2/07/2011

दान सुभाषितावाली

 दान सुभाषितावाली
यद्ददाति विशिश्तेभ्यो  याच्चाश्नाती दिने दिने
तच्च वित्त्महम मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति.
जो विशिष्ट सत्पात्रो को दान देता है और जो कुछ अपने भोजन आच्छादन में प्रतिदिन व्यवहृत  करता है, उसी को मै उस व्यक्ति का वास्तविक धन या संपत्ति मानता हूँ, अन्यथा शेष संपत्ति तो किसी अन्य की है, जिसकी वह रखवाली मात्र करता है.

यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनं
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि
दान में जो कुछ देता है और जितने मात्र का वह अपना धन है. अन्यथा म़र जाने पर उस व्यक्ति के स्त्री, धन आदि वस्तुओ से दूसरे लोग आनंद मनाते है. अर्थात मौज उड़ाते है, तात्पर्य यह है की सावधानीपूर्वक अपनी धन संपत्ति को दान आदि सत्कर्मो में व्यय करना  चाहिए.

2/06/2011

घर का भेदी लंका ढाए का समाधान

कुछ साहित्यकारों, निबंध लेखको ने भक्तिप्रधान ह्रदय को गौड़ समझने  के कारण "घर का भेदी लंका ढावे" यह मुहावरा ही बना दिया. यह मुहावरा प्रायः  अनभिग्य लोगो के मुख से सुना गया है. सहज आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति के साथ असुर भाव हजारो वर्षों तक रहा जा सकता है किन्तु असुर भाव से रहित सज्जन धर्म में सदा निरत व्यक्ति स्वधर्म की रक्षा करता हुआ एक वर्ष भी असुरो के मध्य व्यतीत कर ले फिर भी आसुरी संगती का प्रभाव न पड़ा हो, वह व्यक्तित्व कितना प्रबल तथा धैर्य और धर्म संपन्न होगा? लगता वुद्धिमानो ने इस पर विचार ही नहीं किया.

केसरी नंदन श्री हनुमानजी को तुलसी वन तथा शंख, चक्र, गदा पद्म भगवान् के इन आयुधो से अंकित भवन को देखकर यही तो आश्चर्य हुआ -
लंका निशिचर निकर निवास, यहाँ कहा सज्जन कर वासा

धर्म-सत्कर्म विहीन राजा के राज्य में सज्जन व्यक्ति धर्म का निर्वहन नहीं कर सकता क्योकि प्रजा को राजा के अनुकूल ही रहना  पड़ेगा. अन्यथा आचरण करने पर देश निषकासन हो जाएगा, अथवा प्राण दंड का भागी होगा. धन जन बली राजा प्रजा  को दमन पूर्वक अपने स्वभाव के अनुकूल नियमो से संचालित करता है.

हिरन्य्कशिपू के स्वभाव से विपरीत पुत्र  ही क्यों न हो-जीवित नहीं रहेगा. भक्त प्रहलाद को मारने के असफल प्रयास करता हुआ वह स्वयं म्रत्यु के अधीन हो गया. यहाँ विभीषण के स्वतंत्र  रावण स्वभाव के विरुद्ध आचरण से पवन पुत्र व्यक्ति की द्रढ़ता तथा निर्भीकता का अनुमान करके विभीषण  से हठ पूर्वक परिचय बढ़ाना चाहते है.
कामी, लोभी, मोही व्यक्ति शरीर प्रेमी होता है, इसलिए स्वभाव के विपरीत परस्थितियो का दास हो जाता है. आध्यात्म ज्ञान में परिनिष्ठित  भगवद्भक्त वीर के समान ही शरीर की आहुति देने को तैयार रहता है किन्तु सद्गुणों तथा सन्मार्ग का परित्याग नहीं करता. पापी का साथ देने वाला सद्गुणी व्यक्ति कायर होता है. भक्त तथा वीर अपने तथा वीर अपने श्रेष्ठ स्वभाव का त्याग नहीं करते, भले ही शरीर त्याग ही क्यों न करना पड़े.

परधन, परनारीहर्ता, अपना ही संबंधी बंधू गुरू माता-पिता कोई भी हो उसकी सहायता करके, समाज को निर्बल बनाने वाला आपकी बुद्धि के अनुसार श्रेष्ठ है? और त्याग करने वाला भेदी ?

असद्गुनो के त्यागी स्वधर्म परिपालानकर्ता के प्रति असद्बुद्धि का आरोप लगाने वाला विवेकहीन बुद्धिमत्ता का ढोगी है. आज भी बुरे भाई का साथी अच्छा भाई नहीं देखा जाता. सत स्वभाव रहित, चरित्रहीनता का पौषक साहित्कार धर्म-मर्म से रहित  स्वशरीर पोषक अविवेकी है. शूद्र में कदाचित सरस्वती का प्रादुर्भाव हो भी जाए तो भी अच्छे बुरे की विवेकिनी बुद्धी जाग्रत नहीं होती. भगवद्भक्त सद्गुनाग्रही, सत्य के पक्षपाती  विभीषण की वृत्ति और स्वभाव को तत्कालीन ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी के अनुसार जानने  के लिए पढ़े-
घर का भेदी  लंका ढाए का समाधान - विभीषण शरणागति.
लेखक - व्रजपाल शुक्ल, वृन्दावन  

1/29/2011

जनम कोटि लगी रगरि हमारी. बरौ संभु न त रहऊ कुमारी


मनुष्य जीवन में भूले होती है. भूल होना अपराध नहीं है. भूल न सुधारना दोष है. प्रयत्नपूर्वक साधन करते रहने से मनुष्य का मन शुद्ध हो जाता है और वह अपने परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है.

बचपन में पढने जाता था. गाँव का पगडण्डी का मर्ग था वर्षा में कई बार फिसलकर गिर पड़ता था. यदि गिरने पर उठकर स्कूल चला जाता तो ठीक यदि गिरनेपर घर लौटकर आता तो डांटा जाता था.

गिरना अपराध नहीं है. गिरकर न उठाना अपराध है. उठकर पीछे की ओर मुड़ना पीठ दिखाना कायरता है. उठो और बहादुरी के साथ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होवो. गिरते-उठते अनेक जन्मो में हम अपने लक्ष तक पहुच ही जायेगे हम परम गति को प्राप्त करके ही रहते यह ठीक है की पूर्वाभ्यास अपनी ओर खीचता है. जैसे धारा में पड़े मनुष्य को धारा बहाती है, वैसे पूर्व जन्म के अभ्यास से व्यक्ति विवश होकर खीचा जाता है. पूर्वाभ्यास रूचि  प्रवृत्ति देता है, किन्तु प्रयत्न किया जाए तो वह रूचि प्रवृत्ति नष्ट हो जायेगी.

आप व्यापार के लिए कितना प्रयत्न करते हो? भोग के लितने व्यस्त रहते हो? वासनापूर्ति के लिए क्या-क्या नहीं करते हो? क्या समाधि, भगवत प्राप्ति या ब्रह्म ज्ञान ही सबसे गया बीता है की आप उसके लिए कोई प्रयत नहीं करना चाहते हो? यदि आप प्रयत्न करना नहीं चाहते हो, तो परमार्थ में आपकी रूचि नहीं है, जब मनुष्य के मन में इच्छा होती है. तब वह प्रयत्न अवश्य करता है. जहा-चाह, वहा राह. यदि आपके मन में परमार्थ प्राप्ति की इच्छा का उदय हो जाएगा तो कही न कही से आपको मार्ग अवश्य मिलेगा. यदि आपको राह नहीं मिलती है, तो समझना की आपकी चाह  दुर्बल है. यदि आपके मन में समाधि लगाने की या इश्वर से मिलने की या पाने स्वरुप में अवस्थित होने की चाह है तो आप प्रयत्न करो, जब मनुष्य प्रयत्न करता है तो उसके पाप छूट जाते है. उसकी वासनाए दूर हो जाती है.उसका चित्त शुद्ध हो जाता है. अपना प्रयत्न करना चाहिए. अपने  मन में यह दृढ आग्रह होना चाहिए की हम परमात्मा को अवश्य पाकर ही रहेगे.

जनम कोटि  लगी रगरि हमारी. बरौ संभु न त रहऊ   कुमारी

1/10/2011

अपमान प्रसाद का जनक

शिष्य - भगवान! कई बार अपमान का बड़ा कटु अनुभव होता है, लोग तरह-तरह से अपमान कर देते है, क्या करू ?
गुरुदेव - जब तुम्हे  अपमान का अनुभव होता है, तब तुम ऐसी भूमि में उतर आये रहते हो जहा अपमान तुम्हारा स्पर्श कर सकता है. तुम ऐसी भूमि में ऐसी स्थिति में रहा करो जहा अपमान की पहुच ही नहीं है.
(मै सोचने लगा, जब मुझे अपमान की अनुभूति होती है, तब मै कहा रहता हूँ? अपमान होता ही किसका है?

(१)  मै उस समय  सम्मान या और किसी कामना के पाश में बद्ध रहता हूँ. उस समय मेरा निवास स्थान काम होता है, राम नहीं.
(२)  मै उस समय शरीर, मन और बुद्धि इनके अभिमान में मत्त रहता हूँ या इनके विलासों में भूला रहता हूँ.
(३)  मै अपने भगवान् को भूलकर, आत्मा को भूलकर अहंकार या ममकार के अधीन रहता हूँ.

अपना अपमान स्वयं मै ही करता हूँ, मुझे स्वयं अपने को ही दंड देना चाहिए. दूसरो के द्वारा हुआ अपमान मेरा स्पर्श नहीं कर सकता)

शिष्य- ठीक है गुरुदेव! अपमान मेरा स्पर्श नहीं करता.

गुरुदेव - इतना ही नहीं, बेटा! अपमान तो तुम्हारी आत्मज्योति को जाग्रत करने वाला है. तुम्हारी विस्मृति को नष्ट करके स्मृति को ताज़ी बनानेवाला है. अपमान क्षोभ का नहीं, प्रसाद का जनक है. अपमान होते ही प्रसन्नता से खिल उठना चाहिए की मेरी स्मृति ताजी करने के लिए साक्षात् भगवान् के दूत, नहीं-नहीं स्वयं भगवान् आये है. महान सौभाग्य है - जीवन में यह अपूर्व अवसर है.

शिष्य - ठीक है गुरुदेव! आपकी कृपा और आशीर्वचन सर्वदा मेरे साथ है.

अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/09/2011

मन की आवाज धोखेबाज है

एक महात्मा ने बचपन में एक बात सुनायी थी-यदि तुम्हारे सामने ईश्वर प्रकट हो और वैराग्य और निवृत्ति के विरुद्ध आदेश दे तो उससे कहना की मन में वासना रही होगी  उसे पूरी करने के लिए तुम ऐसा कह रहे हो. हमको वैराग्य और निवृत्ति के विरुद्ध क्यों चलाते  हो ? हमारे राग और वासना को मिटा दो. तुम्हारा सामर्थ्य हो, तुम कैसे हो की हमारे अंतःकरण की अशुद्धि को दूर नहीं करते ? उसको पूरी करने की सलाह देते हो. ईश्वर आवे तो ऐसे बात करना.

कहो की हमारा शुद्ध अंतःकरण है यह आवाज देता है.
तो कितने संस्कार है तुम्हारे अंतःकरण में  और कितनी वासनाए छिपी हुई है- यह तुम  नहीं जानते हो. इसलिए चलना चाहिए शास्त्रानुसार, गुरु अनुसार, अपने ईशदेव की प्राप्ति के लिए एवं जिससे वासना शांत हो, उसके लिए.
इस अंतःकरण की आवाज एक दिन ऐसा धोखा देती है की आदमी कही का नहीं रहता. इल्हाम-इल्हाम जो बोलते है न वह अन्तःप्रेरणा महात्माओं को होती है, सबको नहीं और वह कभी-कभी सच्ची भी होती है.
अपनी वासना के विपरीत इल्हाम हो तो उसे मानना और अपनी वासना के अनुकूल हो तो नहीं मानना. जैसे किसी के लिए पांच रूपये  देने का मन हो और अन्तःप्रेरणा आवे की मत दो तो आप क्या समझते है ? ईश्वर ने मना कर दिया है देने से ? ईश्वर ने मना नहीं किया है, लोभ ने मना किया है. उसको आप पहचानते नहीं.
अन्तःप्रेरणा से आवाज आवे की इस लड़की से ब्याह कर लो-तो ईश्वर ने आज्ञा दी है. ईश्वर ने नहीं काम ने आज्ञा दी है. यह नहीं पहचान सकता मनुष्य.
मन के कहने पर मत चलो. यह वासना दोनों तरफ से डुबोती है.
जब हम अपनी वासना के अनुसार काम करते है और सफल हो जाते है तो अभिमान  होता है की मेरी बुद्धिमानी से काम बन गया. इससे अपने में बुद्धिमान्पने का  अहंकार आता है. यह अहंकार फिर दूसरी, फिर तीसरी वासना में लगाता है. तब मनुष्य अहंकार और वासना के चक्कर में परमार्थ  से च्युत हो जाता है और
यदि वासना के अनुसार काम न हुआ तो, विषाद होता है. विषाद होगा की हाय, हाय हमारी वासना पूरी नहीं हुई. तो अंतःकरण जो प्रसाद (निर्मलता) है वह भंग हो जाता है- अशुद्ध हो जाता है अंतःकरण.
तो अपनी वासना के अनुसार जो कर्म करते है, वे सफलता मिले तब भी बुरे रास्ते पर जाते है और विफलता मिले तब भी बुरे रस्ते पर जाते है. क्योकि अहंकार और वासना की स्रष्टि ऐसी ही है.
स्वामी अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/08/2011

बयार की ओर पीठ करनी चाहिए

जैसे हवा की आंधी आती है वैसे ही दुनिया में भावनाओं की आंधी आती है. बयार की ओर पीठ करनी चाहिए, सामना नहीं करना चाहिए. धैर्य रखो-सह लो.
जैसे सोते समय सपना आता है वैसे ही जागते समय तुम निकम्मे बैठे हो इसलिए पिछली बाते याद आ आकर तुम्हे  परेशान कर रही है. उनमे धीर रहो.
अच्छा  कभी भविष्य की कल्पना आयी- हमको छेह महीने बाद यह काम करना है, तो तुम यह नहीं समझना की आज जो आया है, वह छेह महीने तक बना रहेगा, अरे वह घंटे-आध घंटे में ढीला पड़ेगा की दूसरा वेग आवेगा, फिर तीसरा वेग आवेगा-यह तो सपने पर सपने आते-जाते रहते है- धैर्य से इनको आने दो और मिट जाने दो, उनका मूल्यांकन मत करो-इसकी कोई कीमत नहीं है, यह नहीं की अच्छे ही अच्छे ही आवे. जो यह कोशिश करता है की हमारे मन में अच्छे ही अच्छे भाव, विचार आवे, उसको भी बहुत दुःख होता है. अरे बाबा, सपने पर जैसे किसी का नियंत्रण नहीं रहता है, सपना कभी अच्छा आता है, कभी बुरा आता है वैसे ही यह जो मनोराज्य होता है यह अनियंत्रित मन में होता है. अरे आयी धारा बह गयी-गंगाजी में कभी फूल माला बह गए, कभी मुर्दा बह गया, ऐसे ही अपने मन में भी दोनों प्रकार के द्रश्य आते है.

पहले ठाकुर साहब लोग होते थे न, तो अपने दरवाजे पर पलंग पर बैठे रहते और हुक्का गुडगुडाते रहते . किसी अछूत के घर में ब्याह था तो उसका लड़का घोड़े पर चढ़कर निकला. तो पूछा यह कौन जा रहा है घोड़े पर? पाता चला की अमुक अछूत है. तो बोले पकड़कर ले आओ - तुम हमारे दरवाजे के सामने से घोड़े पर चढ़कर निकलते हो ? और जूता लेकर के मारने लगे. तो उस जमीदार की जैसी मनोवृत्ति थी वैसी मनोवृत्ति उस साधक  की है जो मन में कोई खराब बात फुरफुरा गयी और लेकर जूता उसको मारने के लिए दौड़ पड़े. तो, एक तो गन्दी मनोवृत्ति आयी और दूसरे उस पर क्रोध ? धैर्य रखो

तुम्हारा जो ज्ञान है वह स्वच्छ है, निर्मल है, वह निर्विषय है, वह निर्द्वंद है, वह अविनाशी है, वह परिपूर्ण है. यह जो तुम्हारा ज्ञान है न, ज्ञानस्वरूप, इस पर द्रश्य की कोई छाप छूटनेवाली नहीं है-द्रश्य आवेगा और अपना तमाशा दिखाकर बह जाएगा, तुम कहे  को परेशान होते हो ? इसको धैर्य बोलते है.
धैर्य-बाहर कोई मरे चाहे  जरे, कोई आये चाहे जाए, चाहे गरीबी हो चाहे अमीरी हो बाहर और मन में चाहे कैसा भी सपना आये और कैसा भी मनोराज्य होवे, उसको मनोराज्य मात्रा समझो, उसको स्वप्नमात्र समझो. उसको यह मत समझो की तुम्हारे कलेजे में पहाड़ घुस गया. हलके रहो और अपनी जगह पर बैठे रहो  धीर.

तो इस प्रकार जो बाहर या भीतर परिस्थितिया आती-जाती है उनकी ओर से, उनकी चोट से बचकर-धीर होना है, उसकी चोट अपने ऊपर मत लगने दो-अरे आया आया, गया, गया.

स्वामी श्री अखान्दनद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/07/2011

यग्य की गति

व्यक्तियों में कर्तापन है की मैंने यह किया, मैंने वह किया इसके मूल में अज्ञान है. यही अहंता मनुष्य की परिचिछ्न्न बनती है. जितनी चोट संसार में पड़ती है. वह सब करता और भोक्तापर ही पड़ती है. यदि अपने भीतर कर्तापन का अभिमान न हो तो चोट न पड़े. असल में महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागी जो परमेश्वर है, उसके कर्मपर उसके भोगपर उसके त्यागपर द्रष्टि रहे तो मनुष्य कभी अपने अभिमान के वश में न हो.

कर्तत्व की शिथिलता  होती है भगवान् की शरणागति  से जब तक अपना कर्तापन है, तबतक जीवन में ईश्वर का आविर्भाव नहीं होता.

देखो, यहाँ अधिकारी का भेद है. यदि एक निकम्मा अधिकारी है तो उसके लिए कहा गया है की काम करो. जब वह काम करने लगा तब कहा गया  की निषिद्ध कर्म मत करो, विहित कर्म करो. जब वह सकाम विहित कर्म करने लगा तब कहा गया निष्काम कर्म करो. जब वह निष्काम कर्म करने लगा तो इस उपदेश का अधिकारी हुआ की तुम कर्तापन का अभिमान मत करो. कर्तत्वाभिमानी के कर्तापन को तोड़ने के लिए ही शरणागति का उपदेश किया जाता है.

 असल में सब काम भगवान् की सत्ता महत्ता से ही हो रहे है. यदि सकाम को भी, बुरा काम करने वाले को भी कहे की भगवान् करा रहे है तो यह जो अध्यारोप हुआ वह बिलकुल गलत स्थान पर हो गया. वस्तुतः भगवान् किसी को निकम्मा नहीं रखते. निकम्मा तो मुर्दा रहता है. निषिद्ध कर्म भगवान् नहीं कराते, अपनी वासना कराती है. सकाम कर्म भगवान् नहीं कराते. अपना स्वार्थ कराता है. इसी तरह हमारे अन्दर जो कर्तापने का अभिमान है, वह भगवान् नहीं देते, हमारी मूर्खता देती है. इसलिए जो जिसका अधिकारी होता है , उसके लिए उसी प्रकार का उपदेश शास्त्र में आया है. यदि व्यभिचारी से कह दिया की इश्वर तुमसे व्यभिचार करा रहे है तो ये सब बाते अविवेकमूलक  है, मूर्खाताजन्य  है, मनुष्य को ईश्वर से प्रथक करने वाली है.

आप अनुभव करे, ईश्वर की कृपा से मेरे द्वारा अच्छा काम हो गया लेकिन हमसे जो बुरा काम हुआ वह हमारी भूल से हुआ. इसी द्रष्टि से तुलसीदास जी ने कहा -
 गुण तुम्हार समुझहि निज दोसा. जेहि सब भाति  तुम्हार भरोसा.

इसलिए कोई अच्छा काम हो तो अभिमान मत करो और समझो की वह इश्वर की प्रेरणा से हुआ है और बुरा काम हो तो मान लो अपनी त्रुटी से अपनी गलती से हुआ है.

अब यदि कहो हम करता नहीं रहे, ईश्वर करता रहा तो यह  ठीक है. भक्त के मन में ऐसा ही आता है. शरणागत कहता है की भगवान् मैंने  तो कुछ नहीं किया, तुमने किया, इसलिए तुम जानो. इस तरह कर्तत्व को उठाकर पूर्णतः परमेश्वर के ऊपर डाल देना, देखना और शरागत हो जाना. यह अभिमान को तोड़ने की युक्ति है. यदि बीच में ही कही पकड़कर बैठ जायेगे और कहेगे की भाई, अच्छा बुरा तो सबसे होता है, कामना तो सबके ह्रदय में ही रहती है, कर्ताप तो सबमे ही रहता है गलत काम तो सबसे ही होते है, तब क्या होगा की उन्नति की जो प्रक्रिया अपने जीवन शुरू होनी थी, प्रगति जो रसायन बनाना था, उसका द्वार बंद हो जायेगा, इसलिए कर्मारंभ से लेकर परिपूर्ण ब्रह्मपर्यंत यग्य की ही गति है.

स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनद रास रत्नाकर से साभार

12/31/2010

विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता



शिव पार्वती विवाह का एक कारण तारकासुर का बध भी था क्योकि उसने वरदान में शिव पुत्र के द्वारा म्रत्यु मांगी थी. इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है की हम सदैव  समाज में भलाई करे. व अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा करे. अगर समाज के हित में कोई भी नियम तोडना पड़े तो कोई दोष नहीं होता.


 विवाह के बाद भगवान् आशुतोष व माँ पार्वती ने कैलाश  पर निवास किया. यह बात आज की गृहणियो को यह सन्देश देती है की  अपने पति के सुख में ही उसका वास्तविक सुख निहित है. विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता उक्त उदगार आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने शिवपुराण कथा के चौथे दिन के प्रवचन में कही. 


ढाना, सागर में चल रही श्री शिव पुराण कथा का आनंद लेने क्षेत्र की अपार भीड़ उमड़ रही है. अपने चौथे दिन के प्रवचन में वृन्दाबन धाम से पधारे अष्टादश पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने आज कार्तिकेय के जन्म का वृतांत सुनते हुए कहा की उनका जन्म देवताओं की पीड़ा हरने के लिए हुआ था.





 वरिष्ठ पत्रकार श्री दीपक तिवारी के निवास पर विगत वर्ष की तरह इस वर्ष भी आचार्य व्रजपाल शुक्ल  के द्वारा धर्म की धारा ढाना ग्राम में शिवपुराण के माध्यम से बह रही है.
 अपने सारगर्भित प्रवचनों में आचार्य जी ने समाज में आज माता-पिता एवं गुरु के प्रति उपेक्षा के भाव पर प्रकाश डालते हुए कहा की गुरु और पिता में एक समानता जरूर होती है और वह है की गुरु अपने शिष्य के वैभव व प्रसिद्धि को देखते हुए प्रसन्न होते है वैसे ही एक पिता अपने पुत्र के ऊचा बढ़ने एवं सम्रद्धि को देखते हुए प्रसन्न होता है.


धन के विषय में आचार्यजी ने कहा की धन से सच्चा यश नहीं मिलता अगर उससे सद्बुद्धि और विवेक शामिल न हो. भगवान् गजानंद का वृतांत सुनते हुए आचार्यजी ने कहा की किस तरह उनका जन्म हुआ और कैसे वे गणेश बने व उनके तेजमय गुणों के कारण ही उन्हें प्रथम पूज्यदेव का वरदान भगवान् भोलेनाथ से मिला.

12/24/2010

उड़ियाबाबा जी महाराज के उपदेश

 तत्वज्ञ  के जीवन में ब्रह्माकार वृत्ति निरंतर बनी रहती है.  तत्वज्ञ  पुरुष को यह अनुभव नहीं होता की अविद्या निवृत्ति हो गयी है. ऐसा तो तब होता जब अविद्या नाम की वस्तु पहले कोई सत्य होती और बाद में निवृत्त होती . तत्वज्ञ का अनुभव तो यह है की अविद्या कभी थी ही नहीं.

निरंतर अभ्यास करते रहने और वासनाओं का पूर्णतया नाश कर देने पर ही अनुभव की प्राप्ति होती है. केवल शस्त्र पढने से कुछ नहीं होता. वासना के रहते चित्त में शांति नहीं आ सकती. वासना रहित चित्त ही परम तत्व के चिंतन का अधिकारी  होता है. निरंतर अभ्यास करते रहने से ही वासनाओं का निर्मूलन होता है और तत्व की उपलब्द्धि  होती है. वासनाओं के उच्छेद के लिए विषयों से सर्वदा वैराग्य रखे और सर्वदा भाग्वादाकर  वृत्ति रखे .

वैराग्य का फल बोध और बोध का फल उपरति.
दोनों में अंतर यही है की वैराग्य होने पर विषयों में ग्लानी होने के  कारण उन्हें भोगा नहीं जाता. उपरति होने पर वस्तु सामने रहें पर भी उसे भोगने की प्रवृत्ति नहीं होती. इसके उपरांत उपरति का फल है आनंद और आनंद का फल है शांति.

राग-यदि किसी वस्तु से मन इस प्रकार फस जाय की किसी भी प्रकार का अपमान निरादर या दुःख होने  पर भी न हटे तो मानना चाहिए की उसमे राग है.
द्वेष-यदि किसी वस्तु से मन ऐसा हट जाय की उसमे दोष ही दोष दिखाई दे  कोई भी गुण न दीख पड़े तो मानना चाहिए की उसमे द्वेष है.
 राग-द्वेष की उत्पत्ति  गुण-दोष या निंदा-स्तुति के चिंतन से ही होती है. राग-द्वेष से मुक्ति, निंदा-स्तुति  के न करने की  प्रतिज्ञा से एवं पूर्ण ग्यानी  या भक्त जो राग-द्वेष से मुक्त होते है, उनका ध्यान करने से राग-द्वेष छूट सकते है. राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष वाला  व्यक्ति उन्नति की सुनहली पगडंडी पर नहीं बढ़ सकता. हा, राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष से छुटकारा पाने की कुंजी मिल जाती है. उसकी पूर्ण निवृत्ति होती है. भगवत्प्रेम और आत्मप्रेम से.

प्रतिष्ठा और गर्व माया मोह में भटकाएगा उससे क्या लाभ होने वाला है ?
जिह्वा का  स्वाद ही सारे अनर्थो की जड़ है.
जीवन्मुक्ति क्या है ? जो जिस प्रकार अज्ञात भासा में तुम्हारी निंदा  या स्तुति की जाय तो तुम्हारा चित्त तनिक भी डावाडोल नहीं होगा, उसी प्रकार यदि तुम्हारी परिचित भाषा में तुम्हारी निंदा या स्तुति  की जाय तब भी तुम्हे क्षोभ न हो तो मानना चाहिए  की तुम जीवन्मुक्त हो.
स्वामी अखंडा नन्द सरस्वतीजी महाराज के आनंद रास रत्नाकर से साभार

12/20/2010

नारायण आपके साथ है

स्वामी अखान्दनान्दजी सरस्वती के आनंद रास रत्नाकर से

जो नारायण को अपने जीवन का संचालक बनाकर व्यवहार के रणक्षेत्र में अवतीर्ण होता है, वह सफल होता है और जो अकेले आता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है.

यह आपके दैनिक जीवन की बात है. मालवीयजी कहा करते थे की आप घर से कोई काम करने के इए चले तो चार बार नारायण, नारायण, नारायण, नारायण बोलकर निकले. इससे क्या होगा की जिस प्रकार कोई नदी बहती है, कोई नहर चलती है और उसके मूल उद्गम से उसका सम्बन्ध बना रहता है तो वह नदी, वह नहर सूखती नहीं है. लेकिन यदि ऎसी कोई नदी या नहर हो जिसका अपने मूल उद्गम से कोई सम्बन्ध नहीं रहे तो वह नदी, वह नहर सूख जाएगी. ठीक इसी प्रकार जीवन की बात है. इसका मूल उद्गम है, नारायण परमेश्वर. यदि यह परमेश्वर के सम्बन्ध रखकर संसार के व्यवहार करेगा तो उसकी शक्ति बनी रहेगी.

परमेश्वर से सम्बन्ध बनाये रखने से तीन बात आपको हमेशा
मिलती रहती है -
 १ आपकी जीवन धारा कभी विछिन्न नहीं होगी.
२  आपकी बुद्धि कभी समाप्त नहीं होगी,
३ आपके जीवन में हमेशा आनंद आता रहेगा.

और इसके विपरीत यदि आप ईश्वर के साथ सम्बन्ध तोड़ देगे तो जीवन की धारा कट पिट जायेगी आपके ज्ञान की धारा, बुद्धि की धारा, आपकी प्रज्ञा क्षीण हो जाएगी और आपको भीतर से आनंद आता है वह बंद हो जाएगा और आप उधर आनंद लेने लग जायेगे. तब आप जीवन लेने लगेगे दवाओं से,  बुद्धि लेने लगेगे किताबो से और दूसरे लोगो से तथा आनंद लेने लगेगे विषय भोगो से यह इस बात का नमूना है की हमारे भीतर जो जीवन का , ज्ञान का और आनंद का मूल स्त्रोत है, उससे हम कट गए है.

हम और सब बाते भूल जाए तो भूल जाए परन्तु यह बात भूलने लायक नहीं है की यह जो हमारा मनुष्य शरीर दिखलायी पड़ता है, इसके भीतर जो समष्टि स्वामी है वह पमेश्वर बैठा हुआ है.

जो बड़े-बड़े लोग है, बड़े-बड़े व्यापारी है, बड़े-बड़े विचारक है, वे नारायण को भूल जाते है.. दुर्योधन गया रणभूमि में, तो नारायण को साथ लेकर नहीं गया, पर अर्जुन रणभूमि में नारायण को साथ
लेकर गया  हम आपसे यह निवेदन करते है की आप कोई भी काम करे तो अकेले, असहाय, दीन-हीन नर के रूप में न करे, नारायण को अपना साथी बनाकर उसकी मदद से अपना काम प्रारंभ करे. आप असहाय है, यह मत समझे, यह समझे की आप जो भी काम करने जा रहे है, नारायण आपके साथ है.

12/18/2010

ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था

द्वितीय स्कंध के अंतिम दसवे अध्याय में शुकदेवजी महाराज परीक्षित  को यह बताते है की इस भागवत महापुराण में दस वस्तुओ  द्वारा परमात्मा के स्वरुप का वर्णन किया गया है. वे दस वस्तुए क्या है ?
यह स्रष्टि कैसे हुई ?
स्रष्टि में विविध योनिया कैसे बनी ?
एक ही तत्व. एक ही पंचभूत है फिर उसमे मानुष, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि कैसे बन जाते है ?
विविधता कहा से आ जाती है ?
स्रष्टि किस स्थान में टिकी है ?
स्रष्टि के सूखने पर इसको सीचनेवाला कौन है ?
वासनाए कैसे-कैसे होती है ?
काल का विभाग  कैसे होता है ?
भक्तो के चरित्र  कैसे होते है ?
भगवान् के प्रेम में मनका निरोध कैसे होता है ?
मुक्ति क्या है ?
सबसे अधिष्ठान परमात्मा का स्वरुप क्या है ?

इन दस वस्तुओ के निरूपण द्वारा सारे श्रीमद्भागवत में एक ही तत्व, एक ही परमात्मा का वर्णन है.

पहले स्कंध में बताया गया है की भागवत के अधिकारी वक्ता-श्रोता सूत-शौनक, नारद-व्यास और शुकदेव-परीक्षित कैसे है तथा दूसरे स्कंध में यह प्रतिपादित किया गया है की भगवत्प्राप्ति के लिए श्रवण ही मुख्य साधन है और उसके इतने अंग है.

भागवत के तीसरे स्कंध में तैतीस अध्याय है. इनमे विसर्ग के द्वारा परमात्मा का वर्णन है विसर्ग का अर्थ है स्रष्टि की विविधता. ब्रह्म के प्रकाश में गुणों  की विषमता से जो विविध प्रकार की स्रष्टि होती है, उसको विसर्ग कहते है.
परन्तु यहाँ विसर्ग शब्द का अर्थ बहुत विलक्षण है आपने गीता में पढ़ा है  की इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग होते है-एक देव सर्ग और दूसरा आसुर सर्ग-
इसलिए तीसरे स्कंध के पूर्वार्द्ध के उन्नीस अध्यायों में आसुर विसर्ग का और उत्तरार्द्ध के  चौदह अध्यायों में देव विसर्ग का वर्णन है. आसुर विसर्ग में हिरण्याक्ष, हिरान्य्कशिपू की कथा है और देव विसर्ग में मनु-शतरूपा, कर्दम-देवहूति तथा कपिल-अदिति की वंश परंपरा का वर्णन है.

बात उस समय की है जब कौरव-पांडवो की ओर से महाभारत युद्ध की तैयारी हो रही थी. विदुर जी ध्रतराष्ट्र  के पास बुलाये गए. क्यों बुलाये गए ? इसलिए बुलाये गए की ध्रतराष्ट्र को चिन्ता के मारे नीद नहीं आ रही थी. उनको चिंता सता रही थी की अब कौरव पांडवो में युद्ध होगा और वंश का नाश हो जाएगा ऐसी श्तिति में  हमें क्या करना चाहिए ?
ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था. उन्होंने दुनिया को बड़े जोर से पकड़ रखा था. उनको परमात्मा तो सूझता ही नहीं था, केवल दुनिया सूझती थी. वे परमात्मा के न सूझने के कारण अंधे थे और दुनिया को पकड़ रखने के कारण ध्रतराष्ट्र थे.
विदुरजी साक्षात् ज्ञान की मूर्ती और धर्मराज के अवतार थे. आप लोगो ने सुना होगा की जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवो के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे तब दुर्योधन ने उनके लिए अपने महल सजा दिए, उनको भेट में देने के लिए बहुमूल्य हीरे मोतियों का ढेर लगा दिया और उनसे प्रार्थना की की आप हमारे यहाँ विश्राम कीजिये और भोजनपर पधारिये.
परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया की दुर्योधन मुझे कोई प्रेम से खिलाता है तो मै उसके घर अवश्यखाता  हूँ. यदि भूखा होऊ तो कही मांगकर भी खा  लेता हूँ  लेकिन तुम न तो मुझे प्रेम से खिलाना चाहते हो और न मै भूखा हूँ  इसलिए मै तुम्हारे घर में न तो ठहरूगा और न ही भोजन करूगा.
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण बिना बुलाये ही विदुर के घर चले गए. भागवत के इसी तीसरे स्कंध के प्रारंभ में श्रीशुकदेवजी महाराज ने परीक्षित  से कहा की भगवान् विदुर के घर को अपना ही घर समझते थे इसलिए वे दुर्योधन के निमंत्रण को ठुकराकर अपने  आप वहा चले गए.
वही विदुरजी जब बुलाये जाने पर ध्रतराष्ट्र के पास गए तब उन्होंने उनको न्याय की, सत्य की, निष्पक्षता की बात समझाई और कहा की तुम्हे  अपने तथा पांडू के पुत्रो के साथ विषमता का व्यवहार नहीं करना चाहिए. तुम्हारे घर में दुर्योधन रूपी कलियुग का अवतार हुआ है और यह वंश का नाश करने के लिए आया है.
यह बात जब दुर्योधन को मालूम हुई तब वह विदुरजी पर बहुत नाराज  हुआ इस पर विदुरजी ने अपना धनुष बाण वही ध्रतराष्ट्र के दरवाजे पर रख दिया, जिससे की कोई यह न समझे की मै पांडव पक्ष में मिलकर कौरवो के साथ युद्ध करूगा और फिर वे घर नगर छोड़कर तीर्थाटन के लिए निकल पड़े. विभिन्न तीर्थो का भ्रमण करते हुए जब वे यमुना  तट पर पहुचे तब वहा उनकी भेट उद्धव जी से हो गयी उनसे विदुरजी ने द्वारका का कुशल मंगल पूछा.
तबतक भगवान् श्रीकृष्ण अंतर्धान हो चुके थे. सिर्फ उद्धवजी ही बचे थे. उद्धवजी विदुरजी द्वारा कुशल मंगल पूछने पर श्रीकृष्ण के स्मरण में मग्न हो गए, उनकी आखो से आँसू गिरने लगे और उनके शरीर में रोमांच हो गया.

12/17/2010

सच क्या है यह मुझे मालूम नहीं है

जो चीज न हो उसको दिखानेवाली और जो चीज हो उसको ढकनेवाली माया ही तो है. ये जितने भी पुतले बने हुए है जैसे मनुष्य के] पशु के] पक्षी के] वृक्ष के] लता के इन सबमे पंचभूत भरे हुए है. मिटटी में पानी है, पानी में आग है, आग में वायु है और वायु में आकाश है. जब हम शांत बैठे रहते है तब आकाश में स्थित रहते है, जब हम दौड़ते है तब गति उत्पन्न होने के कारण शरीर में गरमी आती है, गर्मी से पसीना आता है और पसीना जमकर मिटटी  हो जाता है. समग्र विश्व स्रष्टि  पंचभूत में कल्पित है और बड़े भूत छोटे भूतो में कल्पित रहते है. आकाश वायु को, वायु अग्नि को और अग्नि तेज को धारण करता है. इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व स्रष्टि में मै भरपूर हूँ मेरे अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं है.

यहाँ उस व्यक्ति की बात नहीं है जो केवल यह जानना चाहता है की खाने-पहनने की, पद अधिकार की चीज क्या है ? जिसके ह्रदय में धन चले जाने से , रोग हो जाने से म्रत्यु  की कल्पना से भय लगता है और  जिसकी द्रष्टि सत्य अनुसंधान करने की ओर नहीं जाती, उसका जीवन तो नशे में बीत रहा है.

यहाँ बात की जा रही है उस एक जिज्ञासु की जो सत्य की असलियत को जानना चाहता है, जिसके ह्रदय में यह वेदना है की हाय-हाय मुझको इतना अच्छा जीवन प्राप्त हुआ, बुध्धि प्राप्त हुई लेकिन सच क्या है यह मुझे मालूम नहीं है. इस प्रकार अज्ञान की पीड़ा जिसके  ह्रदय में है, उसके लिए भगवान् ब्रह्मा जी को निमित्त बनाकर कहते है-जो चीज हर समय, हर जगह, हर रूप में मौजूद है, जिसके होने से सब मालूम पड़ता है और सबके विना भी जो मालूम पड़ता है उस चीज को तू जान ले . उसको जान लेने पर तुम देखोगे की वह वस्तु तुम्हारी आत्मा से एक है  और उसी से वही सत्य का साक्षात्कार होता है.

इस प्रकार चतुह्श्लोकी भागवत में भगवान् ने ब्रह्माजी को निमित्त बनाकर समस्त जिज्ञासुओ को अपने अनंत विस्तार का अपनी माया के खेल का, स्रष्टि की उत्पत्ति  का और जीव जगत के अंतिम ज्ञातव्य का वर्णन किया है.

जैसे चतुह्श्लोकी भागवत है वैसे ही चतुह्श्लोकी महाभारत भी है. चतुह्श्लोकी महाभारत को महाभारत की गायत्री अथवा सावित्री भी बोलते है. जिस प्रकार चार श्लोको में समग्र श्रीमद्भागवत के ज्ञान का वर्णन है उसी प्रकार चार श्लोको में महाभारत जैसे विशालकाय महाग्रंथ के प्रतिपाद्य का भी वर्णन है.
अनन्तश्री स्वामी अखंडानंद सरस्तीजी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार

12/14/2010

जब ईश्वर की द्रष्टि से देखेगे तब जान सकेगे इस स्रष्टि का रहस्य

जब अनंत नारायण की नाभि से एक कमल निकला और उस कमल पर ब्रह्मा उत्पन्न हुए तब ब्रह्मा ने चारो ओर देखने का प्रयास किया. उनके चार मुह हो गए. उनको यह विचार हुआ की उनके सिवाय तो और कुछ है ही  नहीं. फिर वह कौन है, जिससे मै प्रकट हुआ हूँ.

उन्होंने ढूढने का प्रयास किया लेकिन उनको अपना कारण न बाहर मिल  और न भीतर मिला. भला अपने पिता का जन्म कोई कैसे जान सकता है ? ब्रह्माजी को प्रयास करने पर कुछ पता नहीं लगा.

इसके बाद ब्रह्मा जब अपनी उत्पाती  का आधार जानने के लिए व्यग्र हो गए तब उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई पड़ी की तप,तप,तप !

वर्णों में जो सोलहवे और इक्कीसवे  अक्षर त तथा प है, वे दोनों उनको सुनाई पड़े. उन्होंने आलोडन करके देखा की जो व्यापक विश्व तत्व है, नारायण है, परमेश्वर है वह और कही नहीं, यही है. फिर ब्रह्माजी को भगवान का दर्शन वही हो गया. उनपर भगवान प्रसन्न हो गए और  बोले की ब्रह्माजी, तुमने  बहुत तप किया अब तुम्हारी जो इस्च्छा हो वह वर मुझसे मांग लो.

यहाँ देखो, अंतःकरण का आधिदैव है , इसमें चार प्रकार की वृत्तिया होती  है. यदि आपको आधिदैव का साक्षात्कार करना हो तो पहले अध्यात्म का साक्षात्कार करना होता है. हमारे ह्रदय  के भीतर जो चीजे है उनको तो हम देखते  नहीं, बाहर की चीजो को देखने के लिए निकल पड़ते है. जिस चीज को आपने अपने घर में नहीं पहुचाना उसको बाहर जाकर कैसे पहचानेगे ?

पहचानिए, ब्रह्माजी का रंग लाल है. स्रष्टि के करता है, इसलिए उनमे राजस की प्रधानता है. फिर बिना ज्ञान के स्रष्टि नहीं हो सकती इसलिए ज्ञान विवेक का पक्षी हंस उनका वाहन  है. चारो वेद उनके चारो मुख है. उनके अंतःकरण की वृत्तिया है संकल्परूप मन, विकल्परूप चित्त, निश्च्यरूप बुद्धि और अहमक्रिया रूप अहंकार. इन सबसे संपन्न होकर ब्रह्माजी स्रष्टि का निर्माण करते है.

जब भगवान ने ब्रह्माजी को दर्शन दिया तब उन पर प्रसन्न होकर उनसे हाथ मिलाया. ब्रह्माजी ने भगवान् को प्रणाम किया और बोले - महाराज मुझे तो तत्वविज्ञान चाहिए. इस पर भगवान ने उनको चतुह्श्लोकी भागवत का उपदेश किया, चार श्लोको में पूरा भागवत सुना दिया, उनमे प्रवेश करने के लिए शुद्ध बुद्धि चाहिए. बह्माजी ने जब तप किया तब उनको भगवान के दर्शन हुए और उन्होंने उनके उपदेश को समझा.

आप जो कुछ देखते या मानते है, उसको भगवान की द्रष्टि से मिलाईये और फिर देखिये की आपका देखना मानना भगवान की द्रष्टि से थी है या नहीं ? आप सोचिये की ईश्वर सब कुछ देख रहा है तब जैसा ईश्वर को दीखता है वह सच है या जैसा आपको दीखता है, वह सच है ?

आपकी इन छोटी-छोटी अक्षम आखो से तो फर्लांग-दो-फर्लांग की चीज भी ठीक-ठीक नहीं दिखाई देती, सूक्ष्म कड भी नहीं दिखाई पड़ते, फिर इन आखो से जो दिखाई देता है, उसी को सच  मानकर आप उसमे क्यों फस जाते है ? पूर्णता की द्रष्टि से क्या सत्य होता है इस पर आपका ध्यान क्यों नहीं जाता ?  अरे, जिसमे पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण और ऊपर-नीचे नहीं है, भूत, भविष्य, वर्तमान तीनो नहीं है, उसका आदि किसी ने देखा है ? भविष्य का अंत किसी ने देखा है ? वर्तमान में ही तो जो बीतता जाता है उसका नाम भूत होता जाता है और जो आने वाला होता है उसका  नाम भविष्य होता जाता है. और जो आने वाला होता है उसका नाम भविष्य होता है.

जहा मै है वहा काल के आदि अथवा अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसी प्रकार देश के आदि अंत में आपकी बुद्धि नहीं पहुच सकती. इसलिए जब आप ईश्वर को द्रष्टि से देखेगे, इश्वर के साथ एक हो जायेगे, तदात्म्यापन्न हो जायेगे तभी इस स्रष्टि का स्वरुप समझ सकेगे, अभी तो आपका कोई है और कोई नहीं है कोई अपना है, कोई पराया है कोई मित्र है और कोई शत्रु है, कोई अच्छा है, कोई बुरा है, किन्तु जब आप ईश्वर की द्रष्टि से देखेगे तब यह जान सकेगे की इस स्रष्टि का रहस्य क्या है ?

12/13/2010

जो नहीं है वह दिखाई पड़ने लगे और जो है उसका दिखना बंद हो जाय

भगवान् की माया से यह श्रष्टि उत्पन्न हुई  है. माया माने लोक व्यवहार में बोला जानेवाला जादू खेल. जहा जो चीज न हो उसको वहा दिखा  देना, जहा जो चीज हो उसको ढक देना, देखनेवाले की आख बांध देना यही जादू है. इसी तरह जो नहीं है वह दिखाई पड़ने लगे और जो है उसका दिखना  बंद हो जाय इसी का नाम माया होता है.

माया के बिना अद्वितीय  अनंत परमात्मा में यह श्रष्टि  दिखाई नहीं पड़ सकती . उपासक लोग माया को ब्रह्मज्ञान  की अचिन्त्य शक्ति कहते है और वेदांती लोग देहात्म  भ्रम के कारण श्रष्टि की. संगती लगाने के लिए भगवान में माया को अध्यारोपित मानते है लेकिन चाहे अध्यारोपित मानो, चाहे  भगवान् की अचिन्त्य शक्ति मानो यह जो समग्र श्रष्टि पैदा हुई है, भगवान् की माया ही है, भगवान् के जादू का खेल ही है.

जो अनित्यवस्तु होती है, उसी का जन्म होता है. यह श्रष्टि आने जानेवाली है. पैदा होने के कारण मरने वाली है और परिवर्तनशील है. किन्तु इसमें जो जीव है वह नित्य है.

दुनिया में ऐसा कोई माई का लाल नहीं है जो यह अनुभव कर ले की मै नहीं हूँ. ऐसा कोई व्यक्ति न हुआ है न है और न आगे होने वाला है. यह भौतिक विज्ञानं नहीं है की  इसमें न जाने क्या-क्या आविष्कार होने की सम्भावना है. यह तो अनुभवका क्षेत्र है. यहाँ सर्वथा सुनिश्चित है की कोई भी मै नहीं हूँ - ऐसा अनुभव नहीं कर सकता. कोई भी वस्तु चाहे वह ज्ञान  हो, चाहे अज्ञान हो, ज्ञान ही विदित होती है. ज्ञान बिना सुषुप्ति भी प्रकाशित नहीं होती, समाधी भी प्रकाशित नहीं होती, प्रलय भी प्रकाशित नहीं होता. यहाँ तक की ज्ञान का लोप भी ज्ञान से ही मालूम पड़ता है.

यह एक बात पर आप ध्यान दीजिये. पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण की जो चारो दिशाए है, कहा से पैदा होती है ? क्या आप बता सकते है की पूर्व से पूर्व, पश्चिम से पश्चिम कहा से शुरू हुआ है ? इसी तरह पूर्व-पश्चिम का कहा अंत होता है, कोई बता नहीं सकता है. ऊपर और नीचे कहा-कहा से  प्रारंभ होता है, किसी को मालूम है ? उसका एक मात्र उत्तर यही है की किसी को भी पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाओं के आदि-अंत का पता नहीं है.

लेकिन अध्यात्म इसका उत्तर देता है. वह कहता है की जहा आपका मै है, वही से पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और ऊपर-नीचे की दिशाए शुरू होती है. यदि आप इनको दूसरी जगह ढूढने जायेगे तो ये आपको कही भी नहीं मिलेगी. केवल आपको अज्ञान मिलेगा, और आप उसके अन्धकार में डूब  जायेगे. इसलिए आपको पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे की दिशाओं तथा इतिहास का आदि ढूढने के लिए कही बाहर जाने की जरूरत नहीं है. आपका जहा मै है, वही सच्चा आदि है, वही अनादी बैठा  हुआ है और वही उसी ज्ञानस्वरूप मै में परमात्मा है. फिर आपको अज्ञान में भटकने की क्या जरूरत है ?

यदि आप कहे की श्रष्टि की उत्पत्ति मै  से कैसे होती है. क्योकि मै तो साक्षी है, ज्ञानस्वरूप है, उसके द्वारा किस प्रकार श्रष्टि होगी, तो इसका उत्तर है की श्रष्टि इस प्रकार नहीं होती माया से श्रष्टि होती है. जबतक श्रष्टि दिखाई पड़ती है, उसके कारण ही कल्पना करनी पड़ती है.

भागवत में श्रष्टि की उत्पत्ति का निरूपण क्रम से किया गया है और फिर बताया गया है की भगवान् का जन्म कैसे होता है ? जो अनित्य है, उसी की उत्पत्ति  होती है. जो नित्य और परिच्छिन्न  जीव है, उसका अनित्य से समागम होता है तथा जो नित्य अपरिच्छिन्न  परमात्मा है, उसमे सारी की सारी श्रष्टि माया से आविर्भूत होती है. इस प्रकार उत्पत्ति के प्रसंग  का निरूपण द्वितीय स्कंध के पांच, छेह और सात इन तीन अध्यायों में किया गया है. पहले माया से जगत की उत्पत्ति, फिर जीव का समागम और तत्पश्चात भगवान् के अवतार का वर्णन.
श्री स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की भाग्वाताम्रत से साभार

12/12/2010

भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान है.

असल में पवित्र वही है जिसके स्मरण से अपवित्र पवित्र हो जाते है, पतित पावन हो जाते है, पिछड़े हुए आगे बढ़ जाए है और ऊपर उठ जाते हो.
भगवान् के स्मरण से उनका आश्रय ग्रहण करने से किरात, हूड, आंध्र, पुलिंद, पुल्कस माने कसाई सब के सब पवित्र हो जाते है. इसीलिए श्रीशुकदेवजी महाराज भगवान् को नमस्कार करके उनसे प्रार्थना करते है की प्रभो  पधारो. मेरी इस वाणी पर बैठ जाओ और इसे अलंकृत करो.

सूतजी  ने स्पष्ट  कर दिया है की भगवान् के प्रवेश के मार्ग हमारे कान ही है. जिस तरह शरद ऋतू  आती है तो सारा जल अपने आप स्वच्छ हो जाता है उसी तरह कान के रास्ते  से भगवान् हमारे ह्रदय में प्रवेह करते है तो सारे कल्मष दूर हो जाते है-
प्रविष्टिः कर्ण रंध्रेड   स्वनाम भावसरोरुहम.
धुनोति शमलम कृष्णः सलिलस्य यथा शरत.

कोई सज्जन अपने एक मित्र के यहाँ मिलने गए. मित्र के घर का दरवाजा भीतर से बंद था उन्होंने बहुत पुकारा-खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. दूसरी ओर एक खिड़की खुली दिखाई पड़ी. सज्जन उसी खिड़की के रस्ते किसी प्रकार भीतर घुसे तो उन्होंने देखा की उनका मित्र बीमार है, छत  पर बेहोश पड़ा है, घर में कई दिनों से झाड़ू नहीं लगी है, खाने -पीने का भी साधन नहीं  है.
सज्जन ने पहले घर की सफाई की, मित्र का हाथ  मुह साफ़ किया, उसके कपडे बदले, उसको दवा दी, पथ्य दिया और इस प्रकार उस मित्र को स्वस्थ्य कर दिया, मित्र ने पूछा की भाई तुम घर में आये कैसे ? न दरवाजा खुला  था और न मैंने तुमको कोई सूचना दी थी. सज्जन ने कहा की मुझे  बुलाने के लिए तुम्हारे  निमंत्रण की जरूरत नहीं थी, इसलिए बिना बुलाये आ गया और जब मैंने तुम्हारा दरवाजा बंद देखा  तो उस खुली खिड़की से भीतर आ गया.

इसी  तरह भगवान् करते है. जैसे कोई नकाब लगाकर किसी के घर में घुस आता है उसी तरह भगवान संसार की भावनाओं से भरे हुए मनुष्य के ह्रदय में उसके काम के छिद्र से प्रविष्ट हो जाते है और  उसके सारे दोष दूर कर देते है.

श्रवण में एक तो चाहिए तत्व का ज्ञान, दूसरा चाहिए नियम, तीसरा चाहिए ह्रदय की निर्मलता और चौथा चाहिए भगवान् का स्तवन. भगवान् सबसे बड़े है, उनसे बड़ा कोई नहीं है-ऐसा समझकर भगवान् के उत्कर्ष का मन में चिंतन, वाणी से भगवान् के चरित्र का वर्णन और कान से भगवान के गुणों का श्रवण ह्रदय को निर्मल बनाता है.

जब तत्व ध्यानपूर्वक निर्मल ह्रदय से भगवान् के सम्बन्ध में मनन किया जाता है तभी श्रवण पूरा होता है.

मनन दो तरह से होता है-एक तो उत्पत्ति के द्वारा और दूसरा उपपत्ति के द्वारा. उपपत्ति द्वारा किये जानेवाले मनन के प्रसंग  में नारदजी ब्रह्माजी से कहते है-पिताजी, मै तो समझता हूँ की दुनिया में आप सबसे बड़े है. फिर आप ध्यान किसका करते है ? क्या आपसे बड़ा भी दूसरा कोई है, जिसका आप खयान करते है ? यह सुनकर ब्रह्मा जी हंस पड़े और बोले की बेटा, तुमको अभी मालूम नहीं है. एक ऎसी वस्तु है जो मुझसे, मेरी सारी श्रष्टि से, अनंत कोटि ब्रह्मांडो से और समग्र प्रकृति से भी निराली है. उसी से हम लोग पैदा होते है.

इसके बाद ब्रह्माजी ने उत्पत्ति क्रम का वर्णन करते हुए बताया की किस प्रकार भगवान् की माया द्वारा यह श्रष्टि हुई.

स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के भाग्वाताम्रत से साभार

12/11/2010

हम जिन वस्तुओ को महत्वपूर्ण समझते है वे महत्वपूर्ण नहीं

अद्भुत है भागवत का दर्शन. यह किसी एक जाती या राष्ट्र की संपत्ति नहीं है, भगवान के जितने भी बालक है, बच्चे है, उन सबके लिए श्रीमद भागवत है. भागवत में वृक्ष भी भक्त है, पक्षी भी भक्त है, लताये भी भक्त है, जल में कमल खिलते है और नदियों का प्रवाह रुक जाता है. भगवान् की भक्ति में यहाँ की सारी श्रष्टि   ओतप्रोत है.

बुरा देखने से बुरी वस्तु अपने ह्रदय में आजाती है और उससे अपना ह्रदय गन्दा हो जाता है. इसलिए तत्व का न करके  
अन्वय-व्यतिरेक द्वारा यह निश्चित करना चाहिए की परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है.

जन्म भी वही, मरण भी वही, रोग भी वही, आरोग्य भी वही, वियोग भी वही, संयोग भी वही उसके अतिरिक्त दूसरी कोई बस्तु है ही नहीं.

आपके ह्रदय में भक्ति होनी चाहिए. आप अकाम है की सकाम है इससे  कोई मतलब नहीं . भगवान् जब आपके ह्रदय में आयेगे तब उसमे पूर्णता का प्रकाश हो जाएगा.

इस संसार में हम जिन वस्तुओ को बहुत महत्वपूर्ण समझते है वे वस्तुतः महत्वपूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण तो केवल भगवान् ही है. आप उनके रूप का ध्यान कीजिये, आपका मन शुद्ध हो जाएगा, आप यदि चाहे की आपकी क्रममुक्ती हो, आप ब्रह्मलोक में जाए तो भी जा सकते है. यदि आपकी इच्छा यहीं भक्त होने की है तो आपको यहीं सद्योमुक्ति मिल सकती है. भागवत में क्रम मुक्ति और सद्योमुक्ति इन दोनी के मार्ग बताये गए है.

परन्तु  कोई भले ही ब्रह्मलोक में चला जाए, वहा जाने पर भी उसको दुःख होता है. उसे यह दुःख होता है की वहा जाने पर यह धरती दिखाई पड़ती है, धरती के लोग दिखाई पड़ते है और यह दिखाई पड़ता है की संसारी लोग केवल धन के कारण दुखी है. जब की दुःख नाम की चीज श्रष्टि में कही नहीं है. केवल  उनकी अपनी बुद्धि का यह भ्रम है की इसमें उनको दुःख मालूम पड़ता है.

संसार के लोग बारम्बार इसीलिए दुखी हो रहे है की वे सचाई को जानते नहीं, सत्य को समझते नहीं और संसार के चक्र में फसे हुए है.

शोक्स्थान सहस्राणि भय्स्थान्शतानी च
दिवसे-दिवसे मूध्माविशंती न पंडितम

दिन भर में सैकड़ो हजारो बार भय-शोक से ग्रस्त होना मनुष्य की विद्या बुद्धि की पहचान नहीं है. मूर्खता की ही पहचान है. क्योकि शोक-भय तो इस संसार में आते-जाते रहे है. इनसे अपने चित्त को दुखी नहीं करना चाहिए.

जब जीव ब्रह्मलोक में जाने पर जब धरती के लोगो को दुखी देखता है, तब उसके मन में आता है की इन सबको छोड़कर मेरा अकेला ब्रह्मलोक में आना ठीक नहीं हुआ. फिर तो वह जीव ब्रह्मलोक   से कूद पड़ता है और इस धरती पर आकर उससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है. वह अनुभव करता है की सम्पूर्ण प्रथिवी का सुख-दुःख मेरा अपना सुख-दुःख है.
 पहले उसका तादात्म्य जड़ से होता है फिर  अग्निसे, वायु से, आकाश से, समग्र प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने के बाद वह अपने को साक्षात् परमात्मा के रूप  में अनुभव करता है.

श्रीमद्भागवत की यही प्रडाली है.

9/27/2010

भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता

सूतजी कहते है- हे शौनक ! उसी समय युधिष्ठिर ने शरशय्या  पर  लेटे भीष्मसे अपने मन की शांति के लिए विविध धर्मो को पूछा. भीष्मजी ने बहुत से आख्यानो एवं इतिहासों द्वारा वर्णधर्म, आश्रमधर्म, भाग्वाद्धर्म , स्त्रीध्रम आदि का उपायों के सहित गंभीर  विवेचन किया और कहा -  हे राजन ! तुम अपने को करता मानकर क्यों शोकाकुल  होते हो. भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तब क्या तुम इन अक्षौहिणी सेनाओं का संहार करने वाले हो सकते हो ? तुम्हारा सामर्थ्य ही क्या है ? स्वयं भगवान ने श्रीमुख से गीता में जो कहा है उसे भी तुम भूल रहे हो. उसका स्मरण करो , भगवान ने कहा है -
द्रोण, भीष्म आदि सेनाओं  के समस्त वीरो को मैंने ही मारा है. तुम व्यर्थ शोक क्यों करते हो इत्यादि कहकर समझाया, जिससे युधिस्ठिर का शोक निवृत्त हुआ और उनके मन को पूर्ण शांति मिली. धर्म का उपदेश करते हुए जब उत्तरायण का समय आया तब भीष्म ने अपने वाणी रोक कर सामने खड़े चत्रभुज  भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए उनमे अपने मन लगा दिया.
इस विसुद्ध धारणा से उनकी सब वासनाए और भगवान के कृपा कटाक्ष  से शस्त्रों की पीड़ा भी दूर हो गयी. वे शरीर का त्याग करते हुए प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति  करने लगे.

8/20/2010

जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है.

प्रजा का नाश करने से भयभीत युधिष्ठिर सब धर्मो को जानने की इच्छा से कुरुक्षेत्र  गए. जहा भीष्म पितामह स्वर्ग से च्युत देवताके  सामान शरसय्यापर  पड़े थे. युधिशिथिर के पीछे उनके भाई भी रथ पर चढ़कर वहा पहुचे . नारद, व्यास आदि बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि भी भीष्म के दर्शनार्थ वहा गए. अर्जुन के साथ भगवान् श्रीकृष्ण भी वहा उपस्थित हुए और उन्होंने भीष्म पितामह को प्रणाम किया. भीष्म ने उपस्थित सभी का मन ही मन पूजन किया. लीलाविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन भी उन्होंने बड़े भक्तिभाव से अपने ह्रदय में ही किया.

जब पांडवो पर उनकी द्रष्टि पड़ी तब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और बोले - आप लोग बड़े धर्मात्मा है, आप लोगो के साथ बड़ा अन्याय हुआ, बड़ा कष्ट दिया गया. जहापर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सहायक विद्यमान हो, वहा आपत्ति का होना बड़ा आश्चर्य है. पर काल की गति का कोई लंघन  नहीं कर सकता और न उसका विधान कोई जान ही सकता है. बड़े-बड़े विद्वानों को भी इस विषय में मोह हो जाता है. संसार के सुख-दुःख सब देव के  अधीन है ऐसा विचार कर आप प्रजा का पालन करे.

यह जो सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े है इनके प्रभाव को भगवान शिव, कपिल, नारद कुछ ही लीग जानते है. यह तुम्हारे लिए सारथि, मंत्री, दूत आदि सब कुछ बने. यद्यपि इनमे विषमता नहीं है, फिर भी हे राजन इनके जो अनन्य भक्त  है उनपर इनकी कैसे कृपा रहती है यह प्रत्यक्ष देखो मेरे प्राणत्याग के समय दर्शन देने को स्वयं उपस्थित हो गए.

भक्ति से इनमे मन लगाकर वाणी से इनमे नाम का कीर्तन करता हुआ जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है. ये बड़े ही भक्तवत्सल है, मेरी हार्दिक इच्छा है, जब तक मेरा शरीर न छूते, तब तक इसी चतुर्भुज स्वरूप का मुझे दर्शन होता रहे.
शेष अगले अंक में .............

8/09/2010

भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं

कुंती कहती है भगवान् आप आज हम लोगो को छोड़कर जा रहे है, आपके सिवा हमारा  कोई दूसरा रक्षक नहीं है. आप ऐसी कृपा करे की मेरा  मन आपमें ही सदा लगा रहे. मै आपके मंगलमय दिव्य नामो  को स्मरण कर बार-बार प्रणाम करती हूँ, मुझपर आपकी दया सदा बनी रहे. इस प्रकार कुंती भावपूर्ण छब्बीस श्लोको से स्तुति कर  अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण को निहारती हुई चुप हो गई.

कुंती की प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान मुस्कराते हुए बोले- बुआ जी ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, यह कहकर श्रीकृष्ण फिर हस्तिनापुर लौट आये.
इधर युधिष्ठिर की विलक्षण दशा थी. वह अपने सुह्रद और बंधुओ के वध का चिंतन करते हुए बड़े मोहपाश में बंध गए थे. वे कहा करते थे मैंने इस नश्वर  शरीर के लिए कितनी अक्षौहिणी सेनाओ का नाश कर डाला. मेरी क्या गति होगी ? करोडो वर्षों तक भी मेरा नरक से उद्धार होना संभव नहीं है.

व्यास आदि महार्षियो ने तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण  ने बहुत से इतिहासों द्वारा युधिष्ठिर को समझाया किन्तु उनका शोक निवृत्त नहीं हुआ. कारण भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य भक्त भीष्म पितामह की महिमा लोक  में अभिव्यक्त करने के निमित्त उनके मुख से निकले उपदेशाम्रत से उनका मोह निवृत्त कराना चाहते थे.

एक दिन महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति  भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने उनके निवासस्थान पर गए, वहा उन्होंने भगवान कोनेत्र बंदकर ध्यानमग्न देखा, कुछ देर बाद जब भगवान ने नेत्र खोले , तब युधिष्ठिर ने प्रणाम कर पूछा-भगवान आप किसका ध्यान कर रहे थे ?
यह सुनकर भगवान के नेत्रों में अश्रु छलक  आये, उन्होंने उदास होकर कहा-राजन! म्रतुशय्या पर लेटे भीष्म  बड़े ही आर्त भाव से मेरा ध्यान कर रहे थे. उनसे आकृष्ट होकर मै वहा उन्ही के पास चला गया था. अब भरत वंशी सूर्य  अस्त होने ही वाला है. आपको जो कुछ सीखना हो उनसे सीख लीजिये.

महान योद्धा परमज्ञानी मेरे अनन्य भक्त भीष्म  के सामान  धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं है, उनके समीप जाकर आप समस्त धर्मो का श्रवण करे. मेरा विश्वास है की उनके उपदेश से आपके सब संदेह निवृत्त हो जायेगे.

8/08/2010

मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे.

मृत बंधुओ को जल देने के लिए पांडव श्रीकृष्ण तथा गांधारी, कुंती आदि के साथ गंगातट पर गए. वहा उन्होंने सबको जल दिया और विलाप कर गंगा के पवित्र जल में स्नान किया. वहा बैठे शोकसंतप्त ध्रतराष्ट्र, युधिष्ठिर, विदुर, गांधारी, कुंती आदि को श्रीकृष्ण ने प्राणियो में काल की गति को बलवती बतलाते हुए नाना प्रकार   से समझाया.

श्रीकृष्ण ने युधिस्ठिर को राज्य दिलाकर तीन अश्वमेध यग्य कराये, जिनसे युधिस्ठिर का सुयश सब दिशाओ  में फ़ैल गया. फिर सात्यकी और उद्धव को साथ लेकर श्रीकृष्ण द्वारका को जाने का विचार कर रथ पर बैठ ही रहे थे की सामने से आती उत्तरा दिखरी दी, जो रोती हुई दौड़ी आ रही थी.

उसने कहा-हे भगवान, रक्षा कीजिये. यह देदियामन तीखा वाण मेरी ओर आ रहा है, यह मुझे भले ही भस्म कर दे, इसकी मुझे चिंता नहीं, किन्तु मेरा गर्भ न गिरा सके. उत्तरा के ऐसे करुण वचन सुनकर एवं यह अस्त्र जगत को पांडव शून्य  करने के लिए अश्वत्थामा दारा छोड़ा गया है, यह जानकर भगवान् ने तुरंत योग द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया और सुदर्शन चक्र से उसके गर्भ की रक्षा की.

इधर पांडवो ने भी प्रथक-प्रथक पांच बादो  को अपनी ओर आते देखकर उनके निवारणार्थ अपने ब्रह्मास्त्र ग्रहण किये किन्तु उनके संधान में प्रयोग  का विलम्ब होता देखकर  प्रतिज्ञापूर्वक न्यस्त शस्त्र  होने पर भी अपनी प्रतिज्ञा  को भंगकर, पांड्वो की भी सुदर्शन चक्र से रक्षा की और अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक किया. यद्यपि ये ब्रह्मास्त्र अमोघ थे फिर भी वैशनव तेज सुदर्शन चक्र से वे सर्वथा शांत हो गए.

इसके पश्चात् भगवान जब जाने के लिए पुनः उद्यत हुए तब कुंती आकर भगवान किस्तुती करती हुई  बोली- हे भगवान  बड़ी-बड़ी आप्तात्तियो से अपने हम  लोगो की रक्षा की. विष भरे मोदको से लाक्षा भवन  की दाह से, वन में देखे गए हिडिम्ब आदि भीषण दैत्यों से, द्यूत सभा से, वन में प्राप्त हुए नाना प्रकार के क्लेश से तथा संग्राम में अनेक महारथियो के दिव्यास्त्रो से आपने ही हमारा त्राण किया. कहाँ तक कहू इस समय अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमें बचाया, आपको बार-बार नमस्कार है. मै आपकी शरण में हूँ.

मेरी एक प्रार्थना है कृपया उसे स्वीकार करे-भगवान मै जहा कही भी राहू मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे. कारण उन विपत्तियों में मुझे आपका दर्शन होया रहेगा, जिससे दुखमय संसार सदा के लिए निवृत्त हो जायेगा.