अद्भुत है भागवत का दर्शन. यह किसी एक जाती या राष्ट्र की संपत्ति नहीं है, भगवान के जितने भी बालक है, बच्चे है, उन सबके लिए श्रीमद भागवत है. भागवत में वृक्ष भी भक्त है, पक्षी भी भक्त है, लताये भी भक्त है, जल में कमल खिलते है और नदियों का प्रवाह रुक जाता है. भगवान् की भक्ति में यहाँ की सारी श्रष्टि ओतप्रोत है.
बुरा देखने से बुरी वस्तु अपने ह्रदय में आजाती है और उससे अपना ह्रदय गन्दा हो जाता है. इसलिए तत्व का न करके
अन्वय-व्यतिरेक द्वारा यह निश्चित करना चाहिए की परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है.
जन्म भी वही, मरण भी वही, रोग भी वही, आरोग्य भी वही, वियोग भी वही, संयोग भी वही उसके अतिरिक्त दूसरी कोई बस्तु है ही नहीं.
आपके ह्रदय में भक्ति होनी चाहिए. आप अकाम है की सकाम है इससे कोई मतलब नहीं . भगवान् जब आपके ह्रदय में आयेगे तब उसमे पूर्णता का प्रकाश हो जाएगा.
इस संसार में हम जिन वस्तुओ को बहुत महत्वपूर्ण समझते है वे वस्तुतः महत्वपूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण तो केवल भगवान् ही है. आप उनके रूप का ध्यान कीजिये, आपका मन शुद्ध हो जाएगा, आप यदि चाहे की आपकी क्रममुक्ती हो, आप ब्रह्मलोक में जाए तो भी जा सकते है. यदि आपकी इच्छा यहीं भक्त होने की है तो आपको यहीं सद्योमुक्ति मिल सकती है. भागवत में क्रम मुक्ति और सद्योमुक्ति इन दोनी के मार्ग बताये गए है.
परन्तु कोई भले ही ब्रह्मलोक में चला जाए, वहा जाने पर भी उसको दुःख होता है. उसे यह दुःख होता है की वहा जाने पर यह धरती दिखाई पड़ती है, धरती के लोग दिखाई पड़ते है और यह दिखाई पड़ता है की संसारी लोग केवल धन के कारण दुखी है. जब की दुःख नाम की चीज श्रष्टि में कही नहीं है. केवल उनकी अपनी बुद्धि का यह भ्रम है की इसमें उनको दुःख मालूम पड़ता है.
संसार के लोग बारम्बार इसीलिए दुखी हो रहे है की वे सचाई को जानते नहीं, सत्य को समझते नहीं और संसार के चक्र में फसे हुए है.
शोक्स्थान सहस्राणि भय्स्थान्शतानी च
दिवसे-दिवसे मूध्माविशंती न पंडितम
दिन भर में सैकड़ो हजारो बार भय-शोक से ग्रस्त होना मनुष्य की विद्या बुद्धि की पहचान नहीं है. मूर्खता की ही पहचान है. क्योकि शोक-भय तो इस संसार में आते-जाते रहे है. इनसे अपने चित्त को दुखी नहीं करना चाहिए.
जब जीव ब्रह्मलोक में जाने पर जब धरती के लोगो को दुखी देखता है, तब उसके मन में आता है की इन सबको छोड़कर मेरा अकेला ब्रह्मलोक में आना ठीक नहीं हुआ. फिर तो वह जीव ब्रह्मलोक से कूद पड़ता है और इस धरती पर आकर उससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है. वह अनुभव करता है की सम्पूर्ण प्रथिवी का सुख-दुःख मेरा अपना सुख-दुःख है.
पहले उसका तादात्म्य जड़ से होता है फिर अग्निसे, वायु से, आकाश से, समग्र प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने के बाद वह अपने को साक्षात् परमात्मा के रूप में अनुभव करता है.
श्रीमद्भागवत की यही प्रडाली है.
12/11/2010
9/27/2010
भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता
सूतजी कहते है- हे शौनक ! उसी समय युधिष्ठिर ने शरशय्या पर लेटे भीष्मसे अपने मन की शांति के लिए विविध धर्मो को पूछा. भीष्मजी ने बहुत से आख्यानो एवं इतिहासों द्वारा वर्णधर्म, आश्रमधर्म, भाग्वाद्धर्म , स्त्रीध्रम आदि का उपायों के सहित गंभीर विवेचन किया और कहा - हे राजन ! तुम अपने को करता मानकर क्यों शोकाकुल होते हो. भगवदिच्छा के बिना जब एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तब क्या तुम इन अक्षौहिणी सेनाओं का संहार करने वाले हो सकते हो ? तुम्हारा सामर्थ्य ही क्या है ? स्वयं भगवान ने श्रीमुख से गीता में जो कहा है उसे भी तुम भूल रहे हो. उसका स्मरण करो , भगवान ने कहा है -
द्रोण, भीष्म आदि सेनाओं के समस्त वीरो को मैंने ही मारा है. तुम व्यर्थ शोक क्यों करते हो इत्यादि कहकर समझाया, जिससे युधिस्ठिर का शोक निवृत्त हुआ और उनके मन को पूर्ण शांति मिली. धर्म का उपदेश करते हुए जब उत्तरायण का समय आया तब भीष्म ने अपने वाणी रोक कर सामने खड़े चत्रभुज भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए उनमे अपने मन लगा दिया.
इस विसुद्ध धारणा से उनकी सब वासनाए और भगवान के कृपा कटाक्ष से शस्त्रों की पीड़ा भी दूर हो गयी. वे शरीर का त्याग करते हुए प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति करने लगे.
द्रोण, भीष्म आदि सेनाओं के समस्त वीरो को मैंने ही मारा है. तुम व्यर्थ शोक क्यों करते हो इत्यादि कहकर समझाया, जिससे युधिस्ठिर का शोक निवृत्त हुआ और उनके मन को पूर्ण शांति मिली. धर्म का उपदेश करते हुए जब उत्तरायण का समय आया तब भीष्म ने अपने वाणी रोक कर सामने खड़े चत्रभुज भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए उनमे अपने मन लगा दिया.
इस विसुद्ध धारणा से उनकी सब वासनाए और भगवान के कृपा कटाक्ष से शस्त्रों की पीड़ा भी दूर हो गयी. वे शरीर का त्याग करते हुए प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति करने लगे.
8/20/2010
जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है.
प्रजा का नाश करने से भयभीत युधिष्ठिर सब धर्मो को जानने की इच्छा से कुरुक्षेत्र गए. जहा भीष्म पितामह स्वर्ग से च्युत देवताके सामान शरसय्यापर पड़े थे. युधिशिथिर के पीछे उनके भाई भी रथ पर चढ़कर वहा पहुचे . नारद, व्यास आदि बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि भी भीष्म के दर्शनार्थ वहा गए. अर्जुन के साथ भगवान् श्रीकृष्ण भी वहा उपस्थित हुए और उन्होंने भीष्म पितामह को प्रणाम किया. भीष्म ने उपस्थित सभी का मन ही मन पूजन किया. लीलाविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन भी उन्होंने बड़े भक्तिभाव से अपने ह्रदय में ही किया.
जब पांडवो पर उनकी द्रष्टि पड़ी तब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और बोले - आप लोग बड़े धर्मात्मा है, आप लोगो के साथ बड़ा अन्याय हुआ, बड़ा कष्ट दिया गया. जहापर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सहायक विद्यमान हो, वहा आपत्ति का होना बड़ा आश्चर्य है. पर काल की गति का कोई लंघन नहीं कर सकता और न उसका विधान कोई जान ही सकता है. बड़े-बड़े विद्वानों को भी इस विषय में मोह हो जाता है. संसार के सुख-दुःख सब देव के अधीन है ऐसा विचार कर आप प्रजा का पालन करे.
यह जो सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े है इनके प्रभाव को भगवान शिव, कपिल, नारद कुछ ही लीग जानते है. यह तुम्हारे लिए सारथि, मंत्री, दूत आदि सब कुछ बने. यद्यपि इनमे विषमता नहीं है, फिर भी हे राजन इनके जो अनन्य भक्त है उनपर इनकी कैसे कृपा रहती है यह प्रत्यक्ष देखो मेरे प्राणत्याग के समय दर्शन देने को स्वयं उपस्थित हो गए.
भक्ति से इनमे मन लगाकर वाणी से इनमे नाम का कीर्तन करता हुआ जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है. ये बड़े ही भक्तवत्सल है, मेरी हार्दिक इच्छा है, जब तक मेरा शरीर न छूते, तब तक इसी चतुर्भुज स्वरूप का मुझे दर्शन होता रहे.
शेष अगले अंक में .............
जब पांडवो पर उनकी द्रष्टि पड़ी तब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और बोले - आप लोग बड़े धर्मात्मा है, आप लोगो के साथ बड़ा अन्याय हुआ, बड़ा कष्ट दिया गया. जहापर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सहायक विद्यमान हो, वहा आपत्ति का होना बड़ा आश्चर्य है. पर काल की गति का कोई लंघन नहीं कर सकता और न उसका विधान कोई जान ही सकता है. बड़े-बड़े विद्वानों को भी इस विषय में मोह हो जाता है. संसार के सुख-दुःख सब देव के अधीन है ऐसा विचार कर आप प्रजा का पालन करे.
यह जो सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े है इनके प्रभाव को भगवान शिव, कपिल, नारद कुछ ही लीग जानते है. यह तुम्हारे लिए सारथि, मंत्री, दूत आदि सब कुछ बने. यद्यपि इनमे विषमता नहीं है, फिर भी हे राजन इनके जो अनन्य भक्त है उनपर इनकी कैसे कृपा रहती है यह प्रत्यक्ष देखो मेरे प्राणत्याग के समय दर्शन देने को स्वयं उपस्थित हो गए.
भक्ति से इनमे मन लगाकर वाणी से इनमे नाम का कीर्तन करता हुआ जो शरीर त्यागता है वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है. ये बड़े ही भक्तवत्सल है, मेरी हार्दिक इच्छा है, जब तक मेरा शरीर न छूते, तब तक इसी चतुर्भुज स्वरूप का मुझे दर्शन होता रहे.
शेष अगले अंक में .............
8/09/2010
भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं
कुंती कहती है भगवान् आप आज हम लोगो को छोड़कर जा रहे है, आपके सिवा हमारा कोई दूसरा रक्षक नहीं है. आप ऐसी कृपा करे की मेरा मन आपमें ही सदा लगा रहे. मै आपके मंगलमय दिव्य नामो को स्मरण कर बार-बार प्रणाम करती हूँ, मुझपर आपकी दया सदा बनी रहे. इस प्रकार कुंती भावपूर्ण छब्बीस श्लोको से स्तुति कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण को निहारती हुई चुप हो गई.
कुंती की प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान मुस्कराते हुए बोले- बुआ जी ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, यह कहकर श्रीकृष्ण फिर हस्तिनापुर लौट आये.
इधर युधिष्ठिर की विलक्षण दशा थी. वह अपने सुह्रद और बंधुओ के वध का चिंतन करते हुए बड़े मोहपाश में बंध गए थे. वे कहा करते थे मैंने इस नश्वर शरीर के लिए कितनी अक्षौहिणी सेनाओ का नाश कर डाला. मेरी क्या गति होगी ? करोडो वर्षों तक भी मेरा नरक से उद्धार होना संभव नहीं है.
व्यास आदि महार्षियो ने तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत से इतिहासों द्वारा युधिष्ठिर को समझाया किन्तु उनका शोक निवृत्त नहीं हुआ. कारण भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य भक्त भीष्म पितामह की महिमा लोक में अभिव्यक्त करने के निमित्त उनके मुख से निकले उपदेशाम्रत से उनका मोह निवृत्त कराना चाहते थे.
एक दिन महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने उनके निवासस्थान पर गए, वहा उन्होंने भगवान कोनेत्र बंदकर ध्यानमग्न देखा, कुछ देर बाद जब भगवान ने नेत्र खोले , तब युधिष्ठिर ने प्रणाम कर पूछा-भगवान आप किसका ध्यान कर रहे थे ?
यह सुनकर भगवान के नेत्रों में अश्रु छलक आये, उन्होंने उदास होकर कहा-राजन! म्रतुशय्या पर लेटे भीष्म बड़े ही आर्त भाव से मेरा ध्यान कर रहे थे. उनसे आकृष्ट होकर मै वहा उन्ही के पास चला गया था. अब भरत वंशी सूर्य अस्त होने ही वाला है. आपको जो कुछ सीखना हो उनसे सीख लीजिये.
महान योद्धा परमज्ञानी मेरे अनन्य भक्त भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं है, उनके समीप जाकर आप समस्त धर्मो का श्रवण करे. मेरा विश्वास है की उनके उपदेश से आपके सब संदेह निवृत्त हो जायेगे.
कुंती की प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान मुस्कराते हुए बोले- बुआ जी ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, यह कहकर श्रीकृष्ण फिर हस्तिनापुर लौट आये.
इधर युधिष्ठिर की विलक्षण दशा थी. वह अपने सुह्रद और बंधुओ के वध का चिंतन करते हुए बड़े मोहपाश में बंध गए थे. वे कहा करते थे मैंने इस नश्वर शरीर के लिए कितनी अक्षौहिणी सेनाओ का नाश कर डाला. मेरी क्या गति होगी ? करोडो वर्षों तक भी मेरा नरक से उद्धार होना संभव नहीं है.
व्यास आदि महार्षियो ने तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत से इतिहासों द्वारा युधिष्ठिर को समझाया किन्तु उनका शोक निवृत्त नहीं हुआ. कारण भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य भक्त भीष्म पितामह की महिमा लोक में अभिव्यक्त करने के निमित्त उनके मुख से निकले उपदेशाम्रत से उनका मोह निवृत्त कराना चाहते थे.
एक दिन महाराज युधिष्ठिर नित्य की भांति भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने उनके निवासस्थान पर गए, वहा उन्होंने भगवान कोनेत्र बंदकर ध्यानमग्न देखा, कुछ देर बाद जब भगवान ने नेत्र खोले , तब युधिष्ठिर ने प्रणाम कर पूछा-भगवान आप किसका ध्यान कर रहे थे ?
यह सुनकर भगवान के नेत्रों में अश्रु छलक आये, उन्होंने उदास होकर कहा-राजन! म्रतुशय्या पर लेटे भीष्म बड़े ही आर्त भाव से मेरा ध्यान कर रहे थे. उनसे आकृष्ट होकर मै वहा उन्ही के पास चला गया था. अब भरत वंशी सूर्य अस्त होने ही वाला है. आपको जो कुछ सीखना हो उनसे सीख लीजिये.
महान योद्धा परमज्ञानी मेरे अनन्य भक्त भीष्म के सामान धर्म का तत्व जाननेवाला दूसरा नहीं है, उनके समीप जाकर आप समस्त धर्मो का श्रवण करे. मेरा विश्वास है की उनके उपदेश से आपके सब संदेह निवृत्त हो जायेगे.
8/08/2010
मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे.
मृत बंधुओ को जल देने के लिए पांडव श्रीकृष्ण तथा गांधारी, कुंती आदि के साथ गंगातट पर गए. वहा उन्होंने सबको जल दिया और विलाप कर गंगा के पवित्र जल में स्नान किया. वहा बैठे शोकसंतप्त ध्रतराष्ट्र, युधिष्ठिर, विदुर, गांधारी, कुंती आदि को श्रीकृष्ण ने प्राणियो में काल की गति को बलवती बतलाते हुए नाना प्रकार से समझाया.
श्रीकृष्ण ने युधिस्ठिर को राज्य दिलाकर तीन अश्वमेध यग्य कराये, जिनसे युधिस्ठिर का सुयश सब दिशाओ में फ़ैल गया. फिर सात्यकी और उद्धव को साथ लेकर श्रीकृष्ण द्वारका को जाने का विचार कर रथ पर बैठ ही रहे थे की सामने से आती उत्तरा दिखरी दी, जो रोती हुई दौड़ी आ रही थी.
उसने कहा-हे भगवान, रक्षा कीजिये. यह देदियामन तीखा वाण मेरी ओर आ रहा है, यह मुझे भले ही भस्म कर दे, इसकी मुझे चिंता नहीं, किन्तु मेरा गर्भ न गिरा सके. उत्तरा के ऐसे करुण वचन सुनकर एवं यह अस्त्र जगत को पांडव शून्य करने के लिए अश्वत्थामा दारा छोड़ा गया है, यह जानकर भगवान् ने तुरंत योग द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया और सुदर्शन चक्र से उसके गर्भ की रक्षा की.
इधर पांडवो ने भी प्रथक-प्रथक पांच बादो को अपनी ओर आते देखकर उनके निवारणार्थ अपने ब्रह्मास्त्र ग्रहण किये किन्तु उनके संधान में प्रयोग का विलम्ब होता देखकर प्रतिज्ञापूर्वक न्यस्त शस्त्र होने पर भी अपनी प्रतिज्ञा को भंगकर, पांड्वो की भी सुदर्शन चक्र से रक्षा की और अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक किया. यद्यपि ये ब्रह्मास्त्र अमोघ थे फिर भी वैशनव तेज सुदर्शन चक्र से वे सर्वथा शांत हो गए.
इसके पश्चात् भगवान जब जाने के लिए पुनः उद्यत हुए तब कुंती आकर भगवान किस्तुती करती हुई बोली- हे भगवान बड़ी-बड़ी आप्तात्तियो से अपने हम लोगो की रक्षा की. विष भरे मोदको से लाक्षा भवन की दाह से, वन में देखे गए हिडिम्ब आदि भीषण दैत्यों से, द्यूत सभा से, वन में प्राप्त हुए नाना प्रकार के क्लेश से तथा संग्राम में अनेक महारथियो के दिव्यास्त्रो से आपने ही हमारा त्राण किया. कहाँ तक कहू इस समय अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमें बचाया, आपको बार-बार नमस्कार है. मै आपकी शरण में हूँ.
मेरी एक प्रार्थना है कृपया उसे स्वीकार करे-भगवान मै जहा कही भी राहू मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे. कारण उन विपत्तियों में मुझे आपका दर्शन होया रहेगा, जिससे दुखमय संसार सदा के लिए निवृत्त हो जायेगा.
श्रीकृष्ण ने युधिस्ठिर को राज्य दिलाकर तीन अश्वमेध यग्य कराये, जिनसे युधिस्ठिर का सुयश सब दिशाओ में फ़ैल गया. फिर सात्यकी और उद्धव को साथ लेकर श्रीकृष्ण द्वारका को जाने का विचार कर रथ पर बैठ ही रहे थे की सामने से आती उत्तरा दिखरी दी, जो रोती हुई दौड़ी आ रही थी.
उसने कहा-हे भगवान, रक्षा कीजिये. यह देदियामन तीखा वाण मेरी ओर आ रहा है, यह मुझे भले ही भस्म कर दे, इसकी मुझे चिंता नहीं, किन्तु मेरा गर्भ न गिरा सके. उत्तरा के ऐसे करुण वचन सुनकर एवं यह अस्त्र जगत को पांडव शून्य करने के लिए अश्वत्थामा दारा छोड़ा गया है, यह जानकर भगवान् ने तुरंत योग द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया और सुदर्शन चक्र से उसके गर्भ की रक्षा की.
इधर पांडवो ने भी प्रथक-प्रथक पांच बादो को अपनी ओर आते देखकर उनके निवारणार्थ अपने ब्रह्मास्त्र ग्रहण किये किन्तु उनके संधान में प्रयोग का विलम्ब होता देखकर प्रतिज्ञापूर्वक न्यस्त शस्त्र होने पर भी अपनी प्रतिज्ञा को भंगकर, पांड्वो की भी सुदर्शन चक्र से रक्षा की और अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक किया. यद्यपि ये ब्रह्मास्त्र अमोघ थे फिर भी वैशनव तेज सुदर्शन चक्र से वे सर्वथा शांत हो गए.
इसके पश्चात् भगवान जब जाने के लिए पुनः उद्यत हुए तब कुंती आकर भगवान किस्तुती करती हुई बोली- हे भगवान बड़ी-बड़ी आप्तात्तियो से अपने हम लोगो की रक्षा की. विष भरे मोदको से लाक्षा भवन की दाह से, वन में देखे गए हिडिम्ब आदि भीषण दैत्यों से, द्यूत सभा से, वन में प्राप्त हुए नाना प्रकार के क्लेश से तथा संग्राम में अनेक महारथियो के दिव्यास्त्रो से आपने ही हमारा त्राण किया. कहाँ तक कहू इस समय अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से भी आपने ही हमें बचाया, आपको बार-बार नमस्कार है. मै आपकी शरण में हूँ.
मेरी एक प्रार्थना है कृपया उसे स्वीकार करे-भगवान मै जहा कही भी राहू मुझे निरंतर विपत्तिय प्राप्त होती रहे. कारण उन विपत्तियों में मुझे आपका दर्शन होया रहेगा, जिससे दुखमय संसार सदा के लिए निवृत्त हो जायेगा.
8/05/2010
जब अश्वत्थामा मिला अभी जीवित है
जब महाभारत संग्राम में कौरव और पांड्वो की sena के बड़े-बड़े बीर मारे गए एवं भीम के गदा प्रहार से दुर्योधन के उरुदंड भी टूट गए तब अश्वत्थामा ने दुर्योधन के संतोषार्थ द्रौपदी के सोये हुए पुत्रो का सर कट डाला. यह देखकर विलाप करती हुई द्रौपदी को अर्जुन ने समझाया की तू शोक न कर, मै अश्वत्थामा का सर काटकर लाता हूँ. ऐसा कहकर अर्जुन ने अश्वत्थामा का पीछा किया. अश्वत्थामा पीछा कर रहे अर्जुन को देखकर बहुत घबडाया और रथ पर चड़कर बड़ी तेजी से भगा.
जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थित हो गता, चारो ओर हाहाकार मच गया/ तब भगवान के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को बांधकर अपने डेरे पर ले गए.
मार्ग में भगवान ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र जानकर ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बढे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली-इसे छोड़ दो यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही पूज्य गुरु है जिसकी कृपा से तुमने सारी धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र रूप में यह साक्षात् द्रोणाचार्य ही विद्यमान है, इसे मत मरो, छोड़ दो. मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ,
द्रौपदी के इन वचनों क युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बढ़ कारण ही श्रेयस्कर है.
यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले, इधर द्रौपदी उसे बचने चली. तब चार भुजा धारण कर भगवान ने दो भुजाओ से भीम को और दो से द्रौपदी को रोका और अर्जुन से कहा - हे अर्जुन अधम ब्रह्मण भी वधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी वध योग्य है, ये दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और वह करो जिससे द्रौपदी को सांत्वना देते हुए तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझ को भी प्रिय हो. अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकर अश्वत्थामा के केश सहित मणि खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. शास्त्र में अधम ब्रह्मण का यही वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं, इस तरह सभी के वचनों दी रक्षा हो गयी. अश्वत्थामा के प्राण भी बच गए और बढ़ भी हो गया.
मुंडन कर देना, धन छीन लेना तथा स्थान से निकल देना, यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं. बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांड्वो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि परलौकिक कर्म किये.
जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थित हो गता, चारो ओर हाहाकार मच गया/ तब भगवान के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को बांधकर अपने डेरे पर ले गए.
मार्ग में भगवान ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र जानकर ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बढे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली-इसे छोड़ दो यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही पूज्य गुरु है जिसकी कृपा से तुमने सारी धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र रूप में यह साक्षात् द्रोणाचार्य ही विद्यमान है, इसे मत मरो, छोड़ दो. मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ,
द्रौपदी के इन वचनों क युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बढ़ कारण ही श्रेयस्कर है.
यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले, इधर द्रौपदी उसे बचने चली. तब चार भुजा धारण कर भगवान ने दो भुजाओ से भीम को और दो से द्रौपदी को रोका और अर्जुन से कहा - हे अर्जुन अधम ब्रह्मण भी वधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी वध योग्य है, ये दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और वह करो जिससे द्रौपदी को सांत्वना देते हुए तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझ को भी प्रिय हो. अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकर अश्वत्थामा के केश सहित मणि खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. शास्त्र में अधम ब्रह्मण का यही वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं, इस तरह सभी के वचनों दी रक्षा हो गयी. अश्वत्थामा के प्राण भी बच गए और बढ़ भी हो गया.
मुंडन कर देना, धन छीन लेना तथा स्थान से निकल देना, यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है, प्राणदंड नहीं. बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांड्वो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि परलौकिक कर्म किये.
8/02/2010
भागवत से 6 - जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है
नारदजी कहते है मै अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुनाता हूँ. मै पूर्वजन्म में एक दासी का पुत्र था. मेरी माता ने मुझे चातुर्मास्य व्रत करनेवाले महात्माओ की सेवा में लगा किया था. मेरी पांच वर्ष की अवस्था थी, मै और बालको के सामान खेलता कूदता नहीं था. कम बोलता था. यथा समय महात्माओं की सेवा करता था. दिन में एक बार महात्माओं का उच्छिष्ट प्रसाद ग्रहण करत था.
नोच्छिश्तम कस्यचिद दद्यात, उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
इसके अनुसार जो पाक भांडो में बच जाता था वह प्रसाद ग्रहण करता था.
जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है. नारद जी के इस व्यव्हार से महात्माओं की कृपा हुई जिससे उनकी भगवद भक्ति में रूचि हो गई. वे महात्मा प्रतिदिन भगवान की कथा का गान किया करते था. नारद जी ने भी वह कथा सुनी. उससे सूतजी का चित्त शुद्ध हो गया और भगवान में निश्चल भक्ति हो गई. चातुर्मास्य के बाद जब महात्मा लोग जाने लगे तब उन्होंने भगवान के दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया , जिससे नारदजी पर भगवान की माया का प्रभाव कैसे पड़ता है इस रहस्य को जान गए.
संसार में तीनो तापो की यही एकमात्र औषधि है की जो कुछ कर्म करे वह सब भगवान को अर्पण कर दे. आप तो बहुश्रुत है, इसलिए भगवान का यश इस प्रकार वर्णन करे. जिससे विद्वानी को भी जानने की कोई वस्तु शेष न रह जाए. संसार में पीड़ित मनुष्यों की शांति के लिए भगवच्चरित्र से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है.
इस प्रकार नारदजी के जन्म और कर्म का वृतांत सुनकर व्यासजी ने उनसे फिर पूछा-जब आपको उपदेश देकर महात्मा लोग चले गए तब आपने क्या किय? आपकी शेष आयु किस तरह व्यतीत हुई ? अन्तकाल में आपने शरीर का त्याग कैसे किया ? आपको पूर्जन्म की स्मृति कैसे रह गयी?
नारदजी बोले-मुझे उपदेश देकर जब महात्मा लोग चले गए तब मैंने जो कुछ किया उसे सुने. मेरी माता दासी थी. मै उसका अकेला पुत्र था. वह मुझसे बड़ा स्नेह रखती थी. मै चाहता था की माता का स्नेह कम हो और मुझसे छुट्टी मिले. एक समय रात्रि में मेरी माता गौ दुहने के लिए घर से बाहर निकली. मार्ग में सर्प ने उसे डस लिया और मर गयी. माता के मरण को भगवान का अनुग्रह मानकर मै उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा. मार्ग में बहुत से देश, नगर, ग्राम वन, उपवन पार करता एक निर्जन वन में जा पंहुचा. उस समय मै बहुत थका और भूख प्यास से व्याकुल था. एक नदी के तट पर जाकर विश्राम किया और स्नानकर जल पिया, उससे मेरी थकावट दूर हो गई. तब मै एक पीपल के नीचे बैठा और महात्माओ के उपदेस के अनुशार वहा ध्यान करने लगा. सहसा मेरे ह्रदय में भगवान प्रगट हो गए.
भगवान के दर्शन करते ही मै आनंद समुद्र में डूब गया मेरे नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी, शरीर में रोमांच हो आया और मुझे अपने पराये का कुछ भी ज्ञान न रहा. थोड़ी देर बाद भगवान की मूर्ती मेरे ह्रदय से अन्तर्हित हो गई और मेरी समाधी टूट गई, मेरा चित्त अत्यंत व्याकुल हो गया. जब फिर दूसरी बार मन को स्थिर कर भगवान के दर्शन की इच्छा की तो वह रूप मुझे दिखाई नहीं दिया. तब अतृप्त की तरह मै व्याकुल हो उठा.
तब मुहे लक्ष्य कर आकाशवाणी हुई की अब इस जन्म में तुमको मेरा दर्शन नहीं होगा, कारण अभी तुम्हारी वासनाए निवृत्त नहीं हुई है. इस शरीर का त्याग करने के पश्चात् तुम मेरे पार्षद बनोगे और तब प्रलयकाल में भी तुम्हारी स्मृति नष्ट नहीं होगी. यह कहकर आकाशवाणी विरत हो गई, मैंने उसको सर से प्रणाम किया और भगवान के नामो का गान करता हुआ प्रथ्वी पर भ्रमण करने लगा. मै सदा काल की प्रतीक्षा मै रहता था एक दिन अकस्मात् बिजली की तरह काल सामने आया और मेरा पांचभौतिक शरीर प्रथ्वी पर गिर पड़ा. मै तत्क्षण भगवान का पार्षद बन गया.
कल्पान्त में ब्रह्मा के साथ ही मै जलशायी नारायण के शरीर में प्रविष्ट हो गया. फिर श्रष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा से मै उत्पन्न हुआ. मेरी गति कही रूकती नहीं. भगवान की सेवा से चित्त जैसा शांत होता है, वैसा योग आदि साधन से नहीं होता. हे व्यासजी आपने जो पूछा था उसका उत्तर मैंने दे दिया और आपके अपरितोश का कारण भी बता दिया
. सूतजी कहते है - हे शौनक यह कहकर देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुन गाते चले गए. अहो देवर्षि नारद धन्य है जो भगवान की कीर्ति गाते हुए क्लेशाक्रांत जीवो को अपनी वीणा के सुमधुर स्वर से आनंदित करते है.
नोच्छिश्तम कस्यचिद दद्यात, उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
इसके अनुसार जो पाक भांडो में बच जाता था वह प्रसाद ग्रहण करता था.
जूठा देने वाले और खाने वाले दोनों कुत्ते की योनी में जाते है. नारद जी के इस व्यव्हार से महात्माओं की कृपा हुई जिससे उनकी भगवद भक्ति में रूचि हो गई. वे महात्मा प्रतिदिन भगवान की कथा का गान किया करते था. नारद जी ने भी वह कथा सुनी. उससे सूतजी का चित्त शुद्ध हो गया और भगवान में निश्चल भक्ति हो गई. चातुर्मास्य के बाद जब महात्मा लोग जाने लगे तब उन्होंने भगवान के दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया , जिससे नारदजी पर भगवान की माया का प्रभाव कैसे पड़ता है इस रहस्य को जान गए.
संसार में तीनो तापो की यही एकमात्र औषधि है की जो कुछ कर्म करे वह सब भगवान को अर्पण कर दे. आप तो बहुश्रुत है, इसलिए भगवान का यश इस प्रकार वर्णन करे. जिससे विद्वानी को भी जानने की कोई वस्तु शेष न रह जाए. संसार में पीड़ित मनुष्यों की शांति के लिए भगवच्चरित्र से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है.
इस प्रकार नारदजी के जन्म और कर्म का वृतांत सुनकर व्यासजी ने उनसे फिर पूछा-जब आपको उपदेश देकर महात्मा लोग चले गए तब आपने क्या किय? आपकी शेष आयु किस तरह व्यतीत हुई ? अन्तकाल में आपने शरीर का त्याग कैसे किया ? आपको पूर्जन्म की स्मृति कैसे रह गयी?
नारदजी बोले-मुझे उपदेश देकर जब महात्मा लोग चले गए तब मैंने जो कुछ किया उसे सुने. मेरी माता दासी थी. मै उसका अकेला पुत्र था. वह मुझसे बड़ा स्नेह रखती थी. मै चाहता था की माता का स्नेह कम हो और मुझसे छुट्टी मिले. एक समय रात्रि में मेरी माता गौ दुहने के लिए घर से बाहर निकली. मार्ग में सर्प ने उसे डस लिया और मर गयी. माता के मरण को भगवान का अनुग्रह मानकर मै उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा. मार्ग में बहुत से देश, नगर, ग्राम वन, उपवन पार करता एक निर्जन वन में जा पंहुचा. उस समय मै बहुत थका और भूख प्यास से व्याकुल था. एक नदी के तट पर जाकर विश्राम किया और स्नानकर जल पिया, उससे मेरी थकावट दूर हो गई. तब मै एक पीपल के नीचे बैठा और महात्माओ के उपदेस के अनुशार वहा ध्यान करने लगा. सहसा मेरे ह्रदय में भगवान प्रगट हो गए.
भगवान के दर्शन करते ही मै आनंद समुद्र में डूब गया मेरे नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी, शरीर में रोमांच हो आया और मुझे अपने पराये का कुछ भी ज्ञान न रहा. थोड़ी देर बाद भगवान की मूर्ती मेरे ह्रदय से अन्तर्हित हो गई और मेरी समाधी टूट गई, मेरा चित्त अत्यंत व्याकुल हो गया. जब फिर दूसरी बार मन को स्थिर कर भगवान के दर्शन की इच्छा की तो वह रूप मुझे दिखाई नहीं दिया. तब अतृप्त की तरह मै व्याकुल हो उठा.
तब मुहे लक्ष्य कर आकाशवाणी हुई की अब इस जन्म में तुमको मेरा दर्शन नहीं होगा, कारण अभी तुम्हारी वासनाए निवृत्त नहीं हुई है. इस शरीर का त्याग करने के पश्चात् तुम मेरे पार्षद बनोगे और तब प्रलयकाल में भी तुम्हारी स्मृति नष्ट नहीं होगी. यह कहकर आकाशवाणी विरत हो गई, मैंने उसको सर से प्रणाम किया और भगवान के नामो का गान करता हुआ प्रथ्वी पर भ्रमण करने लगा. मै सदा काल की प्रतीक्षा मै रहता था एक दिन अकस्मात् बिजली की तरह काल सामने आया और मेरा पांचभौतिक शरीर प्रथ्वी पर गिर पड़ा. मै तत्क्षण भगवान का पार्षद बन गया.
कल्पान्त में ब्रह्मा के साथ ही मै जलशायी नारायण के शरीर में प्रविष्ट हो गया. फिर श्रष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा से मै उत्पन्न हुआ. मेरी गति कही रूकती नहीं. भगवान की सेवा से चित्त जैसा शांत होता है, वैसा योग आदि साधन से नहीं होता. हे व्यासजी आपने जो पूछा था उसका उत्तर मैंने दे दिया और आपके अपरितोश का कारण भी बता दिया
. सूतजी कहते है - हे शौनक यह कहकर देवर्षि नारद वीणा बजाते, हरिगुन गाते चले गए. अहो देवर्षि नारद धन्य है जो भगवान की कीर्ति गाते हुए क्लेशाक्रांत जीवो को अपनी वीणा के सुमधुर स्वर से आनंदित करते है.
8/01/2010
मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है
खिन्न चित्त व्यासजी को देखकर देवर्षि नारद मुस्कुराते हुए बोले - आप अपने को अपूर्ण सा मानकर उदास क्यों है ? व्यासजी बोले-हे नारदजी!आपने जो कुछ कहा, वह सब सत्य है. फिर भी मुझे संतोष नहीं हो रह है. इसका कारण कृपया आप बताये ? मुझमे क्या न्यूनता रह गयी है ? इसे भी अपनी दिव्य दृष्टि से देखने की कृपा करे.
नारदजी बोले-हे मुनिवर! सब कुछ करने पर भी आपने भगवान के निर्मल यश का प्रधान रूप से वर्णन नहीं किया. इसीसे आपकी आत्मा में परितोष नहीं है यही आपमें न्यूनता रह गयी है. हे मुने महाभारत में जिस प्रकार आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन किया, उस प्रकार भगवान की महिमा का वर्णन आप नहीं कर सके.
जिस मानुष की वाणी भगवान के जगत पवित्र यश का वर्णन नहीं कर करती, वह मनुष्य कूड़ा घर के सामान है. ज्ञानी पुरुष उससे वैसे ही संपर्क नहीं रखते जैसे मानसरोवर में विहार करनेवाले हंस काकतीर्थ में नहीं रमते. भगवान के निर्मल गुणों का वर्णन करनेवाली रचना आदि अशुद्ध भी हो तो भी वह जनता की पापराशी को भस्म कर देती है, कारण उससे भगवान के मंगलमय नामो का स्मरण होता है, जिनका भक्तजन ह्रदय से अभिनन्दन करते है, अधिक क्या कहे, मोक्ष देनेवाला जो नैष्कर्म्य ज्ञान है, वह भी यदि भगवान की भक्ति से रहित हो, तो उसका भी मूल्य कुछ नहीं वह बंधन निवृत्ति नहीं कर सकता.
ऐसी स्थिति में भगवद्भक्ति से हीन सकाम और निष्काम कर्म का तो कहना ही क्या है ? इसलिए हे महाभाग जीवो की बंधन निवृत्ति के लिए समाधी द्वारा आप भगवान के चरित्रों का स्मरण कर उनका वर्णन कर. भगवान के चरित्रों को छोड़कर मनुष्य जो कुछ वर्णन करता है उससे उसकी बुद्धि कही सुस्थिर नहीं रहती बायु के वेग से कम्पित नौका के सामान डगमगाती ही रहती है, जिस प्रकार मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है उसी प्रकार विषय सुख भी प्राप्त होता है, उसके लिए प्रयत्न करना उचित नहीं, निवृत्ति मार्ग से कोई विरला ही ज्ञानी पुरुष भगवत सम्बन्धी सुख प्राप्तकर सकता है. सब इसके अधिकारी नहीं है, इसलिए सर्व साधारण के कल्याणार्थ आप भगवान की लीलाओ का ही विशेष रूप से वर्णन करे.
नारदजी बोले-हे मुनिवर! सब कुछ करने पर भी आपने भगवान के निर्मल यश का प्रधान रूप से वर्णन नहीं किया. इसीसे आपकी आत्मा में परितोष नहीं है यही आपमें न्यूनता रह गयी है. हे मुने महाभारत में जिस प्रकार आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन किया, उस प्रकार भगवान की महिमा का वर्णन आप नहीं कर सके.
जिस मानुष की वाणी भगवान के जगत पवित्र यश का वर्णन नहीं कर करती, वह मनुष्य कूड़ा घर के सामान है. ज्ञानी पुरुष उससे वैसे ही संपर्क नहीं रखते जैसे मानसरोवर में विहार करनेवाले हंस काकतीर्थ में नहीं रमते. भगवान के निर्मल गुणों का वर्णन करनेवाली रचना आदि अशुद्ध भी हो तो भी वह जनता की पापराशी को भस्म कर देती है, कारण उससे भगवान के मंगलमय नामो का स्मरण होता है, जिनका भक्तजन ह्रदय से अभिनन्दन करते है, अधिक क्या कहे, मोक्ष देनेवाला जो नैष्कर्म्य ज्ञान है, वह भी यदि भगवान की भक्ति से रहित हो, तो उसका भी मूल्य कुछ नहीं वह बंधन निवृत्ति नहीं कर सकता.
ऐसी स्थिति में भगवद्भक्ति से हीन सकाम और निष्काम कर्म का तो कहना ही क्या है ? इसलिए हे महाभाग जीवो की बंधन निवृत्ति के लिए समाधी द्वारा आप भगवान के चरित्रों का स्मरण कर उनका वर्णन कर. भगवान के चरित्रों को छोड़कर मनुष्य जो कुछ वर्णन करता है उससे उसकी बुद्धि कही सुस्थिर नहीं रहती बायु के वेग से कम्पित नौका के सामान डगमगाती ही रहती है, जिस प्रकार मनुष्य को दुःख प्रयत्न के बिन ही प्राप्त होता है उसी प्रकार विषय सुख भी प्राप्त होता है, उसके लिए प्रयत्न करना उचित नहीं, निवृत्ति मार्ग से कोई विरला ही ज्ञानी पुरुष भगवत सम्बन्धी सुख प्राप्तकर सकता है. सब इसके अधिकारी नहीं है, इसलिए सर्व साधारण के कल्याणार्थ आप भगवान की लीलाओ का ही विशेष रूप से वर्णन करे.
7/31/2010
भगवन शंकर द्वारा वर्णित वह अमरकथा श्रीमद्भागवत ही है,
एक समय पार्वतीजी ने भगवन शिव से निवेदन किया-भगवन ! मेरा आपसे कभी वियोग न हो और मुझे सर्वदा आत्मज्ञान बना रहे, कृपया इसका कोई उपाय बताये. इस पर शिवजी ने कहा-प्रिये ! प्रश्न तो तुमने बहुत अच्छा किया, पर पहले बाहर जाकर देख आओ की हमारी बाते कोई दूसरा सुन तो नहीं रहा है. पार्वती ने बहार जाकर चतुर्दिक द्रष्टि डाली किन्तु उन्हें शुक के एक विगलित अंडे के सिवा वहा अन्य कोई जीव दिखाई न दिया. ऐसी स्थिति में पार्वती ने तुरंत ही लौटकर भगवान शिवजी से निवेदन किया नाथ! बहार कोई नहीं है. तब भगवान शिव ने सानंद ध्यानस्थ मुद्रा में अमरकथा का अमृत प्रवाह आरम्भ किया और पार्वतीजी बीच-बीच हुंकारी भारती रही. भगवन शंकर द्वारा वर्णित वह अमरकथा श्रीमद्भागवत ही है,
कथा का क्रम प्रथम स्कंध से दशम स्कंध पर्यंत पहुचने तक पारवती बराबर हुंकारी भारती रही पर ग्यारहवे स्कंध के आरम्भ में उन्हें निद्रा आ गई और इस बीच उस विगलित अंडे से बहार हिक्ला हुआ शुक्षावक हुंकारी भरता गया. बारहवे स्कंध की समाप्ति पर पार्वतीजी की जब निद्रा भंग हुई तब उन्होंने शिवजी से कहा-भगवन! कृष्ण उद्धव संबाद तो मै नहीं सुन सकी. देव ! क्षमा कीजिये, बीच में मै निद्रा ग्रस्त हो गई थी. इस पर शिवजी ने पूछा - तब हुंकारी कौन भर रहा था ? यह कहकर वे वास्तविकता जानने के लिए स्वयं ही बाहर आये और वहा उन्होंने सुग्गे का एक सुन्दर बच्चा बैठा देखा.
शुक-शावक को देखते ही भगवान शिव ने व्यग्र होकर पार्वतीजी से प्रश्न किया-आखिर यह यहाँ कैसे ? क्या तुमने इसे देखा नहीं ? पार्वतीजी ने सुविनीत भाव से म्रदुल स्वर में उत्तर दिया - देव! यह तो यहाँ विगलित अंडे के रूप मे पड़ा था. मालूम होता है, यह भागवत रुपी अमृत पान से जीवित हो गया. आप इस पर क्रोध न करे.
किन्तु शिवजी इतनेसे ही शांत नहिः हुए. अमरकथा का इस प्रकार फूट जाना उनकी द्रष्टि में कोई साधारण घटना न थी, अतः तुरंत वे बड़े वेगसे उस शुक शावक को पकड़ने की इच्छा से उस पर झपटे. शुक-शावक भी शिवजी की यह मुद्रा देखकर भगा और जम्हाई लेती हुई व्यासजी की पत्नी पिंगला के मुख में प्रविष्ट हो गया. इधर उसे न पाकर निराश हो शंकरजी अपने आश्रम में लौट आये. वही शुक शावक श्रीव्यासजी के पुत्र शुकदेव के रूप में उत्पन्न हुआ.
श्री शुकदेवजी के प्रसंग में अन्य पुरानो की कथा है की वे गोलोक में श्रीराधाजी के लीलाशुक थे. भगवन श्रीकृष्ण के अवतरण काल में श्रीराधाजी ने स्वयं भी लीला विग्रह धारण के समय अपने इस प्रिय शुक से साथ चलने को कहा था. वही शुक श्री राधाजी के वियोग के कारण उक्त विगलित अंडे के रूप में भगवन श्रीशंकर के आश्रम के निकट आ पड़ा था जहा उसे इस अमृतमयी कथा का अनुपम रसास्वाद स्वयं भगवन शिव के श्रीमुख से प्राप्त हुआ.
श्रीव्यासजी की पत्नी के मुख से उदर में प्रविष्ट हुआ वह शुक बारह वर्षों तक वही स्थित रह गया. इस दशा पर व्यग्र होकर एक दिन व्यासजी कह बैठे-बेटा बहार क्यों नहीं आते ? देखो तो इस स्थिति में तुम्हारी माता को कितना अधिक कष्ट हो रहा है. शुकदेवजी ने कहा-पिताजी, मेरे उदर में रहने के कारण माता को कुछ कष्ट नहीं हो रहा है, मेरे बहार आने पर माया मुझ पर आक्रमण करेगी, तब मुझे कष्ट ही नहीं, कष्ट राशी झेलनी पड़ेगी इसलिए मेरा बाहर न आना ही अच्छा है.
ऐसी मर्म मई वाणी सुनकर व्यासदेव चकित हो उठे. उन्होंने प्रश्न किया - तुम्ही बतलाओ, किस दशा में तुम्हारा बाहर आना संभव हो सकता है ? इस पर शुक ने कहा- पिताजी, द्वारकाधीश भगवन श्रीकृष का यदि यह आश्वासन मिले की माया का आक्रमण मुझपर न होगा, तभी में इस प्रथ्वी पर आ सकता हूँ, अन्यथा नहीं. जब श्रीव्यास देव ने भगवान श्रीकृष्ण से शुक्पर माया का आक्रमण न होने कात्रिवाचिक आशीर्वाद सुलभ करा दिया तब श्रीशुकदेवजी प्रथ्वी पर अवतीर्ण हुए और आशिर्वाद्दाता भगवान श्रीकृष्ण एवं माता पिता के श्रीचरणों में सादर प्रणाम कर वन की ओर चल पड़े. व्यासजी पुत्र्वात्सल्य से उनके पीछे-पीछे हे पुत्र! हे पुत्र! कहते उन्हें बुलाते रहे -
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव
किन्तु शुकदेवजी लौटे नहीं. एक पर्वत की कन्दरा में जाकर समाधिस्थ हो गए. व्यासजी विरह से व्याकुल होकर पुत्र के संस्कार को जाग्रत करने वाले भागवत के भावपूर्ण श्लोको का बार-बार उच्चारण करने लगे. उन श्लोको में प्रथम श्लोको में प्रथम श्लोक यह था-
अहो बाकि यम स्तान्काल्कूतम जिन्घान्स्या पायायादाप्य्साध्वी
लेभे गतिम् धत्र्युचितम तातोंयम कम व दयालुम शरणम वृजेम
आश्चर्य ! भगवान् की दयालुता का मै कहा तक वर्णन करू. दुष्ट राक्षसी पूतना ने मरने की इच्छा से अपने स्तनों में कालकूट विष भरकर भगवान को पिलाया किन्तु भगवन ने उसे माता की सी उचित गति अपना लोक दे दिया. विष देने वाले को भी जो अमृत प्रदान कर, ऐसा दयालु दूसरा देवता कौन है, जिसकी मै शरण लू.
यह श्लोक सुनते ही शुकदेवजी की समाधी टूट गई. वह विह्वल होकर कन्दरा से बहार आये और उन्मत्त की तरह उस श्लोक की ध्वनि का अनुसरण कर व्यासजी के समीप जा पहुचे. वहा उनके चरणों पर गिरकर आंसू बहाते हुए बोले- बेटा ! आश्रम पर चलो, वहा हम तुम्हे ऐसे ही बहुत से श्लोक सुनायेगे. शुकदेवजी भगवन के गुणों से आकृष्ट होकर उनके साथ आश्रम पर वहा उन्होंने व्यासजी के श्री मुख से सम्पूर्ण भागवत का अध्ययन किया.
कथा का क्रम प्रथम स्कंध से दशम स्कंध पर्यंत पहुचने तक पारवती बराबर हुंकारी भारती रही पर ग्यारहवे स्कंध के आरम्भ में उन्हें निद्रा आ गई और इस बीच उस विगलित अंडे से बहार हिक्ला हुआ शुक्षावक हुंकारी भरता गया. बारहवे स्कंध की समाप्ति पर पार्वतीजी की जब निद्रा भंग हुई तब उन्होंने शिवजी से कहा-भगवन! कृष्ण उद्धव संबाद तो मै नहीं सुन सकी. देव ! क्षमा कीजिये, बीच में मै निद्रा ग्रस्त हो गई थी. इस पर शिवजी ने पूछा - तब हुंकारी कौन भर रहा था ? यह कहकर वे वास्तविकता जानने के लिए स्वयं ही बाहर आये और वहा उन्होंने सुग्गे का एक सुन्दर बच्चा बैठा देखा.
शुक-शावक को देखते ही भगवान शिव ने व्यग्र होकर पार्वतीजी से प्रश्न किया-आखिर यह यहाँ कैसे ? क्या तुमने इसे देखा नहीं ? पार्वतीजी ने सुविनीत भाव से म्रदुल स्वर में उत्तर दिया - देव! यह तो यहाँ विगलित अंडे के रूप मे पड़ा था. मालूम होता है, यह भागवत रुपी अमृत पान से जीवित हो गया. आप इस पर क्रोध न करे.
किन्तु शिवजी इतनेसे ही शांत नहिः हुए. अमरकथा का इस प्रकार फूट जाना उनकी द्रष्टि में कोई साधारण घटना न थी, अतः तुरंत वे बड़े वेगसे उस शुक शावक को पकड़ने की इच्छा से उस पर झपटे. शुक-शावक भी शिवजी की यह मुद्रा देखकर भगा और जम्हाई लेती हुई व्यासजी की पत्नी पिंगला के मुख में प्रविष्ट हो गया. इधर उसे न पाकर निराश हो शंकरजी अपने आश्रम में लौट आये. वही शुक शावक श्रीव्यासजी के पुत्र शुकदेव के रूप में उत्पन्न हुआ.
श्री शुकदेवजी के प्रसंग में अन्य पुरानो की कथा है की वे गोलोक में श्रीराधाजी के लीलाशुक थे. भगवन श्रीकृष्ण के अवतरण काल में श्रीराधाजी ने स्वयं भी लीला विग्रह धारण के समय अपने इस प्रिय शुक से साथ चलने को कहा था. वही शुक श्री राधाजी के वियोग के कारण उक्त विगलित अंडे के रूप में भगवन श्रीशंकर के आश्रम के निकट आ पड़ा था जहा उसे इस अमृतमयी कथा का अनुपम रसास्वाद स्वयं भगवन शिव के श्रीमुख से प्राप्त हुआ.
श्रीव्यासजी की पत्नी के मुख से उदर में प्रविष्ट हुआ वह शुक बारह वर्षों तक वही स्थित रह गया. इस दशा पर व्यग्र होकर एक दिन व्यासजी कह बैठे-बेटा बहार क्यों नहीं आते ? देखो तो इस स्थिति में तुम्हारी माता को कितना अधिक कष्ट हो रहा है. शुकदेवजी ने कहा-पिताजी, मेरे उदर में रहने के कारण माता को कुछ कष्ट नहीं हो रहा है, मेरे बहार आने पर माया मुझ पर आक्रमण करेगी, तब मुझे कष्ट ही नहीं, कष्ट राशी झेलनी पड़ेगी इसलिए मेरा बाहर न आना ही अच्छा है.
ऐसी मर्म मई वाणी सुनकर व्यासदेव चकित हो उठे. उन्होंने प्रश्न किया - तुम्ही बतलाओ, किस दशा में तुम्हारा बाहर आना संभव हो सकता है ? इस पर शुक ने कहा- पिताजी, द्वारकाधीश भगवन श्रीकृष का यदि यह आश्वासन मिले की माया का आक्रमण मुझपर न होगा, तभी में इस प्रथ्वी पर आ सकता हूँ, अन्यथा नहीं. जब श्रीव्यास देव ने भगवान श्रीकृष्ण से शुक्पर माया का आक्रमण न होने कात्रिवाचिक आशीर्वाद सुलभ करा दिया तब श्रीशुकदेवजी प्रथ्वी पर अवतीर्ण हुए और आशिर्वाद्दाता भगवान श्रीकृष्ण एवं माता पिता के श्रीचरणों में सादर प्रणाम कर वन की ओर चल पड़े. व्यासजी पुत्र्वात्सल्य से उनके पीछे-पीछे हे पुत्र! हे पुत्र! कहते उन्हें बुलाते रहे -
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव
किन्तु शुकदेवजी लौटे नहीं. एक पर्वत की कन्दरा में जाकर समाधिस्थ हो गए. व्यासजी विरह से व्याकुल होकर पुत्र के संस्कार को जाग्रत करने वाले भागवत के भावपूर्ण श्लोको का बार-बार उच्चारण करने लगे. उन श्लोको में प्रथम श्लोको में प्रथम श्लोक यह था-
अहो बाकि यम स्तान्काल्कूतम जिन्घान्स्या पायायादाप्य्साध्वी
लेभे गतिम् धत्र्युचितम तातोंयम कम व दयालुम शरणम वृजेम
आश्चर्य ! भगवान् की दयालुता का मै कहा तक वर्णन करू. दुष्ट राक्षसी पूतना ने मरने की इच्छा से अपने स्तनों में कालकूट विष भरकर भगवान को पिलाया किन्तु भगवन ने उसे माता की सी उचित गति अपना लोक दे दिया. विष देने वाले को भी जो अमृत प्रदान कर, ऐसा दयालु दूसरा देवता कौन है, जिसकी मै शरण लू.
यह श्लोक सुनते ही शुकदेवजी की समाधी टूट गई. वह विह्वल होकर कन्दरा से बहार आये और उन्मत्त की तरह उस श्लोक की ध्वनि का अनुसरण कर व्यासजी के समीप जा पहुचे. वहा उनके चरणों पर गिरकर आंसू बहाते हुए बोले- बेटा ! आश्रम पर चलो, वहा हम तुम्हे ऐसे ही बहुत से श्लोक सुनायेगे. शुकदेवजी भगवन के गुणों से आकृष्ट होकर उनके साथ आश्रम पर वहा उन्होंने व्यासजी के श्री मुख से सम्पूर्ण भागवत का अध्ययन किया.
7/30/2010
श्रीमद्भागवत का श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
भागवत 4 स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ महाभारत की रचना हुई
शुकदेवजी ने यह कथा परीक्षित को सुनाई थी. यह कथा किस स्थान में, किस कारण और किस युग में आरम्भ हुई ? किससे प्रेरति होकर व्यासजी ने यह संहिता बनायीं ?
व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी समदर्शी और योगी थे. उनकी कही आसक्ति और भेद्द्रष्टि नहीं थी. वह उत्पन्न होते ही सब कुछ त्यागकर वन में जा रहे थे. मार्ग में एक सरोवर था . उसमे अप्सराये नग्न होकर जलविहार कर रही थी. शुकदेव को देखकर उन अप्सराओ को न तो लज्जा हुई और न उन्होंने वस्त्र धारण किये . शुकदेवजी के हे पुत्र ! हे पुत्र! हे पुत्र ! कहते जब वृद्ध अनग्न व्यासजी आये, तब उन स्त्रियों को बड़ी लज्जा हुई. जल से निकलकर उन्होंने तुरंत अपने-अपने वस्त्र पहन लिए. यह देखकर व्यासजी को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने इसका कारण अप्सराओ से पूछा , तब वे बोली-
भगवन आपकी द्रष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है. किन्तु आपके पुत्र की पवित्र द्रष्टि में वह भेद नहीं है, व्यासजी यह सुनकर चकित हो मौन हो गए.
ऐसे निर्लिप्त अनासक्त, ज्ञानी शुकदेवजी के साथ परीक्षित का संवाद कैसे हुआ ? जो उन्मत्त और मूक के सामान अवधूत वेश में हस्तिनापुर के आस-पास इधर-उधर विचर करते थे. उन्हें लोगो ने कैसे पहचाना इसके अतिरिक्त जब वह घूमते-फिरते कभी किसी गृहस्थ के यहाँ चले जाते, तो गोदोहन काल तक ही ठहरते थे, अधिक नहीं. तब परीक्षित को सात दिनों तक उन्होंने कथा कैसे सुनाई ? हमारे इस संदेह को कृपया आप निवृत्त करे.
शुकदेव सा वक्ता होना कठिन है और श्रोता परीक्षित सा होना भी कठिन है, क्योंकि दोनों के जन्म और कर्म आश्चर्यमय ही है. महाराज परीक्षित ने किस कारण राज्य का परित्याग किया ? अन्न-जल का परित्याग कर वे गंगातट पर क्यों गए ? और वही उन्होंने प्राणों का परित्याग भी क्यों किया ? आप हमारे इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करे.
व्यासजी द्वापर में महर्षि पराशर से उत्पन्न हुए. वह एक दिन सरस्वती नदी के तट पर आचमन कर बैठे थे. सूर्य का उदय हो रहा था, इसी समय ब्यासजी के मन में विचार आया की आगे कलियुग आनेवाला है. इसमें मनुष्य अल्पायु, दुर्बुद्धि, अश्रद्धालु और नास्तिक होगे. दिव्य चक्षु से यह सब देखकर समस्त वर्ण और आश्रमों के हित का विचार कर उन्होंने एक वेद को चार भागो में विभक्त किया और अपने चार शिष्य पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को उन्हें पढ़ा दिया. उन्ही की कृपा से मेरे पिता रोमहर्षण इतिहास पुराण के ज्ञाता हुए. स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ उन्होंने महाभारत की रचना की. यह सब करने पर भी प्राणियों के कल्याणार्थ सर्वदा तत्पर व्यासजी के ह्रदय में संतोष नहीं हुआ. उन्होंने विचार किया की मैंने दृढ संकल्प से वेद, गुरु और अग्नि की शुश्रूषा करते हुए सदा उनका आदर और आज्ञापालन किया है. फिर भी खेद है की मेरी आत्मा में संतोष नहीं हुआ. इसका कारण क्या है ?
अगले अंक में शुकदेव जी की जन्म कथा पढ़े
व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी समदर्शी और योगी थे. उनकी कही आसक्ति और भेद्द्रष्टि नहीं थी. वह उत्पन्न होते ही सब कुछ त्यागकर वन में जा रहे थे. मार्ग में एक सरोवर था . उसमे अप्सराये नग्न होकर जलविहार कर रही थी. शुकदेव को देखकर उन अप्सराओ को न तो लज्जा हुई और न उन्होंने वस्त्र धारण किये . शुकदेवजी के हे पुत्र ! हे पुत्र! हे पुत्र ! कहते जब वृद्ध अनग्न व्यासजी आये, तब उन स्त्रियों को बड़ी लज्जा हुई. जल से निकलकर उन्होंने तुरंत अपने-अपने वस्त्र पहन लिए. यह देखकर व्यासजी को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने इसका कारण अप्सराओ से पूछा , तब वे बोली-
भगवन आपकी द्रष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है. किन्तु आपके पुत्र की पवित्र द्रष्टि में वह भेद नहीं है, व्यासजी यह सुनकर चकित हो मौन हो गए.
ऐसे निर्लिप्त अनासक्त, ज्ञानी शुकदेवजी के साथ परीक्षित का संवाद कैसे हुआ ? जो उन्मत्त और मूक के सामान अवधूत वेश में हस्तिनापुर के आस-पास इधर-उधर विचर करते थे. उन्हें लोगो ने कैसे पहचाना इसके अतिरिक्त जब वह घूमते-फिरते कभी किसी गृहस्थ के यहाँ चले जाते, तो गोदोहन काल तक ही ठहरते थे, अधिक नहीं. तब परीक्षित को सात दिनों तक उन्होंने कथा कैसे सुनाई ? हमारे इस संदेह को कृपया आप निवृत्त करे.
शुकदेव सा वक्ता होना कठिन है और श्रोता परीक्षित सा होना भी कठिन है, क्योंकि दोनों के जन्म और कर्म आश्चर्यमय ही है. महाराज परीक्षित ने किस कारण राज्य का परित्याग किया ? अन्न-जल का परित्याग कर वे गंगातट पर क्यों गए ? और वही उन्होंने प्राणों का परित्याग भी क्यों किया ? आप हमारे इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करे.
व्यासजी द्वापर में महर्षि पराशर से उत्पन्न हुए. वह एक दिन सरस्वती नदी के तट पर आचमन कर बैठे थे. सूर्य का उदय हो रहा था, इसी समय ब्यासजी के मन में विचार आया की आगे कलियुग आनेवाला है. इसमें मनुष्य अल्पायु, दुर्बुद्धि, अश्रद्धालु और नास्तिक होगे. दिव्य चक्षु से यह सब देखकर समस्त वर्ण और आश्रमों के हित का विचार कर उन्होंने एक वेद को चार भागो में विभक्त किया और अपने चार शिष्य पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को उन्हें पढ़ा दिया. उन्ही की कृपा से मेरे पिता रोमहर्षण इतिहास पुराण के ज्ञाता हुए. स्त्री, शूद्र आदि के कल्यार्थ उन्होंने महाभारत की रचना की. यह सब करने पर भी प्राणियों के कल्याणार्थ सर्वदा तत्पर व्यासजी के ह्रदय में संतोष नहीं हुआ. उन्होंने विचार किया की मैंने दृढ संकल्प से वेद, गुरु और अग्नि की शुश्रूषा करते हुए सदा उनका आदर और आज्ञापालन किया है. फिर भी खेद है की मेरी आत्मा में संतोष नहीं हुआ. इसका कारण क्या है ?
अगले अंक में शुकदेव जी की जन्म कथा पढ़े
7/28/2010
श्रीमद्भागवत से - 3 - मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ
भगवान ने पहले लोक रचना की इच्छा से पुरुष अवतार ग्रहण किया था. उस समय भगवान, जिनके नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए एवं जिनके शरीर के अवयवो से समस्त लोक रचना संभव हुई, योग निद्रा का विस्तार कर जल में शयन कर रहे थे. विशुद्ध सत्त्वमय भगवान के इसी प्रधान रूप का योगी जन ज्ञान चक्षु से दर्शन करते है, इसमें भगवान के अनंत पैर, उरु, भुजा, मुख, शिर, कर्ण, नेत्र, नासिका आदि सुशोभित हो रहे है. यह रूप बहुत से मुकुट, कुंडल आदि आभूश्नो से देदीप्यमान है.
इसी रूप से भगवान के नाना अवतार होते है और फिर इसी में उनका लय हो जाता है, इसी के अंशांश ब्रह्मा, मरीचि तथा कश्यप से देवता, पशु पक्षी तथा मानुश्यादी योनिया उत्पन्न होती है. इसी रूप से जिन चौबीस अवतारों का प्रादुर्भाव हुआ था, उनके मंगलमय नामो का आप लोग श्रवण करे -
१-सनकादी महर्षियों का अवतार, २-बारह अवतार , ३-नारदावतार, ४-नर narayan अवतार, ५-कपिल अवतार, ६-दत्तात्रेय अवतार, ७-यग्य अवतार, 8- रिषभ अवतार, ९-प्रथू का अवतार, १०-मत्यस्य अवतार, ११- कूर्म अवतार, १२-धन्वन्तरी का अवतार, १३-मोहिनी का अवतार, १४-नरसिंह अवतार, १५-वामन अवतार, १६-परशुराम अवतार, १७-व्यास अवतार, १८-राम अवतार, १९-बलदेवता अवतार, २०-श्री कृष्ण अवतार, २१-हरी अवतार, २२-हंस अवतार, २३-बुद्ध अवतार और २४-कल्कि अवतार
इस प्रकार भगवान के असंख्य अवतार है और वे समय-समय पर प्रगट होकर जगत की रक्षा करते है. जो मनुष्य सायं प्रातः इन अवतारों का श्रवण और कीर्तन करता है वह दुखमय संसार से मुक्त हो जाता है.
जैसे निरुप आकाश में वायु के आश्रित मेघो की और वायु में पार्थिव रेणुओ की अज्ञानवश कल्पना की जाती है, वैसे ही द्रष्टा आत्मा में अज्ञानियो ने द्रश्य्त्व का आरोप किया है, ये दोनों ही जीव के बंधन हेतु संसार के कारण है, जब प्रेम लक्षणा भक्ति के द्वारा ज्ञान रुपी सूर्य का उदय होता है तब ये दोनों शरीर ज्ञान अग्नि में भस्म हो जाते है एवं जीव भगवान का साक्षात्कार कर परम आनंद का अनुभव करता है, प्रेम लक्षणा भक्ति भावना के जन्म, कर्म तथा लीलाओ के कीर्तन और चिंतन से प्राप्त होती है.
यद्यपि देहाभिमानी जीव तर्क आदि कौशल के द्वारा भी भगवान की लीलाओ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, तथापि जो निष्कपट भाव से अहंकार त्यागकर भगवान के चरण कमल मकरंद का पान करता है, उस पर शीघ्र भगवत्कृपा होती है, जिससे उसे लीलाओ के ज्ञान के साथ-साथ भक्ति द्वारा भगवान के स्वरूप का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है,
श्रीमद्भागवत को पांचवा वेद कहा गया है. इसमें भगवान के दिव्य मधुमय चरित्रों का वर्णन है, लोक कल्याण के लिए ही इसका प्रादुर्भाव हुआ है, व्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका उपदेश किया था. शुकदेवजी ने गंगा के तट पर स्थित महाराज परीक्षित को इसे सुनाया. वही सूतजी ने भी इसका श्रवण किया.
भगवान श्री कृष्ण जब अपने धाम को चले गए, तब मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ है. धर्म भी अब इसी के आश्रय में रहता है. यह छठे प्रश्न का उत्तर भी हो गया.
इसी रूप से भगवान के नाना अवतार होते है और फिर इसी में उनका लय हो जाता है, इसी के अंशांश ब्रह्मा, मरीचि तथा कश्यप से देवता, पशु पक्षी तथा मानुश्यादी योनिया उत्पन्न होती है. इसी रूप से जिन चौबीस अवतारों का प्रादुर्भाव हुआ था, उनके मंगलमय नामो का आप लोग श्रवण करे -
१-सनकादी महर्षियों का अवतार, २-बारह अवतार , ३-नारदावतार, ४-नर narayan अवतार, ५-कपिल अवतार, ६-दत्तात्रेय अवतार, ७-यग्य अवतार, 8- रिषभ अवतार, ९-प्रथू का अवतार, १०-मत्यस्य अवतार, ११- कूर्म अवतार, १२-धन्वन्तरी का अवतार, १३-मोहिनी का अवतार, १४-नरसिंह अवतार, १५-वामन अवतार, १६-परशुराम अवतार, १७-व्यास अवतार, १८-राम अवतार, १९-बलदेवता अवतार, २०-श्री कृष्ण अवतार, २१-हरी अवतार, २२-हंस अवतार, २३-बुद्ध अवतार और २४-कल्कि अवतार
इस प्रकार भगवान के असंख्य अवतार है और वे समय-समय पर प्रगट होकर जगत की रक्षा करते है. जो मनुष्य सायं प्रातः इन अवतारों का श्रवण और कीर्तन करता है वह दुखमय संसार से मुक्त हो जाता है.
जैसे निरुप आकाश में वायु के आश्रित मेघो की और वायु में पार्थिव रेणुओ की अज्ञानवश कल्पना की जाती है, वैसे ही द्रष्टा आत्मा में अज्ञानियो ने द्रश्य्त्व का आरोप किया है, ये दोनों ही जीव के बंधन हेतु संसार के कारण है, जब प्रेम लक्षणा भक्ति के द्वारा ज्ञान रुपी सूर्य का उदय होता है तब ये दोनों शरीर ज्ञान अग्नि में भस्म हो जाते है एवं जीव भगवान का साक्षात्कार कर परम आनंद का अनुभव करता है, प्रेम लक्षणा भक्ति भावना के जन्म, कर्म तथा लीलाओ के कीर्तन और चिंतन से प्राप्त होती है.
यद्यपि देहाभिमानी जीव तर्क आदि कौशल के द्वारा भी भगवान की लीलाओ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, तथापि जो निष्कपट भाव से अहंकार त्यागकर भगवान के चरण कमल मकरंद का पान करता है, उस पर शीघ्र भगवत्कृपा होती है, जिससे उसे लीलाओ के ज्ञान के साथ-साथ भक्ति द्वारा भगवान के स्वरूप का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है,
श्रीमद्भागवत को पांचवा वेद कहा गया है. इसमें भगवान के दिव्य मधुमय चरित्रों का वर्णन है, लोक कल्याण के लिए ही इसका प्रादुर्भाव हुआ है, व्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका उपदेश किया था. शुकदेवजी ने गंगा के तट पर स्थित महाराज परीक्षित को इसे सुनाया. वही सूतजी ने भी इसका श्रवण किया.
भगवान श्री कृष्ण जब अपने धाम को चले गए, तब मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ है. धर्म भी अब इसी के आश्रय में रहता है. यह छठे प्रश्न का उत्तर भी हो गया.
7/27/2010
श्री मदभागवत से- २, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है,
सूतजी सौनकादी ऋषियों के छः प्रश्नों को सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और श्री शुकदेवजी का ध्यान कर कहने लगे- कृष्ण सम्बन्धी प्रश्नों से लोगो का महान कल्याण होता है और आत्मा को शांति प्राप्त होती है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
7/26/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ? कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्रीमद भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का रसमय फल है. यह भक्तिरस से भरा हुआ है. यह सुमधुर फल श्रीनारायण से ब्रह्माजी को, ब्रह्माजी से नारद को, श्रीनारादजी से सरस्वती के तट पर आसीन खिन्नचित्त श्री व्यासजी को तथा व्यासजी से योगेश्वर श्री शुकदेवजी को प्राप्त हुआ.
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
7/25/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
ಎएक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले yagy का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परमज्ञानी सूतजी वहा आ पहुचे. ऋषियों ने पूछा - हे भगवान आपने समस्त इतिहास पुरानो का अध्ययन और उनका प्रवचन भी किया है. व्यासजी जो रहस्य जानते है, उन सबका आपको भी पूर्ण रूप ज्ञान है. श्रद्धालु और प्रेमी शिष्यों को गुरुजन गोप्य बाते भी बतला देते है. इसलिए अब आप कृपा कर यह बताये की
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
7/24/2010
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
7/21/2010
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
श्रीमद्भागवत की कथा किसके मुख से सुनी जाये उसके भी नियम है, इस विषय में कौशिकी संहिता में लिखा है की जो वैष्णव नहीं, उनके मुख से कथा कदापि नहीं सुननी चाहिए. भागवत की कथा तो विशेष रूप से वैष्णव के मुख से ही सुननी चाहिए. पूर्वाचार्यों ने वैष्णव शब्द का अर्थ ब्राह्मण बताया है.
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
7/20/2010
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष इस कथा को अवश्य सुने.
महाभारत युद्ध के आरम्भ में भगवान श्री कृष्ण जब अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे, तब हनुमानजी ने ध्वजा पर बैठे-बैठे गीता का श्रवण किया. गीता की समाप्ति पर अर्जुन की तरह हनुमानजी ने भी भगवान का पूजन कर उनसे कहा, भगवान, मै भी आपका शिष्य हूँ, कारण मैंने ध्वजा पर बैठे-बैठे ही आपसे गीता सुनी है,
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
7/19/2010
ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है.
यदि स्वतंत्र रूप से सप्ताह करने का समर्थ न हो,तो आठ सहायक मिलकर इस शुभ कार्य को करे. सर्व प्रथम ज्योतिषी से मुहूर्त पूछे.
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
7/18/2010
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए.
पिता के मरने पर एक दिन धुन्धुकारी ने अपनी माता को भी खूब पीटा और कहा jaldi ब्बता धन कंहा गडा है, नहीं तो लातो के प्रहार से तुझे मार ही डालूगा. पुत्र के भय से व्याकुल धुधुली उसी रात कुए में गिरकर मर गयी. गोकर्ण पहले ही teerth यात्रा करने चले गए थे. उनका कोई शत्रु या मित्र न थे. घर में घुन्धुकारी अकेला रह गया था , उसने वहा पांच वेश्याये रख ली और चोरी के dhan से उनका पोषण कर कुकर्मो me निरत रहने लगा. एक दिन उन वेश्याओं ने उससे वस्त्र आभूषण लाने का आग्रह किया. वह कामांध कही से बहुत से भूषण वस्त्र चोरी कर ले भी आया. सोने चांदी के बहुमूल्य सामान को देखकर रात्री में वेश्याओ ने विचार किया की यह तो प्रतिदिन ही चोरी करता है, एक दिन राजा इसे पकड़कर मार ही देगा और साथ में हमें भी मरकर सारा धन छीन लेगा. इसलिए हम स्वयं ही क्यों न इसे मरकर धन लेकर कही अन्यत्र चली जाय. ऐसा निश्चय कर एक रात उन सबने सोते समय उसके हाथ पैर बाधकर गले में जलते अंगारे उसके मुख में ठूस दिए. अग्नि की ज्वाला से छटपटाकर वह मर गया, उसके मरते ही उन साहसी वेश्याओं ने वही गड्ढा खोदकर उसे गाड दिया. इस रहस्य का किसी को भी पता न चला . जब लोग धुन्धुकारी का हाल पूछते तो वेशाए कह देती की वह धन के लोभ में कही दूर चले गए है. आशा है, एक वर्ष में आ जायेगे.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
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