9/25/2011

कलियुग चार स्थानों में निवास करता है

सरस्वती नदी के तट पर रजा परीक्षित ने कलि को देखा जो डंडे से गौ और वृषभ को मार रहा था. वृषभ मारे भय के थोडा-थोडा मूतता हुआ काप रहा था. वह शूद्र रुपी कलि गौ को लातो से मार रहा था. जिससे वह रो रही थी. वह भूखी थी, खाने को भूसा चाहती भी थी. 


रथ पर बैठ राजा परीक्षित ने वह बीभत्स द्रश्य देखा, तो वे कड़क कर बोले-अरे दुष्ट! तू कौन है. इस प्रकार वृषभ और गौ को क्यों सता रहा है? साथ ही गौ और वृषभ से भी कहा - हे माता मेरे रहते तुम क्यों रोती हो? हे वृषभ तुम भी मत डरो. मै इस दुष्ट को दंड दूगा. तुम यह बताओ की तुम्हारे तीन पैर किसने काटे ? तुम्हे विरूप करने वालो ने मेरे पूर्वज पांडवो की धवल कीर्ति को कलंकित  किया है. मेरे रहते निरपराध प्राणी को सताने वाला साक्षात् ईंद्र ही क्यों न हो, मै उसकी भी भुजा जड़ से उखाड़ डालूगा.


वृषभ रूपी धर्म यह सुनकर बोला -  हे पुरुषश्रेष्ठ आप उन पांडवो के बंशधर है, जिनके विविध गुणों से रीझ कर भगवान् ने दूत सारथी आदि तक का काम किया था. आपका इस प्रकार भयभीतो को अभय देना उचित ही है किन्तु जिसने मुझे क्लेश दिया है , उसे आप ही स्वयं समझे. मै इस विषय में कुछ भी नहीं कह सकता क्योकि क्लेशदाता कौन है ?


अद्वैतवादी विद्वान् कहते है आत्मा के अज्ञान से विलसित यह सुख-दुःख रूप द्वैत मिथ्या है. अतः सुख-दुःख का कारण कोई नहीं है. तार्किक सुख दुःख का कारण आत्मा को मानते है. ज्योतिषी गृहादी देवताओं को मीमांसक कर्म को नास्तिक स्वभाव को साख्य्वादी  स्वभाव शब्द से गुण परिणाम को सुख दुःख कारण मानते है. अतः आप ही अपनी बुद्धि से क्लेशदाता का निर्णय कर लीजिये. 


राजा परीक्षित ने विचार किया की सुख-दुःख मिथ्या तो नहीं हो सकते क्योकि उनकी अनुभूति आत्मा में होती है. जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता क्योकि वह परतंत्र है. गृह भी कारण नहीं हो सकते क्योकि वे कालचक्र के अधीन है. कर्म भी कारण नहीं हो सकते है क्योकि वे जड़ कालचक्र के अधीन है. कर्म भी कारण नहीं हो सकते है क्योकि वे जड़ है. स्वभाव भी कारण नहीं हो सकता क्योकि वह व्यभिचार दूषित  है. अतः सुख दुःख के कारण ये कोई भी नहीं हो सकते है. 


तदनंतर राजा परीक्षित ने कहा - हे धर्म ! तुम ठीक कहते हो. तुम वृषभ रूपी  साक्षात् धर्म ही हो, इसलिए घातक को जानते हुए भी उसे बताना नहीं चाहते हो क्योकि अधर्म करनेवाले को जिस नरक आदि की प्राप्ति होती है वही प्राप्ति सूचना देने वाले  भी होते है.


यह विचार कर राजा ने अपनी बुद्धि से दुःख का कारण मन को जान लिया और प्रथ्वी रूप गौ तथा वृषभ रूप  धर्म  को आश्वासन देते हुए कलि को मारने के लिए तीक्ष्ण तलवार खीच ली.


राजा परीक्षित को मानरे के लिए आया देखकर कलि ने अपने सर से मुकुट उतारकर फेक दिया और भयभीत होकर उनके चरणों में जा गिरा उसे चरणों में पड़ा देखकर परीक्षित हँसते हुए बोले - 


मै पांडव वंशी  हूँ. मेरे समक्ष हाथ जोड़ने वाले शरणागत को फिर भय नहीं रहता कितु मेरे राज्य से निकल जा. तू यहाँ रह नहीं सकता क्योकि तेरे रहते राजाओं के शरीर में अधर्म के परिवार लोभ, अनृत,  कलह, दम्भादी प्रवेश करेगे. यह सुनकर हाथ जोड़ नतमस्तक हो कलि बोला - हे महाराज मै जहा कही भी क्यों न रहू वही मुझे आप धनुष बाड़ लिए खड़े दिखाई पड़ते है. मै कहा रहू ? यह आप ही बताये. 


कलि की ऐसी प्रार्थना करने पर राजा परीक्षित ने उसको रहने के लिए चार स्थान बताये -


द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्र अधर्मशचतुर्विधः 

१ द्युत स्थान, २ मदिरालय, ३ वेश्यालय और ४ वधस्थान (कसाई खाना) जिनमे वह अनृत, मद, काम, रजो मूल हिंसा और वैर के साथ रहता है. 


पुनः उसके प्रार्थना करने पर उसे रहने के लिए एक स्थान सुवर्ण और दिया. जिसमे इन चारो का तथा बैर का भी निवास है. इसलिए अभ्युदय  चाहने वाले पुरुषो को इन पांचो का सेवन नहीं करना चाहिए. बाद में राजा परीक्षित ने धर्म के शेष तीन पद तप, शौच और दया को जोड़कर उसके चारो पैर पूरे कर दिए. प्रथ्वी को भी आश्वासन देकर संतुष्ट किया. 

9/24/2011

राम चरित मानस में कलियुग के लक्षण





दो - कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सदग्रंथ
     दम्भिंह निज मति कल्पि करी प्रगट किये बहु पंथ


चो - भये लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म
     सुनु हरिजान ज्ञान निधि कहु कछुक कलिधर्म




बरन धर्म नहीं आश्रम चारी. श्रुति बिरोध रत सब नर नारी
द्विज श्रुति बेचक भूप  प्रजासन. कोऊ नहिमान निगम अनुसासन
मारग सोई जा कहू जोई भावा . पंडित सोई जो गाल बजावा
मिथ्यारंभ दंभ  रत जोई. ता  कहू संत कहई  सब कोई
सोई समान  जो परधन हारी. जो कर दंभ सो बड  आचारी.
जो कह झूठ मसखरी जाना. कलिजुग सोई गुनवंत बखाना
निराचार  जो श्रुति पथ त्यागी. कलिजुग सोई ज्ञानी सो बिरागी
जाके नख अरु जटा  बिसाला. सोई तापस प्रसिद्द कलिकाला.




दो - असुध बेश भूषन धरे भच्छाभच्छ जे खाही
     तेई जोगी तेई सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहि




सो - जे अपकारी  चार तिन्ह कर गौरव मान्य  तेई
       मन क्रम बचन लबार तेई बकता कलिकाल महू


चो- नारी बिबस नर सकल गोसाई. नाचहि नर मरकट  की नाई .
     सूद्र द्विजन्ह उपदेसहि गयाना.  मेली  जनेऊ लेही कुदाना.
    सब नर काम लोभ रत क्रोधी. देव विप्र  श्रुति संत बिरोधी.
    गुण मंदिर सुन्दर पति त्यागी. भजहि नारी पर पुरुष अभागी.
    सौभागिनी बिभूषण हीना. बिधवन्ह  के सिंगार नबीना.
    गुर सिष बधिर अंध का लेखा. एक न सुनी एक नहीं देखा.
    हरई शिष्य धन सोक न हरई. सो गुर घोर नरक महू परई.
    मातु पिता बालकन्हि  बोलावाही. उदार भरे  सोई धर्म सिखावाही.


दो - ब्रह्म ज्ञान बिनु नारी नर कहहि न दूसरी बात
      कौड़ी लागी लोभ बस कराही बिप्र गुर घात




    बादही सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटी.
    जानई ब्रह्म सो बिप्रबर आखी देखावाही डाटी


चो - पर त्रिय लम्पट कपट सयाने. मोह द्रोह ममता लपटाने.
तेई अभेदबादी ज्ञानी नर. देखा मै चरित्र कलिजुग कर.
आपु गए अरु तिन्हहू घालहि. जे कहू सत मारग प्रतिपालाही.
कल्प कल्प भरी एक एक नरका. परही जे दूषहि  श्रुति करी तरका.
जे बरनाध तेली कुम्हारा. स्वपच किरात कोल कलवारा.
नारी मुई गृह सम्पति नासी. मूड  मुडाई होही सन्यासी.
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावही. उभय लोक निज हाथ नासवाही.
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी. निराचार सठ   ब्रश्ली स्वामी.
सूद्र करहि जप तप ब्रत नाना. बैठी बरासन कहहि पुराना.
सब नर कल्पित करही अचारा. जाई न बरनी अनीति अपारा.




दो -  भये बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग.
       करही पाप पावही दुःख भय रुज सोक बियोग.


       श्रुति सम्मत हरी भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक.
      तेहि न चलहि नर मोह बस कल्पहि पंथ अनेक 


छ - बहु दाम सवारही धाम जती. विषया हरी लीन्हिन  रही बिरती .
     तपसी धन्वंत दरिद्र गृही. कलि कौतुक तात न जात कही.




    कुलवंत निकरही नारी सती. गृह आनहि चेरी निबेरी  गती.
    सुत मानही मातु पिता तब लौ. अबलानन दीख नहीं जब लौ.




    ससुरारी पिआरी लगी जब ते. रिपुरूप कुटुंब भये तब ते.
    नृप पाप परायण धर्म नहीं. करी दंड बिडम्ब प्रजा नितही.


   धन्वंत कुलीन मलीन अपी. द्विज चिन्ह जनेऊ उघार  तपी.
   नहीं मान पुराण न बेदहि जो. हरि सेवक संत सही कलि सो.


   कबी वृन्द उदार दुनी न सूनी. गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी.
   कलि बारही बार दुकाल परे . बिनु अन्न दुखी सब लोग मरे.


दो - सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड.
      मान मोह मारादी  मद ब्यापी  रहे ब्रहमांड.


     तामस धर्म करही नर जप तप ब्रत मख दान.
     देव न बरषही  धरनी बये न जामही धान.


छ- अबला कच भूषन भूरी छुधा. धनहीन दुखी ममता बहुधा.
     सुख चाहहि मूढ़ न धर्म रता. मति थोरी कठोरी न कोमलता.
     नर पीड़ित रोग न भोग कही. अभिमान बिरोध अकारनही.
     लघु जीवन संबतु पञ्च दसा कल्पांत न नास गुमान असा.
    कलिकाल बिहाल किये मनुजा. नहीं मानत क्वो अनुजा तनूजा.
    नहीं तोष बिचार न सीतलता. सब जाती कुजाती भये मगता.
    ईरिषा परुषाच्छर लोलुपता. भरी पूरी रही समता बिगता.
    सब लोग बियोग बिसोक हए. बरनाश्रम धर्म अचार गए. 
    दम दान दया नहीं जानपनी. जड़ता प्रबंचन्ताती  घनी.
     तनु पोषक नारी नरा सगरे. परनिंदक जे जग मो बगरे.


दो - सुनु ब्यालारी काल कलि मल अवगुन आगार.
     गुनऊ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार.
    क्रत्जुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग.
   जो गति होई सो कलि हरी नाम ते पावही लोग. 


क्रत्जुग सब जोगी बिग्याने. करी हरी ध्यान तरही भाव प्राणी.
त्रेता बिबिध जगी नर करही. प्रभुहि समर्पी  कर्म भाव तरही.
द्वापर करी रघुपति पद पूजा. नर भाव तरही  उपाय न दूजा.
कलिजुग केवल हरी गुन गाहा. गावत नर पावही भव थाहा.
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना. एक आधार  राम गुन गाना.
सब भरोस तजि जो भज रामही. प्रेम समेत गाव गुण ग्रामहि
सोई भव तर कछु संसय नाही. नाम प्रताप प्रगट कलि माही.
कलि कर एक पुनीत  प्रतापा  . मानस पुन्य होही नहीं पापा. 


दो - कलिजुग सम जुग आन नहीं जौ नर कर बिस्वास.
      गाई राम गुन गन बिमल भव तर बिनही प्रयास.
     प्रगट चारी पद धर्म के कलि महू एक  प्रधान.
     जेन केन बिधि दीन्हे दान करई कल्याण. 






     

9/23/2011

शास्त्र में अधम ब्राहमण का यही बध कहा गया है


सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर शम्याप्रास नाम का व्यासजी का आश्रम था. वह बद्री वृक्षों के समूह से मंडित था. वही व्यासजी ने आचमन  कर मन को निग्रह किया, तब उन्हे माया और पुरुष का दर्शन हुआ. 

यह माया ही समस्त अनर्थो की मूल है. अनर्थो की निवृत्ति भक्ति से होती है  और भक्ति भगवत चरित्रों  के श्रवण  से होती है ऐसा विचारकर उन्होंने भगवत चरित्रों से परिपूर्ण भागवत संहिता की रचना की.

यस्यं वै श्रूयमाड़ायाम  क्रश्ने    परम्पूरुशे
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोक्मोह्भयापहा 

जिसके श्रवण मात्र से भगवान् में मनुष्यों की भक्ति होती है  और शोक, मोह, भय आदि सब निवृत्ति हो जाते है. व्यासजी के पुत्र श्रीशुकदेवजी निवृत्ति मार्ग से निरत थे, ग्रंथो के अध्ययन और अध्यापन से  उनका कोई सम्बन्ध न था. फिर भी भगवान् के गुणों से आकृष्ट होकर उन्होंने अपने पिताजी से इस विशाल ग्रन्थ का  अध्ययन किया और परीक्षित को भी इसे सुनाया.

यदा म्रधे कौरव स्रंज्यानाम वीरेश्व्ठो वीर्गातिम गतेषु
व्रकोदाराविद्ध  गदाभिमर्ष भाग्नोरूदंडे  धृतराष्ट्र्पुत्रे 

जब महाभारत संग्राम में कौरव और पांडवो की सेना के बड़े-बड़े वीर मारे गए एवं भीम के गदा प्रहार से दुर्योधन के उरूदंड भी टूट गए तब अश्वत्थामा ने दुर्योधन के संतोषार्थ द्रौपदी के सोये हुए पुत्रो का सर काट डाला. यह देखकर विलाप करती हुई द्रौपदी को अर्जुन ने समझाया की  तू शोक न कर, मै अश्वत्थामा का सर काटकर लाता हूँ. ऐसा कहकर अर्जुन ने अश्वत्थामा का पीछा किया. अश्वत्थामा पीछा कर रहे अर्जुन को देखकर बहुत घबडाया और रथ पर चढ़कर बड़ी तेजी से भागा, जैसे रूद्र के भय से सूर्य भागे थे

जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रहास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थि हो गया चारो और हाहाकार मच गया. तब भगवन के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को रस्सी से बांधकर अपने डेरे ले गए.

मार्ग में भगवान् ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते  हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र  जानकार ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बंधे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली

इसे छोड़ दो, यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही  पूज्य गुरु है, जिसकी कृपा से तुमने  सारी  धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र  रूप में यह साक्षात्  द्रोड़ाचार   ही विद्यमान है. इसे मत मारो छोड़ दो, मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ 

द्रौपदी के इन वचनों का युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बध करना ही श्रेयस्कर है.

यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले उधर द्रौपदी बचाने चली. तब भगवान् ने दोनों को रोका और अर्जुन से कहा - अधम ब्राहमण भी बधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी बध योग्य है, यह दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और भी ऐसा करो जिससे द्रोपदी को सांत्वना देते हुए तुमने  जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन  को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझको भी प्रिय हो. 

अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकार अश्वत्थामा के केश सहित मडी खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. 

शास्त्र में अधम ब्राहमण  का यही बध कहा गया है, प्राणदंड नहीं.  इस तरह सभी के वचनों की रक्षा हो गयी. 

मुंडन कर देना, धन छीन लेना  तथा स्थान से निकाल देना यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है. प्राणदंड नहीं.  बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांडवो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि पारलौकिक कर्म किये.

9/22/2011

जीवन धर्म क्या है...?

 एक शरीर और उसके संबंधियों में क्रमशः अहंता और ममता करके जीव ने स्वयं ही अपने आपको संसार के बंधन में जकड लिया है. अब धर्म का काम यह है की जीव की अहंता और ममता को शिथिल करके उसे संसार के बंधन से सर्वदा के लिए छुड़ा दे. 


ऐसे धर्म का स्वरुप यही है की मनुष्य केवल अपने सुख से फूल न उठे और अपने ही दुःख से मुरझा न जाय. उसे चाहिए की वह समस्त प्राणियों के सुख-दुःख  के साथ अपना नाता जोड़ दे. सबके सुख में सुखी हो और सबके दुःख में दुखी. इससे अहंकार का बंधन कटता है और ममता भी शिथिल पड़ती है. परन्तु ईतना ही धर्म नहीं है. धर्म की गति इससे आगे भी है.


मनुष्य में  कुछ विशेषता होनी चाहिए वह विशेषता क्या है? 
बस इतनी ही की किसी को दुखी देखकर उसका ह्रदय दया से द्रवित हो जाय औ वह इसके प्रति सहानुभूति के भाव से भर जाय.


 यद्यपि  सहानुभूति भी एक बहुत बड़ा बल है, इससे दुखियो को बड़ी शक्ति प्राप्त होती है, तथापि जो सज्जन कुछ प्रत्यक्ष सहायता कर सकते है वे तन,मन, धन से दोनों की रक्षा करे,


जो दुखी प्राणियों की उपेक्षा करके अथवा किसी भी प्राणी से द्वेष भाव रखकर केवल सूखे पूजा पाठ में लगे रहते है उन्हें कभी सन्ति नहीं मिल सकती और न तो उन्हें परमात्मा के प्रसन्नता ही प्र्त्फो सकती है. भागवत के चौथे स्कंध इ कहा गया है की चारो वेदों का ज्ञाता और समदर्शी महात्मा भी यति दीं दुखियो की उपेक्षा करता है तो उसका सारा वेदज्ञान नष्ट और निष्फल हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे फूटे घड़े से पानी बह जाता है .


प्रशंशनीय तो वह है जो की अपने कष्टों को मिटाने की क्षमता होने पर भी उन्हें सहन करे अर्थात स्वयं दुःख सहन करके दूसरो का दुःख मिटावे अपनी इच्छा  अपूर्ण रखकर दुसरे की ईक्षा पूर्ण करे. यह सत्य है की ईससे अपनी साम्पत्तिक, पारिवारिक और शारीरिक हानि होने की संभावना है. परन्तु उस लाभ के सामने जो ईससे स्वयं होता है यह हानि कुछ भी नहीं है. क्योकि हानि तो होती है देवल सांसारिक पदार्थो की और लाभ होता है परमार्थ का. ऐसा मनुष्य अपने धर्म पालन के द्वारा परम कल्याण का अधिकारी  होता है. 


यह तो हुई जीव के सामान्य धर्म की बात. एक परम धर्म भी है.


परमधर्म का तो ज्ञान भी बड़े सौभाग्य से होता है. वह श्रीमद्भागवत में सुनिश्चित रूपसे बतलाया गया है. ब्रह्माजी बार-बार शास्त्रों का आलोचन करके ईसी निश्चय पर पहुचे की समस्त शास्त्रों का तात्पर्य भगवान् के नामो का जप, कीर्तन और अर्थ  चिंतन द्वारा परमात्मा के निरंतर स्मरण में ही है. शास्त्रों में ईसे ही परमधर्म के नाम से कहा गया है.

9/13/2011

उलटा नाम जपत जगा जाना वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना.

 वाल्मीकि जी महाराज  के जीवन  के सम्बन्ध में आध्यात्म रामायण, पद्मं पुराण, विष्णु  पुराण  , आदि में तरह-तरह की कथाये आती   है. अद्भुत बात यह है की उनका पूर्ण जीवन उत्तम कोटी   का नहीं बताया गया है. आध्यात्म रामायण   में बताया गया है - 
अहम् पूरा किरातेशु किरातैह सह वर्धितः
जन्म्मात्र द्विज्त्वं में शूद्रचार्रतः सदा. 
इसमें बाल्मीकी जी स्वयं कहते है की पहले मै जंगल में रहता था. जंगली लोगो के साथ ही मुझे पढने सीखने का अवसर मिला. वहा  मैंने बुरे-बुरे चरित्र किये. मै शूद्राचार परायण हो गया.


ब्रह्मसूत्र के शारीरिक भाष्य में शूद्र शब्द की व्याख्या ऐसे की गयी है - शुचा अभिदुद्रूवे ईति शूद्रः - जो बात-बात में स्वयं दुखी हो जाय और दूसरो को सुखी करे, रुलाये, उसका नाम शूद्र है.


बाल्मीकी जी कहते है की मै पहले ईसी तरह  के काम किया करता था. एक दिन मेरे सामने से सप्तर्षि निकले. मन में आया की उनके पास जो कमंडल  है, दंड है, वस्त्र है, उन सबको छीन लू और उनसे प्राप्त द्रव्य को अपने कुटुंब के पालन पोषण में लगाऊ


एक पुराण में तो  यह लिखा है  की वाल्मीकि जी को सप्तर्षि मिले और दुसरे पुराण में लिखा ही की केवल नारदजी मिले. 


जो भी हो, जब वाल्मीकिजी कमानल आदि को छीनने के लिए सप्तर्षियो अथवा नारदजी के पास पहुचे तब उन्होंने उनसे पूछा की तुम जो यह काम करने जा रहे हो, इसके फलभागी  तुम्हारे घरवाले होगे या नहीं?


 जानते हो की पाप का फल क्या होता है? केवल दुःख होता है. यदि तुम हमारा सामान  छीनकर हमें दुःख दोगे तो तुमको भी दुःख होगा. इसलिए पहले यह देख लो की तुम जो पाप कर रहे हो और जिसके फलस्वरूप तुम्हे दुःख मिलने वाला है, उसमे तुम्हारे घरवाले हिस्सेदार होगे या नहीं?


वाल्मीकि ने कहा की मुझे तो यह सब मालूम नहीं है. मै घरवालो से पूछकर जबाब दे सकता हूँ.. लेकिन मै यह बात पूछने घर जाऊ और तुम ईतने में भाग जाओ तो क्या होगा?


इस पर सातो  ने कहा की तुमको जिसने संतोष हो वह कर लो लेकिन घर जाकर पूछ जरूर आओ.


वाल्मीकिजी ने उनको पेड़   से बाढ़ दिया. वे खुशी से बांध  गए और बधे-बधे भगवान् का स्मरण करने लगे.
वाल्मीकिजी ने अपने घर जाकर अपनी पत्नी, पिता-माता और बंधू=बांधव सबसे पूछा की मै चोरी डकैती, बेईमानी, छल-कपट तथा दूसरो को दुःख पहुचाकर  धन संपत्ति ले आता हूँ उससे तुम लोगो का पालन पोषण होता हैलेकिन मुझे इस पाप कर्म का जो फल मिलेगा उसमे तुम लोग हिस्सेदार बनोगे या नहीं?


घरवालो ने एक स्वर में उत्तर दिया की-नहीं. तुम घर के मालिक  हो. तुम्हारा कर्तव्य  है की हमारा पालन पोषण करो. तूम कर्तव्य के अनुसार ही हमारे पालन-पोषण के लिए धन कमाकर ले आते हो. लेकिन हम यह नहीं जानते की तुम कहा से कैसे लाते हो. इसलिए यदि तुम्हारे कर्तव्य पालन का फल दुःख है तो हम उसको भोगने में हिस्सेदारी नहीं होगे.


यह सुनकर बाल्मीकी जी ने बड़े ग्लानी हुई. वे तुरंत सप्तर्षियो के पास पहुचे और उनको बंधन से मुक्त करके बोले की घरवाले तो दुःख में हिस्सेदार नहीं होगे.


इसके बाद सप्तर्षियो ने बाल्मीकी को समझाया की देखो दूसरो को तकलीफ पहुचकर धन बटोरना पाप है. फिर जब उस पाप में तुम्हारे परिवार के लोग ही सम्मिलित नहीं है तब तुम केवल अपने लिए दुःख की स्रष्टि क्यों कर रहे है?


अब वाल्मीकि सप्तर्षियो के सरनागत हो गए. उन्होंने उनको राम-राम जपने का उपदेश दिया लेकिन वाल्मिकी जी की स्थित ऐसी थी की उनके मुह से राम-राम निकले ही नहीं.


इस पर ऋषियों ने कहा अच्छा तुम सीधे  राम-राम नहीं जप सकते तो मरा- मरा जपो क्योकि मारा मारा जपने से भी राम राम क उच्चारण हो जाएगा. इसी आधार पर तुलसीदासजी ने कहा है-


उलटा नाम जपत जगा जाना 
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना. 


वाल्मीकिजी मारा-मारा जपने लगे और ऐसी तपस्या में सलग्न हुए की ब्रह्म के सामान हो गए. इसलिए वाल्मीकि रामायण के प्रारंभ में ही उनके लिए तपस्वी शब्द का प्रयोग किया गया है.





9/11/2011

अशांति की अवस्था में काम पैदा होता है

वास्तव में रूपये अच्छे नहीं है पर लोभ के कारण रूपये अच्छे लगते है. ऐसे ही मोह के कारण संसार, कुटुम्बी अच्छे लगते है. प्रेम के कारण भगवान् अच्छे, मीठे लगते है. गोपियों को मीराबाई को भगवान् मीठे  लगते थे. प्रेम के कारण ही मित्र से मिलने में आनंद आता है. गाय के प्रेम के कारण बछड़े को गाय के दूध से जो पुष्टि होती है वह केवल दूध से नहीं .

नाशवान मोह होता है, अविनाशी में प्रेम होता है. मूल में चीज एक है. मोह से पतन होता है.

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संसार का सुख हम छोड़ते नहीं और उसे छोड़े बिना पारमार्थिक सुख मिलता नहीं.

दुःख, अशांति की अवस्था में काम पैदा होता है. ममता रखने से वस्तुओ का सदुपयोग नहीं होता. अपना न मानने से ही वस्तुओ का सदुपयोग होता है. वस्तुओ को अपना न मानने  से और सबको अपना न  मानने से उदारता नहीं आती. वस्तु को चाहे संसार की मानो, चाहे प्रकृति मानो, चाहे भगवन की मानो. उसे अपनी मानना बेईमानी है. केवन तू और तेरा है मै और मेरा है ही नहीं.

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विचार से विवेक होता है और चिंतन से स्थिति होती है. चिंतन अभ्यास है. अभ्यास से विवेक तेज है. चिंतन मन से होता है. मन अपर प्रकृति है. शरीर को संसार से अलग मानना अविवेक है.

सत्संत सुनकर विचार नहीं करते. विचार करना वैराग्य में हेतु होता है और विचर उदय होना तत्व प्राप्ति में हेतु होता है.

अपने लिए कोई अपना नहीं है, पर सेवा के लिए सभी अपने है. चाहे किसी को अपना  मत मानो, चाहे संसार को अपना मानो दोनों का परिणाम एक होगा. अधूरी चीज ही बाधक होती है. अधूरा विधी रोगी को मार देता है. अतः या तो बिलकुल न माने या पूरा जाने. सुख लेने के लिए शरीर भी पाना नहीं है और सेवा करने के लिए पूरा संसार अपना है.

9/10/2011

धन से हानि


धन की सार्थकता उसे भगवान् की सेवा में लगाने में है. लक्ष्मी  भगवान् की सेविका है, उन्हें निरंतर भगवान् की सेवा में ही नियुक्त करते रहना चाहिए. इससे लक्ष्मी की प्रसन्नता पाप्त होती है और उनका विस्तार होता है. लक्ष्मीपति नारायण तो प्रसन्न होते ही है. संसार में जिसके पास जो कुछ भी है, सब भगवान् का है, हमने जो उस पर पाना अधिकार मान लिया है, यह तो हमारी बेईमानी है,

       हम सेवक है, हमारा काम है मालिक की संपत्ति की रक्षा करना और उनके आज्ञानुसार , उनकी माग के  अनुसार उनके सेवा में उसे समर्पित करते रहना. सारे जीव भगवान् के स्वरूप है - उनमे जहा जिस वस्तु  का अभाव है, वही भगवान् उस वस्तु को चाह रहे है. जिसके पास वह वस्तु है, उसे चाहिए की भगवान् की इस माग को ठुकराए नहीं और बड़े आदर के साथ उस  पर अपना कोई अधिकार न समझकर उसे यथायोग्य अभावग्रस्त प्राणियों को  अर्पण कर दे.

       अभावग्रस्त प्राणियों को दया का पात्र न समझे और न अपने को दाता समझकर मन में अभिमान  या उनपर अहसान करे. उन्हें भगवान् का स्वरूप समझे और भगवान् के नाते उस वस्तु पर उनका सहज अधिकार समझे यह समझे की मैंने भगवान् की वास्तु भगवान् को ही दी है.

       जो वस्तु का स्वामी है, उसी को वह वस्तु दी जाय इसमें हमारे लिए अभिमान की कोण सी बात है ? इस प्रकार निरभिमान होकर धन के द्वारा भगवान् की  सेवा करता रहे, इसी में धन की सार्थकता है और ऐसा करने से ही धन का उत्तम परिणाम होता है, नहीं तो धन केवल कष्टदायक होता है और नाना प्रकार के पाप उत्पन्न करके  नरको और दुखपूर्ण योनियों में पंहुचा देता है.

       प्रायः देखा जाता है के केवल  ईकट्ठा करने वाले क्रपड़ो को  धन से कभी सुख नहीं मिलता. यहाँ तो वे रात-दिन धन कमाने और उसकी रक्षा  करने की चिंता से जलते रहते है और मरने पर धन का सदुपयोग न करके उसे पापकर्म का कारणरूप बनाने के कारण घोर नरको में गिरते है.

      जैसे थोडा सा कोढ़ सर्वांगसुंदर शरीर के सौन्दर्य को बिगाड़ देता है वैसे ही धन का तनिक सा लोभ यशास्वियो के निर्मल यश में और गुडवानो के सद्गुदो  में कलंक लगा देता है. धन कमाने में, कमाकर उसे बढाने में, रक्षा करने में, खर्च करने में, भोगने में और नाश हो जाने दिन-रात परिश्रम, भय, चिंता और भ्रम डूबे रहना पड़ता है.

        चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दंभ, काम, क्रोध, गर्व, मद-अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अत्यंत जुआ और शराब - ये पंद्रह अनर्थ मनुष्यों में  धन से ही पैसा होते है. इसलिए अपना कल्याण चाहने वाले पुरुषो को ऐसे अनर्थ करनेवाले अर्थ को दूर से ही प्रणाम कर लेना चाहिए.

        स्नेह बंधन में बढ़कर सदा एक रहनेवाले सगे भाई बंधू, स्त्री-पुत्र, माता-पिता और सगे संबंधियों आदि में भी धन की कौड़ियो के कारण इतनी फूट पड़ जाती है की  वे एक दुसरे के वैरी बन जाते है. थोड़े से धन के लिए वे क्षुब्ध हो जाते है, उनके क्रोध की आग भड़क उठती है. वे आपस में लड़ने लगते है और पुराने प्रेम बंधन को तोड़कर सहसा एक दुसरे का गला काटने को तैयार हो जाते है.

        इसपर टीका-टिप्पड़ी व्यर्थ है. धनासक्ति, धन-कामना, धनप्राप्ति और धनसंग्रह का यह
परिणाम जगत में आज प्रत्यक्ष  हो रहा है. यह सत्य है-धन आवश्यक है, धन की सार्थकता भी है और धन कमाना भी चाहिए परन्तु  कमाना चाहिए उसे भगवान् की सेवा के लिए, भगवान् के नियमो  की रक्षा करते हुए, भगवान् के अनुकूल उपायों से ही और धन के प्राप्त होने पर उसका भगवान् के आज्ञानुसार सदुपयोग करना चाहिए. अपने धन पर जो गरीबो का अधिकार समझता है  और उनके हितार्थ उसका यथायोग्य उपयोग करता है, वही सच्चा धनी है.

        धन का वही उपयोग उत्तम है जो परिणाम में शांति, प्रसन्नता और सुख उत्पन्न करनेवाला हो, जो किसी को कुछ देकर पछताता है, वह या तो धन का दुरूपयोग करता है, अथवा धनासक्ति में फंसा हुआ प्राणी है जो  धन के नाम पर कमाता रहता है.

   

9/09/2011

मनुष्य संसार के संसाधनों में सुख खोज रहा है.



संसार का प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है. आज का मनुष्य संसार के संसाधनों में सुख खोज रहा है. सुख की प्रत्याशा में ही वह कर्म करता है, वह आशा करता है की उसे सुख अवश्य मिलेगा, पर ऐसा होता नहीं है, निराशा और सुख ही हाथ लगते है
सो परत्र दुःख पावै सिर धुनी धुनी पछिताई
एक संस्कृत सूक्ति में सुख और दुःख इस प्रकार परिभाषित किया गया है-
सर्वं परवशं दुखम सर्वमात्म्वषम सुखं 
अर्थात दुसरे के बंधन में अधीन रहना दुःख है, जबकि आत्माधीन या स्वतंत्र रहना सुख है. आज के मोहासक्त मानव ने सुख दुःख के अर्थ ही बदल लिए है. आज का मानव इच्छापूर्ती होने को सुख और पूर्ती न होने को दुःख मान बैठा है. हमारे धर्मग्रंथो में सुख के दो रूप बताये गए है-लौकिक सुख और अलौकिक सुख. लौकिक सुख आशय उस सुख से है जो संसार की किसी बस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति के संयोग से मिलता है


दुसरे शब्दों में आपको अपनी इक्षित वस्तुए, मकान, दूकान, सोना-चांदी मिले, आपको पति-पत्नी, संसार, भी-बहन आदि परिवारजन मिले, आपको अनुकूल परिस्थिति एवं सम्मान मिले-इन सबके मिलने से आपको जो आराम महसूस होता है, उसे लौकिक सुख कहते है. लौकिक सुख क्षणिक होते है. इन सुखो का अभाव तो संसारी प्राणी के लिए दुखकार होता ही है, इन सुखो की प्राप्ति भी दुखकार ही होती है. जैसे एक व्यक्ति के पास मकान नहीं है, वह दूसरो के मकानों को देखकर स्वयं मकान बनवाने के लिए कठिन परिश्रम करता है.


कर्माकर्म का विचार किये बिना वह धन कमाता है, मकान बनवा लेता है, किन्तु बाद में यह मकान उसे स्थाई सुख नहीं देता है. उसकी सुरक्षा की चिंता, पुत्रो के विवाद आदि विषय उसे दुःख देने लगते है. ईसी प्रकार पुत्र प्राप्ति का सुख भी दुखदायी हो जाता है. अर्थात लौकिक  सुख कष्टप्रद एवं दुख देनेवाले ही होते है. 


आजके मानव में लौकिक सुक्खो को जीवन का आधार मान लिया है. संत कवी तुलसी ने सांसारिक सुखो को दाद की खुजली के सामान बताया है -
ममता दादू कंडू इरषाई
हरष विषाद गरह बहुताई

लौकिक सुखजनित दुखनिव्रत्ति का एक ही उपाय है की इन सुखो में आसक्ति न रखे . इन सुखो को भगवत क्रपा  से प्राप्त हुआ माने तथा कर्तापन का अभिमान भुला दे. ऐसा मान लेने पर व्यक्ति इन सुखो के नष्ट हो जाने पर  दुःख का अनुभव नहीं होगा.


अलौकिक सुख, वह सुख है, जो संसार पर आधारित नहीं है. वह संसार की किसी वास्तु, व्यक्ति अथबा परिस्थिति से नहीं मिलता. अलौकिक सुख की विचित्रता यह है की वह मिलने के बाद निरंतर बढ़ता रहता है. उसके बढ़ने की कोई सीमा नहीं है. अलौकिक सुखो को तीन नामो से जाना जा सकता है -  भगवद्भक्ति, परम शांति और जीवन मुक्ति. इसी सुख का नाम है - परमानंद, निजानद, स्थायी प्रसन्नता, अलौकिक आनंद. 


कबीरदास के शब्दों में - 
मन मगन भया तब क्या बोले
हंसा पाया मान सरोवर, डाबर डाबर क्या डोले.

अलौकिक सुख शारीरिक एवं मानसिक बल, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार, धन-संपत्ति, सम्मान आदि से नहीं मिलेगा. अलौकिक सुख की प्राप्ति सरल उपाय है - सत्संग एवं ईश्वर में विशवास. अलौकिक सुख भगवत कृपा  से प्राप्त होता है. उस अनंत करुडामय परमात्मा के दिव्य चरित्रों में श्रद्धा-विशवास के साथ उनके श्रवण, चिंतन  एवं मनम से व्यक्ति को एक अपूर्व आनंद का अनुभव होने लगता है. इसी आनंद का नाम है-अलौकिक सुख. 


मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एवं उनके नाम को आनद सिन्धु   एवं सुखो का धाम कहा गया है. नामकरण करते हुए नहामुनी वसिष्ठ ने कहा है -
जो आनंद सिन्धु सुख राशी
सीकर तें त्रैलोक सुपासी
अलौकिक सुख की प्राप्ति के लिए हमें सत्संग की वृत्ति अपनानी होगी. आत्मचिंतन करना होगा, परमात्मा के उन अनंत उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना होगा, जो उसने हमें प्रदान किये है. स्मरण रहे अलौकिक सुख का आंड मानवजीवन में ही संभव है. निरंतर सत्संग एवं आत्मचिंतन प्राप्ति का संयोग बनाए. अपने जीवं इन उपायों की अवधारणा करते ही धीरे सांसारिक आसक्ति से विरक्ति हो जायगे. अंतःकरण आनंद का अजस्र निर्झर झरने लगेगा और अलौकिक सुख की अनुभूति होने लगेगी.

9/08/2011

गौसेवा के चमत्कार



अनादिकाल से मानवजाति गोमाता की सेवा कर अपने  जीवन को सुखी, सम्रद्ध, निरोग, ऐश्वर्यवान एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है. गोमाता की सेवा के माहात्म्य से शास्त्र भरे पड़े है. आईये शास्त्रों की गो महिमा की कुछ झलकिय देखे -


गौ को घास खिलाना कितना पुण्यदायी 
    तीर्थ स्थानों में जाकर स्नान दान से जो पुन्य प्राप्त होता है, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जिस पुन्य  की प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, तपस्या, महादान तथा हरी की आराधना करने पर जो पुन्य  प्राप्त होता है, सम्पूर्ण प्रथ्वी की परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदों के पढने तथा समस्त यज्ञो के करने से मनुष्य जिस पुन्य को पाता है, वही पुन्य  बुद्धिमान पुरुष गौओ को खिलाकर पा लेता है.


गौ सेवा से वरदान की प्राप्ति
    जो पुरुष गौओ की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौए उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती है.


गौ सेवा से मनोकामनाओ की पूर्ती
    गौ की सेवा याने गाय को चारा डालना, पानी पिलाना, गाय की पीठ सहलाना, रोगी गाय का ईलाज करवाना आदि करनेवाले मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि जिस-जिस वस्तु की ईच्छा करता है, वे सब उसे प्राप्त हो जाती है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती.


    भगवान् शिव कहते है-हे पार्वती! सम्पूर्ण गौए जगत में श्रेष्ठ है. वे लोगो को जीविका देने  के कार्य  में प्रवृत  हुई है. वे मेरे  अधीन  है और चन्द्रमा के अमृतमय द्रव से प्रकट हुई है. वे  सौम्य, पुन्मयी, कामनाओं की पूर्ती करने वाली तथा प्राणदायिनी है. इसलिए पुन्य प्राप्ति की इच्छा  वालो  को सदैव गायो की पूजा, सेवा (घास आदि खिलाना , पानी पिलाना, रोगी गाय का ईलाज कराना आदि-आदि) करनी चाहिए.


भूमि दोष समाप्त होते है
    गौओ का समुदाय जहा बैठकर  निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान की शोभा को बाधा देता है और वह के सारे पापो को खीच लेता है.


सबसे बड़ा तीर्थ गौ सेवा
    देवराज इंद्र कहते है- गौओ में सभी तीर्थ निवास करते है. जो मनुष्य गाय की पीठ छोटा है और उसकी पूछ को नमस्कार करता है वह मानो तीर्थो में तीन दिनों तक उपवास पूर्वक रहकर स्नान कर देता है.


असार संसार छेह सार पदार्थ
   भवान विष्णु, एकादशी व्रत, गंगानदी, तुलसी, ब्रह्मण और गौए - ये ६ इस दुर्गम असार संसार से मुक्ति दिलाने वाले है.


मंगल होगा
    जिसके घर बछड़े सहित एक भी गाय होती है, उसके समस्त पाप्नाष्ट हो जाते है और उसका मंगल होता है. जिसके घर में एक भी गौ दूध देने वाले न हो उसका मंगल कैसे हो सकता है और उसके अमंगल का नाश कैसे हो सकता है.


ऐसा न करे
    गौओ, ब्राह्मणों तथा रोगियों को जब  कुछ दिया  जाता  है उस समय  जो न देने की सलाह  देते है. वे मरकर प्रेत बनते है.


गोपूजा - विष्णुपूजा
    भगवान् विष्णु देवराज इन्द्र से कहते है के हे देवराज! जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष, गोरोचन और गौ की सदा पूजा सेवा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरो और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत की भी पूजा हो जाते है. उस रूप में उसके द्वारा की हुई पूजा को मई यथार्थ रूप से अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ.


गोधूली महान पापो की नाशक है.
    गायो के खुरो से उठी हुई धूलि, धान्यो की धूलि तथा पुट के शरीर में लगी धूलि अत्यंत पवित्र एवं महापापो का नाश करने वाले है.


चारो सामान है
    नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान् का चिंतन, तुलसी को सीचना और गौ की सेवा करना ये चारो सामान है


गो सेवा के चमत्कार
    गौओ के दर्शन, पूजन, नमस्कार, परिक्रमा, गाय को सहलाने, गोग्रास देने तथा जल पिलाने आदि सेवा के द्वारा मनुष्य दुर्लभ सिधिया प्राप्त होती है. 
    गो सेवा से मनुष्य की मनोकामनाए जल्द ही पूरी हो जाती है.
    गाय के शरीर में सभी देवी-देवता, ऋषि मुनि, गंगा आदि सभी नदिया तथा तीर्थ निवास करते है. इसीलिये गोसेवा से सभी की सेवा का फल मिल जाता है.
    गे को प्रणाम करने से - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो की प्राप्ति होती है. अतः सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को गायो को निरंतर प्रणाम करना चाहिए.
    ऋषियों ने सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रथम किया जाने वाला धर्म गोसेवा को ही बताया है.
    प्रातःकाल सर्वप्रथम गाय का दर्शन करने से जेवण उन्नत होता है.
    यात्रा पर जाने से पहले गाय का दर्शन करके जाने से यात्रा मंगलमय होती है.
    जिस स्थान पर गाये रहती है, उससे काफी दूरतक का वातावरण शुद्ध एवं पवित्र हो है, अतः गोपालन करना चाहिए.
    भगवान् विष्णु भी गोसेवा से सर्वाधिक प्रसन्न होते है, गोसेवा करनेवाले कोअनायास ही गोलोक की प्राप्ति हो जाती है.
    प्रातःकाल स्नान के पश्चात अर्व्प्रथम गाय का स्पर्श करने से पाप नष्ट होते है.


गोदुग्ध - धरती का अमृत
    गाय का दूश धरती का अमृत है. विश्व में गोद्म्ग्ध के सामान पौष्टिक आहार दूसरा कोई नहीं है. गाय के दूध को पूर्ण आहार माना गया है. यह रोगनिवारक भी है. गाय के दूध का कोई विकल्प नहीं है. यह एक दिव्य पदार्थ है.
    वैसे भी गाय के दूध का सेवन करना गोमाता की महान सेवा करना ही है. क्योकि इससे गोपालन को बढ़ावा मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से गाय की रक्षा ही होती है. गाय के दूध का सेवन कर गोमाता की रक्षा में योगदान तो सभी दे ही सकते है.


पंचगव्य
    गाय के दूध, दही, घी, गोबर रस, गो-मूत्र का एक निश्चित अनुपात में मिश्रण पंचगव्य कहलाता है. पंचगव्य का सेवन करने से मनुष्य के समस्त पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते है, जैसे जलती आग से लकड़ी भस्म हो जाते है.
    मानव शरीर ऐसा कोई रोग नहीं है, जिसका पंचगव्य से उपचार  नहीं हो   सकता. पंचगव्य से पापजनित  रोग भी नष्ट हो जाते है.


    यदि उपर्युक्त सूत्रों को एक बार में अथवा एक या दो करके दूरदर्शन आदि प्रसार माध्यमो के द्वारा लिखा हुआ दिखाया जाय और अन्य विज्ञापनों की तरह दिन में अनेक बार और कुछ लम्बे समय तक विज्ञापनों को जारी रखा जाय तो थोड़े समय में देश में गोक्रन्ती  हो सकती है और यदि गो-दुग्ध सेवन के प्रचार को अधिक महत्त्व दिया जाय तो गोवध तो अपने आप ही धीरे-धीरे बंद हो जायगा.  


9/07/2011

प्रतिभा की पहचान

यूनान देश के थ्रेस प्रान्त में एक निर्धन बालक दिनभर परिश्रम करके जंगल में लकडिया काटता. फिर उनका गट्ठर बनाकर शाम को बाजार में बेचता था. एक दिन एक संभ्रांत व्यक्ति उस बाजार से जा रहा था. उसने देखा की  उस बालक का गट्ठर बहुत ही कलात्मक रूप से बांधा हहा है.

उसने उस लड़के से पूछा - क्या यह  गट्ठर तुमने बांधा है? लड़के ने जवाब दिया, जी हां, मै दिनभर लकड़ी काटता हूँ, स्वयं गट्ठर बाधता हूँ  और फिर रोज बाजार में बेचता हूँ. 

उस व्यक्ति ने लड़के से कहा-क्या तुम इसे खोलकर ईसी प्रकार दुबारा बांध सकते हो ? जी हां, यह देखिये ईतना कहकर उस लड़के ने गट्ठर खोला तथा बड़े ही सुन्दर तरीके से पुनः गट्ठर बाध दिया. यह कार्य वह बड़े ध्यान लगन और फुर्ती के साथ कर रहा था.

उस व्यक्ति पर इस लड़के की एकाग्रता, लगन तथा कलात्मक  प्रतिभा का बहुत प्रभाव पड़ा. उसने देखा की बालक में छोटे से काम को भी दिलचस्पी, लगन और कलात्मक ढंग से करने का गुड विद्यमान है. ऐसा विचारकर उसने बालक से कहा - क्या तुम मेरे साथ चलोगे ? मै तुम्हे शिक्षा दिलाऊगा और तुम्हारा सारा व्यय वहन करूगा. बालक सोच विचार में मगन हो गया फिर उसने उस व्यक्ति को अपनी स्वीकृति दे दी और उसके साथ चला गया. उस व्यक्ति ने बालक के रहने और उसकी शिक्षा का प्रबंध किया. वह स्वयं भी उसे पठाता था.

थोड़े समय में ही उस बालक ने अपनी लगन तथा कुशाग्र बुद्धी  से उच्च शिक्षा आत्मसात कर ली. बड़ा होने पर यही बालक यूनान के महान दार्शनिक पाईथागोरस के नाम  से प्रशिद्ध हुआ.

वह भला आदमी जो बालक की आदतों, बुद्धि तथा लगन पर मोहित हो गया था, जिसने एक द्रष्टि में बालक के अन्दर छिपे हुए महानता के बीज पहचानकर उसे पल्लवित किया था, वह था यूनान का विख्यात तत्वज्ञानी डेमोक्रीट्स.

 जो व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कार्य भी लगन एवं ईमानदारी से करते है, उन्ही में महानता के बीज छिपे रहते है. 

9/06/2011

सही निर्वाचन


अमेरिका के सुप्रसिद्ध राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने रक्षामंत्री के स्थान पर एक उद्दंड स्वभाव के व्यक्ति को पदासीन किया. इस व्यक्ति का राष्ट्रपति से पुराना वैर था. इनके विषय में वह नाना प्रकार की बाते, टीका टिप्पड़ी तथा आलोचना किया करता था. राष्ट्रपति के कुछ शुभचिंतक एवं मित्र उनके पास पहुचे और बोले रक्षामंत्री के पद पर आपने जिस व्यक्ति को नियुक्त किया है उसके विषय में क्या आप भली भाती जानते है.

राष्ट्रपति ने उत्तर दिया हां जानता हूँ.

समय-समय पर वह आपको गोरिल्ला कहता रहा यह भी जानते है ?

हां, जानता हूँ.

कई जन सभाओं में उसने आपको अपशब्द भी कहे है.

मुझे मालूम है.

अनेक बार उसने आपका अपमान भी किया है.

वह भी मुझे मालूम है

इतना सब कुछ मालूम होते हुए भी आपने उस व्यक्ति को इतने महत्वपूर्ण पद पर कैसे बैठा दिया? मित्रो ने खीझ कर पूछा.

तो क्या हुआ? महत्वपूर्ण पद पर ही तो बैठाया है, गलत स्थान पर तो नहीं बैठाया/ चहरे पर उसी प्रकार स्वाभाविक मुस्कान लाते हुए लिंकन ने कहा.

पर आप यह क्यों नहीं समझते की...

लिंकन ने बात बीच में काटते हुए कहा मै कुछ समझू इससे पहले आपलोग यह क्यों नहीं समझते है की वह एक योग्य व्यस्थापक, संचालक और अपने क्षेत्र का कुशल  तथा कर्मठ कार्यकर्ता भी है. वह भले ही अब्राहम लिंकन का अपमान कर सकता है, लेकिन उसके गुड और इसकी योग्ताये राष्ट्र के लिए हितकर एवं कल्याणकारी है. व्यक्तिगत द्वेष के आधार पर मै एक कार्यकुशल व्यक्ति को राष्ट्र से अलग कैसे कर दू? राष्ट्र को उसकी सेवाओं से वंचित किस प्रकार कर दू? मुझे लिंकन भक्त नहीं राष्ट्र भक्त चाहिए और मुझे विशवास है की वह राष्ट्रभक्त है.

यह सुनकर राष्ट्रपति के मित्र चुपचाप लौट गए.

परदोष दर्शन ऐसा भीषण पाप है




मुस्लिम भक्तो की एक टोली मक्का जा रही थी. शेख सादी उन दिनों बच्चे थे. मक्का जानेवाले दल में अपने पिता के साथ वे भी गए.
तीर्थयात्रियो ने खुदा की बंदगी के लिए कुछ नियम बना रखे थे. एक नियम यह भी था की आधी रात को उठकर प्रार्थना की जाय. एक दिन रात्री में प्रार्थना  करने के लिए शेख सादी और उनके पिता ही उठे. दल के और लोग यात्रा से इतने थक गए थे की वे सोते ही रहे. 
पिता और पुत्र ने प्राथना की. प्रार्थना संपन्न होने पर जब दोनों सोने लगे तब सादी से न रहा गया. आखिर बच्चे ही तो थे. वे बोले पिताजी देखिये केवल हम दोनों ने ही प्रार्थना  की है. दल के ये लोग कितने आलसी है, न उठते है न प्रार्थना करते है.
बालक के ये वाचन उस सरलचित्त और धर्मनिष्ठ पिता के ह्रदय में तीर की भाती  चुभ गए; उन्होंने सादी को सावधान करते हुए कहा मेरे सादी तू भी प्रार्थना के लिए न उठता तो अच्छा था. उठकर खुदा की बंदगी की इससे दूसरो पर क्या अहसान किया? प्रार्थना के लिए उठकर दूसरो के दोष देखने तथा उसका बखान करने से तो न उठना ही श्रेयष्कर था.
सादी को अपनी भूल समझ में आ गयी उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पिता से अपनी भूल के लिए क्षमा मागी. पिता ने फिर कहा बेटा परदोष दर्शन ऐसा भीषण पाप है जिसको खुदा ही क्षमा कर सकते है. तुम खुदा  से ही अपने ह्रदय की शुद्धि के लिए प्रार्थना करो.

9/04/2011

क्या हम इतना भी नहीं कर सकते

   
भगवान की लीला बडी रसमयी ही. अपनी लीला के रूप मे वे स्वयं अपने को ही प्रकट करते है. भगवान और भगवान की लीला ये दोनो भिन्न नहीं  है. एक ही है. एक प्रकार से याह संपूर्ण संसार भगवान की लीला ही है. यह सब नाम रूप उनही के है, वे ही है, परंतु वे इतने ही नही इनसे परे भी है. उनकी सत्ता उनका स्वरूप और उनकी लीला अनिर्वचनीय है. 

जब जीव प्रमादवश भगवान के  स्वरूप और लीलाओं को भूलकर  उनसे भिन्न प्राकृत  पदार्थों से सुख पाने की  आशा एवं अभिलाषा करता  है और बहिर्मुख होकर  उन्हीं के  पीछे भटकने लगता है, तब वह उद्वेग, अशांति एवं दुख से घिर जाता है। भगवान वैसी स्थिति में भी उसे बार-बार चेतावनी देते रहते हैं और प्रतीक्षा किया करते  हैं की  वह अभिमान तथा भौतिक  पदार्थों का भरोसा छोडक़र सच्चे ह्दय से पुकारते  तो मै अभी चल कर  उसे गले से लगा लूँ, उस पर अपना अनन्त प्रेम प्रकट करू  तथा सर्वदा के  लिए सुख  शान्ति के  साम्राज्य में वास दे दूँ।

परंतु जीव की  यह मोहनिद्रा टूटे तब तो यह आयोजन संभव हो। भगवान की  दया तो क्या वर्णन किया  जाए? उन्होने तो समस्त जीवों को  दया के  समुद्र में ही रख छोड़ा है। उनके  अनन्त उपकार,  अपार कृपा  और अपरिमित प्रेम से सब के  सब दबे हुए हैं।

जब अभिमान, कामना  और भय के  थपेड़ों से व्याकुल होकर , रजोगुण के  नाना व्यापारों से ऊबकर नरक , स्वर्ग आदि में चक्कर खाते-खाते परेशान होकार भी लोग सात्वित्क्ता , दैवी सम्पत्ति एवं भगवान की  शरण नहीं ग्रहण करते उलटे  तमोगुण की  प्रगाढ़ निद्रा में सो जाते हैं, चराचर प्रलय हो जाता है, तब यदि भगवान प्रकृति   को  क्षुब्ध करते  इन्हें जगाते नहीं तो उस मोह निद्रा से कैसे छुटकारा  मिलता? सोते से जगाया, ज्ञान का  संचार किया । तम से रज में लाकर  सत्त्व की  ओर अग्रसर किया। अब क्या जीवन दान करणे  वाले प्रभु की  शरण लेना ही हमारा कर्तव्य  नहीं है? क्या हम जतना भी नहीं कर सकते ?

केवळ कृतज्ञता  की  दृष्टि से ही नहीं चल सकता  । हम चाहे जितना प्रयत्न कारे , जितना हाथ-पैर पीटें, उनके  बिना हमारे सुख शांति आदि स्थायी भी तो नही रह सकते । दो चार दिन के  लिए कुछ     गुणों की  छाया भले ही आ जाए, भगवान के  बिना उनका  टिकू  होना असंभव है। यह आज की  बात नहीं है सर्वदा से ऐसा ही होता आया है।

6/13/2011

नुकसानदायक है अंडा सेवन


यदि शास्त्रीय विधि निषेध की बात न मानी जाय तो हर व्यक्ति इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र है की वह क्या खाए और क्या न खाय किन्तु अच्छे स्वास्थ्य के द्रष्टिकोण से या भयानक बीमारियों की रोकथाम के लिए कुछ खाद्य पदार्थो का सेवन हानिकारक हो तो आपको चाहिए की आप विवेकपूर्वक ऐसा खाद्य पदार्थ न ले.
आप निम्न तथ्यों से भली बहती जान जायेगे की अंडा जहा स्वास्थ्य के लिए हानिकर है वह वह मांसाहार भी है. इसलिए इसका सेवन किसी भी द्रष्टि से उचित नहीं -

१ अंडा सेवन अंहिसा एवं करुना के विपरीत-

यह बहुधा सुनने में आता है की अनिशेचित अंडे शाकाहारी है लेकिन यदि यह मालूम हो जाय की उनके उत्पादन की विधि कितनी क्रूरता से परिपूर्ण है और भारतीय मूल्यों जैसे अहिंसा और करुना के विपरीत है तो बहुत से लोग अंडा सेवन बंद कर देगे. अमेरिका के विश्व्विध्यात लेखक जान राबिन्स ने  अपनी प्रसिद्द पुस्तक दैत फार ऐ न्यू अमेरिका में लिखा ह ई की अन्डो की फेक्ट्रीयो में स्थापित किये हुए पिजड़ो में ईतनी अधिक मुर्गिय भर दी जाती है की वे पंख भी नहीं फद्फदा सकती और तंग जगह की वजह से वे आपस में चोचे मारती है, जख्मी होती है, गुस्सा करती है और कष्ट भगती है, जब मुर्गी को २४ घंटे लोहे की सलाख पर बैठना पड़ता है तब एक विशेष मशीन से एक ही रात में लगभग हजारो मुर्गियों की चोचे काट दी जाती है और गरम-गरम आग से तपते लाल औजारों से उनके पंख भी काट दिए जाते है. आप समझ सकते है की जल्दी से अंडा उत्पन्न करने का तरीका कितना हिंसात्मक है.

२ अन्डो से कई बीमारिया

हासे ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त  विश्व में यह साबित कर दिया है की मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारन अन्डो से वह बीमारी उस मानुष में प्रवेश कर जाती है. अंडा सेवन करने वाले व्यक्तियों को यह भी नहीं मालूम की इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्र होती है. अन्डो के सेवन से ऑटो में सदन और टी बी आदि की आशंकाए बढ़ जाती है. अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन ईन्जाईम के विरुद्ध प्रतिक्रिया होती है. कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मित्लित रिपोर्ट में कहा है की अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए जिम्मेदार है. यह बात १९८५ ईश्वी  के नोबुल पुरस्कार विजेता डाक्टर ब्राउन और डाक्टर गोल्द्स्तीं ने कही है की अन्डो में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारन बहुत अधिक मौते होती है. इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है की जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ रहने की कल्पना कर रहे है वे कल लकवा, अग्जिमा, ईन्जईना जैसे रोगों के शिकार होगे. फिर अंडे में फाईबर नहीं होता और कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फ्रूति देता है वह भी शून्य होता है.

३ अन्डो में पौष्टिकता एवं उर्जा की कमी

विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है की शाकाहारी कह्द्यानो की तुलना में अंडे में अधिक प्रोटीन है सकीं विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह ज्ञात होता है की प्रोटीन, खनिज लावन और कैलोरी आदि की द्रष्टि से कौन सा आहार हमारे लिए उपयुक्त है 

 
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४ कोइ भी अंडा शाकाहारी नहीं होता - 

प्रचार माध्यमो के कारण कुछ वर्षो से शुद्ध शाकाहारी परिवार के नवयुवक भी अन्डो  का सेवन करने लगे है क्योकि अनिशेचित अन्डो को शाकाहारी नामकरण देकर एक भ्रमजाल फैलाया गया है. यह एक वैज्ञानिक तथ्य है की अनिशेचित अंडे किशी भी प्रकार से शाकाहारी नहीं होते क्योकि न तो वे पदों पर उगते है और न किसी पौधे पर बल्कि वे सब मुर्गी के पेट से उत्पन्नं होते है.१९७१ ईश्वी में मिशीगन यूनिवर्सिटी अमेरिका के वैज्ञानिको ने यह सिद्ध कर दिया था की संसार का कोई भी अंडा निर्जीव नहीं है चाहे निषेचित हो य अनिशेषित. अंडे के ऊपरी भाग पर हजारो सूक्ष्म छिद्र होते है जिनमे अनिशिचित अंडे का जीव श्वास लेता है 

4/07/2011

अपना आत्मा अपना घर है

श्रीमदभागवत में बताया गया है की जब ह्रदय में ईश्वर विषयक चर्चा श्रवण करने की इच्छा होती है तो ईश्वर तत्क्षण ह्रदय में आकर बैठ जाता है. असल में ईश्वर की कृपा जन्म-जन्म के पुन्य सत्कर्मो का परिपाक, गुरु की कृपा, अपने ह्रदय में शुभेच्छा होवे तब वेदांत सुनने को मिलता है.
दुनिया में राज कथा, भोगकथा, जगत कथा, बहू-बेटी की बात सुनानेवाला मिलेगा, ब्रह्मविद्या को सुनानेवाल तो जल्दी मिलेगा नहीं!
लोग तो यह कहकर डराते है की वेदांत सुनोगे तो घर-गृहस्थी छूट  जाएगी पर वेदांत घर गृहस्थी  से कोई दुश्मनी तो है नहीं , वेदांत की अर्थात ज्ञान की दुश्मनी अगर किसी से है तो  केवल  अज्ञान से है, ज्ञान तुम्हारा घर, तुम्हारा परिवार, तुम्हारा धन, तुम्हारा शरीर इन सब का कुछ नहीं बिगाड़ेगा, और यह जो तुम्हारे मन में मान्यताये है, संस्कार है, छोटी-छोटी बातो में जो तुम उलझे हुए हो ये बेवकूफी की जो मान्यताये है, इनको तो जरूर मिटा देगा.
अपने नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करो. अपने दुर्भाग्य को मत कोसो, अपने प्रतिबंधो के बारे में भी सोच-सोचकर निराश मत होवो. वेदांत के अधिकारी सब है-अपने घर में जाना है यह पराया  घर नहीं है. यह अपना आत्मा अपना घर है, अपने पास लौटने के लिए क्या झगडा ? घर के दरवाजे पर लिखा हो बिना ईजाजत अन्दर आना मन है और घर का मालिक आ जाय तो क्या वह उसके लिए भी लिखा है ?  बोले भाई, यह बात जरूर है की अपने घर में भी जब ठाकुरबाड़ी बनाते है तब जरा पाँव धोकर जाते है, अपवित्र  पाँव से प्रवेश नहीं करते  है, पवित्र होकर जाते है. तो वेदांत श्रवण के लिए पवित्र बुद्धि से -ईर्ष्या, द्वेष, कलुषित बुद्धि से नहीं राग-द्वेष कलुषित बुद्धि से नहीं, अहंता, ममता से कलुषित बुद्धि से नहीं. उपरोक्त बुद्धि से जाना चाहिए.

4/06/2011

अल्प के प्रति वैराग्य हुए बिना अनंत के प्रति लालसा संभव नहीं है.

समय की वेगवती धारा में सब कुछ बहा जा रहा है. द्रश्यमान प्रपंच में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो स्थिर हो. हमारे सामने संसार में कितने ही उत्थान-पतन और उथल-पुथल होते रहते है. जब हम किसी लुभावनी वस्तु में आसक्त हो जाते है या डरावनी वस्तु से द्वेष करने लगते है तब हमारा अन्तरंग राग-द्वेष के रंग में रंग जाता है. उसी के आवेश में हम अपने स्वरुप को और उसके अनुरूप स्थिति, भावना अभ्यास और धर्म को भूल जाते है तथा आमूल-चूल संसार के दलदल में निमग्न तथा संलग्न हो जाते है. वर्तमान स्थिति यह है की न हमें अपने स्वरुप का ज्ञान है, न पररूप का. न ह्रदय में सद्भावना है, न जीवन में सत्कर्म. जिसका अंग-अंग राग रंग और दुह्संग में रंग गया है उसके लिए अज्ञान निवर्तक तत्वज्ञान की तो चर्चा ही क्या है. जहा भगवद अर्चा  नही वह  ब्रह्म चर्चा भी शोभाहीन है.
देहावेश की निवृत्ति के लिए देहातिरिक्त आत्मा का ज्ञान आवश्यक है. वह देह नहीं देही है. पाप पुन्य का करता है. सुख-दुःख का भोक्ता है. जीवन का आदि-अंत यह शरीर ही नहीं है. इस शरीर के पूर्व भी जीवन था और पश्चात भी रहेगा. आकार, आयु, शक्ति, संकल्प, प्रज्ञा, सुख-दुःख आदि  में तारतम्य भी स्पष्ट ही देखने में आता है. शून्य, विज्ञान, भौतिक द्रव्य, प्रकृति, परमाणु अथवा ब्रह्मरूप उपादानो  में, चाहे वे एक हो अथवा अनेक हो, सद्रश हो अथवा विस्द्रश हो, संस्कार रूप बीज पूर्व्कर्मानुसार ही होते है. संस्कार रूप बीज के बिना परस्पर विलक्षण, विचित्र एवं विभिन्न जातियों तथा व्यक्तयो के शरीर की उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो सकती.
इसलिए देहातिरिक्त  आत्मा को कर्ता, भोक्ता एवं 
गमनागमनशील  जानकार सुखदायक संस्कार उत्पन्न करने के लिए मनुष्य शरीर में धर्मनिष्ठ की नितांत आवश्यकता है. धर्मनिष्ठ में ही स्वभाव के परिवर्तन और निर्माण की शक्ति है और देहावेश की निवृत्ति भी धर्मनिष्ठ ही करती है.
धर्मनिष्ठां  के साथ ही साथ भक्तिनिष्ठ का होना भी आवश्यक है क्योकि मनुष्य का ह्रदय अत्यंत संवेदनशील और भावुक है. वह तत्काल प्रिय, अप्रिय के प्रति क्रमशः राग द्वेष के वशीभूत होकर अपने ह्रदय में सद्भाव या दुर्भाव को स्थिर आश्रय दे देता है और दुःख भोगने लगता है. राग-द्वेष दोनों का ही अंतिम परिणाम जलन है इसलिए अपने ह्रदय में निरंतर लोकोत्तर चमत्कारकारी परमेश्वर का चिंतन करना चाहिए. इसी से लौकिक पारलौकिक विषयों  के प्रति वैराग्य होता है. अल्प के प्रति वैराग्य हुए बिना अनंत के प्रति जिज्ञासा, लालसा  या प्रगति संभव नहीं है. संसार की छोटी-छोटी वस्तुओ में लुभा जाने वाला पुरुष परमात्मा की प्राप्ति का अधिकारी नहीं हो सकता.