भगवान ने पहले लोक रचना की इच्छा से पुरुष अवतार ग्रहण किया था. उस समय भगवान, जिनके नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए एवं जिनके शरीर के अवयवो से समस्त लोक रचना संभव हुई, योग निद्रा का विस्तार कर जल में शयन कर रहे थे. विशुद्ध सत्त्वमय भगवान के इसी प्रधान रूप का योगी जन ज्ञान चक्षु से दर्शन करते है, इसमें भगवान के अनंत पैर, उरु, भुजा, मुख, शिर, कर्ण, नेत्र, नासिका आदि सुशोभित हो रहे है. यह रूप बहुत से मुकुट, कुंडल आदि आभूश्नो से देदीप्यमान है.
इसी रूप से भगवान के नाना अवतार होते है और फिर इसी में उनका लय हो जाता है, इसी के अंशांश ब्रह्मा, मरीचि तथा कश्यप से देवता, पशु पक्षी तथा मानुश्यादी योनिया उत्पन्न होती है. इसी रूप से जिन चौबीस अवतारों का प्रादुर्भाव हुआ था, उनके मंगलमय नामो का आप लोग श्रवण करे -
१-सनकादी महर्षियों का अवतार, २-बारह अवतार , ३-नारदावतार, ४-नर narayan अवतार, ५-कपिल अवतार, ६-दत्तात्रेय अवतार, ७-यग्य अवतार, 8- रिषभ अवतार, ९-प्रथू का अवतार, १०-मत्यस्य अवतार, ११- कूर्म अवतार, १२-धन्वन्तरी का अवतार, १३-मोहिनी का अवतार, १४-नरसिंह अवतार, १५-वामन अवतार, १६-परशुराम अवतार, १७-व्यास अवतार, १८-राम अवतार, १९-बलदेवता अवतार, २०-श्री कृष्ण अवतार, २१-हरी अवतार, २२-हंस अवतार, २३-बुद्ध अवतार और २४-कल्कि अवतार
इस प्रकार भगवान के असंख्य अवतार है और वे समय-समय पर प्रगट होकर जगत की रक्षा करते है. जो मनुष्य सायं प्रातः इन अवतारों का श्रवण और कीर्तन करता है वह दुखमय संसार से मुक्त हो जाता है.
जैसे निरुप आकाश में वायु के आश्रित मेघो की और वायु में पार्थिव रेणुओ की अज्ञानवश कल्पना की जाती है, वैसे ही द्रष्टा आत्मा में अज्ञानियो ने द्रश्य्त्व का आरोप किया है, ये दोनों ही जीव के बंधन हेतु संसार के कारण है, जब प्रेम लक्षणा भक्ति के द्वारा ज्ञान रुपी सूर्य का उदय होता है तब ये दोनों शरीर ज्ञान अग्नि में भस्म हो जाते है एवं जीव भगवान का साक्षात्कार कर परम आनंद का अनुभव करता है, प्रेम लक्षणा भक्ति भावना के जन्म, कर्म तथा लीलाओ के कीर्तन और चिंतन से प्राप्त होती है.
यद्यपि देहाभिमानी जीव तर्क आदि कौशल के द्वारा भी भगवान की लीलाओ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, तथापि जो निष्कपट भाव से अहंकार त्यागकर भगवान के चरण कमल मकरंद का पान करता है, उस पर शीघ्र भगवत्कृपा होती है, जिससे उसे लीलाओ के ज्ञान के साथ-साथ भक्ति द्वारा भगवान के स्वरूप का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है,
श्रीमद्भागवत को पांचवा वेद कहा गया है. इसमें भगवान के दिव्य मधुमय चरित्रों का वर्णन है, लोक कल्याण के लिए ही इसका प्रादुर्भाव हुआ है, व्यासजी ने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका उपदेश किया था. शुकदेवजी ने गंगा के तट पर स्थित महाराज परीक्षित को इसे सुनाया. वही सूतजी ने भी इसका श्रवण किया.
भगवान श्री कृष्ण जब अपने धाम को चले गए, तब मंदमति मनुष्यों के कल्याणार्थ इस पुराण रुपी सूर्य का उदय हुआ है. धर्म भी अब इसी के आश्रय में रहता है. यह छठे प्रश्न का उत्तर भी हो गया.
7/28/2010
7/27/2010
श्री मदभागवत से- २, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है,
सूतजी सौनकादी ऋषियों के छः प्रश्नों को सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और श्री शुकदेवजी का ध्यान कर कहने लगे- कृष्ण सम्बन्धी प्रश्नों से लोगो का महान कल्याण होता है और आत्मा को शांति प्राप्त होती है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
चार प्रश्नों के उत्तर और भक्ति का महत्त्व
क्रिश्न्भाक्तिः परम श्रेयः शास्त्र्सारास्च सैव ही.
प्रयोजनम सतो रक्षा कर्म shrastyaadi लक्षणं .
अवतार असंख्येय धर्मो भगवते स्थितिः.
चतुर्नामत्र शेषस्य तृतीये चोत्तरम कृतं.
संसार में जीवो के श्रेय का मुख्य साधन और समस्त शास्त्रों का सार यही है की मनुष्यों को श्रीकृष्ण में निश्चल भक्ति हो. इसमें ज्ञान और वैराग्य शीर्घ्र ही प्राप्त हो जाते है. धर्मं का अनुष्ठान करने पर भी यदि भगवान की कथा में रूचि नहीं हुई तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, अन्य कुछ नहीं. संसार में धर्म का प्रयोजन मोक्ष है, अर्थोपार्जन नहीं. अर्थ का प्रयोजन भी धर्मोपर्जन है. विषय सुख नहीं. विषय भी शरीर के निर्वाहार्थ है, इन्द्रियों की तृप्ति उनका प्रयोजन नहीं, संसार में तत्व की जिज्ञासा ही जीवन का प्रयोजन है, केवल कर्मजाल में फसे रहना नहीं, तत्व भगवान श्रीकृष्ण ही है.
इसलिए सर्वदा निश्चल मन से उन्ही का श्रवण कीर्तन, ध्यान तथा पूजन करना चाहिए-
तस्मादेके न मनसा भगवान सात्व्ताम पतिः.
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा.
इसमें मनुष्यों का बंधन हेतु अहंकार निवृत्त हो जाता है और भगवान की कथा में दृढ रूचि उत्पन्न हो जाती है, जब मनुष्य भागवत कथा सुनने का दृढ संकल्प कर लेता है, तब भगवान उसके ह्रदय में प्रगट होकर उसकी सम्पूर्ण वासनाए नष्ट कर देते है, फिर चित्त कभी काम , क्रोध आदि शत्रुओ से आक्रांत नहीं होता और उसके सब संशय सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाते है, चित्त के सत्वगुण में स्थित होने के कारण वह परम शांति को प्राप्त होता है. प्रकृति से परे एक ही भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि, पालन और संहार के हेतु ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे नाम गुणों के अनुसार धारण करते है.
वेद, यग्य, जब, तप आदि सब इन्ही वासुदेव का प्रतिपादन करते है, क्योकि ये सभी भगवत्प्राप्ति के उपाय है.
7/26/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ? कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्रीमद भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का रसमय फल है. यह भक्तिरस से भरा हुआ है. यह सुमधुर फल श्रीनारायण से ब्रह्माजी को, ब्रह्माजी से नारद को, श्रीनारादजी से सरस्वती के तट पर आसीन खिन्नचित्त श्री व्यासजी को तथा व्यासजी से योगेश्वर श्री शुकदेवजी को प्राप्त हुआ.
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
श्री शुकदेवजी ने गंगातट पर आसीन महाराज परीक्षित को इसका रसास्वादन कराया. इस प्रकार शिष्य प्रशिष्य परंपरा द्वारा यह दिव्य रसमय फल जीवो के कल्याणार्थ प्रथ्वी पर प्राप्त हुआ है. आप लोग जीवन पर्यंत सर्वदा इसका पानकर माया पर विजय प्राप्त करे. इस प्रसंग में हम आप लोगो के समक्ष सूत और सौनक का संवाद उपस्थित करते है. उसे आप ध्यानपूर्वक सुने.
एक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले यग्य का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परम ज्ञानी सूत जी वहा आ पहुचे ऋषियो ने उठकर उनका स्वागत किया और दिव्य आसन पर उन्हें बैठाकर उनसे पूछा-
(१) मनुष्यों के लिए श्रेय का साधन क्या है ?
(२) शास्त्रों में जो कुछ वर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश करे,
(३) यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
(४) भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
(५) भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाए है, उन्हें भी सुने. हम भगवान के चरित्र सुनने के लिए लालायित बैठे है. दुस्तर संसार सगर को पार करने की इच्छा वाले हम लोगो के लिए ब्रह्मा जी ने आपको कर्णधार बनाकर यहाँ भेज दिया है.
(६) आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
कथा सार श्रीमद्भागवत-1
7/25/2010
श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
ಎएक समय नैमिशारान्य में शौन्कादी ऋषि भगवान की प्राप्ति के लिए सहस्त्र वर्षों में पूर्ण होने वाले yagy का अनुष्ठान कर रहे थे. वे प्रातःकाल अग्नि में हवन कर भगवान के ध्यान में निमग्न थे की व्यासजी के शिष्य परमज्ञानी सूतजी वहा आ पहुचे. ऋषियों ने पूछा - हे भगवान आपने समस्त इतिहास पुरानो का अध्ययन और उनका प्रवचन भी किया है. व्यासजी जो रहस्य जानते है, उन सबका आपको भी पूर्ण रूप ज्ञान है. श्रद्धालु और प्रेमी शिष्यों को गुरुजन गोप्य बाते भी बतला देते है. इसलिए अब आप कृपा कर यह बताये की
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
मनुष्यों के लिए मुख्य श्रेय का साधन क्या है ?
शास्त्रों में जो कुछ बर्णन किया गया है, उसका सार अपनी बुद्धि से निकलकर आप हमें उपदेश कर्र,
यह भी बतलाये की भगवान देवकी के पुत्र रूप में किस कार्य के लिए अवतीर्ण हुए थे ?
भगवान के जो-जो अद्भुत चरित्र है जिनका कवियों ने बहुधा वर्णन किया है उन्हें भी आप हमें बताये,
भगवान की अवतार सम्बन्धी जो कथाये है, उन्हें भी सुनाये.
आप यह भी बतलाये की योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जब अपने धाम को चले गए तब निराश्रय धर्म किसकी शरण में गया ?
7/24/2010
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
श्रीमद भागवत का श्रवण करने से भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
अभी तक आपने पढ़ा श्रीमद भागवत का महात्म्य अब प्रथम स्कंध की कथा प्रारंभ हो रही है. सावधान होकर आप इसका श्रवण कर. द्वापर के अंत में व्यासजी ने प्रकट होकर इसकी रच की थी. यह कथा कल्पवृक्ष के सामान मनुष्यो क सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाली है. इसमें बारह स्कंध, ३३५ अध्याय और अठारह हजार श्लोक है एवं शुकदेव और राजा परीक्षित का संबाद है. इसी को भागवत कहते है. इस कथा की निर्विघ्न समाप्ति हो, इसलिए व्यासजी आरम्भ में मंगलाचरण द्वारा भगवान शीक्रष्ण का ध्यान कर रहे है. आप लोग भी हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करे.
जन्माद्यस्य यतों व्यादी तर्ताश चार्थे श्वाभिग्याह स्वराट
तेने ब्रह्म ह्रदय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूर्यः
तेजोवारिम्रदाम यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्त्कुह्कम सत्यम परम धीमहि.
जो भगवान विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले है. जिनका आकाश आदि कार्यो में, अन्वय (सम्बन्ध) एवं अकार्य खापुश्पादी से व्यतिरेक ( आभाव) है, जो सर्वग्य, सर्वशक्तिमान तथा प्रकाशस्वरूप है, जिन्होंने संकल्पमात्र से ब्रह्मजी को वेद का उपदेश किया था, जिसमे विवेकी विद्वानों को भी मोह हो जाता है, मृग मरीचिका के सामान मिथ्या जगत भी जिनके आधार से सत्यव्रत प्रतीत हो रहा है एवं जिन्होंने अपने तेज से भक्तो का अज्ञान दूर किया है, उन सत्यस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते है.
इस ग्रन्थ में भक्ति लक्षण परमधर्म का निरूपण किया गया है, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाता है, इसका श्रवण, मनन तथा चिंतन करने से जिस प्रकार भगवान सरलता से ह्रदय में स्थिर हो जाते है, उस प्रकार अन्य ग्रंथो के अध्ययन से नहीं होते यही इसकी विशेषता है.
7/21/2010
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
श्रीमद्भागवत की कथा किसके मुख से सुनी जाये उसके भी नियम है, इस विषय में कौशिकी संहिता में लिखा है की जो वैष्णव नहीं, उनके मुख से कथा कदापि नहीं सुननी चाहिए. भागवत की कथा तो विशेष रूप से वैष्णव के मुख से ही सुननी चाहिए. पूर्वाचार्यों ने वैष्णव शब्द का अर्थ ब्राह्मण बताया है.
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
ब्राह्म्नेतर से इसका कभी श्रवण न करे. गुरु भी ब्राह्मण को ही बनावे. अन्य जातीय को नहीं.
'पतिरेव गुरुह स्त्रीणाम' के अनुसार स्त्री पति से अतिरिक्त किसी को गुरु न बनावे. विधवा स्त्री भी पति का चित्र सामने रखकर गुरु बुद्धि से मस्की पूजा कर. अन्य किसी को गुरु न बनावे, अन्यथा उनका परलोक बिगड़ जाता है.
कौशिकी संहिता में आगे लिखा है की लेटकर कथा सुननेवाले अजगर की योनी तथा कथावाचक व्यासजी को बिना प्रणाम किये कथा सुननेवाले वृक्ष की योनी को प्राप्त होते है,
किन्तु यह नियम रोगी पर लागू नहीं होता. वक्ता के कथा स्थल पर पहुचने पर सबको उनका अभिवादन करना चाहिए. श्रोतागण कथा के मध्य में किसी प्रकार का संदेह होने पर वक्ता से प्रश्न न करे. जो कुछ भी प्रष्टव्य हो कथा के अंत में विनयपूर्वक पूछे. अन्यथा कथा रस भंग होने के साथ-साथ अनावासर पर पूछ्ने वाले पर सरस्वती देवी कुपित होती है, जिससे वह जन्मान्तर में गूगा होता है. तदनंतर तीन जन्मो तक मूर्ख रहकर अंत में कौए की योनी प्राप्त करता है.
व्यास आसन पर आसीन आचार्य साक्षात् व्यासरूप माने गए है. वह ब्राह्मण, राजा, वृद्ध, पिता, पितामह, तथा गुरु से भी पूजनीय होते है. इसलिए वह किसी को प्रणाम न करे. न मुख से अमंगल शब्द का उच्चारण करे और न किसी का अभ्युत्थान ही करे . ऐसा करने से उनका धर्म नष्ट नहीं होता.
ब्रह्माजी ने ब्राहमण में ही आचार्यत्व की स्थापना की है, अन्य वर्णों में नहीं. तपश्चर्या आदि के द्वारा भी अन्य वर्ण ब्रह्मण नहीं हो सकते. केवल चिन्ह मात्र धारण करने से जाती की निवृत्ति अथवा प्राप्ति नहीं हो सकती.
न नापितो ब्रह्मनतम याति सूत्रादिधार्नात.
अर्थात नापित यज्ञोपवीत आदि धारण कर लेने से कदापि ब्राह्मण नहीं हो सकता.
कलियुग में ब्राह्मण शरीर जन्म से ही प्राप्त होता है, तपस्या आदि से नहीं.
कलौ ब्रह्मंता याति वीर्यात्त्पश्चार्यादिना नहीं.
जो मोह से, स्नेह से अथवा हाथ से अग्रभोजी ब्राह्मण को उच्छिस्ट भोजन कराता है, वह मूढ़ लालाभक्ष नामक नरक में गिरता है,
जो स्वयं हीन वर्ण होकर उत्तमवर्ण ब्राह्मण को शिष्य बनाने की कुचेष्टा करता है, वह प्रलय पर्यंत मल भक्षण करता रहता है, और क्रम से शूकर गर्दभ आदि पाप योनिय भोगकर चंडाल योनी को प्राप्त करता है,
उच्छिष्ट्भोजी पुरुष कुत्ते की योनी प्राप्त करता है - उच्छिष्ट भोजिनः श्वानः
7/20/2010
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष इस कथा को अवश्य सुने.
महाभारत युद्ध के आरम्भ में भगवान श्री कृष्ण जब अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे, तब हनुमानजी ने ध्वजा पर बैठे-बैठे गीता का श्रवण किया. गीता की समाप्ति पर अर्जुन की तरह हनुमानजी ने भी भगवान का पूजन कर उनसे कहा, भगवान, मै भी आपका शिष्य हूँ, कारण मैंने ध्वजा पर बैठे-बैठे ही आपसे गीता सुनी है,
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
इस पर भगवान ने कहा- यह तो तुमने बहुत अनुचित किया. श्रोता का यह धर्म नहीं की वह वक्ता से ऊपर बैठकर कथा सुने. इसलिए तुम पिशाच हो जाओ. इस पर जब हनुमानजी ने प्रार्थना कर शाप निवृत्ति का उपाय पूछा तब भगवान ने गीता पर भाष्य करने को कह. तदनुसार हनुमानजी ने गीता पर भाष्य किया, वह पैशच्यभाश्य के नाम से प्रसिद्ध है, इस प्रकार वे शाप मुक्त हो सके थे. इसलिए कथा सुनते समय वक्ता के बराबर या ऊपर आसन पर कभी न बैठे.
श्रीमद भागवत सुनने से क्या-क्या मिलता है -
जिस स्त्री को मासिक धर्म न गोह हो, जिसे एक बार ही प्रसव हुआ हो, जिसका कभी प्रसव न हुआ ही, जिसके बच्चे मर जाते हो, जिसका गर्भ गिर जाता ही, ऐसी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक इस कथा का श्रवण करना चाहिए, इस कथा के श्रवण से ये सारे दोष नष्ट हो जाते है,
दरिद्र, क्षयरोगी, अभागा, संतानही, पापी तथा मोक्षाभिलाशी पुरुष श्रीमद भागवत कथा को अवश्य सुने.
7/19/2010
ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है.
यदि स्वतंत्र रूप से सप्ताह करने का समर्थ न हो,तो आठ सहायक मिलकर इस शुभ कार्य को करे. सर्व प्रथम ज्योतिषी से मुहूर्त पूछे.
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
सप्ताह के लिए चैत्र और पौष को छोड़कर सभी मॉस शुभ बताये गए है, मलमास, शुक्रास्त एवं चन्द्र के अस्त में, गुर्वादित्य (खरमास - मीन और धन की संक्रांति अर्थात चैत्र और पौष ) में, क्षय तिथि में सप्ताह करने का विधान नहीं है. वारो में मंगल तथा शनि त्याज्य है, नित्य कथा में द्वादशी तिथि को कथा सुनना वर्जित है, क्योकि सूतजी के देहावसान के कारण उस दिन सूतक मनाया जाता है , सप्ताह कथा में द्वादशी तिथि वर्जित नहीं है, ऐसा व्यासजी का कथन है, नान्दीश्राद्ध कर मंडप का निर्माण कराये. चारो दिशाओं में श्रीफल सहित कलशो की स्थापना कर, गणेश, नवग्रह, षोडश मातृका एवं पौराणिक आचारो का प्रतिदिन पूजन करे , मंडप में शालिग्राम शिला अवश्य रखे, एक पल सोने के विष्णु प्रतिमा बनवाकर उसे प्रधान कलश पर स्थापित कर, पांच, सात अथवा तीन ब्रह्मण कथा के आरम्भ से अंत तक गणेश, गायत्री एवं द्वादशाक्षर मंत्र का जप करे. जिन मासों में जिन खाद्य वस्तुओ का त्याग बताया गया है, उनका सप्ताह में भी सेवन न कर, निमंत्रण पत्र भेजकर देश-देश से अपने कुटुम्बियो को बुलाये. यहाँ सात दिन तक ज्ञानी महात्माओं का समाज एकत्र रहेगा , उसमे अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा होगी. आप इस अमृत रस का पान करने के लिए सपरिवार अवश्य पधार, यदि अधिक अवकाश न हो तो भी कृपा कर एक किन के लिए तो अवश्य पधारे क्योकि ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता. यहाँ सप्ताह कथा का एक-एक क्षण दुर्लभ है,
आगंतुको के लिए स्थान, भोजन आदि का समुचित प्रबंध कर, तीर्थ में वन में अथवा घर में, जहा भी विशाल स्थान हो, वही कथा का मंडप बनाये. वक्ता के लिए एक सुन्दर सिंहासन की व्यस्था करे, जो गद्दा तकिया आदि से सुसज्जित हो. यदि वक्ता उत्तरमुख बैठे तो, प्रधान श्रोता यजमान पूर्वमुख बैठे , यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख बैठे, वक्ता के सामने सात पंक्तिया रहे , पहली पंक्ति तपोलोक है, जिसमे वानप्रस्थ बैठे, तीसरी पंक्तिको जनलोक कहा है, जिसमे ब्रह्मचारी बैठे, चौथी पंक्ति महर्लोक है, जिसमे ब्रह्मिन, पाचवी पंक्ति स्वर्गलोक है, जिसमे क्षत्रिय, छठी पंक्ति भुवर्लोक जिसमे वैश्य और सातवी पंक्ति भूलोक है, जिसमे शूद्र बैठकर कथा का श्रवण करे , स्त्री बाई तरफ बैठे और कथा के समय आने वाले श्रोता दक्षिण की ओर बैठे,
वक्ता के ऊर्ध्व भाग में नहीं बैठना चाहिय क्योकि इसका निषेध है. इस प्रसंग में एक छोटी सी कथा है -
कथा अगले अंक में पढ़े
7/18/2010
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए.
पिता के मरने पर एक दिन धुन्धुकारी ने अपनी माता को भी खूब पीटा और कहा jaldi ब्बता धन कंहा गडा है, नहीं तो लातो के प्रहार से तुझे मार ही डालूगा. पुत्र के भय से व्याकुल धुधुली उसी रात कुए में गिरकर मर गयी. गोकर्ण पहले ही teerth यात्रा करने चले गए थे. उनका कोई शत्रु या मित्र न थे. घर में घुन्धुकारी अकेला रह गया था , उसने वहा पांच वेश्याये रख ली और चोरी के dhan से उनका पोषण कर कुकर्मो me निरत रहने लगा. एक दिन उन वेश्याओं ने उससे वस्त्र आभूषण लाने का आग्रह किया. वह कामांध कही से बहुत से भूषण वस्त्र चोरी कर ले भी आया. सोने चांदी के बहुमूल्य सामान को देखकर रात्री में वेश्याओ ने विचार किया की यह तो प्रतिदिन ही चोरी करता है, एक दिन राजा इसे पकड़कर मार ही देगा और साथ में हमें भी मरकर सारा धन छीन लेगा. इसलिए हम स्वयं ही क्यों न इसे मरकर धन लेकर कही अन्यत्र चली जाय. ऐसा निश्चय कर एक रात उन सबने सोते समय उसके हाथ पैर बाधकर गले में जलते अंगारे उसके मुख में ठूस दिए. अग्नि की ज्वाला से छटपटाकर वह मर गया, उसके मरते ही उन साहसी वेश्याओं ने वही गड्ढा खोदकर उसे गाड दिया. इस रहस्य का किसी को भी पता न चला . जब लोग धुन्धुकारी का हाल पूछते तो वेशाए कह देती की वह धन के लोभ में कही दूर चले गए है. आशा है, एक वर्ष में आ जायेगे.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
स्त्रियों का ह्रदय बड़ा कठोर होता है इसलिए उनका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए. पर यह बात पतिव्रताओ पर लागू नहीं hotee. बाद में वेश्याये सब धन लेकर एक दिन कही अन्यत्र चली गई और धुधुकारी अपने कुकर्मो से बड़ा भयंकर प्रेत हो गया. वह वायु रूप धारणकर, भूख प्यास से व्याकुल इधर-उधर भटकता चिल्लाता फिरता था. गोकर्ण ने कुछ काल बाद लोगो से उसका मरना सुनकर उसके निमित्त विधिपूर्वक गया श्राद्ध कर दिया. वे जिस किसी तीर्थ में जाते, उसके निमित्त श्राद्ध किया करते थे, एक दिन तीर्थाटन करते वे अपने घर आये,
रात्री में आँगन में सो रहे थे की आधी रात के समय धुधुकारी भयंकर रूप धारणकर उनके पास आया. वह कभी भेड़, कभी हाथी, कभी भैसा, कभी राजा, कभी अग्नि बनकर और फिर कभी साधारण पुरुष के रूप उनके पास आ खड़ा होता
गोकर्ण ने धैर्यपूर्वक उससे पूछा-अरे, तू कौन है ? प्रेत है, पिशाच है अथवा राक्षस है ? कैसे ऐसी दुर्गति को प्राप्त हो गया है ? यह पूछने पर धुधुकारी भयंकर ध्वनिका उच्च स्वर से रोने लगा किन्तु स्पष्ट कुछ बोल न सका. उसने केवल संकेत किया. तब गोकर्ण ने मन्त्र पढ़कर उसपर जल का छीटा मारा, जिससे उसका कुछ पाप नष्ट हुआ और उसे बोलने की शती प्राप्त हुई. उसने कहा-
मै तुम्हारा ही भाई धुन्धुकारी हूँ. मेरे कुकर्मो की संख्या नहीं. मैंने स्वयं अपने ब्रह्मनत्व का नाश कर डाला वेशाओ ने बुरी तरह मेरी हत्या कर मुझे गड्ढे में डाल दिया, जिससे मै प्रेत हो गया हूँ. केवल वायु पीकर रहता हूँ. मेरे दयालु भैया, मै बहुत प्यासा हूँ प्यासा हूँ. मुझे जल पिलाओ. मेरा मुख सुई के सामान है, मै स्वयं जल नहीं पी सकता, तुम्हारे वर दिया गया जल ही मुझे मिल सकेगा. मेरा उद्धार करो, मै बड़े कष्ट में हूँ. यह सुनकर गोकर्ण के नेत्रों में अश्रु छलक आये उन्होंने कहा-भैया मैंने तो तुम्हारे निमित्त गया में विधिपूर्वक पिंडदान भी कर दिया, फिर तुम मुक्त क्यों नहीं हुए ?
यह तो बड़ा आश्चर्य है, प्रेत ने कहा-भाई, गया में एक क्या सौ श्राद्ध करने पर भी मेरी मुक्ते न होगी. आप कई दूसरा उपाय सोचे. यह सुनकर गोकर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने कहा-भैया, तब तो तुम्हे इस योनी से मुक्त करना बड़ा ही कठिन है.
अच्छा इस समय तुम अपने स्थान पर चले जाओ, मै विचारकर तुम्हारी मुक्ति कोई दूसरा उपाय करूगा . गोकर्ण के कथनानुसार प्रेत अपने स्थान पर चला गया इधर गोकर्ण रात्री भर चिंतामग्न होकर उसकी मुक्ति का उपाय सोचते रहे किन्तु उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं . तब गोकर्ण ने बड़े-बड़े विद्वानों से इसके बारे में परामर्श किया किन्तु कोई भी कुछ उपाय बता न सका. इस पर सबकी सम्मति से गोकर्ण ने मन्त्र द्वारा सूर्य का स्ताम्भंकर उन्ही से मुक्ति का उपाय पूछा. सूर्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा-
भागवत के सप्ताह वाचन से इसकी मुक्ति होगी.
यह सुनकर गोकर्ण बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सप्ताह बांचने का निश्चय किया. इस निश्चय को सुनकर देश और ग्राम से बहुत बड़ी संख्या में जनता आने लगी. प्रेत भी अपने लिए स्थान खोजता हुआ सात ग्रंथि वाले एक बांस में आ घुसा. गोकर्ण ने प्रथम स्कंध से कथा आरम्भ की. सायंकाल जब कथा समाप्त हुई तब बांस की एक ग्रंथि फट गई. दूसरे दिन दूसरी ग्रंथी , तीसरे दिन तीसरी ग्रंथि, इसी प्रकार सात दिन में बॉस की सातो ग्रंथिया फट गई और धुन्धुकारी प्रेत योनी से मुक्त होकर पीताम्बर पहने मुकुट और कुण्डलो से सुशोभित दिव्य रूप धारणकर प्रकट हो गया, गोकर्ण को सप्रेम प्रणाम कर वह बोला-भैया, आपने मेरा उद्धार कर दिया, प्रेत बाधा दूर करने वाली भागवत की यह कथा धन्य है,
जिसके प्रभाव से मै आज प्रेत योनी से मुक्त हो गया हूँ. सप्ताह भी धन्य है, जिससे भगवद्धाम बैकुंठ की प्राप्ति होती है, जब मनुष्य सप्ताह सुनने का संकल्प करता है, तब उसके पाप कापने लगते है और कहते है यह कथा तो हमारा प्रलय ही कर डालेगी अब हम भागकर कहा जाय. पूर्वजन्म के पुण्यो से इस भारत वर्ष में जन्म पाकर भी जिसने सप्ताह की कथा का श्रवण नहीं किया, उसका जन्म देवताओं ने व्यर्थ बताया है, नाना प्रकार के सुन्दर सुस्वादु पकवानों के भोजन से जिस शरीर को परिपुष्ट किया जाता है, वह शरीर नश्वर है, इस प्रकार अस्थिर शरीर से जो मनुष्य स्थिर धर्म aadi का उपार्जन नहीं करता वह निरा पशु ही है,
जिस भागवत की कथा से सूखे बांस की ग्रंथिय फट गई उस कथा में दत्तचित्त होकर बैठे हुए मनुष्य की ह्रदय ग्रंथि नष्ट हो जाय तो आश्चर्य ही क्या है, इस कथा के श्रवण से भगवान शीघ्र ही ह्रदय में आ विराजते है और श्रोता के समस्त संशय तथा पाप ताप नष्ट कर उसे मुक्त कर देते है.
7/17/2010
कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ
तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अत्यंत रमणीय नगर था. उसमे आत्मदेव नामक एक तेजस्वी ब्रह्मण रहता था जो श्रोत एवं स्मार्त कर्म में पारंगत था. धनी होते हुए भी वह भिक्षु वृत्ति करता था. उसकी धुन्धुली नाम की पत्नी बड़ी ही कृपण एवं क्रूर स्वभाव की थी. अकारण ही झगडा कर वह pushtee भी अपनी ही बात की करती थी . ऐसे ही गृहस्थ जीवन में दोनों का बहुत समय बीत गया किन्तु कोई संतान न हुई. बाद में पुत्र के निमित्त नाना प्रकार के दान अनुष्ठान किये, पर कोई फल nahee. हुआ एक दिन चिंता से व्याकुल हो आत्मदेव वन में चला गया. वहां मध्यान्ह में पानी पीने वह एक तालाब पर गया. जल पीकर वह दुखिया वही बैठ गया. दो घड़ी बाद एक सन्यासी वहा आये. वह उनके चरणों पर गिर कर रोने लगा . सन्यासी ने kaha - अरे ब्रह्मण, रोते क्यों हो ? कौन सी चिंता है ? अपने दुःख का कुछ कारण तो कहो. ब्रह्मण ने कहा - महाराज, मैं अपना दुःख क्या कहू ! मैं बड़ा अभागा हूँ. मेरे पित्तर आसूओ को पीकर रहते है. मेरी दी हुई वस्तु देवता या ब्रह्मण भी ग्रहण नहीं करते . संतान न होने से ही मै अत्यंत दुखित हूँ. यहाँ प्राण त्यागने आया हूँ. पुत्र के बिना जीवन या कुल सब व्यर्थ है. अपना दुःख मै कहा तक बताऊ. मैंने जो गौ पाली, वह तक बंध्या हो गयी. वृक्ष लगाया, वह भी सूख गया. कोई मुझे फल दे जाता है तो वह भी मेरे हांथों में आते ही सूख जाता है,. ऐसे भाग्यहीन निरवंशी के जीने से क्या लाभ.
महाराज आप महादयावन है. नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, मेघ अपने लिए जल नहीं बरसते, संत महात्माओं की विभूतिया परोपकार के लिए होती है.
जो अपने से दूसरे के द्वारा अपने परिवार पर दीनों पर अपने भ्रत्यो पर दया नहीं करता उसके जीवन से क्या लाभ यो तो कौआ भी जीता है और अपना पेट भरता है. अर्थात जो दया या उपकार नहीं करता वह दूसरे जन्मा में कौआ होता है.
यह कहकर वह ब्रह्मण जोर-जोर से चिल्लाकर रोने लगा. उसे दुखित देखकर सन्यासी को दया आ गई. उन्होंने उसके मस्तक में लिखित ब्रह्माक्षर बांचे और कहा- हे ब्रह्मण , पुत्र का यह मोह छोड़ दो. कर्म की गति बड़ी बलवती है. उसे कोई टाल नहीं सकता. विवेक का आश्रय लेकर संसार वासना त्याग दे. मैंने तुम्हारा प्रारब्ध देख लिया है. उसमे सात जन्म तक तेरे पुत्र होने का योग नहीं है.
याद रखो संतान से तुम्हे सुख न होगा. रजा सगर एवं अंग की तरह दुःख ही भोगना पड़ेगा. इसलिए पुत्र का आग्रह छोड़ दो. संन्यास में सर्वथा सुख ही सुख है. ब्रह्मण ने कहा - दीनदयालु, इस सूखे विवेक से मेरा क्या होगा ? जैसे भी हो, आप मुझे पुत्र प्राप्ती का वर दे. अन्यथा मैं अभी आपके ही चरणों में प्राण त्याग दूगा.
ब्रह्मण का ऐसा आग्रह देखकर सन्यासी ने आम का एक फल उसके हाँथ में दिया और कहा - जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला देना. उससे तुम्हारे अत्यंत सुन्दर एक पुत्र होगा. यह कहकर सन्यासी चले गए. ब्रह्मण भी लौटकर घर आया. पत्नी को खाने के लिए वह फल देकर स्वयं किसी कार्य से बाहर चला गया.
इधर उसकी कुटिल पत्नी ने अपनी सखी से रोकर कहा - हे सखी, अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है. इस फल को मैं नहीं खाऊगी. इससे गर्भ होकर मेरा पेट बढ़ जाएगा. भूख मारी जाएगी. घर का काम काज भी न कर पाऊगी . उठाना बैठना भी कठिन हो जाएगा. कहीं गर्भ टेढ़ा हो गया तो मैं मर ही जाऊगी. मुझे अस्वस्थ देखकर कही मेरी ननद ही सब सामान उठा न ले जाय. पुत्र का लालन-पालन भी एक बड़ी समस्या है. मेरी समझ में तो बंध्या या विधवा नारीया सर्वथा सुखी है. ऐसे ही अनेक कुतर्क कर उसने वह फल नहीं खाया. जब पति ने आकर उससे पुछा की तुमने फल खाया तब उसने कह दिया हाँ खिला लिया.
एक दिन देवात उसके घर उसकी छोटी बहन आयी. उसने सारा वृतांत अपनी बहन को कह सुनाया . वह बोली तू चिंता न कर. मेरे गर्भ है. मैं अपने बच्चे को तुझे दे दूंगी. तब तक तू गर्भवती बनकर गुप्तरूप से घर में बैठी रह. मेरे पतिदेव को अपने स्वामी से धन दिला देना. वे बच्चा सौप देने में आपत्ती न करेंगे. मैं प्रचारित करा दूंगी की मेरा छेह मॉस का बच्चा मर गया. प्रतिदिन आकर मैं तेरे बच्चे का पालन पोषण करती रहूगी. तू परीक्षार्थ यह फल गौ को खिला दे./
स्त्री स्वाभाव से धुन्धुली ने वैसा ही किया. समय आने पर उसकी बहन के बालक हुआ और वह चुप चाप आकर एकांत में उसे अपना बच्चा दे गयी. पुत्र का जन्म सुनते ही आत्मदेव आनंद विभोर हो उठे. दरवाजे पर बाजों के साथ ही मांगलिक गान भी होने लगे. पत्नी ने स्वामी से कहा - मेरे स्तनों में दूध नहीं है. ऊपर के दूध से इसका पालन कठिन होगा. इसलिए आप मेरी बहन को बुला ले. वह बच्चे का पोषण कर देगी. सुना है, उसका बच्चा मर गया. पति ने ऐसा ही किया. उधर तीन मास बाद गौ के भी बच्चा हुआ. वह बालक इतना सुन्दर था की उसे देखने दूर-दूर से लोग आने लगे. उसके कान गौ के सामान होने से पति ने उसका नान गोकर्ण रखा. आगे चलकर वह बड़ा पंडित एवं ज्ञानी हुआ. इधर धुन्धुली का पुत्र धुन्धुकारी हुआ.
वह महा क्रूर प्रकृति का, दुराचारी एवं वेश्यागामी निकला. आचार विचार से हीन वह दीन और अंधे प्राणियों को सताता था, दूसरों का घर जला डालता था. कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ. खेल में बालको को ले जाकर कुए में डाल देता. उसने वेश्याओ के कुसंग में पड़कर पिता का सारा धन नष्ट कर डाला. एक दिन पिता को पीटकर वह उसके सोने-चांदी के सरे बर्तन ले गया. पिता को इससे बड़ा दुःख हुआ. वह रो रोकर कहने लगे की अब मैं कहा जाऊ, क्या करू, मेरा दुःख कौन दूर करेगा ? पुत्र न होना अच्छा है, किन्तु कुपुत्र का होना अच्छा नहीं.
उसी समय गोकर्ण ने आकर कहा-पिताजी, आप दुःख न करे. यह संसार ही असार है, यहाँ कौन किसका पुत्र और किसका धन. इन वस्तुओ में आसक्ति करने वाला सर्वदा जलता ही रहता है. इसलिए इन सबका मोह त्यागकर वन गमन करे.
पिताजी शरीर में हड्डी, मांस और रुधिर ही तो भरा है, आप इसमें अहंबुद्धि न करे, स्त्री-पुत्रादि की ममता त्यागकर जगत की क्षणभंगुरता पर ध्यान दें और वैराग्य धारण कर भगवान की भक्ती में लग जाए . इससे आपका सम्पूर्ण दुःख निवृत्त हो जायेगा.
काम्य धर्मों का त्याग कर निष्काम धर्म का आचरण करे, सत्पुरुषों का संग करे, विषय वासना को ह्रदय से हटा दे एवं दूसरो की स्तुति निंदा में न पड़कर भागवत कथा रूपी अमृत का सदा पान करे.
इस प्रकार पुत्र के उपदेश से आत्मदेव वन में चले गए और वहा प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण की सेवा एवं भागवत के दशम स्कंध के पाठ से भागवत-स्वरूप को प्राप्त हो गए.
शेष आगे के अंक में
महाराज आप महादयावन है. नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, मेघ अपने लिए जल नहीं बरसते, संत महात्माओं की विभूतिया परोपकार के लिए होती है.
जो अपने से दूसरे के द्वारा अपने परिवार पर दीनों पर अपने भ्रत्यो पर दया नहीं करता उसके जीवन से क्या लाभ यो तो कौआ भी जीता है और अपना पेट भरता है. अर्थात जो दया या उपकार नहीं करता वह दूसरे जन्मा में कौआ होता है.
यह कहकर वह ब्रह्मण जोर-जोर से चिल्लाकर रोने लगा. उसे दुखित देखकर सन्यासी को दया आ गई. उन्होंने उसके मस्तक में लिखित ब्रह्माक्षर बांचे और कहा- हे ब्रह्मण , पुत्र का यह मोह छोड़ दो. कर्म की गति बड़ी बलवती है. उसे कोई टाल नहीं सकता. विवेक का आश्रय लेकर संसार वासना त्याग दे. मैंने तुम्हारा प्रारब्ध देख लिया है. उसमे सात जन्म तक तेरे पुत्र होने का योग नहीं है.
याद रखो संतान से तुम्हे सुख न होगा. रजा सगर एवं अंग की तरह दुःख ही भोगना पड़ेगा. इसलिए पुत्र का आग्रह छोड़ दो. संन्यास में सर्वथा सुख ही सुख है. ब्रह्मण ने कहा - दीनदयालु, इस सूखे विवेक से मेरा क्या होगा ? जैसे भी हो, आप मुझे पुत्र प्राप्ती का वर दे. अन्यथा मैं अभी आपके ही चरणों में प्राण त्याग दूगा.
ब्रह्मण का ऐसा आग्रह देखकर सन्यासी ने आम का एक फल उसके हाँथ में दिया और कहा - जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला देना. उससे तुम्हारे अत्यंत सुन्दर एक पुत्र होगा. यह कहकर सन्यासी चले गए. ब्रह्मण भी लौटकर घर आया. पत्नी को खाने के लिए वह फल देकर स्वयं किसी कार्य से बाहर चला गया.
इधर उसकी कुटिल पत्नी ने अपनी सखी से रोकर कहा - हे सखी, अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है. इस फल को मैं नहीं खाऊगी. इससे गर्भ होकर मेरा पेट बढ़ जाएगा. भूख मारी जाएगी. घर का काम काज भी न कर पाऊगी . उठाना बैठना भी कठिन हो जाएगा. कहीं गर्भ टेढ़ा हो गया तो मैं मर ही जाऊगी. मुझे अस्वस्थ देखकर कही मेरी ननद ही सब सामान उठा न ले जाय. पुत्र का लालन-पालन भी एक बड़ी समस्या है. मेरी समझ में तो बंध्या या विधवा नारीया सर्वथा सुखी है. ऐसे ही अनेक कुतर्क कर उसने वह फल नहीं खाया. जब पति ने आकर उससे पुछा की तुमने फल खाया तब उसने कह दिया हाँ खिला लिया.
एक दिन देवात उसके घर उसकी छोटी बहन आयी. उसने सारा वृतांत अपनी बहन को कह सुनाया . वह बोली तू चिंता न कर. मेरे गर्भ है. मैं अपने बच्चे को तुझे दे दूंगी. तब तक तू गर्भवती बनकर गुप्तरूप से घर में बैठी रह. मेरे पतिदेव को अपने स्वामी से धन दिला देना. वे बच्चा सौप देने में आपत्ती न करेंगे. मैं प्रचारित करा दूंगी की मेरा छेह मॉस का बच्चा मर गया. प्रतिदिन आकर मैं तेरे बच्चे का पालन पोषण करती रहूगी. तू परीक्षार्थ यह फल गौ को खिला दे./
स्त्री स्वाभाव से धुन्धुली ने वैसा ही किया. समय आने पर उसकी बहन के बालक हुआ और वह चुप चाप आकर एकांत में उसे अपना बच्चा दे गयी. पुत्र का जन्म सुनते ही आत्मदेव आनंद विभोर हो उठे. दरवाजे पर बाजों के साथ ही मांगलिक गान भी होने लगे. पत्नी ने स्वामी से कहा - मेरे स्तनों में दूध नहीं है. ऊपर के दूध से इसका पालन कठिन होगा. इसलिए आप मेरी बहन को बुला ले. वह बच्चे का पोषण कर देगी. सुना है, उसका बच्चा मर गया. पति ने ऐसा ही किया. उधर तीन मास बाद गौ के भी बच्चा हुआ. वह बालक इतना सुन्दर था की उसे देखने दूर-दूर से लोग आने लगे. उसके कान गौ के सामान होने से पति ने उसका नान गोकर्ण रखा. आगे चलकर वह बड़ा पंडित एवं ज्ञानी हुआ. इधर धुन्धुली का पुत्र धुन्धुकारी हुआ.
वह महा क्रूर प्रकृति का, दुराचारी एवं वेश्यागामी निकला. आचार विचार से हीन वह दीन और अंधे प्राणियों को सताता था, दूसरों का घर जला डालता था. कुत्ते पालने वाला तथा चोर वह निपट चंडाल सिद्ध हुआ. खेल में बालको को ले जाकर कुए में डाल देता. उसने वेश्याओ के कुसंग में पड़कर पिता का सारा धन नष्ट कर डाला. एक दिन पिता को पीटकर वह उसके सोने-चांदी के सरे बर्तन ले गया. पिता को इससे बड़ा दुःख हुआ. वह रो रोकर कहने लगे की अब मैं कहा जाऊ, क्या करू, मेरा दुःख कौन दूर करेगा ? पुत्र न होना अच्छा है, किन्तु कुपुत्र का होना अच्छा नहीं.
उसी समय गोकर्ण ने आकर कहा-पिताजी, आप दुःख न करे. यह संसार ही असार है, यहाँ कौन किसका पुत्र और किसका धन. इन वस्तुओ में आसक्ति करने वाला सर्वदा जलता ही रहता है. इसलिए इन सबका मोह त्यागकर वन गमन करे.
पिताजी शरीर में हड्डी, मांस और रुधिर ही तो भरा है, आप इसमें अहंबुद्धि न करे, स्त्री-पुत्रादि की ममता त्यागकर जगत की क्षणभंगुरता पर ध्यान दें और वैराग्य धारण कर भगवान की भक्ती में लग जाए . इससे आपका सम्पूर्ण दुःख निवृत्त हो जायेगा.
काम्य धर्मों का त्याग कर निष्काम धर्म का आचरण करे, सत्पुरुषों का संग करे, विषय वासना को ह्रदय से हटा दे एवं दूसरो की स्तुति निंदा में न पड़कर भागवत कथा रूपी अमृत का सदा पान करे.
इस प्रकार पुत्र के उपदेश से आत्मदेव वन में चले गए और वहा प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण की सेवा एवं भागवत के दशम स्कंध के पाठ से भागवत-स्वरूप को प्राप्त हो गए.
शेष आगे के अंक में
7/16/2010
छान्दोग्य उपनिषद ने उपाय बताया - श्रीमदभागवत का श्रवण करो
नारदजी ने सोचा की ज्ञान और वैराग्य के बिना तो भक्ति पूर्ण होती ही नहीं. यदि भक्ति में ज्ञान और वैराग्य नहीं है तो भक्ति किसकी? जिस भगवान की भक्ति की जाती है उनका ही दर्शन नहीं हो रहा है, ज्ञान नहीं हो रहा है और जिस प्रपंच से, संसार से मन को हटाकर भगवान की भक्ति की जाती है, उसके प्रति वैराग्य नहीं है. यदि भगवान से प्रेम हो तो संसार से अर्थात ममता से, मोह से और उन समस्त संबंधों से, जिनमे हम फंसे हुए है, हमें वैराग्य होना चाहिए.
पर नारद जी को न तो वहां जाग्रतावस्था में वैराग्य दिखा और न ज्ञान. ये दोनों भक्ति के पुत्र है, फल है. जब भक्तिभाव ह्रदय में आता है तब भजनीय भगवान का ज्ञान होता है और उसके सिवाय किसी दूसरे से राग-द्वेष नहीं होता. राग-देवश की शिथिलता, राग-द्वेष के अभाव का नाम ही वैराग्य है. हम किसी एक से तो प्रेम करें और दुसरे से द्वेष करें तो इसका फल यह होगा के हम जिससे राग-द्वेष करेंगे वह आकर भगवान की जगह हमारे ह्रदय में बैठ जायगा. फिर भगवान नहीं दिखेंगे, हमारे ह्रदय में वह शत्रु दीखेंगा जिससे द्वेष है, वह मित्र दिखेगा- जिससे राग है. इस प्रकार भगवान के स्थान पर संसार की नफरत, दोनी नहीं चलती. वहां तो ह्रदय में शुद्ध रूप से भगवान होने चाहिए.
नारदजी एक ओर तो संसार की अशांति से, संघर्ष से, वैमनस्यसे, तीर्थ आदि पवित्र स्थानों में भी काम क्रोध की अधिकता से दुखी थे ही, दूसरी ओर भक्ति की अपूर्णता, अस्वस्थता तथा अप्रसन्नता देखकर और भी दुखी हो गए, नारदजी ने भक्ति की प्रार्थना पर उसे सुखी करने का उपाय सोच, ध्यान किया. इतने में आकाशवाणी हुई की तुम्हारे मन में जो दुःख है, भक्ति को जो क्लेश है, ज्ञान वैराग्य की जो मूर्छा है, उसके निवारण का उपाय जब तुम्हे संत मिलेंगे तब बताएँगे.
इसके बाद नारदजी ने अपने गुरु सनकादिकों की शरण में गए. सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमा - ये चारों श्रुति प्रसिद्ध मुनीश्वर है. इन्होने तत्वोप्देश करके नारदजी का शोक दूर किया. छान्दोग्य उपनिषद ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य को जाग्रत करने के लिए यह उपाय बताया की श्रीमदभागवत का श्रवण करो. फिर उन्होंने स्वयं ही श्रीमद्भागवत का श्रवण कराया और उसके फलस्वरूप भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पुष्ट-तुष्ट हो गए.
पर नारद जी को न तो वहां जाग्रतावस्था में वैराग्य दिखा और न ज्ञान. ये दोनों भक्ति के पुत्र है, फल है. जब भक्तिभाव ह्रदय में आता है तब भजनीय भगवान का ज्ञान होता है और उसके सिवाय किसी दूसरे से राग-द्वेष नहीं होता. राग-देवश की शिथिलता, राग-द्वेष के अभाव का नाम ही वैराग्य है. हम किसी एक से तो प्रेम करें और दुसरे से द्वेष करें तो इसका फल यह होगा के हम जिससे राग-द्वेष करेंगे वह आकर भगवान की जगह हमारे ह्रदय में बैठ जायगा. फिर भगवान नहीं दिखेंगे, हमारे ह्रदय में वह शत्रु दीखेंगा जिससे द्वेष है, वह मित्र दिखेगा- जिससे राग है. इस प्रकार भगवान के स्थान पर संसार की नफरत, दोनी नहीं चलती. वहां तो ह्रदय में शुद्ध रूप से भगवान होने चाहिए.
नारदजी एक ओर तो संसार की अशांति से, संघर्ष से, वैमनस्यसे, तीर्थ आदि पवित्र स्थानों में भी काम क्रोध की अधिकता से दुखी थे ही, दूसरी ओर भक्ति की अपूर्णता, अस्वस्थता तथा अप्रसन्नता देखकर और भी दुखी हो गए, नारदजी ने भक्ति की प्रार्थना पर उसे सुखी करने का उपाय सोच, ध्यान किया. इतने में आकाशवाणी हुई की तुम्हारे मन में जो दुःख है, भक्ति को जो क्लेश है, ज्ञान वैराग्य की जो मूर्छा है, उसके निवारण का उपाय जब तुम्हे संत मिलेंगे तब बताएँगे.
इसके बाद नारदजी ने अपने गुरु सनकादिकों की शरण में गए. सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमा - ये चारों श्रुति प्रसिद्ध मुनीश्वर है. इन्होने तत्वोप्देश करके नारदजी का शोक दूर किया. छान्दोग्य उपनिषद ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य को जाग्रत करने के लिए यह उपाय बताया की श्रीमदभागवत का श्रवण करो. फिर उन्होंने स्वयं ही श्रीमद्भागवत का श्रवण कराया और उसके फलस्वरूप भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पुष्ट-तुष्ट हो गए.
7/15/2010
वृन्दावन में अलौकिक अनुभूती हुई
ಅ उद्धवजी ने भगवन श्रीकृष्ण से प्रार्थना की की महाराज, आप तो अपने भक्तों का कार्य पूरा करके, उनको सुख देकर अंतर्धान हो जावेगे. फिर आपका, आपकी लीला का, आपके द्वारा प्रतिपादित धर्म का दर्शन कहाँ होगा?
भगवन श्रीकृष्ण ने कहा की उद्धवजी मैं पहले तो अंतर्धान होकर वैकुण्ठ या क्षीरसागर में चला जाया करता था. पर अवकी वर अंतर्धान होने पर मैं वैकुण्ठ या क्षीरसागर में नहीं जाऊंगा, श्रीमद्भागवत-रूप समुद्र में ही निवास करूंगा-
तिरोधाय प्रविश्तोयम श्रीमाद्भाग्वातार्दावं.
अतः भगवन श्रीकृष्ण बाहर से तो अंतर्धान हुए, परन्तु श्रीमद्भागवत रूप अमृत समुद्र में आकर बैठ गए. वही भगवान की प्रत्यक्षा वन्ग्मायी शब्दमयी मूर्ति हम लोगो की आँखों के सामने है-
तेनेयं वान्ग्मायी मूर्तिः प्रत्यक्षण वर्तते हरेह.
भक्त लोग श्रीक्रिश्नाव्तार के समय अपने नेत्रों और अन्य समग्र इन्द्रियों के द्वारा जिस रस का आस्वादन करे हैं, वही रस आज भी हम श्रीमद्भागवत के श्रवण द्वारा प्राप्त कर सकते है. वह सुख परीक्षा का विषय नहीं, प्रत्यक्षा का विषय है, क्योंकि भगवान कहीं पर्लूक में नहीं गए, अंतर्धान नहीं हुए, श्रीमद्भागवत के रूप में स्वयं प्रकट है.
इसीसे जब यह प्रश् उठा की भाग्वाताम्रत किसे पिलाया जाय- परीक्षित को या देवताओं को तो श्री शुकदेवजी महाराज ने देवताओं को उपेक्षित कर दिया, और परीक्षित को ही भाग्व्ताम्रत पिलाया. भला कहाँ तो श्रीमाद्भाग्वाटका अमृत और कहाँ स्वर्ग का अमृत? दोनों की दोई तुलना नहीं है.
एक बात ध्यान देना योग्य है, जिसपर पहले लौकिक-द्रष्टि से विचार करत हैं. नारदजी ने सम्पूर्ण प्रथिवी में भ्रमण किया और फिर धर्मप्रधान भारतवर्ष में, भरतखंड में आये. यहाँ उन्होंने भिन्न-भिन्न तीर्थों की यात्रा की, लेकिन उन्हें कही भी शांति, सुख तथा धर्म परायणता के दर्शन नहीं हुए. अत्यंत व्याकुल होकर जब वे वृन्दावन में यामुनाजीके तट पर आये तब वहां उनको अलौकिक अनुभूति हुई. जो वस्तु आँखों से नहीं दिखती, वह उन्हें वृन्दावन में देखने को मिली.
भक्ति-ज्ञान-वैराग्य - ये सब अमूर्त भाव है. इनकी मूर्ती का नहीं, इनके भाव का ही दर्शन होता है. ह्रदय में ही भक्ति आती है, ज्ञान आता है, वैराग्य आता है. लौकिक दशा में इन अलौकिक देवताओं का साक्षात्कार किसी को नहीं होता.
परन्तु नारदजी जब वृन्दावन में आये तो वहां उनके सामने अमूर्त भी मूर्त हो गया, भाव भी साकार हो गया, उन्होंने देखा की वहां भक्ती तो है युवती-सुन्दर, भगवन्मयी किन्तु उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हैं अर्थात वृन्दावन में भक्ति का तो बहुत आदर है, परन्तु ज्ञान-वैराग्य का आदर नहीं है. लोगो ने ज्ञान वैराग्य से रहित भक्ति को स्वीकार किया है.
भगवन श्रीकृष्ण ने कहा की उद्धवजी मैं पहले तो अंतर्धान होकर वैकुण्ठ या क्षीरसागर में चला जाया करता था. पर अवकी वर अंतर्धान होने पर मैं वैकुण्ठ या क्षीरसागर में नहीं जाऊंगा, श्रीमद्भागवत-रूप समुद्र में ही निवास करूंगा-
तिरोधाय प्रविश्तोयम श्रीमाद्भाग्वातार्दावं.
अतः भगवन श्रीकृष्ण बाहर से तो अंतर्धान हुए, परन्तु श्रीमद्भागवत रूप अमृत समुद्र में आकर बैठ गए. वही भगवान की प्रत्यक्षा वन्ग्मायी शब्दमयी मूर्ति हम लोगो की आँखों के सामने है-
तेनेयं वान्ग्मायी मूर्तिः प्रत्यक्षण वर्तते हरेह.
भक्त लोग श्रीक्रिश्नाव्तार के समय अपने नेत्रों और अन्य समग्र इन्द्रियों के द्वारा जिस रस का आस्वादन करे हैं, वही रस आज भी हम श्रीमद्भागवत के श्रवण द्वारा प्राप्त कर सकते है. वह सुख परीक्षा का विषय नहीं, प्रत्यक्षा का विषय है, क्योंकि भगवान कहीं पर्लूक में नहीं गए, अंतर्धान नहीं हुए, श्रीमद्भागवत के रूप में स्वयं प्रकट है.
इसीसे जब यह प्रश् उठा की भाग्वाताम्रत किसे पिलाया जाय- परीक्षित को या देवताओं को तो श्री शुकदेवजी महाराज ने देवताओं को उपेक्षित कर दिया, और परीक्षित को ही भाग्व्ताम्रत पिलाया. भला कहाँ तो श्रीमाद्भाग्वाटका अमृत और कहाँ स्वर्ग का अमृत? दोनों की दोई तुलना नहीं है.
एक बात ध्यान देना योग्य है, जिसपर पहले लौकिक-द्रष्टि से विचार करत हैं. नारदजी ने सम्पूर्ण प्रथिवी में भ्रमण किया और फिर धर्मप्रधान भारतवर्ष में, भरतखंड में आये. यहाँ उन्होंने भिन्न-भिन्न तीर्थों की यात्रा की, लेकिन उन्हें कही भी शांति, सुख तथा धर्म परायणता के दर्शन नहीं हुए. अत्यंत व्याकुल होकर जब वे वृन्दावन में यामुनाजीके तट पर आये तब वहां उनको अलौकिक अनुभूति हुई. जो वस्तु आँखों से नहीं दिखती, वह उन्हें वृन्दावन में देखने को मिली.
भक्ति-ज्ञान-वैराग्य - ये सब अमूर्त भाव है. इनकी मूर्ती का नहीं, इनके भाव का ही दर्शन होता है. ह्रदय में ही भक्ति आती है, ज्ञान आता है, वैराग्य आता है. लौकिक दशा में इन अलौकिक देवताओं का साक्षात्कार किसी को नहीं होता.
परन्तु नारदजी जब वृन्दावन में आये तो वहां उनके सामने अमूर्त भी मूर्त हो गया, भाव भी साकार हो गया, उन्होंने देखा की वहां भक्ती तो है युवती-सुन्दर, भगवन्मयी किन्तु उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हैं अर्थात वृन्दावन में भक्ति का तो बहुत आदर है, परन्तु ज्ञान-वैराग्य का आदर नहीं है. लोगो ने ज्ञान वैराग्य से रहित भक्ति को स्वीकार किया है.
7/14/2010
गाँव की प्रगति से ही देश सम्पन्न होगा
आज हर देशवासी बड़ा असहाय होकर कह रहा है की हमारे गाँव बहुत ज्यादा पिछड़े हुए है. दुर्भाग्य से यह सत्य है. परन्तु वास्तविक स्थिति यह है की हमारे गाँव में वे सब वस्तुए विद्यमान हैं, जिनसे वे शहरों से भी अधिक सुन्दर और संपन्न बन सकते हैं. इससे शहरों का सदियों से बना हुआ प्रभुत्व छीन नहीं जाएगा; बल्कि शहरों को और अधिक सुन्दर और स्वस्थ बनाने में सहायता होगी. गाँव स्वस्थ होंगे तो दूध, फल, सब्जियां, अनाज और
दालें स्वाथ्यवर्धक होंगी; गांवों से शहरों की और पलायन रुकने से शहर में मिलने वाला जल और वायु भी अच्छा होगा. इससे पूरे पर्यावरण पर सार्थक प्रभाव पड़ेगा.
यह देश का दुर्भाग्य है की यहाँ के उद्योगपतियों का ध्यान गाँव से सम्बंधित उद्योग लगाने की और उचित मात्रा में नहीं गया, हलाकि शहरों की हर आवश्यक वस्तु विशेषकर स्वास्थ्यवर्धक खाने-पीने का सामान, कपड़ो के लिए कपास, रहने के भवनों के लिए ईट इत्यादि की उपलब्धी गांवों पर ही निर्भर करती है. गांवों में वे उद्योग लगें जो वहा का कच्चा माल जैसे दूध, गोबर, गोमूत्र, फल, सब्जियां इत्यादि की खपत करें तो गांवों का आर्थिक और शहरों का स्वस्थ्य संबंधी पक्ष मजबूत होगा. जबसे भारत सरकार और इसके adhikariyon ने रासायनिक खाद पर भारी
आर्थिक सहायता देना और कीटनाशक दवाओं का आयात करना प्रारंभ किया; तबसे फल, दालें, अनाज और सब्जयों के जहरीले होने से शहरवाले कई नई बीमारियों के शिकार होने लगे है. ये सब वस्तुए गांवों के खेतों से ही आती हैं. फलस्वरूप शहरों में बड़े छोटे अस्पतालों और नर्सिंग होमों की भरमार हो गई. हर दूसरा व्यक्ति मधुमेह, रक्तचाप और ह्रदयरोग से ग्रस्त है. शहरों में डाक्टरों की आवश्यकता इतनी बड़ी की हर डॉक्टर आर्थिक द्रष्टि से संपन्न हुआ और दवाओं का व्यापार सबसे अच्छा धंधा बन गया, केमिस्टों की दुकाने दवाओं से लबालब भरी हैं और दवा लेने वालों की न समाप्त होनेवाली लाईन लगी हैं. यह विडम्बना ही है.
विदेशी उद्योगपतियों का प्रभाव
स्वंतंत्रता के पश्चात सरकार की बहुत सारी आर्थिक नीतियां तथा कथित विकसित देशों के सुझावों और इशारों पर चलती रही है और अब भी चल रही है. भारतीय विशेषज्ञों के कहने के बावजूद की देशी गाय के गोबर से बनी खाद प्रथ्वी का प्राकृतिक पोषक आहार है, भारत सरकार रासायनिक खाद का लगातार आयात कर रही है. रासायनिक खाद बनानेवाली विदेशी कंपनियों के प्रलोभन देने पर सरकारी अफसरों ने भारत सरकार की ओर से भारी आर्थिक सहायता देकर किसानों को केमिकल फर्टिलाइजर के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. भोले-भाले किसान रासायनिक खाद के प्रारंभिक परिणामों से प्रभावित होकर इसका व्यापक प्रयोग करने लगे. कुछ ही वर्षों के प्रयोग से जब धरती की उर्वरा शक्ति kam हो गयी तो किसानों की फसलें नष्ट होनी प्रारंभ हुई, किसान बैंकों और महाजनों से भारी सूद पर कर्जा लेने को बाध्य हो गए. ऋण का भुगतान न होने पर किसानों ने आत्महत्या का सहारा लिया. कसानों ने सोचा आत्महत्या करने से उनके परिवार की आर्थिक समस्याओं का हल हो जायेगे; क्योंके अब तो कुछ राज्य सरकारों ने भी आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को अच्छी सहायता देने के कानून भी बना दिए हैं. आत्महत्या के आकडे चौका देनवाले हैं. पिछले चार वर्षों में दर्ज हुए आत्महत्या के १५० लाख मामले भारत के स्वंत्रता के बाद के आर्थिक पक्ष पर एक न मिटने वाला कलंक है.
जैविक खाद भूमि पोषक
हम ऐसी भयानक स्थिति से कैसे उबरें? भारत सरकार का ध्यान गाँव की समस्याओं की ओर कदापि नहीं जा रहा. पत्रिकाओं और टी वही पर किसानों की आत्महत्याओं की चर्चाओं के कारण भारत सरकार ने और कुछ राज्य सरकारों ने जल्दी से आदेश पारितकर किसानों के बैंकों के ऋण तो माफ़ कर दिए, परन्तु यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं. सरकार जल्दी से निर्णय लेकर केमिकल फर्तिलैजर का आयात बंद करे और युद्ध स्तर पर किसानों को विभिन्न प्रकार की गोबर की खाद बनाने का व्यापक प्रशिक्षण दे. समय-समय पर इस प्रश्नों को उठाया गया, केमिकल फर्टिलाइजर की विदेशी कंपनियों के भारत रह रहे अधिकारी आदि पैसे के जोर से अपनी लोबी इतनी मजबूत रखते है, जिससे सरकार उनसे आयात की हुई खाद पर आर्थिक सहायत देकर सीधे-सादे किसानों को इसको खरीदने का प्रलोभन देकर मनवा लेती है.
स्वयंसेवी संस्थाओं का योगदान
इन सब दुष्प्रभावों को रोकने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थान किसानों को रासायनिक खादों का प्रयोग न करने की सलाह दे रही है. थोड़े से उधोगपति भी किसानों को ग्रीन एग्रीकल्चर करने का प्रोत्साहन दे रहे हैं. कई उद्योगपति स्वयं भी गो- गोबर आधारित कृषि कर रहे हैं और ऐसी ही कृषि से उत्पादित वस्तुए किसानों से अधिक मूल्य देकर खरीद रहे है. इसका व्यापक प्रभाव तब हो, जब हजारों छोटे-बड़े उद्योगपति किसानों से जैविक खेती करवाए, किसानों से ऐसी खेती से उपार्जित अनाज, फल, सब्जियां और दालें छोटे-बड़े शहरों में बेचें. इससे किसान तो पनपेंगें ही, ये वस्तुए फैलते हुए रोगों को रोकेंगी, लोग स्वस्थ होंगे, उनकी कार्य क्षमता बढ़ेगी, जिससे देश संपन्न होगा. जब जैविक खाद की महिमा बढ़ेगी तो किसान देशी गाय भी पालेंगे, जिसके गोबर से वह विभिन्न प्रकार की खाद बनाकर अपने खेतों की उर्वरा शक्ति फिर से वापस लायेगा और अपनी जरूरत से अधिक खाद को बेंचकर आर्थिक लाभ भी ले सकता है. वास्तव में इस विकट स्थिति में उद्द्योगपतियों को आगें आकर गाँव और गायों की स्थिति को ठीक करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए. वे गांवों में जैविक खाद द्वारा कृषि कराये और गो-उत्पादों जैसे गोबर, गोमूत्र और दूध- संबंधी उद्योग लगाए, जिससे गांवों और देश की सर्वांग उन्नति ही. इस प्रकार शहर और ग्राम अपनी आर्थिक और स्वस्थ्य संबंधी उन्नति में एक दुसरे के पूरक बन सकेंगे.
दालें स्वाथ्यवर्धक होंगी; गांवों से शहरों की और पलायन रुकने से शहर में मिलने वाला जल और वायु भी अच्छा होगा. इससे पूरे पर्यावरण पर सार्थक प्रभाव पड़ेगा.
यह देश का दुर्भाग्य है की यहाँ के उद्योगपतियों का ध्यान गाँव से सम्बंधित उद्योग लगाने की और उचित मात्रा में नहीं गया, हलाकि शहरों की हर आवश्यक वस्तु विशेषकर स्वास्थ्यवर्धक खाने-पीने का सामान, कपड़ो के लिए कपास, रहने के भवनों के लिए ईट इत्यादि की उपलब्धी गांवों पर ही निर्भर करती है. गांवों में वे उद्योग लगें जो वहा का कच्चा माल जैसे दूध, गोबर, गोमूत्र, फल, सब्जियां इत्यादि की खपत करें तो गांवों का आर्थिक और शहरों का स्वस्थ्य संबंधी पक्ष मजबूत होगा. जबसे भारत सरकार और इसके adhikariyon ने रासायनिक खाद पर भारी
आर्थिक सहायता देना और कीटनाशक दवाओं का आयात करना प्रारंभ किया; तबसे फल, दालें, अनाज और सब्जयों के जहरीले होने से शहरवाले कई नई बीमारियों के शिकार होने लगे है. ये सब वस्तुए गांवों के खेतों से ही आती हैं. फलस्वरूप शहरों में बड़े छोटे अस्पतालों और नर्सिंग होमों की भरमार हो गई. हर दूसरा व्यक्ति मधुमेह, रक्तचाप और ह्रदयरोग से ग्रस्त है. शहरों में डाक्टरों की आवश्यकता इतनी बड़ी की हर डॉक्टर आर्थिक द्रष्टि से संपन्न हुआ और दवाओं का व्यापार सबसे अच्छा धंधा बन गया, केमिस्टों की दुकाने दवाओं से लबालब भरी हैं और दवा लेने वालों की न समाप्त होनेवाली लाईन लगी हैं. यह विडम्बना ही है.
विदेशी उद्योगपतियों का प्रभाव
स्वंतंत्रता के पश्चात सरकार की बहुत सारी आर्थिक नीतियां तथा कथित विकसित देशों के सुझावों और इशारों पर चलती रही है और अब भी चल रही है. भारतीय विशेषज्ञों के कहने के बावजूद की देशी गाय के गोबर से बनी खाद प्रथ्वी का प्राकृतिक पोषक आहार है, भारत सरकार रासायनिक खाद का लगातार आयात कर रही है. रासायनिक खाद बनानेवाली विदेशी कंपनियों के प्रलोभन देने पर सरकारी अफसरों ने भारत सरकार की ओर से भारी आर्थिक सहायता देकर किसानों को केमिकल फर्टिलाइजर के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. भोले-भाले किसान रासायनिक खाद के प्रारंभिक परिणामों से प्रभावित होकर इसका व्यापक प्रयोग करने लगे. कुछ ही वर्षों के प्रयोग से जब धरती की उर्वरा शक्ति kam हो गयी तो किसानों की फसलें नष्ट होनी प्रारंभ हुई, किसान बैंकों और महाजनों से भारी सूद पर कर्जा लेने को बाध्य हो गए. ऋण का भुगतान न होने पर किसानों ने आत्महत्या का सहारा लिया. कसानों ने सोचा आत्महत्या करने से उनके परिवार की आर्थिक समस्याओं का हल हो जायेगे; क्योंके अब तो कुछ राज्य सरकारों ने भी आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को अच्छी सहायता देने के कानून भी बना दिए हैं. आत्महत्या के आकडे चौका देनवाले हैं. पिछले चार वर्षों में दर्ज हुए आत्महत्या के १५० लाख मामले भारत के स्वंत्रता के बाद के आर्थिक पक्ष पर एक न मिटने वाला कलंक है.
जैविक खाद भूमि पोषक
हम ऐसी भयानक स्थिति से कैसे उबरें? भारत सरकार का ध्यान गाँव की समस्याओं की ओर कदापि नहीं जा रहा. पत्रिकाओं और टी वही पर किसानों की आत्महत्याओं की चर्चाओं के कारण भारत सरकार ने और कुछ राज्य सरकारों ने जल्दी से आदेश पारितकर किसानों के बैंकों के ऋण तो माफ़ कर दिए, परन्तु यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं. सरकार जल्दी से निर्णय लेकर केमिकल फर्तिलैजर का आयात बंद करे और युद्ध स्तर पर किसानों को विभिन्न प्रकार की गोबर की खाद बनाने का व्यापक प्रशिक्षण दे. समय-समय पर इस प्रश्नों को उठाया गया, केमिकल फर्टिलाइजर की विदेशी कंपनियों के भारत रह रहे अधिकारी आदि पैसे के जोर से अपनी लोबी इतनी मजबूत रखते है, जिससे सरकार उनसे आयात की हुई खाद पर आर्थिक सहायत देकर सीधे-सादे किसानों को इसको खरीदने का प्रलोभन देकर मनवा लेती है.
स्वयंसेवी संस्थाओं का योगदान
इन सब दुष्प्रभावों को रोकने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थान किसानों को रासायनिक खादों का प्रयोग न करने की सलाह दे रही है. थोड़े से उधोगपति भी किसानों को ग्रीन एग्रीकल्चर करने का प्रोत्साहन दे रहे हैं. कई उद्योगपति स्वयं भी गो- गोबर आधारित कृषि कर रहे हैं और ऐसी ही कृषि से उत्पादित वस्तुए किसानों से अधिक मूल्य देकर खरीद रहे है. इसका व्यापक प्रभाव तब हो, जब हजारों छोटे-बड़े उद्योगपति किसानों से जैविक खेती करवाए, किसानों से ऐसी खेती से उपार्जित अनाज, फल, सब्जियां और दालें छोटे-बड़े शहरों में बेचें. इससे किसान तो पनपेंगें ही, ये वस्तुए फैलते हुए रोगों को रोकेंगी, लोग स्वस्थ होंगे, उनकी कार्य क्षमता बढ़ेगी, जिससे देश संपन्न होगा. जब जैविक खाद की महिमा बढ़ेगी तो किसान देशी गाय भी पालेंगे, जिसके गोबर से वह विभिन्न प्रकार की खाद बनाकर अपने खेतों की उर्वरा शक्ति फिर से वापस लायेगा और अपनी जरूरत से अधिक खाद को बेंचकर आर्थिक लाभ भी ले सकता है. वास्तव में इस विकट स्थिति में उद्द्योगपतियों को आगें आकर गाँव और गायों की स्थिति को ठीक करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए. वे गांवों में जैविक खाद द्वारा कृषि कराये और गो-उत्पादों जैसे गोबर, गोमूत्र और दूध- संबंधी उद्योग लगाए, जिससे गांवों और देश की सर्वांग उन्नति ही. इस प्रकार शहर और ग्राम अपनी आर्थिक और स्वस्थ्य संबंधी उन्नति में एक दुसरे के पूरक बन सकेंगे.
7/13/2010
इन नामों को लेने से विष का प्रभाव नहीं पड़ता
इन बारह नामों का जो नित्य प्रातः काल उठकर स्नान के समय या सोते समय पाठ करता है, उस पर किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नहीं पड़ता, उसे कोई हिंसक प्राणी मार नहीं सकता, युध्ध में तथा व्यहार में उसे विजय प्राप्त होती है, वह बंधन से मुक्ति प्राप्त कर लेता है और उसे यात्रा में सिध्धि मिलती है.
महात्मा गरुड़ के बारह नाम इस प्रकार हैं -
१ सुपर्ण यानी सुन्दर पंखों वाला,
२ वैनतेय यानी विनता के के पुत्र,
३ नागारी यानी नागों के शत्रु,
४ नागभीषण यानी नागों के लिए भयंकर,
५ जितान्तक यानी काल को भी जीत लेने वाले,
६ विषारी यानी विष के शत्रु,
७ अजित यानी अपराजेय,
८ विश्वरूपी यानी सर्वस्वरूप,
९ गरुत्मान यानी अतिशय पराक्रम सम्पन्न,
१० खगश्रेष्ठ यानी पक्षियों में सर्वश्रेष्ठ,
११ तार्क्ष्य यानी गरुड़ तथा
१२ कश्यप्नंदन यानी महर्षि कश्यप के पुत्र -
महात्मा गरुड़ के बारह नाम इस प्रकार हैं -
१ सुपर्ण यानी सुन्दर पंखों वाला,
२ वैनतेय यानी विनता के के पुत्र,
३ नागारी यानी नागों के शत्रु,
४ नागभीषण यानी नागों के लिए भयंकर,
५ जितान्तक यानी काल को भी जीत लेने वाले,
६ विषारी यानी विष के शत्रु,
७ अजित यानी अपराजेय,
८ विश्वरूपी यानी सर्वस्वरूप,
९ गरुत्मान यानी अतिशय पराक्रम सम्पन्न,
१० खगश्रेष्ठ यानी पक्षियों में सर्वश्रेष्ठ,
११ तार्क्ष्य यानी गरुड़ तथा
१२ कश्यप्नंदन यानी महर्षि कश्यप के पुत्र -
7/04/2010
आज बच्चा माँ से कम, मीडिया से ज्यादा प्रभावित हो रहा है.
जवानी पर ज्यादा मत इतराना क्योंकि जवानी सिर्फ चार दिनों की है. अतः कानो में बहरापन आवे, इससे पहले ही जो सुनने जैसा है, उसे सुन लेना. पैरों में लग्दानापन आवे, इससे पहले ही दोद कर तीर्थ यात्रा कर लें. आँखों में अंधापन आवे, इससे पहले ही अपने स्वरुप को निहार लें. वाणी में गूंगापन आवे, इससे पहले ही कुछ मीठे बोल बोल लेना. हाथों में लूलापन आवे, इससे पहले ही दान पुण्य कर डालना. दिमाग में पागलपन आवे, इससे पहले ह ई प्रभु के हो जाना.
पैसा कमाने के लिए कलेजा चैये. मगर दान करने के लिए उल्लसे भी बड़ा कलेजा चाहिए. दुनिया कहती है फड पैसे तो हाथ का मेल है. मैं पैसे को ऐसी गाली कभी नहीं दूंगा. जीवन और जगत में पैसे का अपना मूल्य है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. मगर यह भी सही है के जीवन में पैसे कुछ हो सकता है, कुछ-कुछ भी हो सकता है, और बहुत कुछ भी हो सकता है मगर सब कुछ नहीं हो सकता. और जो लोग पैसे को ही सब कुछ मान लेते हैं वे पैसे के खातिर अपनी आत्मा को बेचने के लिए भी तैयार हो जाते हैं.
कहा जाता है की बच्चे पर माँ का प्रभाव पड़ता है. लेकिन आज बच्चा माँ से कम, मीडिया से ज्यादा प्रभावित हो रहा है. कल तक कहा जाता था की यह बच्चा अपनी माँ पर गया है और यह बाप पर. मगर आज जिस तरह से देशी-विदेशी चैनल हिंसा और अश्लीलता परोस रहे हैं. उसे देखकर लगता है के कल यह कहा जाएगा की यह बच्चा जी टीवी पर गया है और यह स्टार टीवी पर और यह जो निखट्टू है न यह तो पूरी फैशन टीवी पर गई है. आज विभिन्न चैनलों द्वारा देश पर जो संस्कृतिक हमले हो रहे हैं वे ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों के हमले से भी ज्यादा खतरनाक हैं.
तरुण सागर जी के कडवे बचन हितकारी से साभार
पैसा कमाने के लिए कलेजा चैये. मगर दान करने के लिए उल्लसे भी बड़ा कलेजा चाहिए. दुनिया कहती है फड पैसे तो हाथ का मेल है. मैं पैसे को ऐसी गाली कभी नहीं दूंगा. जीवन और जगत में पैसे का अपना मूल्य है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. मगर यह भी सही है के जीवन में पैसे कुछ हो सकता है, कुछ-कुछ भी हो सकता है, और बहुत कुछ भी हो सकता है मगर सब कुछ नहीं हो सकता. और जो लोग पैसे को ही सब कुछ मान लेते हैं वे पैसे के खातिर अपनी आत्मा को बेचने के लिए भी तैयार हो जाते हैं.
कहा जाता है की बच्चे पर माँ का प्रभाव पड़ता है. लेकिन आज बच्चा माँ से कम, मीडिया से ज्यादा प्रभावित हो रहा है. कल तक कहा जाता था की यह बच्चा अपनी माँ पर गया है और यह बाप पर. मगर आज जिस तरह से देशी-विदेशी चैनल हिंसा और अश्लीलता परोस रहे हैं. उसे देखकर लगता है के कल यह कहा जाएगा की यह बच्चा जी टीवी पर गया है और यह स्टार टीवी पर और यह जो निखट्टू है न यह तो पूरी फैशन टीवी पर गई है. आज विभिन्न चैनलों द्वारा देश पर जो संस्कृतिक हमले हो रहे हैं वे ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों के हमले से भी ज्यादा खतरनाक हैं.
तरुण सागर जी के कडवे बचन हितकारी से साभार
7/03/2010
gau hatya ko roka nahee ja sakta
गाय आज धर्मनीति और राजनीती के बीच पिस रही है. जब तक गाय धर्मनीति और राजनीती के जाल से मुक्त नहीं होगी तब तक गौ हत्या को रोका नहीं जा सकता. मेरा मानना है की अगर हम गाय को धर्मं नीति और राजनीती के जंजाल से बाहर निकल दे और उसे पूरी तरह से अर्थनीति से जोड़ दे तो स्वतः ही देश में गौ रक्षा आन्दोलन सफल हो जायेगा.
बिल्ली और शेखचिल्ली की तरह अब दिल्ली भी भरोसे के काबिल नहीं रही. हज करके लोटी बिल्ली पर अगर चूहे यह भरोसा कर ले की अब वह सुद्धर गई है, उसने चूहे खाने छोड़ दिए हैं तो यह उनकी बड़ी भूल होगी. जो सिर्फ सपनो में जीना जानता है, ऐसा शेखचिल्ली भी भरोसे के काबिल कैसे हो सकता है? और दिल्ली? जहाँ सिर्फ बातों के आचार्य दूर-दूर तक दिखाई न देते हो ऐसे दिल्ली से भी आखिर क्या उम्मीद की जा सकते है?
तरुण सागर महाराज के कडवे वचन से साभार
बिल्ली और शेखचिल्ली की तरह अब दिल्ली भी भरोसे के काबिल नहीं रही. हज करके लोटी बिल्ली पर अगर चूहे यह भरोसा कर ले की अब वह सुद्धर गई है, उसने चूहे खाने छोड़ दिए हैं तो यह उनकी बड़ी भूल होगी. जो सिर्फ सपनो में जीना जानता है, ऐसा शेखचिल्ली भी भरोसे के काबिल कैसे हो सकता है? और दिल्ली? जहाँ सिर्फ बातों के आचार्य दूर-दूर तक दिखाई न देते हो ऐसे दिल्ली से भी आखिर क्या उम्मीद की जा सकते है?
तरुण सागर महाराज के कडवे वचन से साभार
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