9/06/2011

परदोष दर्शन ऐसा भीषण पाप है




मुस्लिम भक्तो की एक टोली मक्का जा रही थी. शेख सादी उन दिनों बच्चे थे. मक्का जानेवाले दल में अपने पिता के साथ वे भी गए.
तीर्थयात्रियो ने खुदा की बंदगी के लिए कुछ नियम बना रखे थे. एक नियम यह भी था की आधी रात को उठकर प्रार्थना की जाय. एक दिन रात्री में प्रार्थना  करने के लिए शेख सादी और उनके पिता ही उठे. दल के और लोग यात्रा से इतने थक गए थे की वे सोते ही रहे. 
पिता और पुत्र ने प्राथना की. प्रार्थना संपन्न होने पर जब दोनों सोने लगे तब सादी से न रहा गया. आखिर बच्चे ही तो थे. वे बोले पिताजी देखिये केवल हम दोनों ने ही प्रार्थना  की है. दल के ये लोग कितने आलसी है, न उठते है न प्रार्थना करते है.
बालक के ये वाचन उस सरलचित्त और धर्मनिष्ठ पिता के ह्रदय में तीर की भाती  चुभ गए; उन्होंने सादी को सावधान करते हुए कहा मेरे सादी तू भी प्रार्थना के लिए न उठता तो अच्छा था. उठकर खुदा की बंदगी की इससे दूसरो पर क्या अहसान किया? प्रार्थना के लिए उठकर दूसरो के दोष देखने तथा उसका बखान करने से तो न उठना ही श्रेयष्कर था.
सादी को अपनी भूल समझ में आ गयी उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पिता से अपनी भूल के लिए क्षमा मागी. पिता ने फिर कहा बेटा परदोष दर्शन ऐसा भीषण पाप है जिसको खुदा ही क्षमा कर सकते है. तुम खुदा  से ही अपने ह्रदय की शुद्धि के लिए प्रार्थना करो.

9/04/2011

क्या हम इतना भी नहीं कर सकते

   
भगवान की लीला बडी रसमयी ही. अपनी लीला के रूप मे वे स्वयं अपने को ही प्रकट करते है. भगवान और भगवान की लीला ये दोनो भिन्न नहीं  है. एक ही है. एक प्रकार से याह संपूर्ण संसार भगवान की लीला ही है. यह सब नाम रूप उनही के है, वे ही है, परंतु वे इतने ही नही इनसे परे भी है. उनकी सत्ता उनका स्वरूप और उनकी लीला अनिर्वचनीय है. 

जब जीव प्रमादवश भगवान के  स्वरूप और लीलाओं को भूलकर  उनसे भिन्न प्राकृत  पदार्थों से सुख पाने की  आशा एवं अभिलाषा करता  है और बहिर्मुख होकर  उन्हीं के  पीछे भटकने लगता है, तब वह उद्वेग, अशांति एवं दुख से घिर जाता है। भगवान वैसी स्थिति में भी उसे बार-बार चेतावनी देते रहते हैं और प्रतीक्षा किया करते  हैं की  वह अभिमान तथा भौतिक  पदार्थों का भरोसा छोडक़र सच्चे ह्दय से पुकारते  तो मै अभी चल कर  उसे गले से लगा लूँ, उस पर अपना अनन्त प्रेम प्रकट करू  तथा सर्वदा के  लिए सुख  शान्ति के  साम्राज्य में वास दे दूँ।

परंतु जीव की  यह मोहनिद्रा टूटे तब तो यह आयोजन संभव हो। भगवान की  दया तो क्या वर्णन किया  जाए? उन्होने तो समस्त जीवों को  दया के  समुद्र में ही रख छोड़ा है। उनके  अनन्त उपकार,  अपार कृपा  और अपरिमित प्रेम से सब के  सब दबे हुए हैं।

जब अभिमान, कामना  और भय के  थपेड़ों से व्याकुल होकर , रजोगुण के  नाना व्यापारों से ऊबकर नरक , स्वर्ग आदि में चक्कर खाते-खाते परेशान होकार भी लोग सात्वित्क्ता , दैवी सम्पत्ति एवं भगवान की  शरण नहीं ग्रहण करते उलटे  तमोगुण की  प्रगाढ़ निद्रा में सो जाते हैं, चराचर प्रलय हो जाता है, तब यदि भगवान प्रकृति   को  क्षुब्ध करते  इन्हें जगाते नहीं तो उस मोह निद्रा से कैसे छुटकारा  मिलता? सोते से जगाया, ज्ञान का  संचार किया । तम से रज में लाकर  सत्त्व की  ओर अग्रसर किया। अब क्या जीवन दान करणे  वाले प्रभु की  शरण लेना ही हमारा कर्तव्य  नहीं है? क्या हम जतना भी नहीं कर सकते ?

केवळ कृतज्ञता  की  दृष्टि से ही नहीं चल सकता  । हम चाहे जितना प्रयत्न कारे , जितना हाथ-पैर पीटें, उनके  बिना हमारे सुख शांति आदि स्थायी भी तो नही रह सकते । दो चार दिन के  लिए कुछ     गुणों की  छाया भले ही आ जाए, भगवान के  बिना उनका  टिकू  होना असंभव है। यह आज की  बात नहीं है सर्वदा से ऐसा ही होता आया है।

6/13/2011

नुकसानदायक है अंडा सेवन


यदि शास्त्रीय विधि निषेध की बात न मानी जाय तो हर व्यक्ति इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र है की वह क्या खाए और क्या न खाय किन्तु अच्छे स्वास्थ्य के द्रष्टिकोण से या भयानक बीमारियों की रोकथाम के लिए कुछ खाद्य पदार्थो का सेवन हानिकारक हो तो आपको चाहिए की आप विवेकपूर्वक ऐसा खाद्य पदार्थ न ले.
आप निम्न तथ्यों से भली बहती जान जायेगे की अंडा जहा स्वास्थ्य के लिए हानिकर है वह वह मांसाहार भी है. इसलिए इसका सेवन किसी भी द्रष्टि से उचित नहीं -

१ अंडा सेवन अंहिसा एवं करुना के विपरीत-

यह बहुधा सुनने में आता है की अनिशेचित अंडे शाकाहारी है लेकिन यदि यह मालूम हो जाय की उनके उत्पादन की विधि कितनी क्रूरता से परिपूर्ण है और भारतीय मूल्यों जैसे अहिंसा और करुना के विपरीत है तो बहुत से लोग अंडा सेवन बंद कर देगे. अमेरिका के विश्व्विध्यात लेखक जान राबिन्स ने  अपनी प्रसिद्द पुस्तक दैत फार ऐ न्यू अमेरिका में लिखा ह ई की अन्डो की फेक्ट्रीयो में स्थापित किये हुए पिजड़ो में ईतनी अधिक मुर्गिय भर दी जाती है की वे पंख भी नहीं फद्फदा सकती और तंग जगह की वजह से वे आपस में चोचे मारती है, जख्मी होती है, गुस्सा करती है और कष्ट भगती है, जब मुर्गी को २४ घंटे लोहे की सलाख पर बैठना पड़ता है तब एक विशेष मशीन से एक ही रात में लगभग हजारो मुर्गियों की चोचे काट दी जाती है और गरम-गरम आग से तपते लाल औजारों से उनके पंख भी काट दिए जाते है. आप समझ सकते है की जल्दी से अंडा उत्पन्न करने का तरीका कितना हिंसात्मक है.

२ अन्डो से कई बीमारिया

हासे ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त  विश्व में यह साबित कर दिया है की मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारन अन्डो से वह बीमारी उस मानुष में प्रवेश कर जाती है. अंडा सेवन करने वाले व्यक्तियों को यह भी नहीं मालूम की इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्र होती है. अन्डो के सेवन से ऑटो में सदन और टी बी आदि की आशंकाए बढ़ जाती है. अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन ईन्जाईम के विरुद्ध प्रतिक्रिया होती है. कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मित्लित रिपोर्ट में कहा है की अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए जिम्मेदार है. यह बात १९८५ ईश्वी  के नोबुल पुरस्कार विजेता डाक्टर ब्राउन और डाक्टर गोल्द्स्तीं ने कही है की अन्डो में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारन बहुत अधिक मौते होती है. इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है की जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ रहने की कल्पना कर रहे है वे कल लकवा, अग्जिमा, ईन्जईना जैसे रोगों के शिकार होगे. फिर अंडे में फाईबर नहीं होता और कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फ्रूति देता है वह भी शून्य होता है.

३ अन्डो में पौष्टिकता एवं उर्जा की कमी

विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है की शाकाहारी कह्द्यानो की तुलना में अंडे में अधिक प्रोटीन है सकीं विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह ज्ञात होता है की प्रोटीन, खनिज लावन और कैलोरी आदि की द्रष्टि से कौन सा आहार हमारे लिए उपयुक्त है 

 
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४ कोइ भी अंडा शाकाहारी नहीं होता - 

प्रचार माध्यमो के कारण कुछ वर्षो से शुद्ध शाकाहारी परिवार के नवयुवक भी अन्डो  का सेवन करने लगे है क्योकि अनिशेचित अन्डो को शाकाहारी नामकरण देकर एक भ्रमजाल फैलाया गया है. यह एक वैज्ञानिक तथ्य है की अनिशेचित अंडे किशी भी प्रकार से शाकाहारी नहीं होते क्योकि न तो वे पदों पर उगते है और न किसी पौधे पर बल्कि वे सब मुर्गी के पेट से उत्पन्नं होते है.१९७१ ईश्वी में मिशीगन यूनिवर्सिटी अमेरिका के वैज्ञानिको ने यह सिद्ध कर दिया था की संसार का कोई भी अंडा निर्जीव नहीं है चाहे निषेचित हो य अनिशेषित. अंडे के ऊपरी भाग पर हजारो सूक्ष्म छिद्र होते है जिनमे अनिशिचित अंडे का जीव श्वास लेता है 

4/07/2011

अपना आत्मा अपना घर है

श्रीमदभागवत में बताया गया है की जब ह्रदय में ईश्वर विषयक चर्चा श्रवण करने की इच्छा होती है तो ईश्वर तत्क्षण ह्रदय में आकर बैठ जाता है. असल में ईश्वर की कृपा जन्म-जन्म के पुन्य सत्कर्मो का परिपाक, गुरु की कृपा, अपने ह्रदय में शुभेच्छा होवे तब वेदांत सुनने को मिलता है.
दुनिया में राज कथा, भोगकथा, जगत कथा, बहू-बेटी की बात सुनानेवाला मिलेगा, ब्रह्मविद्या को सुनानेवाल तो जल्दी मिलेगा नहीं!
लोग तो यह कहकर डराते है की वेदांत सुनोगे तो घर-गृहस्थी छूट  जाएगी पर वेदांत घर गृहस्थी  से कोई दुश्मनी तो है नहीं , वेदांत की अर्थात ज्ञान की दुश्मनी अगर किसी से है तो  केवल  अज्ञान से है, ज्ञान तुम्हारा घर, तुम्हारा परिवार, तुम्हारा धन, तुम्हारा शरीर इन सब का कुछ नहीं बिगाड़ेगा, और यह जो तुम्हारे मन में मान्यताये है, संस्कार है, छोटी-छोटी बातो में जो तुम उलझे हुए हो ये बेवकूफी की जो मान्यताये है, इनको तो जरूर मिटा देगा.
अपने नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करो. अपने दुर्भाग्य को मत कोसो, अपने प्रतिबंधो के बारे में भी सोच-सोचकर निराश मत होवो. वेदांत के अधिकारी सब है-अपने घर में जाना है यह पराया  घर नहीं है. यह अपना आत्मा अपना घर है, अपने पास लौटने के लिए क्या झगडा ? घर के दरवाजे पर लिखा हो बिना ईजाजत अन्दर आना मन है और घर का मालिक आ जाय तो क्या वह उसके लिए भी लिखा है ?  बोले भाई, यह बात जरूर है की अपने घर में भी जब ठाकुरबाड़ी बनाते है तब जरा पाँव धोकर जाते है, अपवित्र  पाँव से प्रवेश नहीं करते  है, पवित्र होकर जाते है. तो वेदांत श्रवण के लिए पवित्र बुद्धि से -ईर्ष्या, द्वेष, कलुषित बुद्धि से नहीं राग-द्वेष कलुषित बुद्धि से नहीं, अहंता, ममता से कलुषित बुद्धि से नहीं. उपरोक्त बुद्धि से जाना चाहिए.

4/06/2011

अल्प के प्रति वैराग्य हुए बिना अनंत के प्रति लालसा संभव नहीं है.

समय की वेगवती धारा में सब कुछ बहा जा रहा है. द्रश्यमान प्रपंच में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो स्थिर हो. हमारे सामने संसार में कितने ही उत्थान-पतन और उथल-पुथल होते रहते है. जब हम किसी लुभावनी वस्तु में आसक्त हो जाते है या डरावनी वस्तु से द्वेष करने लगते है तब हमारा अन्तरंग राग-द्वेष के रंग में रंग जाता है. उसी के आवेश में हम अपने स्वरुप को और उसके अनुरूप स्थिति, भावना अभ्यास और धर्म को भूल जाते है तथा आमूल-चूल संसार के दलदल में निमग्न तथा संलग्न हो जाते है. वर्तमान स्थिति यह है की न हमें अपने स्वरुप का ज्ञान है, न पररूप का. न ह्रदय में सद्भावना है, न जीवन में सत्कर्म. जिसका अंग-अंग राग रंग और दुह्संग में रंग गया है उसके लिए अज्ञान निवर्तक तत्वज्ञान की तो चर्चा ही क्या है. जहा भगवद अर्चा  नही वह  ब्रह्म चर्चा भी शोभाहीन है.
देहावेश की निवृत्ति के लिए देहातिरिक्त आत्मा का ज्ञान आवश्यक है. वह देह नहीं देही है. पाप पुन्य का करता है. सुख-दुःख का भोक्ता है. जीवन का आदि-अंत यह शरीर ही नहीं है. इस शरीर के पूर्व भी जीवन था और पश्चात भी रहेगा. आकार, आयु, शक्ति, संकल्प, प्रज्ञा, सुख-दुःख आदि  में तारतम्य भी स्पष्ट ही देखने में आता है. शून्य, विज्ञान, भौतिक द्रव्य, प्रकृति, परमाणु अथवा ब्रह्मरूप उपादानो  में, चाहे वे एक हो अथवा अनेक हो, सद्रश हो अथवा विस्द्रश हो, संस्कार रूप बीज पूर्व्कर्मानुसार ही होते है. संस्कार रूप बीज के बिना परस्पर विलक्षण, विचित्र एवं विभिन्न जातियों तथा व्यक्तयो के शरीर की उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो सकती.
इसलिए देहातिरिक्त  आत्मा को कर्ता, भोक्ता एवं 
गमनागमनशील  जानकार सुखदायक संस्कार उत्पन्न करने के लिए मनुष्य शरीर में धर्मनिष्ठ की नितांत आवश्यकता है. धर्मनिष्ठ में ही स्वभाव के परिवर्तन और निर्माण की शक्ति है और देहावेश की निवृत्ति भी धर्मनिष्ठ ही करती है.
धर्मनिष्ठां  के साथ ही साथ भक्तिनिष्ठ का होना भी आवश्यक है क्योकि मनुष्य का ह्रदय अत्यंत संवेदनशील और भावुक है. वह तत्काल प्रिय, अप्रिय के प्रति क्रमशः राग द्वेष के वशीभूत होकर अपने ह्रदय में सद्भाव या दुर्भाव को स्थिर आश्रय दे देता है और दुःख भोगने लगता है. राग-द्वेष दोनों का ही अंतिम परिणाम जलन है इसलिए अपने ह्रदय में निरंतर लोकोत्तर चमत्कारकारी परमेश्वर का चिंतन करना चाहिए. इसी से लौकिक पारलौकिक विषयों  के प्रति वैराग्य होता है. अल्प के प्रति वैराग्य हुए बिना अनंत के प्रति जिज्ञासा, लालसा  या प्रगति संभव नहीं है. संसार की छोटी-छोटी वस्तुओ में लुभा जाने वाला पुरुष परमात्मा की प्राप्ति का अधिकारी नहीं हो सकता.

4/04/2011

राम विशेषता है वे कष्ट उठाकर भी अपने धर्म का पालन करते है.

माता-पिता की आज्ञा का पालन यदि आराम से , सुख से, अपने लाभ के लिए होती है   तो बहुत से लोग उसे धर्म समझकर करना चाहते है और करने के लिए तैयार रहते है. परन्तु इस धर्म के प्रति निष्ठां की परिपुष्टि तो तब होती है जब उसका पालन करने में हमें कष्ट मिले  और उस कष्ट को सहकर भी हम अपने धर्म का पालन करे. कष्टसाध्य धर्म का पालन करने पर ही मनुष्य धर्मात्मा होता है.

श्रीरामचंद्र ने जो राज्य का परित्याग करके चौदह वर्षो तक वन में निवास किया, वन्य जीवन व्यतीत किया, इसी से पता चलता है की उनके ह्रदय में माता-पिता की आज्ञा के प्रति कितनी निष्ठां थी. जो ब्यक्ति धर्म पालन में कष्ट उठाने से हिचकता है, वह धर्मनिष्ठ नहीं होता. धर्म का पालन तभी होता है, जब हम अपने हाथ को वासना के अनुसार काम करने  से रोके और आज्ञानुसार काम करने दे. अनुशासन सबसे बड़ी चीज है. हमारे पावो को आज्ञा के अनुसार चलना चाहिए, वासनानुसार नहीं चलना चाहिए. जो कार्य शासनानुसरी होता है, वही धर्म होता है, वासनानुसारी कार्य तो  लम्पटता का रूप होता है. हमें यह देखते रहना चाहिए की हम अपने जीवन  में जो मनोराज्य या मनोरथ करते है, वे वासनानुसार है अथवा वेद, शास्त्र, आचार्य और बड़ो की आज्ञा के अनुसार है.

राम की यही विशेषता है कि वे घोर कष्ट उठाकर भी अपने   धर्म का पालन करते है. धर्म माने धारण करना - धरन्ति इति धर्मः. जो हमारे  भीतर रहकर हमारी रक्षा करता है, पावो को बुरी जगह जाने नहीं देता, हाथो  से बुरा काम करने नहीं देता, मुह से बुरी बात नहीं बोलने देता, इन्द्रियों को बुरे मार्ग पर नहीं चलने देता, वह धर्म है. जो शक्ति हमारे अंतःकरण में विराजमान है और हमारी इन्द्रियों तथा मन को पकड़कर वश में रखती है, उसी का नाम होता है धर्म.

4/02/2011

गीता से


सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज
अहम् तवा सर्वपापेभ्यो मोक्षिश्यामी  मा शुचः -  गीता
सम्पूर्ण धर्मो को अर्थात सम्पूर्ण दर्ताव्य कर्मो को मुझमे त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वधर परमेश्वर की ही शरण में आ जा. मई तुझे सम्पूर्ण पाप्सो से मुक्त कर दूगा तू शोक मत कर.

3/30/2011

दीमको की बनायी बांबी से प्रकट होने के कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा

भगवान् का, सर्वेश्वर का, बैकुंठनाथ विष्णु का अथवा साक्षात् परब्रह्म परमात्मा का जो राम रूप है, वह वाल्मीकि की द्रष्टि में मानव रूप है. और हम सब लोगो के जीवन के साथ सीधा सम्बन्ध रखता है. हमें अन्य भगवानो की उपासना करनी पड़ेगी, ध्यान करना पड़ेगा, प्रार्थना करनी पड़ेगी, उनका ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा, पर हम श्री रामचंद्र के चरित्र को साक्षात् अपने इसी भौतिक जीवन में उतार सकते है.
वाल्मीकि जी क्या है? वाल्मीकि माने होता है बांबी. तपस्या करते-कतरे उनके शरीर में लग गए दीमक और दीमको की माटी से उनका शरीर ढक गया. वे केवल अस्थिमात्र शेष रह गए. उनके चाम, रक्त और पीब को दीमक चाट गए. दीमको की बनायी बांबी से प्रकट होने के कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा. मतलब यह है की वाल्मीकि धरती के, प्रथ्वी के पुत्र है.

3/29/2011

लोग एक-दुसरे से मिलने पर राम-राम कहते है.

बाल्मिकिजी मरा-मरा जपने लगे और ऐसी तपस्या में सलग्न हुए की ब्रह्म के सामान हो गए. इसलिए बाल्मीकि रामायण के प्रारंभ में ही उनके लिए तपस्वी शब्द का प्रयोग किया गया है.
बल्मिकिजी पब तप सिद्ध होकर दुबारा सप्तर्षियो से मिले तब उन्होंने यह प्रश्न किया की महाराज इस संसार में सबसे श्रेष्ठ गुणवान मनुष्य कौन है? उनके द्वारा किया गए प्रश्न है-
इस समय इस संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मग्य, क्रतग्य, सत्यवक्ता और दृढ प्रतिज्ञ कौन है?
कौन सदाचार परायण, समस्त प्राणियों का हितसाधक, विद्वान, सामर्थ्शाली और प्रियदर्शन है ?
मन पर अधिकार रखनेवाल, क्रोधजयी, कान्तिमान और अनिन्दक कौन है?
संग्राम में कुपित होने पर देवता भी किससे डरते है?
मै यह सब जानना चाहता हूँ. मुझे यह जानने की बड़ी उत्सुकता है.
इस पर ऋषियों ने उत्तर दिया की बाल्मिकिजी ऐसे गुणागार तो केवल  ईक्षवाकुवंशी श्री रामचन्द्र  ही है और यह बात जन-जन को मालूम है.
वास्तव में इस धरती पर  भगवान् श्रीरामचंद्र का नाम सबके पास पंहुचा हुआ है. ऐसा कोई नहीं है ,जिसके कानमे राम का नाम  न पड़ा हो. आज भी लोग एक-दुसरे से मिलने पर  राम-राम कहते है.
बाल्मीकि रामायण में जिन राम का वर्णन है उनका विचार यदि अभिधा वृत्ति से ही किया जाय तो वे मनुष्य रूप से ही वर्णित हुए है. वाल्मीकि रामायण के राम मानव राम है. न तो वे मोहविनाशक ज्ञान के रूप में वर्णित  है, न अवतारी नारायण के रूप में वर्णित है और न तुरीय तत्व के रूप में वर्णित है. यह सब बाते तो लक्षणा से प्रतीकात्मक अर्थ करे कही जाती है.
सीढ़ी बात है की अयोध्या नगरी है, उसमे कौसल्या और दशरथ दंपत्ति है और उनके पुत्र है रामचंद्र. वे मनुष्यों के रूप में इतने सद्गुण संपन्न है की भूत, वर्तमान और भविष्य में सदा सर्वदा मानव के आदर्श रूप में बने रहेगे. एक सच्चे मनुष्य के जीवन में कितने और कैसे-कैसे गुण होने चाहिए, उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए, ह्रदय कैसा होना चाहिए, इसके लिए श्रीराम चंद्रजी का चरित्र आदर्श है.
इसलिए हैं यह मानना चाहिए की श्रीराम चन्द्र भगवान् तो हमारे जीवन है, हमारी आखो के सामने है और सद्गुण संपन्न होकर हमें मार्ग दिखा रहे है.
यदि किसी को यह बात मालूम पड़ जाय की श्री राम मनुष्य  नहीं साक्षात् नारायण है तो रावण तक भी यह खबर पहुच जायगी और वह ब्रह्मा  के पास जाकर लड़ पड़ेगा. कहेगा की तुमने तो मुझे वरदान दिया था की मै मनुष्य के हाथो ही मरुगा. फिर तुमे  मुझे मारने के लिए नारायण को क्यों भेज दिया? यदि नारायण मुझे मारेगे तो तुम्हारा  यह वरदान झूठा हो गया की मनुष्य और वानर के अतिरिक्त अन्य किसी से मुझको भय नहीं रहेगा. इसलिए श्रीराम यदि मनुष्य न हो विष्णु देवता के रूप में प्रख्यात हो जाय तो ब्रह्माजी द्वारा रावण को दिया हुआ वरदान निराधार हो जाएगा.

यह बात भी ध्यान में रखने की है की हिंदी में भगवान् शब्द ईश्वर के लिए चल गया है. वैशनव लोग भगवान् शब्द का और शैव लोग ईश्वर शब्द का प्रयोग करते है. भगवान् शब्द संस्कृत में संज्ञा नहीं है, विशेषण है. इसलिए भवान व्यासः, भगवान् नारदः बोलते है. लेकिन विषेसड   होने पर भी भगवान् शब्द का प्रयोग बाल्मीकि रामायण  में बहुत कम, नाम मात्र का प्राप्त होता है.

3/28/2011

जो बात-बात में स्वयं दुखी हो जाय और दूसरो को दुखी करे, रुलाये, उसका नाम शूद्र है.

बाल्मीकी के जीवन के सम्बन्ध में आद्यात्म रामायण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण आदि में तरह-तरह की कथाये आती  है. अद्भुत बात यह है की उनका पूर्ण जीवन उच्च  कोटि का नहीं बताया गया है. आध्यात्म रामायण में आता है-
अहम् पुरा किरातेशु किरातैह सह वर्धितः
जन्म्मात्र द्विजत्वम में शूद्रचाररतः सदा
इसमें बाल्मीकी जी स्वयं कहते है की मै पहले जंगल में रहता था. जंगली लोगो के साथ ही मुझे पढने सीखने का अवसर मिला. वहा   मैंने बुरे-बुरे चरित्र किये, मई शूद्रचार परायण हो गया.
ब्रह्मसूत्र के शारीरिक भाष्य में शूद्र शब्द की व्याख्या ऐसे की गयी है- शुचा अभिदुद्रूवे  इती  शूद्रः, जो बात-बात में स्वयं दुखी हो जाय और दूसरो को दुखी करे, रुलाये, उसका नाम शूद्र है.
बाल्मीकी जी कहते है की मै पहले इसी तरह के काम किया करता था. एक दिन मेरे सामने से सप्तर्षि  निकले. मन में आया की उनके पास जो कमण्डलु है, दंड है, वस्त्र है, उन सबको मै छीन लू और उनसे प्राप्त द्रव्य को अपने कुटुंब के पालन पोषण में लगाऊ.
एक पुराण में तो यह लिखा है की बाल्मीकि जी को सप्तर्षि मिले और दुसरे पुराण में लिखा है की केवल नारदजी मिले. जब बाल्मीकि जी कमण्डलु आदि को छीनने के लिए सप्तर्षियो  के पास पहुचे तब उन्होंने उनसे पूछा की तुम जो यह काम करने जा रहे हो इसके फलभागी तुम्हारे घरवाले होगे या नहीं? जानते हो की पाप का फल क्या होता है? यदि तुम हमारा सामन छीनकर हमें दुःख दोगे तो तुमको भी दुःख होगा. इसलिए पहले यह देख लो की तुम जो पाप कर रहे हो और जिसके  फलस्वरूप  तुम्हे दुःख मिलनेवाला है, उसमे तुम्हारे घरवाले हिस्सेदार होगे या नहीं?
बल्मीकिजी ने कहा मुझे तो यह बात मालूम नहीं है. मै घरवालो से पूछकर जबाब दे सकता हूँ. लेकिन मै यह बात पूछने घर जाऊ  और तुम  इतने में भाग जाओ तो क्या होगा?
इसपर सातो ऋषियों ने कहा की तुमको जिससे संतोष हो वह कर लो लेकिन घर जाकर पूछ  जरूर आओ.
बाल्मीकि जी ने ऋषियों को पेड़  से बाढ़ दिया  वे खुशी से बंध गए और बंधे -बंधे भगवान् का स्मरण करने लगे.
बाल्मीकि जी ने घर जाकर अपनी पत्नी,पिता-माता और बंधू-बांधव सबसे पूछा की मै चोरी-डकैती, बेईमानी, छल-कपट तथा दूसरो को दुःख पहुचकर धन संपत्ति ले आता हूँ, उससे तुम लोगो का पालन पोषण होता है लेकिन मुझे इस पाप कर्म का जो फल मिलेगा उससे तुम लोग हिस्सेदार बनोगे या नहीं?
घरवालो ने एक स्वर से उत्तर दिया की नहीं. तुम घर के मालिक हो तुम्हारा कर्तव्य है की हमारा पालन पोषण करो तुम कर्तव्य के अनुसार ही हमारे पालन पोषण के लिए धन कमाकर ले आते हो लेकिन हम यह नहीं जानते की तुम कहा से कैसे लाते हो इसलिए यदि तुम्हारे कर्तव्य पालन का फल दुःख है तो हम उसको भोगने में हिस्सेदार नहीं होगे.
यह सुनकर बाल्मिकिजी  को बड़ी ग्लानी हुई. वे तुरंत सप्तर्षियो के पास पहुचे और उनको बंधन  से मुक्त करके बोले की घरवाले तो दुःख में हिस्सेदार नहीं होगे.
तब सप्तर्षियो ने बाल्मिकिजी को समझाया की देखो दूसरो को तकलीफ पहुचकर धन बटोरना पाप है फिर जब उस पाप में तुम्हारे परिवार के लोग ही सम्मिलित नहीं है तब तुम केवल अपने लिए दुःख की स्रष्टि क्यों कर रहे हो?
अब तो बाल्मीकि जी सप्तर्षियो के शरणागत हो गए. उन्होंने उनको राम-राम जपने का उपदेश दिया लेकिन बाल्मिकिजी की स्थिति ऐसी थी की उनके मुह से राम-राम निकले ही नहीं.
उसपर सप्तर्षियो ने कहा की अच्छा तुम सीधे राम-राम नहीं जप सकते तो मरा-मरा जपो क्योकि मरा-मरा जपने से भी राम-राम का उच्चारण हो जाएगा. इसी आधार पर गोस्वामी तुलसीदास जी  ने कहा है- उल्टा नाम जपत जग जाना , बाल्मीकि भये ब्रह्म सामना.

3/20/2011

स तरति, स तरति, स लोकंस्तार्यती

स तरति, स तरति, स लोकंस्तार्यती

वह पार होता है. वह माया से पार होता है. वह लोको को भी माया से पार कर देता है.
वह भक्त स्वयं तो माया से पार होता ही है, उसके द्वारा दूसरे भी माया से पार हो जाते है.
यह संसार माया का खेल है. यदि कोई जादू के रूपये एकत्र कर ले तो क्या वे स्थाई रहेगे? जादू के खेल में जो स्त्री पुरुष का सम्बन्ध देखा वह क्या सच्चा है? 
यह जो कुछ दीख रहा है, सब जादू का खेल माया है. जीव इसमें उलझ गया इसे सच्चा मान बैठा. इससे पार कैसे होगा? इसके लिए साधन बतलाया. जो व्याकुल होता  है पार जाने के लिए, जो माया के पदार्थो से - धन, स्त्री-पुत्र, पद आदि से प्रेम नहीं करता, जो इनको मेरा मानकर बढ़ता नहीं, जिसे यह ज्ञान है की हमें प्रभु के समीप जाना है और जो उस प्रभु को    ही चाहता है, उसी को  प्राप्त करने के लिए रोता रहा है, उसे प्रभु स्वयं मिल जाते है. 

कोई रजा विदेश गए. उनके कई रनिया  थी, उन्होंने वह से रानियों को पात्र लिखकर पूछा की लौटते समय किसके लिए क्या लेते आवे. जिस रानी को जो चाहिए था उसने वह लिख दिया.राजा  ने वह सब सामान बाजार से मगा  लिया. छोटी रानी का पत्र  खोला गया तो उसमे केवल  एक लिखा था. राजा  ने अपने सचिव से पूछा-इस एक का क्या अर्थ है?

सचिव ने बताया-छोटी महारानी का तात्पर्य है की उन्हें कोई सामग्री नहीं चाहिए. उन्हें तो एक आपको पाने की इच्छा है.

राजा  स्वदेश लौटे जिस रानी ने जो सामग्री मगाई थी वह उसके भवन में भेज दी. जिस छोटी रानी ने एक मागा था उसके राजभवन में वे स्वयं गए.

इस माया के खेल में जो खिलौने नहीं चाहता, उस मायावी को चाहता है, उसे वह प्राप्त होता है. सच्चे प्रेम के सामने परदे नहीं तित्कते. जैसे ज्ञान आवरण भंग कर डा है वैसे ही प्रेम भी आवरण भंग करता है.

जो इस मार्ग पर चलता है उसे अटूट अखंड प्रेम प्राप्त होता है. वह स्वयं तो माया से पार हो ही जाता है, दूसरो को भी माया से पार कर देता है, क्योकि जो उस मायावी को जान चूका, पा चूका, उसके सामने माया टिकती नहीं है.

3/11/2011

गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है

वृन्दाबन में श्री  उडिया बाबाजी महाराज को एक विद्वान् ने पूछा-महाराज! 
यह गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है?
महराजजी ने उनसे उल्टा प्रश्न किया-तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो?
 उन्होंने कहा-जानकारी प्राप्त कनरे  के लिए 
महाराज जी- अबतक जो जानकारी तुम्हे प्राप्त है, उसमे कुछ संशय होगा तभी तो हमसे अपनी जानकारी की पुष्टि करवाना चाहते हो.
विद्वान्-महाराज! आप कह देगे तो निर्णय हो जायेग. 
महाराज जी बोले-तो यही तो गुरु की आवश्यकता है.
असल में जीवन में मनुष्य अपने आप कुछ इधर की कुछ उधर की छिटपुट हजारो बाते सुनता रहता है  हजारो अधिकारी के लिए हजारो शास्त्र वचनं अहि और साधना के एक-एक मार्ग को दिखने वाले हजरू ऋषि है. उनमे हमारे लिए कौन सा ठीक है , यह हम अपनी बुद्धि से निर्णय करना चाहे तो कुछ न कुछ दुविधा बनी रहेगी. इसलिए इसमें सद्गुरु की आवश्यकता है की वो हमारी बुद्धि की दुविधा मिटाकर हमको एक साधन भजन की पद्धति में 
निष्ठावान बना दे.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार 

3/10/2011

ये बाके बिहारी है.

भगवान् ने देखा की संसार के लोग दुखी है.
क्यों दुखी है?
कहा हमसे बिछुड़े हुए है.
जो अपने को आनंद स्वरूप अनुभव  करे और दुनिया में किसी को दुखी देखे तो उसका क्या ख्याल बनेगा ? यही न की मै आनंद स्वरूप, इन्होने मेरी और पीठ कर ली है इसलिए दुखी है. यही तो सोचेगे और क्या सोचेगे?

संसार में ज्यादा लोग दुखी है-अपना धन, अपना कर्म, अपना भोग, अपना शरीर, अपनी परिच्छिन्नता- इसी पर नजर बढ़ गयी है- इसके कारण संसार के लोग दुखी है. जरा सामने वाले पर जाने दो नजर-जो मंद-मंद मुस्करा रहा है, टेढ़ी टांगवाला ! टेढ़ी टांग वाले को आप जानते है......?
बाकेबिहारी........त्रिभंग ललित, टेढ़ी कमर वाला, टेढ़ा चिबुक, टेढ़ा पाँव, तीन जगह से टेढ़े, फिर भी ललित! यह बाके बिहारी है. मंद-मंद मुस्कान, आखो में प्रेम, भौहो में अनुग्रहवाले क्या तीर है! क्या बाड़ है!

वे सम्पूर्ण सौन्दर्य का आधार है. वक्षस्थल जिसपर लक्ष्मी निवास करती है, श्रीवत्स है. जिनका रोम-रोम पुकारता है, आओ, आओ! सुख चाहते हो तो हमारी ओर आओ! उसका चिबुक हिलता है तो कहता है हमारे पास आ जाओ, हाथ हिलाता है तो कहता है हमारे पास आ जाओ! आख हिलती है तो कहती है, हमारे पास आओ! भौह हिलती है तो कहती है हमारे पास आओ! आमंत्रण करने वाल देवता है, यह निमंत्रण करने वाला देवता है!

ये संसार के बिछुड़े हुए लोग, ये बिरही लोग, ये दुखी लोग संसार के विषयों से प्रेम करके दुखी हो गए. उनके दुःख निवारण के लिए ये परम कृपालु , ये करुणा वरुणालय. ये करुण नयन ह्रदय  में निमंत्रण दे रहे है की आओ-आओ-आओ तुम्हे गंध चाहिए तो गंध लो, रस चाहिए तो रस लो , रूप चाहिए तो रूप लो, स्पर्श चाहिए तो स्पर्श लो, शब्द चाहिए तो शब्द लो, दिल चाहिए तो दिल लो, दिमाग चाहिए तो दिमाग लो और कुछ न चाहिए तो हमको ही ले लो.

योगमायामुपश्रितः -अर्थात जीवो को ईश्वर की प्राप्ति हो जाय, उनको अविनाधी सत मिले, उनको स्वयं प्रकाश चित मिले, उनको अनायास नित्यानंद मिले, इसके लिए योगमाया का आश्रय लिया.

3/09/2011

ईश्वर की भक्ति का चमत्कार

भगवान् को शक्ल-सूरत से जानना, जानना नहीं होता, मानना   होता है. क्योकि जब हम एक साढ़े तीन हाथ का कोई ब्यक्ति देखते है तो इसी ने यह स्रष्टि बनाई है, यह सर्वागी है, ये सर्वशक्तिमान है- यह तो मानना  पड़ेगा.
जब हम एक छोटी सी  चीज में, छोटे से आकर में, भगवान् का भाव करेगे तो वह काल और द्रव्य की कल्पना उसके अन्दर, उसके एक कद में होती रहती है और मिट्टी रहती है. वह है क्या? उसका तत्व क्या है? जैसे आभूषण हम बहुत देखते है-छोटा बच्चा चमकता हुआ आभूषण देखता है, पहनता भी है लेकिन वह सोने को नहीं पहचानता है. उसी प्रकार भगवान् को जो लोग बहुत छोटे रूप मे देखते है, वे आभूषण तो पहनते है, परन्तु आभूषण स्वर्ण है, यह ज्ञान उनको नहीं होता.  जब सोने से प्रेम होगा तब पता लगायेगे की यह क्या है?
भगवत तत्व का ज्ञान तब होता है जब हमारे जीबन में भक्ति आती है. जब परमात्मा का ज्ञान होता  है तो जैसे आभूषण और स्वर्ण में फर्क नहीं है इसी तरह आत्मा और परमात्मा में कोई फर्क नहीं रह जाता.जब तक आप अपने अन्दर पूर्ण ज्ञान का और पूर्ण शक्ति का अनुभव नहीं करेगे तब तक आपके  सारे काम एवं संकल्प  तथा  सफलताये अधूरी रहेगी. लेकिन आप अपने में पूर्णता का अनुभव कर ले तो आप जो-जो करेगे वही पूर्ण होगा. आपके जीवन में उत्साह बना रहेगा , कभी टूटेगा नहीं. आपको हमेशा  सफलता मिलेगी, कही विफलता है ही नहीं. कही आप दुखी नहीं होगे. हमेशा सुखी रहेगे. कभी आप अपने को दीन-हीन महसूस नहीं करेगे.
यह जो ज्ञान है यह केवल समाधि लगाने के लिए नहीं है, हिमालय में जाने के लिए नहीं है या केवल मंदिर में बैठने के लिए नहीं है. यह केवल  यज्ञशाला में  रहने के लए नहीं है. भाव जहा रहे- रण में, वन में, आप पहाड़ पर रहे, एकाकी रहे. भीड़ में भले लोगो में रहे, बुरे लोगो में रहे, आप सबको आनंद बाटते रहे, सबको ज्ञान बाटते रहे, सबको जीवन दान करते रहेगे. यह तत्व ज्ञान भक्ति के द्वारा प्राप्त होता है.
अनन्य भक्ति का अर्थ होता है-ईश्वर के साथ भक्ति का सम्बन्ध रखे जो कभी बदलेगी नहीं. फिर आप परिवार में रहिये, ईश्वर कि भक्ति बनी है, समाज में जाईये, ईश्वर  की भक्ति बनी है. व्यापार में जाईये , राजनीती में जाईये-फसिये कही नहीं. दुनिया के सारे फसावो को, पक्षपातो को क्रूरताओ को मिटाने के लिए, हमारे ह्रदय में जब ईश्वर की भक्ति आती है तो वह ऐसा चमत्कार दिखाती है की मनुष्य के जीवन में कोई दुख  , कोई दीनता, कोई हीनता रहती ही नही है.

3/08/2011

अहंकार का दान


एक महात्मा किसी धार्मिक राजा के महल में पहुचे. उन्हें देखकर रजा बहुत प्रसन्न हुए और
 बोले- आज मेरी इच्छा है की मै आपको मुहमागा उपहार दू. महात्मा ने कहा आप स्वयं ही अपनी सर्वाधिक प्रिय वास्तु मुझे दान कर दे. मै क्या मागू ? 

रजा ने कहा- मै आपको राजकोष अर्पित करता हूँ. 

महात्मा ने कहा-वह तो प्रजाजनों का है, आप तो मात्र सरक्षक है.

 राजा ने दूसरी बार कहा-महल सवार आदि तो मेरे है, आप इन्हें ले लो. 

महात्मा हस पड़े और बोले-राजन आप क्यों भूलते है, यह सब प्रजाजनों का ही है, आपको कार्य की सुविधा के लिए दिए गए है. 

अब राजा ने कहा- मै यह शरीर दान कर दूगा, यह तो मेरा है. 

महात्मा ने कहा- यह भी आपका नहीं है, एक दिन आपको इसे भी छोड़ना होगा. यह पंचतत्व में विलीन हो जायगा, इसलिए इसे आप कैसे दे पायेगे?

अब राजा चिंता में पड़ गया. तब महात्मा  ने कहा- राजन मेरी एक बात माने आप अपने अहंकार का दान कर दे. अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है. 

अहकार दान में देकर राजा दुसरे दिन से अनासक्त योगी की भाति रहेने लगा, उसके जीवन में नए आनंद की वर्षा होने लगी. 

भगवान् की लीला का रहस्य

मत्स्य भगवान् ने कहा-राजन जिसके ह्रदय में दुखी प्राणियों के प्रति  दया नहीं है, उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता. वह कभी मुझे पहचान नहीं सकता. या यो कहिये की उसके सामने मै  कभी प्रकट नहीं हो सकता
मेरे अवतार का कोई कारण नहीं हुआ करता. मै  भक्तो की भलाई के लिए अपनी इच्छा से समय-समय पर स्वयं ही अवतीर्ण हुआ करता  हूँ. यह सम्पूर्ण संसार मेरी लीला है. यह सब मै  ही हूँ. इसी से चाहे किसी भी शरीर में प्रकट हो सकता हूँ. किसी भी समय किसी भी स्थान पर और किसी भी वास्तु के रूप में मुझे पहचाना जा सकता है और वास्तव में मै वही रहता हूँ. परन्तु जब लोग मुझे नहीं पहचान पाते तब मै अपने आप को स्वयं प्रकट करता  हूँ और किसी भी रूप में प्रकट करता  हूँ. मेरे लिए मनुष्य और मछली के शरीर  में भेद नहीं है. मै ही सब हूँ. जिसने सब रूपों में मुझे पहचान लिया  उसने मेरी लीला का रहस्य समझ लिया  कही से मुझे हटाया नहीं जा सकता. चाहे जिस रूप में मेरे अस्तित्व का विशवास किया जा सकता है.
बात असल में यह है की भगवान् की लीला का रहस्य कठिन  से कठिन और सरल  से सरल है.
कठिन इसलिए की सम्पूर्ण वेद, शास्त्र, पुराण  उनका वर्णन करते-करते हार गए, उन्हें ढूढते -ढूढते थक  गए, अंत में नेति-नेति कहकर चुप हो गए. भगवान् का रहस्य उतना ही दुर्बोध बना रहा. स्वयं भगवान् ने अपनी लीला का सहस्त्र-सहस्त्र मुख से वर्णन करने के लिए शेषनाग का रूप धारण किया. न जाने वे कब से वर्णन कर रहे है और न जाने कब तक करते रहेगे, परन्तु वे भी लीला के रहस्य का पार नहीं पा सके और न तो पाने की संभावना ही है. कारण भगवान् अनंत है उनकी लीला अनंत है, उनका रहस्य अनंत है. जब अंत है ही नहीं तब वे स्वयं अंत कैसे पा सकते है?
सरल इसलिए की वे इतने कृपालु है की उन्हें कभी ग्वाल बालो के साथ नाचना पड़ता है ग्वालिनो के घर माखन चोरी की लीला करनी पड़ती है और रस्सी से बंधकर  रोना पड़ता है. छोटे-छोटे राक्षसों को मारने के लिए उस अजन्मा भगवान् को जन्म लेना पड़ता है, जीने की संकल्प मात्र से सारी स्रष्टि का संहार हो सकता है. यह दया की बात इतनी सरस एवं अरल है की कोई भी सह्रदय व्यक्ति भगवान् की दया का स्मरण करके रोये बिना नहीं रह सकता.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

3/07/2011

भागवत धर्म सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है


कोई भागवत धर्म का अर्थ यह न समझे की वह केवल मंदिर में बैठे रहने के लिए है या गुफा में बैठेने या जंगल में बैठने के लिए है. भले ही संन्यास धर्म, परमहंस धर्म जंगल में रहना आवश्यक हो, गुफा में जाना जरूरी हो , परन्तु भागवत धर्म में यह सब कुछ जरूरी नहीं है.
आप ध्रुव के जीवन में देखेगे की पहले मिले भगवान् और बाद में मिला राज्य. भगवान् की भक्ति और राज्य में कोई विरोध नहीं है. उसके बाद हुआ विवाह, तो भगवान् की भक्ति और विवाह में भी कोई विरोध नहीं है, अच्छा उसके बाद हुआ युद्ध तो आवश्यकता पड़ने पर भागवत धर्म में युद्ध के लिए भी विरोध नहीं है. भगवद इच्छा के अनुसार यदि युद्ध में कूदना पड़े तो हिंसा अहिंसा दोनों के निर्वाहक, संचालक एवं प्रेरक भगवान् ही है. ध्रुव के मन में कोई ग्लानी नहीं है वह जानते है की हमारे ह्रदय में बैठे हुए जो प्रभु है, उन्ही की यह सब लीला है.
भागवत धर्म केवल निवृत्ति परायण लोगो का धर्म नहीं है. निवृत्ति परायण शुकदेव भी भगवत धर्मी है और प्रवत्ति  परायण ध्रुव भी भगवत धर्मी है.
अब एक बात पर आपका ध्यान खीचता हूँ. ध्रुव ने भगवान् के पार्षदों से पूछा की हमको वैकुण्ठ में ले चलने के लिए तुम लोग विमान लेकर आये हो, पर हमारी माँ का क्या हुआ?
पार्षदों ने कहा-महाराज!आप बिलकुल फ़िक्र न करे. भगवान् ने आपकी माता की चिंता पहले ही की ,  जिस माता के ध्रुव सरीखा पुत्र हुआ उस माता को पहले वैकुण्ठ मिलना चाहिए. माँ के पुत्र के भक्त होने से माता का भी कल्याण हो जाता है. यह भगवत धर्म विशेषता है.
कभी भगवान् बड़ा विलक्षण विनोद करते है. मनुष्य चाहता कुछ है और होता कुछ है. इसमें भी भगवान् कि बड़ी भारी कृपा रहती है. बहुत पुरानी बात है, एक महात्मा ने हम को एक बार समझाया था कि मान लो तुम्हारी सब इच्छाए पूरी होने लग जाय जो  तुम चाहते हो वही होने  लग जाय तो क्या ईश्वर कि सत्ता महत्ता  पता लग सकता है? कोई मानेगा ही नहीं ईश्वर को! जब कोई ऐसा कहता  है जो कभी  कभी हमारी इच्छा के  विपरीत भी कर देता है, तब पता चलता है कि हा और कोई है. इसी से माँ को यह हक़ होता है कि अपने बच्चे को वासना के अनुसार चलने से रोके. पति पत्नी को भी परस्पर अधिआर होता है, क्योकि अपने ही मन, अपने मन कि हमेशा होवे तो मनुष्य इतना अहंकारी हो जायेगा कि वह ईश्वर को नही मानेगा. दूसरी बात यह भी है कि मनुष्य तो एक है नहीं अनेक है  और सबकी इच्छाए आपस में टकराएगी  फलस्वरूप स्रष्टि में दुःख और संघर्ष क़ी वृद्धि होगी तो इन इच्छाओ का एक नियंता है वह है ईश्वर.
भागवत धर्म  सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है जो भी भगवान् कि स्रष्टि में पैदा हुआ उन सबके कल्याण के लिए भागवत धर्म है. जैसे पिता कि संपत्ति अपने सब पुत्रो के लिए होती है वैसे भगवान् कि संपत्ति धर्म है और उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्रजा के लिए दिया है.

3/06/2011

दुःख भी कृपा

मूल बात यह है की जब हमारे मन के अनुसार होता है तब तो हम भगवान् की कृपा मानते  है और जब हमारे मन के विपरीत होता है, तब भगवान् की कृपा नही मानते है. इसका अर्थ यह हुआ की हम  कृपा को पहचानते नहीं है और उसको महत्त्व नहीं देते है, बल्कि अपनी वासना और अपनी इच्छा  को ही महत्त्व देते है.

भगवान् का जो विधान है  वह सर्वथा मंगलमय है. उसमे कमी तभी मालूम पड़ती है जब हम भगवान् की इच्छा को न देखकर अपनी वासना के अनुसार चाहते है की हमको जो पसंद है और जरूरी मालूम पड़ता है, वही काम भगवान् करे.

भगवान् की कृपा को यदि आप विशेष रूप से देखेगे की भगवान् इतना धन दे तो बड़े कृपालु, ऐसा तन दे तो बड़े कृपालु, ऐसा ऐश्वर्य दे तो बड़े कृपालु और ऐसा परिवार दे तो बड़े कृपालु, तो आप कृपा को नहीं पहचान सकेगे.

जब भगवान् हमारे मन का न करते है तब, उसमे हमारी ऐसी तैयारी होनी चाहिए हम अपने अहम् से, अपने अभिमान से, अपनी ममता से व अपनी इच्छा से भी ज्यादा, भगवान् की इच्छा का आदर करे और कहे की यह तो भगवान् ने बहुत बढ़िया किया जो आज अपने मन का तो किया.

भगवान् की ओर  से जो आता है उसमे भगवान् का हाथ देखिये. भगवान् तो सर्वग्य है, सर्वशक्ति है, परम दयालु है. वे जो क्रिया हमारे सामने भेजते है, जो वस्तु भेजते है, जो भोग भेजते है, जो परिवार भेजते है, उन सबमे उनकी कृपा ही भरपूर रही है. भगवान् की कृपा का आदर हर रूप में करने से भगवान् की कृपा का अनुभव होने लगेगा. उसमे अपनी इच्छा की प्रधानता न रखकर, भगवान् की इच्छा की प्रधानता रखनी  चाहिए. भक्ति सिद्धांत भी यही है और वेदांत का भी सिद्धांत यही है हम अपनी इच्छा जितना-जितना शिथिल करते  जायेगे, उतना-उतना अपने स्वरूप की अनुभूति के पास पहुचते जायेगे.

असलियत में प्रभु की कृपा को पहचानना ही कठिन है. जिनके मन में संसार से राग होता है, वे उनकी कृपा को नहीं पहचानते है और जिनके मन में संसार से वैराग्य होता है, वे प्रत्येक परिस्थिति में भगवान् का हाथ देखते है, भगवान् की कृपा देखते है.

प्रभु मूरत कृपामयी  है, इनके कृपामय  हाथो से कभी किसी का अमंगल होता ही नई है तो यह जो हम लोगो को दुःख  सरीखा मालूम  पड़ता है उसमे भी भगवान् की कृपा है और मंगल ही मंगल है.

2/26/2011

मार्कंडेय पुराण ब्रह्माजी ने पहले मार्कंडेय मुनि को सुनाया. यह पुराण पुण्यमय, पवित्र, आयुवर्द्धक तथा सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करनेवाला है. जो इसका पाठ और श्रवण करते है वे सब पापो से मुक्त हो जाते है.

जो मनुष्य इन पुरानो के प्रसंगों का श्रवण तथा जनसमुदाय में पाठ करता है, वह सब पापो से मुक्त होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है. पितामह ब्रह्माजी ने जो अठारह पुराण कहे है उनमे इस मार्कंडेय पुराण को सातवा पुराण समझना चाहिए.

उक्त उदगार मोहास में चल रहे अति लघु रूद्र  यग्य में वृन्दावन धाम से पधारे अष्टादश पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रजपाल शुक्ल जी महाराज ने  कही. शुक्रवार को मत्स्य पुराण की विषद व्याख्या करते हुए आचार्य जी ने जीवन की उत्पत्ति के बारे में बताया. शनिवार को वामन पुराण में वामन अवतार पर कथा हुई. नित्य नए पुराण पर आचार्य जी द्वारा कथा कही जा रही है.

मोहास में चल रहे इस धार्मिक आयोजन में बनारस, वृन्दावन से पधारे पंडितो के द्वारा अठारह पुराणों का पाठ चल रहा है. अपने सारगर्भित प्रवचनों में आचार्य व्रज्पाल्जी महाराज ने बताया की जो मनुष्य प्रतिदिन अठारह पुराणों का नाम लेता तथा प्रतिदिन तीनो समय उनका जप करता है उसे अश्वमेध यग्य का फल मिलता है.

मार्कंडेय पुराण चार प्रश्नों से युक्त है. इसके श्रवण से सौ करोड़ कल्प के किये हुए पाप नष्ट हो जाते है. ब्रह्म ह्त्या आदि पाप तथा अन्य अशुभ इसके श्रवण से उसी प्रकार नष्ट होते है जैसे हवा का झोका लगने से रुई ऊड जाती  है. इसके श्रवण से पुष्करतीर्थ में स्नान करने का पुन्य प्राप्त होता है.

बंध्या अथवा म्रत्वत्सा स्त्री यदि यथावत इस पुराण का श्रवण करे तो वह समस्त शुभ  लक्षणों से संपन्न पुत्र प्राप्त करती है. इसका श्रवण करने से मोक्ष, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, धान्य, पुत्र तथा अक्षय वंश प्राप्त करता है.

देश देशांतर से पधारे ब्राहमणों द्वारा हनुमात्धाम मोहस में चल रहे इस धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओ की भारी  भीड़ उमड़ रही है. आठ ही वेदांती जी महाराज द्वारा श्रीमद भागवत कथा का भी श्रोता आनंद उठा रहे है.

सरमन पटेल पंडा द्वारा आयोजित सिद्ध पीठ बजरंग धाम मोहास में चार मार्च तक इसी तरह भक्ति की धारा बहेगी. भण्डारा पाच मार्च को होगा. इस क्षेत्र  में यह पहली बार   है जब  इस तरह का बड़ा धार्मिक आयोज किया गया है.

2/20/2011

जीवन की सबसे बड़ी भूल और सबसे बड़ा दुःख

मनुष्य जो है वह साधारण रूप सइ देह में बंधा हुआ है. यह अपने को देह ही समझता है और देह के जो संबंधी है उनको समझता है मेरा. इसका फल क्या निकला ? एक व्यवहार की बात देखो. जब हम साढ़े तीन हाथ के शरीर को मै समझते है तो इस शरीर के सुख से सुखी और इस शरीर के दुःख से दुखी होते है और इस शरीर के लिए जो सुखकारक पदार्थ है, उनसे राग करते हो  और इस शरीर के लए जो दुख्कारक  पदार्थ है, उनसे द्वेष करते है, हमने अपने को एक सीमा में  बाध दिया. अब बोले भाई,  इतना मै हूँ और मेरे सिवाय और सब दूसरा द्वेष करते है हमने अपने को एक सीमा में बाढ़ दिया. अब बोले भाई, इतना मै हूँ और मेरे सिवाय और सब दूसरा है, जब हमने अपने को शरीर समझा, तब दुसरे भी हमको शरीर समझते है और संसार के सुख-दुःख इसी बात पर आते है.

एक बार मै रेलगाड़ी से यात्रा कर रहा था. बरसी से हरिद्वार जा रहा था. रात्रि  का समय था. एक पेशावरी उस डिब्बे में  सो रहा था. मैंने सोचा की यह पाँव फैलाकर सो रहा है तो मै इसके पाँव के पास बैठ जाऊ तो कोई कोई हर्ज नहीं है और  मै बैठ आया. अब बैठ गया तो वह बड़ा नाराज हुआ. नाराज होकर गाली भी देने लगा और पाँव  से मारने भी लगा. मै चुपचाप बैठा रहा. दुःख तो होता था. पर मै जब बहुत देर तक नहीं बोला तो वह कहने लगा की यह तो कोई गांधी का चेला मालूम पड़ता है. मै स्टेशन आने पर उतर गया. मन में दुःख तो बड़ा था.

एक महात्मा से मिलने गया और उनसे मैंने कहा की महाराज आप लोग तो समझाते हो की देह नहीं हो और इधर देह का कोई तिरस्कार करता है कोई गाली देता है तो बड़ा दुःख होता है. यह क्या बात है? उन्होंने कहा की भैया जिस समय तिरस्कार होता है, उस समय तुम ऐसी जगह पर बैठे रहते हो, जहा बैठने पर तिरस्कार होना ही चाहिए. जब-जब तुन्मे अपमान का अनुभा होता है, तब-तब तुम्हारी बैठक ऐसी जगह पर रहती है, जहा तुम अपमान के पात्र रहे हो.

अखान्दानद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार