतार, २३-बुद्ध अवतार और २४-कल्कि अवतार
इस प्रकार भगवान के असंख्य अवतार है और वे समय-समय पर प्रगट होकर जगत की रक्षा करते है. जो मनुष्य सायं प्रातः इन अवतारों का श्रवण और कीर्तन करता है वह दुखमय संसार से मुक्त हो जाता है.
जैसे निरुप आकाश में वायु के आश्रित मेघो की और वायु में पार्थिव रेणुओ की अज्ञानवश कल्पना की जाती है, वैसे ही द्रष्टा आत्मा में अज्ञानियो ने द्रश्य्त्व का आरोप किया है, ये दोनों ही जीव के बंधन हेतु संसार के कारण है, जब प्रेम लक्षणा भक्ति के द्वारा ज्ञान रुपी सूर्य का उदय होता है तब ये दोनों शरीर ज्ञान अग्नि में भस्म हो जाते है एवं जीव भगवान का साक्षात्कार कर परम आनंद का अनुभव करता है, प्रेम लक्षणा भक्ति भावना के जन्म, कर्म तथा लीलाओ के कीर्तन और चिंतन से प्राप्त होती है.
यद्यपि देहाभिमानी जीव तर्क आदि कौशल के द्वारा भी भगवान की लीलाओ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, तथापि जो निष्कपट भाव से अहंकार त्यागकर भगवान के चरण कमल मकरंद का पान करता है, उस पर शीघ्र भगवत्कृपा होती है, जिससे उसे लीलाओ के ज्ञान के साथ-साथ भक्ति द्वारा भगवान के स्वरूप का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है,
श्रीमद्भागवत को पांचवा वेद कहा गया है. इसमें भगवान के दिव्य मधुमय चरित्रों का वर्णन है, लोक कल्याण के लिए ही इसका प्रादुर्भाव हुआ है, व्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका उपदेश किया था. शुकदेवजी ने गंगा के तट पर स्थित महाराज परीक्षित को इसे सुनाया. वही सूतजी ने भी इसका श्रवण किया.
भगवान श्री कृष्ण जब अपने धाम को चले गए, तब मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ है. धर्म भी अब इसी के आश्रय में रहता है. यह छठे प्रश्न का उत्तर भी हो गया.
इसी रूप से भगवान के नाना अवतार होते है और फिर इसी में उनका लय हो जाता है, इसी के अंशांश ब्रह्मा, मरीचि तथा कश्यप से देवता, पशु पक्षी तथा मानुश्यादी योनिया उत्पन्न होती है. इसी रूप से जिन चौबीस अवतारों का प्रादुर्भाव हुआ था, उनके मंगलमय नामो का आप लोग श्रवण करे -
१-सनकादी महर्षियों का अवतार, २-बारह अवतार , ३-नारदावतार, ४-नर narayan अवतार, ५-कपिल अवतार, ६-दत्तात्रेय अवतार, ७-यग्य अवतार, 8- रिषभ अवतार, ९-प्रथू का अवतार, १०-मत्यस्य अवतार, ११- कूर्म अवतार, १२-धन्वन्तरी का अवतार, १३-मोहिनी का अवतार, १४-नरसिंह अवतार, १५-वामन अवतार, १६-परशुराम अवतार, १७-व्यास अवतार, १८-राम अवतार, १९-बलदेवता अवतार, २०-श्री कृष्ण अवतार, २१-हरी अवतार, २२-हंस अवतार, २३-बुद्ध अवतार और २४-कल्कि अवतार
इस प्रकार भगवान के असंख्य अवतार है और वे समय-समय पर प्रगट होकर जगत की रक्षा करते है. जो मनुष्य सायं प्रातः इन अवतारों का श्रवण और कीर्तन करता है वह दुखमय संसार से मुक्त हो जाता है.
जैसे निरुप आकाश में वायु के आश्रित मेघो की और वायु में पार्थिव रेणुओ की अज्ञानवश कल्पना की जाती है, वैसे ही द्रष्टा आत्मा में अज्ञानियो ने द्रश्य्त्व का आरोप किया है, ये दोनों ही जीव के बंधन हेतु संसार के कारण है, जब प्रेम लक्षणा भक्ति के द्वारा ज्ञान रुपी सूर्य का उदय होता है तब ये दोनों शरीर ज्ञान अग्नि में भस्म हो जाते है एवं जीव भगवान का साक्षात्कार कर परम आनंद का अनुभव करता है, प्रेम लक्षणा भक्ति भावना के जन्म, कर्म तथा लीलाओ के कीर्तन और चिंतन से प्राप्त होती है.
यद्यपि देहाभिमानी जीव तर्क आदि कौशल के द्वारा भी भगवान की लीलाओ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, तथापि जो निष्कपट भाव से अहंकार त्यागकर भगवान के चरण कमल मकरंद का पान करता है, उस पर शीघ्र भगवत्कृपा होती है, जिससे उसे लीलाओ के ज्ञान के साथ-साथ भक्ति द्वारा भगवान के स्वरूप का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है,
श्रीमद्भागवत को पांचवा वेद कहा गया है. इसमें भगवान के दिव्य मधुमय चरित्रों का वर्णन है, लोक कल्याण के लिए ही इसका प्रादुर्भाव हुआ है, व्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका उपदेश किया था. शुकदेवजी ने गंगा के तट पर स्थित महाराज परीक्षित को इसे सुनाया. वही सूतजी ने भी इसका श्रवण किया.
भगवान श्री कृष्ण जब अपने धाम को चले गए, तब मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ है. धर्म भी अब इसी के आश्रय में रहता है. यह छठे प्रश्न का उत्तर भी हो गया.
7/27/2010
श्री मदभागवत से- २, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है,
सूतजी सौनकादी ऋषियों के छः प्रश्नों को सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और श्री शुकदेवजी का ध्यान कर कहने लगे- कृष्ण सम्बन्धी प्रश्नों से लोगो का महान कल्याण होता है और आत्मा को शांति प्राप्त होती है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
7/26/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ? कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्रीमद भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का रसमय फल है. यह भक्तिरस से भरा हुआ है. यह सुमधुर फल श्रीनारायण से ब्रह्माजी को, ब्रह्माजी से नारद को, श्रीनारादजी से सरस्वती के तट पर आसीन खिन्नचित्त श्री व्यासजी को तथा व्यासजी से योगेश्वर श्री शुकदेवजी को प्राप्त हुआ.
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
7/25/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
ಎएक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले yagy का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परमज्ञानी सूतजी वहा आ पहुचे. ऋषियों ने पूछा - हे भगवान आपने समस्त इतिहास पुरानो का अध्ययन और उनका प्रवचन भी किया है. व्यासजी जो रहस्य जानते है, उन सबका आपको भी पूर्ण रूप ज्ञान है. श्रद्धालु और प्रेमी शिष्यों को गुरुजन गोप्य बाते भी बतला देते है. इसलिए अब आप कृपा कर यह बताये की
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
7/24/2010
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
7/21/2010
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
श्रीमद्भागवत की कथा किसके मुख से सुनी जाये उसके भी नियम है, इस विषय में कौशिकी संहिता में लिखा है की जो वैष्णव नहीं, उनके मुख से कथा कदापि नहीं सुननी चाहिए. भागवत की कथा तो विशेष रूप से वैष्णव के मुख से ही सुननी चाहिए. पूर्वाचार्यों ने वैष्णव शब्द का अर्थ ब्राह्मण बताया है.
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
7/20/2010
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष इस कथा को अवश्य सुने.
महाभारत युद्ध के आरम्भ में भगवान श्री कृष्ण जब अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे, तब हनुमानजी ने ध्वजा पर बैठे-बैठे गीता का श्रवण किया. गीता की समाप्ति पर अर्जुन की तरह हनुमानजी ने भी भगवान का पूजन कर उनसे कहा, भगवान, मै भी आपका शिष्य हूँ, कारण मैंने ध्वजा पर बैठे-बैठे ही आपसे गीता सुनी है,
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
7/19/2010
ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है.
यदि स्वतंत्र रूप से सप्ताह करने का समर्थ न हो,तो आठ सहायक मिलकर इस शुभ कार्य को करे. सर्व प्रथम ज्योतिषी से मुहूर्त पूछे.
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
7/18/2010
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए.
पिता के मरने पर एक दिन धुन्धुकारी ने अपनी माता को भी खूब पीटा और कहा jaldi ब्बता धन कंहा गडा है, नहीं तो लातो के प्रहार से तुझे मार ही डालूगा. पुत्र के भय से व्याकुल धुधुली उसी रात कुए में गिरकर मर गयी. गोकर्ण पहले ही teerth यात्रा करने चले गए थे. उनका कोई शत्रु या मित्र न थे. घर में घुन्धुकारी अकेला रह गया था , उसने वहा पांच वेश्याये रख ली और चोरी के dhan से उनका पोषण कर कुकर्मो me निरत रहने लगा. एक दिन उन वेश्याओं ने उससे वस्त्र आभूषण लाने का आग्रह किया. वह कामांध कही से बहुत से भूषण वस्त्र चोरी कर ले भी आया. सोने चांदी के बहुमूल्य सामान को देखकर रात्री में वेश्याओ ने विचार किया की यह तो प्रतिदिन ही चोरी करता है, एक दिन राजा इसे पकड़कर मार ही देगा और साथ में हमें भी मरकर सारा धन छीन लेगा. इसलिए हम स्वयं ही क्यों न इसे मरकर धन लेकर कही अन्यत्र चली जाय. ऐसा निश्चय कर एक रात उन सबने सोते समय उसके हाथ पैर बाधकर गले में जलते अंगारे उसके मुख में ठूस दिए. अग्नि की ज्वाला से छटपटाकर वह मर गया, उसके मरते ही उन साहसी वेश्याओं ने वही गड्ढा खोदकर उसे गाड दिया. इस रहस्य का किसी को भी पता न चला . जब लोग धुन्धुकारी का हाल पूछते तो वेशाए कह देती की वह धन के लोभ में कही दूर चले गए है. आशा है, एक वर्ष में आ जायेगे.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
7/17/2010
कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ
तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अत्यंत रमणीय नगर था. उसमे आत्मदेव नामक एक तेजस्वी ब्रह्मण रहता था जो श्रोत एवं स्मार्त कर्म में पारंगत था. धनी होते हुए भी वह भिक्षु वृत्ति करता था. उसकी धुन्धुली नाम की पत्नी बड़ी ही कृपण एवं क्रूर स्वभाव की थी. अकारण ही झगडा कर वह pushtee भी अपनी ही बात की करती थी . ऐसे ही गृहस्थ जीवन में दोनों का बहुत समय बीत गया किन्तु कोई संतान न हुई. बाद में पुत्र के निमित्त नाना प्रकार के दान अनुष्ठान किये, पर कोई फल nahee. हुआ एक दिन चिंता से व्याकुल हो आत्मदेव वन में चला गया. वहां मध्यान्ह में पानी पीने वह एक तालाब पर गया. जल पीकर वह दुखिया वही बैठ गया. दो घड़ी बाद एक सन्यासी वहा आये. वह उनके चरणों पर गिर कर रोने लगा . सन्यासी ने kaha - अरे ब्रह्मण, रोते क्यों हो ? कौन सी चिंता है ? अपने दुःख का कुछ कारण तो कहो. ब्रह्मण ने कहा - महाराज, मैं अपना दुःख क्या कहू ! मैं बड़ा अभागा हूँ. मेरे पित्तर आसूओ को पीकर रहते है. मेरी दी हुई वस्तु देवता या ब्रह्मण भी ग्रहण नहीं करते . संतान न होने से ही मै अत्यंत दुखित हूँ. यहाँ प्राण त्यागने आया हूँ. पुत्र के बिना जीवन या कुल सब व्यर्थ है. अपना दुःख मै कहा तक बताऊ. मैंने जो गौ पाली, वह तक बंध्या हो गयी. वृक्ष लगाया, वह भी सूख गया. कोई मुझे फल दे जाता है तो वह भी मेरे हांथों में आते ही सूख जाता है,. ऐसे भाग्यहीन निरवंशी के जीने से क्या लाभ.
महाराज आप महादयावन है. नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, मेघ अपने लिए जल नहीं बरसते, संत महात्माओं की विभूतिया परोपकार के लिए होती है.
जो अपने से दूसरे के द्वारा अपने परिवार पर दीनों पर अपने भ्रत्यो पर दया नहीं करता उसके जीवन से क्या लाभ यो तो कौआ भी जीता है और अपना पेट भरता है. अर्थात जो दया या उपकार नहीं करता वह दूसरे जन्मा में कौआ होता है.
यह कहकर वह ब्रह्मण जोर-जोर से चिल्लाकर रोने लगा. उसे दुखित देखकर सन्यासी को दया आ गई. उन्होंने उसके मस्तक में लिखित ब्रह्माक्षर बांचे और कहा- हे ब्रह्मण , पुत्र का यह मोह छोड़ दो. कर्म की गति बड़ी बलवती है. उसे कोई टाल नहीं सकता. विवेक का आश्रय लेकर संसार वासना त्याग दे. मैंने तुम्हारा प्रारब्ध देख लिया है. उसमे सात जन्म तक तेरे पुत्र होने का योग नहीं है.
याद रखो संतान से तुम्हे सुख न होगा. रजा सगर एवं अंग की तरह दुःख ही भोगना पड़ेगा. इसलिए पुत्र का आग्रह छोड़ दो. संन्यास में सर्वथा सुख ही सुख है. ब्रह्मण ने कहा - दीनदयालु, इस सूखे विवेक से मेरा क्या होगा ? जैसे भी हो, आप मुझे पुत्र प्राप्ती का वर दे. अन्यथा मैं अभी आपके ही चरणों में प्राण त्याग दूगा.
ब्रह्मण का ऐसा आग्रह देखकर सन्यासी ने आम का एक फल उसके हाँथ में दिया और कहा - जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला देना. उससे तुम्हारे अत्यंत सुन्दर एक पुत्र होगा. यह कहकर सन्यासी चले गए. ब्रह्मण भी लौटकर घर आया. पत्नी को खाने के लिए वह फल देकर स्वयं किसी कार्य से बाहर चला गया.
इधर उसकी कुटिल पत्नी ने अपनी सखी से रोकर कहा - हे सखी, अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है. इस फल को मैं नहीं खाऊगी. इससे गर्भ होकर मेरा पेट बढ़ जाएगा. भूख मारी जाएगी. घर का काम काज भी न कर पाऊगी . उठाना बैठना भी कठिन हो जाएगा. कहीं गर्भ टेढ़ा हो गया तो मैं मर ही जाऊगी. मुझे अस्वस्थ देखकर कही मेरी ननद ही सब सामान उठा न ले जाय. पुत्र का लालन-पालन भी एक बड़ी समस्या है. मेरी समझ में तो बंध्या या विधवा नारीया सर्वथा सुखी है. ऐसे ही अनेक कुतर्क कर उसने वह फल नहीं खाया. जब पति ने आकर उससे पुछा की तुमने फल खाया तब उसने कह दिया हाँ खिला लिया.
एक दिन देवात उसके घर उसकी छोटी बहन आयी. उसने सारा वृतांत अपनी बहन को कह सुनाया . वह बोली तू चिंता न कर. मेरे गर्भ है. मैं अपने बच्चे को तुझे दे दूंगी. तब तक तू गर्भवती बनकर गुप्तरूप से घर में बैठी रह. मेरे पतिदेव को अपने स्वामी से धन दिला देना. वे बच्चा सौप देने में आपत्ती न करेंगे. मैं प्रचारित करा दूंगी की मेरा छेह मॉस का बच्चा मर गया. प्रतिदिन आकर मैं तेरे बच्चे का पालन पोषण करती रहूगी. तू परीक्षार्थ यह फल गौ को खिला दे./
स्त्री स्वाभाव से धुन्धुली ने वैसा ही किया. समय आने पर उसकी बहन के बालक हुआ और वह चुप चाप आकर एकांत में उसे अपना बच्चा दे गयी. पुत्र का जन्म सुनते ही आत्मदेव आनंद विभोर हो उठे. दरवाजे पर बाजों के साथ ही मांगलिक गान भी होने लगे. पत्नी ने स्वामी से कहा - मेरे स्तनों में दूध नहीं है. ऊपर के दूध से इसका पालन कठिन होगा. इसलिए आप मेरी बहन को बुला ले. वह बच्चे का पोषण कर देगी. सुना है, उसका बच्चा मर गया. पति ने ऐसा ही किया. उधर तीन मास बाद गौ के भी बच्चा हुआ. वह बालक इतना सुन्दर था की उसे देखने दूर-दूर से लोग आने लगे. उसके कान गौ के सामान होने से पति ने उसका नान गोकर्ण रखा. आगे चलकर वह बड़ा पंडित एवं ज्ञानी हुआ. इधर धुन्धुली का पुत्र धुन्धुकारी हुआ.
वह महा क्रूर प्रकृति का, दुराचारी एवं वेश्यागामी निकला. आचार विचार से हीन वह दीन और अंधे प्राणियों को सताता था, दूसरों का घर जला डालता था. कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ. खेल में बालको को ले जाकर कुए में डाल देता. उसने वेश्याओ के कुसंग में पड़कर पिता का सारा धन नष्ट कर डाला. एक दिन पिता को पीटकर वह उसके सोने-चांदी के सरे बर्तन ले गया. पिता को इससे बड़ा दुःख हुआ. वह रो रोकर कहने लगे की अब मैं कहा जाऊ, क्या करू, मेरा दुःख कौन दूर करेगा ? पुत्र न होना अच्छा है, किन्तु कुपुत्र का होना अच्छा नहीं.
उसी समय गोकर्ण ने आकर कहा-पिताजी, आप दुःख न करे. यह संसार ही असार है, यहाँ कौन किसका पुत्र और किसका धन. इन वस्तुओ में आसक्ति करने वाला सर्वदा जलता ही रहता है. इसलिए इन सबका मोह त्यागकर वन गमन करे.
पिताजी शरीर में हड्डी, मांस और रुधिर ही तो भरा है, आप इसमें अहंबुद्धि न करे, स्त्री-पुत्रादि की ममता त्यागकर जगत की क्षणभंगुरता पर ध्यान दें और वैराग्य धारण कर भगवान की भक्ती में लग जाए . इससे आपका सम्पूर्ण दुःख निवृत्त हो जायेगा.
काम्य धर्मों का त्याग कर निष्काम धर्म का आचरण करे, सत्पुरुषों का संग करे, विषय वासना को ह्रदय से हटा दे एवं दूसरो की स्तुति निंदा में न पड़कर भागवत कथा रूपी अमृत का सदा पान करे.
इस प्रकार पुत्र के उपदेश से आत्मदेव वन में चले गए और वहा प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण की सेवा एवं भागवत के दशम स्कंध के पाठ से भागवत-स्वरूप को प्राप्त हो गए.
शेष आगे के अंक में
महाराज आप महादयावन है. नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, मेघ अपने लिए जल नहीं बरसते, संत महात्माओं की विभूतिया परोपकार के लिए होती है.
जो अपने से दूसरे के द्वारा अपने परिवार पर दीनों पर अपने भ्रत्यो पर दया नहीं करता उसके जीवन से क्या लाभ यो तो कौआ भी जीता है और अपना पेट भरता है. अर्थात जो दया या उपकार नहीं करता वह दूसरे जन्मा में कौआ होता है.
यह कहकर वह ब्रह्मण जोर-जोर से चिल्लाकर रोने लगा. उसे दुखित देखकर सन्यासी को दया आ गई. उन्होंने उसके मस्तक में लिखित ब्रह्माक्षर बांचे और कहा- हे ब्रह्मण , पुत्र का यह मोह छोड़ दो. कर्म की गति बड़ी बलवती है. उसे कोई टाल नहीं सकता. विवेक का आश्रय लेकर संसार वासना त्याग दे. मैंने तुम्हारा प्रारब्ध देख लिया है. उसमे सात जन्म तक तेरे पुत्र होने का योग नहीं है.
याद रखो संतान से तुम्हे सुख न होगा. रजा सगर एवं अंग की तरह दुःख ही भोगना पड़ेगा. इसलिए पुत्र का आग्रह छोड़ दो. संन्यास में सर्वथा सुख ही सुख है. ब्रह्मण ने कहा - दीनदयालु, इस सूखे विवेक से मेरा क्या होगा ? जैसे भी हो, आप मुझे पुत्र प्राप्ती का वर दे. अन्यथा मैं अभी आपके ही चरणों में प्राण त्याग दूगा.
ब्रह्मण का ऐसा आग्रह देखकर सन्यासी ने आम का एक फल उसके हाँथ में दिया और कहा - जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला देना. उससे तुम्हारे अत्यंत सुन्दर एक पुत्र होगा. यह कहकर सन्यासी चले गए. ब्रह्मण भी लौटकर घर आया. पत्नी को खाने के लिए वह फल देकर स्वयं किसी कार्य से बाहर चला गया.
इधर उसकी कुटिल पत्नी ने अपनी सखी से रोकर कहा - हे सखी, अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है. इस फल को मैं नहीं खाऊगी. इससे गर्भ होकर मेरा पेट बढ़ जाएगा. भूख मारी जाएगी. घर का काम काज भी न कर पाऊगी . उठाना बैठना भी कठिन हो जाएगा. कहीं गर्भ टेढ़ा हो गया तो मैं मर ही जाऊगी. मुझे अस्वस्थ देखकर कही मेरी ननद ही सब सामान उठा न ले जाय. पुत्र का लालन-पालन भी एक बड़ी समस्या है. मेरी समझ में तो बंध्या या विधवा नारीया सर्वथा सुखी है. ऐसे ही अनेक कुतर्क कर उसने वह फल नहीं खाया. जब पति ने आकर उससे पुछा की तुमने फल खाया तब उसने कह दिया हाँ खिला लिया.
एक दिन देवात उसके घर उसकी छोटी बहन आयी. उसने सारा वृतांत अपनी बहन को कह सुनाया . वह बोली तू चिंता न कर. मेरे गर्भ है. मैं अपने बच्चे को तुझे दे दूंगी. तब तक तू गर्भवती बनकर गुप्तरूप से घर में बैठी रह. मेरे पतिदेव को अपने स्वामी से धन दिला देना. वे बच्चा सौप देने में आपत्ती न करेंगे. मैं प्रचारित करा दूंगी की मेरा छेह मॉस का बच्चा मर गया. प्रतिदिन आकर मैं तेरे बच्चे का पालन पोषण करती रहूगी. तू परीक्षार्थ यह फल गौ को खिला दे./
स्त्री स्वाभाव से धुन्धुली ने वैसा ही किया. समय आने पर उसकी बहन के बालक हुआ और वह चुप चाप आकर एकांत में उसे अपना बच्चा दे गयी. पुत्र का जन्म सुनते ही आत्मदेव आनंद विभोर हो उठे. दरवाजे पर बाजों के साथ ही मांगलिक गान भी होने लगे. पत्नी ने स्वामी से कहा - मेरे स्तनों में दूध नहीं है. ऊपर के दूध से इसका पालन कठिन होगा. इसलिए आप मेरी बहन को बुला ले. वह बच्चे का पोषण कर देगी. सुना है, उसका बच्चा मर गया. पति ने ऐसा ही किया. उधर तीन मास बाद गौ के भी बच्चा हुआ. वह बालक इतना सुन्दर था की उसे देखने दूर-दूर से लोग आने लगे. उसके कान गौ के सामान होने से पति ने उसका नान गोकर्ण रखा. आगे चलकर वह बड़ा पंडित एवं ज्ञानी हुआ. इधर धुन्धुली का पुत्र धुन्धुकारी हुआ.
वह महा क्रूर प्रकृति का, दुराचारी एवं वेश्यागामी निकला. आचार विचार से हीन वह दीन और अंधे प्राणियों को सताता था, दूसरों का घर जला डालता था. कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ. खेल में बालको को ले जाकर कुए में डाल देता. उसने वेश्याओ के कुसंग में पड़कर पिता का सारा धन नष्ट कर डाला. एक दिन पिता को पीटकर वह उसके सोने-चांदी के सरे बर्तन ले गया. पिता को इससे बड़ा दुःख हुआ. वह रो रोकर कहने लगे की अब मैं कहा जाऊ, क्या करू, मेरा दुःख कौन दूर करेगा ? पुत्र न होना अच्छा है, किन्तु कुपुत्र का होना अच्छा नहीं.
उसी समय गोकर्ण ने आकर कहा-पिताजी, आप दुःख न करे. यह संसार ही असार है, यहाँ कौन किसका पुत्र और किसका धन. इन वस्तुओ में आसक्ति करने वाला सर्वदा जलता ही रहता है. इसलिए इन सबका मोह त्यागकर वन गमन करे.
पिताजी शरीर में हड्डी, मांस और रुधिर ही तो भरा है, आप इसमें अहंबुद्धि न करे, स्त्री-पुत्रादि की ममता त्यागकर जगत की क्षणभंगुरता पर ध्यान दें और वैराग्य धारण कर भगवान की भक्ती में लग जाए . इससे आपका सम्पूर्ण दुःख निवृत्त हो जायेगा.
काम्य धर्मों का त्याग कर निष्काम धर्म का आचरण करे, सत्पुरुषों का संग करे, विषय वासना को ह्रदय से हटा दे एवं दूसरो की स्तुति निंदा में न पड़कर भागवत कथा रूपी अमृत का सदा पान करे.
इस प्रकार पुत्र के उपदेश से आत्मदेव वन में चले गए और वहा प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण की सेवा एवं भागवत के दशम स्कंध के पाठ से भागवत-स्वरूप को प्राप्त हो गए.
शेष आगे के अंक में
7/16/2010
छान्दोग्य उपनिषद ने उपाय बताया - श्रीमदभागवत का श्रवण करो
नारदजी ने सोचा की ज्ञान और वैराग्य के बिना तो भक्ति पूर्ण होती ही नहीं. यदि भक्ति में ज्ञान और वैराग्य नहीं है तो भक्ति किसकी? जिस भगवान की भक्ति की जाती है उनका ही दर्शन नहीं हो रहा है, ज्ञान नहीं हो रहा है और जिस प्रपंच से, संसार से मन को हटाकर भगवान की भक्ति की जाती है, उसके प्रति वैराग्य नहीं है. यदि भगवान से प्रेम हो तो संसार से अर्थात ममता से, मोह से और उन समस्त संबंधों से, जिनमे हम फंसे हुए है, हमें वैराग्य होना चाहिए.
पर नारद जी को न तो वहां जाग्रतावस्था में वैराग्य दिखा और न ज्ञान. ये दोनों भक्ति के पुत्र है, फल है. जब भक्तिभाव ह्रदय में आता है तब भजनीय भगवान का ज्ञान होता है और उसके सिवाय किसी दूसरे से राग-द्वेष नहीं होता. राग-देवश की शिथिलता, राग-द्वेष के अभाव का नाम ही वैराग्य है. हम किसी एक से तो प्रेम करें और दुसरे से द्वेष करें तो इसका फल यह होगा के हम जिससे राग-द्वेष करेंगे वह आकर भगवान की जगह हमारे ह्रदय में बैठ जायगा. फिर भगवान नहीं दिखेंगे, हमारे ह्रदय में वह शत्रु दीखेंगा जिससे द्वेष है, वह मित्र दिखेगा- जिससे राग है. इस प्रकार भगवान के स्थान पर संसार की नफरत, दोनी नहीं चलती. वहां तो ह्रदय में शुद्ध रूप से भगवान होने चाहिए.
नारदजी एक ओर तो संसार की अशांति से, संघर्ष से, वैमनस्यसे, तीर्थ आदि पवित्र स्थानों में भी काम क्रोध की अधिकता से दुखी थे ही, दूसरी ओर भक्ति की अपूर्णता, अस्वस्थता तथा अप्रसन्नता देखकर और भी दुखी हो गए, नारदजी ने भक्ति की प्रार्थना पर उसे सुखी करने का उपाय सोच, ध्यान किया. इतने में आकाशवाणी हुई की तुम्हारे मन में जो दुःख है, भक्ति को जो क्लेश है, ज्ञान वैराग्य की जो मूर्छा है, उसके निवारण का उपाय जब तुम्हे संत मिलेंगे तब बताएँगे.
इसके बाद नारदजी ने अपने गुरु सनकादिकों की शरण में गए. सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमा - ये चारों श्रुति प्रसिद्ध मुनीश्वर है. इन्होने तत्वोप्देश करके नारदजी का शोक दूर किया. छान्दोग्य उपनिषद ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य को जाग्रत करने के लिए यह उपाय बताया की श्रीमदभागवत का श्रवण करो. फिर उन्होंने स्वयं ही श्रीमद्भागवत का श्रवण कराया और उसके फलस्वरूप भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पुष्ट-तुष्ट हो गए.
पर नारद जी को न तो वहां जाग्रतावस्था में वैराग्य दिखा और न ज्ञान. ये दोनों भक्ति के पुत्र है, फल है. जब भक्तिभाव ह्रदय में आता है तब भजनीय भगवान का ज्ञान होता है और उसके सिवाय किसी दूसरे से राग-द्वेष नहीं होता. राग-देवश की शिथिलता, राग-द्वेष के अभाव का नाम ही वैराग्य है. हम किसी एक से तो प्रेम करें और दुसरे से द्वेष करें तो इसका फल यह होगा के हम जिससे राग-द्वेष करेंगे वह आकर भगवान की जगह हमारे ह्रदय में बैठ जायगा. फिर भगवान नहीं दिखेंगे, हमारे ह्रदय में वह शत्रु दीखेंगा जिससे द्वेष है, वह मित्र दिखेगा- जिससे राग है. इस प्रकार भगवान के स्थान पर संसार की नफरत, दोनी नहीं चलती. वहां तो ह्रदय में शुद्ध रूप से भगवान होने चाहिए.
नारदजी एक ओर तो संसार की अशांति से, संघर्ष से, वैमनस्यसे, तीर्थ आदि पवित्र स्थानों में भी काम क्रोध की अधिकता से दुखी थे ही, दूसरी ओर भक्ति की अपूर्णता, अस्वस्थता तथा अप्रसन्नता देखकर और भी दुखी हो गए, नारदजी ने भक्ति की प्रार्थना पर उसे सुखी करने का उपाय सोच, ध्यान किया. इतने में आकाशवाणी हुई की तुम्हारे मन में जो दुःख है, भक्ति को जो क्लेश है, ज्ञान वैराग्य की जो मूर्छा है, उसके निवारण का उपाय जब तुम्हे संत मिलेंगे तब बताएँगे.
इसके बाद नारदजी ने अपने गुरु सनकादिकों की शरण में गए. सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमा - ये चारों श्रुति प्रसिद्ध मुनीश्वर है. इन्होने तत्वोप्देश करके नारदजी का शोक दूर किया. छान्दोग्य उपनिषद ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य को जाग्रत करने के लिए यह उपाय बताया की श्रीमदभागवत का श्रवण करो. फिर उन्होंने स्वयं ही श्रीमद्भागवत का श्रवण कराया और उसके फलस्वरूप भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पुष्ट-तुष्ट हो गए.
7/15/2010
वृन्दावन में अलौकिक अनुभूती हुई
ಅ उद्धवजी ने भगवन श्रीकृष्ण से प्रार्थना की की महाराज, आप तो अपने भक्तों का कार्य पूरा करके, उनको सुख देकर अंतर्धान हो जावेगे. फिर आपका, आपकी लीला का, आपके द्वारा प्रतिपादित धर्म का दर्शन कहाँ होगा?
भगवन श्रीकृष्ण ने कहा की उद्धवजी मैं पहले तो अंतर्धान होकर वैकुण्ठ या क्षीरसागर में चला जाया करता था. पर अवकी वर अंतर्धान होने पर मैं वैकुण्ठ या क्षीरसागर में नहीं जाऊंगा, श्रीमद्भागवत-रूप समुद्र में ही निवास करूंगा-
तिरोधाय प्रविश्तोयम श्रीमाद्भाग्वातार्दावं.
अतः भगवन श्रीकृष्ण बाहर से तो अंतर्धान हुए, परन्तु श्रीमद्भागवत रूप अमृत समुद्र में आकर बैठ गए. वही भगवान की प्रत्यक्षा वन्ग्मायी शब्दमयी मूर्ति हम लोगो की आँखों के सामने है-
तेनेयं वान्ग्मायी मूर्तिः प्रत्यक्षण वर्तते हरेह.
भक्त लोग श्रीक्रिश्नाव्तार के समय अपने नेत्रों और अन्य समग्र इन्द्रियों के द्वारा जिस रस का आस्वादन करे हैं, वही रस आज भी हम श्रीमद्भागवत के श्रवण द्वारा प्राप्त कर सकते है. वह सुख परीक्षा का विषय नहीं, प्रत्यक्षा का विषय है, क्योंकि भगवान कहीं पर्लूक में नहीं गए, अंतर्धान नहीं हुए, श्रीमद्भागवत के रूप में स्वयं प्रकट है.
इसीसे जब यह प्रश् उठा की भाग्वाताम्रत किसे पिलाया जाय- परीक्षित को या देवताओं को तो श्री शुकदेवजी महाराज ने देवताओं को उपेक्षित कर दिया, और परीक्षित को ही भाग्व्ताम्रत पिलाया. भला कहाँ तो श्रीमाद्भाग्वाटका अमृत और कहाँ स्वर्ग का अमृत? दोनों की दोई तुलना नहीं है.
एक बात ध्यान देना योग्य है, जिसपर पहले लौकिक-द्रष्टि से विचार करत हैं. नारदजी ने सम्पूर्ण प्रथिवी में भ्रमण किया और फिर धर्मप्रधान भारतवर्ष में, भरतखंड में आये. यहाँ उन्होंने भिन्न-भिन्न तीर्थों की यात्रा की, लेकिन उन्हें कही भी शांति, सुख तथा धर्म परायणता के दर्शन नहीं हुए. अत्यंत व्याकुल होकर जब वे वृन्दावन में यामुनाजीके तट पर आये तब वहां उनको अलौकिक अनुभूति हुई. जो वस्तु आँखों से नहीं दिखती, वह उन्हें वृन्दावन में देखने को मिली.
भक्ति-ज्ञान-वैराग्य - ये सब अमूर्त भाव है. इनकी मूर्ती का नहीं, इनके भाव का ही दर्शन होता है. ह्रदय में ही भक्ति आती है, ज्ञान आता है, वैराग्य आता है. लौकिक दशा में इन अलौकिक देवताओं का साक्षात्कार किसी को नहीं होता.
परन्तु नारदजी जब वृन्दावन में आये तो वहां उनके सामने अमूर्त भी मूर्त हो गया, भाव भी साकार हो गया, उन्होंने देखा की वहां भक्ती तो है युवती-सुन्दर, भगवन्मयी किन्तु उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हैं अर्थात वृन्दावन में भक्ति का तो बहुत आदर है, परन्तु ज्ञान-वैराग्य का आदर नहीं है. लोगो ने ज्ञान वैराग्य से रहित भक्ति को स्वीकार किया है.
भगवन श्रीकृष्ण ने कहा की उद्धवजी मैं पहले तो अंतर्धान होकर वैकुण्ठ या क्षीरसागर में चला जाया करता था. पर अवकी वर अंतर्धान होने पर मैं वैकुण्ठ या क्षीरसागर में नहीं जाऊंगा, श्रीमद्भागवत-रूप समुद्र में ही निवास करूंगा-
तिरोधाय प्रविश्तोयम श्रीमाद्भाग्वातार्दावं.
अतः भगवन श्रीकृष्ण बाहर से तो अंतर्धान हुए, परन्तु श्रीमद्भागवत रूप अमृत समुद्र में आकर बैठ गए. वही भगवान की प्रत्यक्षा वन्ग्मायी शब्दमयी मूर्ति हम लोगो की आँखों के सामने है-
तेनेयं वान्ग्मायी मूर्तिः प्रत्यक्षण वर्तते हरेह.
भक्त लोग श्रीक्रिश्नाव्तार के समय अपने नेत्रों और अन्य समग्र इन्द्रियों के द्वारा जिस रस का आस्वादन करे हैं, वही रस आज भी हम श्रीमद्भागवत के श्रवण द्वारा प्राप्त कर सकते है. वह सुख परीक्षा का विषय नहीं, प्रत्यक्षा का विषय है, क्योंकि भगवान कहीं पर्लूक में नहीं गए, अंतर्धान नहीं हुए, श्रीमद्भागवत के रूप में स्वयं प्रकट है.
इसीसे जब यह प्रश् उठा की भाग्वाताम्रत किसे पिलाया जाय- परीक्षित को या देवताओं को तो श्री शुकदेवजी महाराज ने देवताओं को उपेक्षित कर दिया, और परीक्षित को ही भाग्व्ताम्रत पिलाया. भला कहाँ तो श्रीमाद्भाग्वाटका अमृत और कहाँ स्वर्ग का अमृत? दोनों की दोई तुलना नहीं है.
एक बात ध्यान देना योग्य है, जिसपर पहले लौकिक-द्रष्टि से विचार करत हैं. नारदजी ने सम्पूर्ण प्रथिवी में भ्रमण किया और फिर धर्मप्रधान भारतवर्ष में, भरतखंड में आये. यहाँ उन्होंने भिन्न-भिन्न तीर्थों की यात्रा की, लेकिन उन्हें कही भी शांति, सुख तथा धर्म परायणता के दर्शन नहीं हुए. अत्यंत व्याकुल होकर जब वे वृन्दावन में यामुनाजीके तट पर आये तब वहां उनको अलौकिक अनुभूति हुई. जो वस्तु आँखों से नहीं दिखती, वह उन्हें वृन्दावन में देखने को मिली.
भक्ति-ज्ञान-वैराग्य - ये सब अमूर्त भाव है. इनकी मूर्ती का नहीं, इनके भाव का ही दर्शन होता है. ह्रदय में ही भक्ति आती है, ज्ञान आता है, वैराग्य आता है. लौकिक दशा में इन अलौकिक देवताओं का साक्षात्कार किसी को नहीं होता.
परन्तु नारदजी जब वृन्दावन में आये तो वहां उनके सामने अमूर्त भी मूर्त हो गया, भाव भी साकार हो गया, उन्होंने देखा की वहां भक्ती तो है युवती-सुन्दर, भगवन्मयी किन्तु उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हैं अर्थात वृन्दावन में भक्ति का तो बहुत आदर है, परन्तु ज्ञान-वैराग्य का आदर नहीं है. लोगो ने ज्ञान वैराग्य से रहित भक्ति को स्वीकार किया है.
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