12/12/2010

भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान है.

असल में पवित्र वही है जिसके स्मरण से अपवित्र पवित्र हो जाते है, पतित पावन हो जाते है, पिछड़े हुए आगे बढ़ जाए है और ऊपर उठ जाते हो.
भगवान् के स्मरण से उनका आश्रय ग्रहण करने से किरात, हूड, आंध्र, पुलिंद, पुल्कस माने कसाई सब के सब पवित्र हो जाते है. इसीलिए श्रीशुकदेवजी महाराज भगवान् को नमस्कार करके उनसे प्रार्थना करते है की प्रभो  पधारो. मेरी इस वाणी पर बैठ जाओ और इसे अलंकृत करो.

सूतजी  ने स्पष्ट  कर दिया है की भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान ही है. जिस तरह शरद ऋतू  आती है तो सारा जल अपने आप स्वच्छ हो जाता है उसी तरह कान के रास्ते  से भगवान् हमारे ह्रदय में प्रवेह करते है तो सारे कल्मष दूर हो जाते है-
प्रविष्टिः कर्ण रंध्रेड   स्वनाम भावसरोरुहम.
धुनोति शमलम कृष्णः सलिलस्य यथा शरत.

कोई सज्जन अपने एक मित्र के यहाँ मिलने गए. मित्र के घर का दरवाजा भीतर से बंद था उन्होंने बहुत पुकारा-खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. दूसरी ओर एक खिड़की खुली दिखाई पड़ी. सज्जन उसी खिड़की के रस्ते किसी प्रकार भीतर घुसे तो उन्होंने देखा की उनका मित्र बीमार है, छत  पर बेहोश पड़ा है, घर में कई दिनों से झाड़ू नहीं लगी है, खाने -पीने का भी साधन नहीं  है.
सज्जन ने पहले घर की सफाई की, मित्र का हाथ  मुह साफ़ किया, उसके कपडे बदले, उसको दवा दी, पथ्य दिया और इस प्रकार उस मित्र को स्वस्थ्य कर दिया, मित्र ने पूछा की भाई तुम घर में आये कैसे ? न दरवाजा खुला  था और न मैंने तुमको कोई सूचना दी थी. सज्जन ने कहा की मुझे  बुलाने के लिए तुम्हारे  निमंत्रण की जरूरत नहीं थी, इसलिए बिना बुलाये आ गया और जब मैंने तुम्हारा दरवाजा बंद देखा  तो उस खुली खिड़की से भीतर आ गया.

इसी  तरह भगवान् करते है. जैसे कोई नकाब लगाकर किसी के घर में घुस आता है उसी तरह भगवान संसार की भावनाओं से भरे हुए मनुष्य के ह्रदय में उसके काम के छिद्र से प्रविष्ट हो जाते है और  उसके सारे दोष दूर कर देते है.

श्रवण में एक तो चाहिए तत्व का ज्ञान, दूसरा चाहिए नियम, तीसरा चाहिए ह्रदय की निर्मलता और चौथा चाहिए भगवान् का स्तवन. भगवान् सबसे बड़े है, उनसे बड़ा कोई नहीं है-ऐसा समझकर भगवान् के उत्कर्ष का मन में चिंतन, वाणी से भगवान् के चरित्र का वर्णन और कान से भगवान के गुणों का श्रवण ह्रदय को निर्मल बनाता है.

जब तत्व ध्यानपूर्वक निर्मल ह्रदय से भगवान् के सम्बन्ध में मनन किया जाता है तभी श्रवण पूरा होता है.

मनन दो तरह से होता है-एक तो उत्पत्ति के द्वारा और दूसरा उपपत्ति के द्वारा. उपपत्ति द्वारा किये जानेवाले मनन के प्रसंग  में नारदजी ब्रह्माजी से कहते है-पिताजी, मै तो समझता हूँ की दुनिया में आप सबसे बड़े है. फिर आप ध्यान किसका करते है ? क्या आपसे बड़ा भी दूसरा कोई है, जिसका आप खयान करते है ? यह सुनकर ब्रह्मा जी हंस पड़े और बोले की बेटा, तुमको अभी मालूम नहीं है. एक ऎसी वस्तु है जो मुझसे, मेरी सारी श्रष्टि से, अनंत कोटि ब्रह्मांडो से और समग्र प्रकृति से भी निराली है. उसी से हम लोग पैदा होते है.

इसके बाद ब्रह्माजी ने उत्पत्ति क्रम का वर्णन करते हुए बताया की किस प्रकार भगवान् की माया द्वारा यह श्रष्टि हुई.

स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (13/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  2. बहुत ही खुबसुरत रचना.......मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना"at http://satyamshivam95.blogspot.com/ साथ ही मेरी कविताएँ हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" पर प्रकाशित....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे....धन्यवाद।

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