3/07/2011

भागवत धर्म सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है


कोई भागवत धर्म का अर्थ यह न समझे की वह केवल मंदिर में बैठे रहने के लिए है या गुफा में बैठेने या जंगल में बैठने के लिए है. भले ही संन्यास धर्म, परमहंस धर्म जंगल में रहना आवश्यक हो, गुफा में जाना जरूरी हो , परन्तु भागवत धर्म में यह सब कुछ जरूरी नहीं है.
आप ध्रुव के जीवन में देखेगे की पहले मिले भगवान् और बाद में मिला राज्य. भगवान् की भक्ति और राज्य में कोई विरोध नहीं है. उसके बाद हुआ विवाह, तो भगवान् की भक्ति और विवाह में भी कोई विरोध नहीं है, अच्छा उसके बाद हुआ युद्ध तो आवश्यकता पड़ने पर भागवत धर्म में युद्ध के लिए भी विरोध नहीं है. भगवद इच्छा के अनुसार यदि युद्ध में कूदना पड़े तो हिंसा अहिंसा दोनों के निर्वाहक, संचालक एवं प्रेरक भगवान् ही है. ध्रुव के मन में कोई ग्लानी नहीं है वह जानते है की हमारे ह्रदय में बैठे हुए जो प्रभु है, उन्ही की यह सब लीला है.
भागवत धर्म केवल निवृत्ति परायण लोगो का धर्म नहीं है. निवृत्ति परायण शुकदेव भी भगवत धर्मी है और प्रवत्ति  परायण ध्रुव भी भगवत धर्मी है.
अब एक बात पर आपका ध्यान खीचता हूँ. ध्रुव ने भगवान् के पार्षदों से पूछा की हमको वैकुण्ठ में ले चलने के लिए तुम लोग विमान लेकर आये हो, पर हमारी माँ का क्या हुआ?
पार्षदों ने कहा-महाराज!आप बिलकुल फ़िक्र न करे. भगवान् ने आपकी माता की चिंता पहले ही की ,  जिस माता के ध्रुव सरीखा पुत्र हुआ उस माता को पहले वैकुण्ठ मिलना चाहिए. माँ के पुत्र के भक्त होने से माता का भी कल्याण हो जाता है. यह भगवत धर्म विशेषता है.
कभी भगवान् बड़ा विलक्षण विनोद करते है. मनुष्य चाहता कुछ है और होता कुछ है. इसमें भी भगवान् कि बड़ी भारी कृपा रहती है. बहुत पुरानी बात है, एक महात्मा ने हम को एक बार समझाया था कि मान लो तुम्हारी सब इच्छाए पूरी होने लग जाय जो  तुम चाहते हो वही होने  लग जाय तो क्या ईश्वर कि सत्ता महत्ता  पता लग सकता है? कोई मानेगा ही नहीं ईश्वर को! जब कोई ऐसा कहता  है जो कभी  कभी हमारी इच्छा के  विपरीत भी कर देता है, तब पता चलता है कि हा और कोई है. इसी से माँ को यह हक़ होता है कि अपने बच्चे को वासना के अनुसार चलने से रोके. पति पत्नी को भी परस्पर अधिआर होता है, क्योकि अपने ही मन, अपने मन कि हमेशा होवे तो मनुष्य इतना अहंकारी हो जायेगा कि वह ईश्वर को नही मानेगा. दूसरी बात यह भी है कि मनुष्य तो एक है नहीं अनेक है  और सबकी इच्छाए आपस में टकराएगी  फलस्वरूप स्रष्टि में दुःख और संघर्ष क़ी वृद्धि होगी तो इन इच्छाओ का एक नियंता है वह है ईश्वर.
भागवत धर्म  सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है जो भी भगवान् कि स्रष्टि में पैदा हुआ उन सबके कल्याण के लिए भागवत धर्म है. जैसे पिता कि संपत्ति अपने सब पुत्रो के लिए होती है वैसे भगवान् कि संपत्ति धर्म है और उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्रजा के लिए दिया है.

1 टिप्पणी:

  1. परमतत्व एक स्तिथि है जिसे साधक प्राप्त करता है,दूसरे शब्दों में अपनी अनुभूति होती है.कहानी किस्से प्राथमिक शिक्षा है, इससे अधिक कुछ नहीं.

    बसन्त प्रभात जोशी

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