10/04/2011

भस्म का प्रसाद भी वितरित किया जाएगा

उज्जैन। देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाली भस्म आरती के पश्चात अब दर्शनार्थियों को भस्म का प्रसाद भी वितरित किया जाएगा।
मध्यप्रदेश धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित भगवान महाकालेश्वर मंदिर देश का एकमात्र ऐसा शिवालय है जहां प्रतिदिन तड़के भस्म आरती होती है और इसमें शामिल होने के लिए मंदिर प्रबंध समिति द्वारा प्रवेश पत्र जारी किए जाते हैं।
मंदिर में होने वाली विश्व प्रसिद्ध प्रातःकालीन भस्म आरती के उपरांत दर्शनार्थियों को आरती दी जाती है उसी प्रकार उस दौरान आरती के साथ ही अब भस्म प्रसाद भी दर्शनार्थियों को बांटा जाएगा।

लक्ष्मी चाहनेवाला दुर्गादेवी की पूजा करे

वेद अध्ययन  की सामर्थ्य चाहने वाला पुरुष ब्रह्मा    का यजन करे, इन्द्रिय सामर्थ्य चाहने वाला इंद्र का, प्रजा के वृद्धी चाहने वाला दक्ष का, लक्ष्मी चाहनेवाला दुर्गादेवी का, प्रभाव चाहने वाला अग्नी का, सुवर्ण तथा गौ चाहने वाला वसुओ का, आयु चाहने वाला अश्विनीकुमारो का, सौन्दर्य चाहनेवाला गन्धर्वो का तथा विद्या चाहनेवाला भगवन शिव का यजन करे. इस प्रकार नाना फलो की इच्छा से मनुष्य  नाना देवताओं का यजन करते है. 
सकाम, निष्काम, सर्वकाम अथवा मोक्ष चाहनेवाला मतिमान पुरुष तीव्र भक्तियोग द्वारा भगवान् विष्णु का यजन  करे.
इस प्रकार इंद्र आदि देवताओं का यजन करनेवाले भी शनैः-शनैः सत्संग द्वारा भगवत कथा का  श्रवण से भगवन के प्रेम लक्षणा  भक्ति प्राप्तकर मोक्ष के अधिकारी हो जाते है. जिस कथा से ज्ञान की प्राप्ति , रागद्वेशादी की निवृत्ति, मन में प्रसन्नता, विषयों से वैराग्य तथा मोक्ष प्राप्ति का उत्तम मार्ग भक्ति योग प्राप्त होता है उस भगवत्कथा में कौन विवेकी पुरुष अनुराग नहीं करेगा.
सूर्य उदय और अस्त होते हुए मनुष्यों की आयु हरण करते है किन्तु जिसने भगवत कथा  के श्रवण में एक क्षण भी व्यतीत किया उसकी  आयु व्यर्थ नष्ट नहीं होती, वह सार्थक हो जाती है. वृक्ष क्या जीते नहीं, लोहार के धौकनी क्या श्वास नहीं लेती, पशु क्या खाते-पीते तथा संतति पैदा नहीं करते ? करते ही है, किन्तु इसके कानो में भगवन  का मंगलमय नाम कभी नहीं पड़ा वह मनुष्य कुत्ते, गधे, ऊट और सूकर के सामान दो पैर वाला पशु है.
जो कान भगवन के चरित्र का शरण नहीं करते, वे चूहे के बिल के सामान है, जो जिह्वा भगवत चरित्र का गान नहीं करती, वह मेढक की जिह्वा  के सामान व्यर्थ है.
भगवान् को प्रणाम न करने वाले शिर बोझा रूप है. भगवान् की सेवा न करने वाले हाथ मृतक पुरुष के हाथो के सामान है. भगवान् के श्रीविग्रह के दर्शन न करेवाले नेत्र मयूर पिच्छ  के समान है . जो पैर भगवान् के क्षेत्र तथा तीर्थो की यात्रा नहीं करते  वे ब्रक्ष के सामान है. भगवान् की मधुर कथा सुनने से जिसके नेत्रों में अश्रु नहीं उमड़ पड़ते और शरीर में रोमांच नहीं हो आता, उसका ह्रदय पत्थर के सामान कठोर है. 

10/03/2011

शरीर निर्वाह के लिए जितना भोग अपेक्षित हो उतना ही ग्रहण करना चाहिए,

मन की धारणा
शुकदेवजी बोले - हे राजन ! ईसी धारणा द्वारा ब्रह्मा ने प्रलय काल में नष्ट अपनी  स्मृति को प्राप्त कर विश्व की श्रश्ती  की थी. वेदों में नाना प्रकार के यग्य आदि  कर्मो का जो वर्णन मिलता है, उनके फल स्वर्गादी भोगी पदार्थ सब नश्वर और मिथ्या है. उनमे आसक्ति नहीं करनी चाहिए. हां, इस लोक में शरीर निर्वाह के लिए जितना भोग अपेक्षित हो उतना  ही ग्रहण करना चाहिए, उससे अधिक नहीं. यदि वे भोग बिना परिश्रम के प्राप्त हो जायतो उनके लिए चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए. 


जैसे प्रथ्वी के रहते शय्या की बाहु के रहते तकिया की, अंजलि के  रहते नाना प्रकार के पात्रो की तथा वल्कलो के रहते वस्त्रो की आवश्यकता नहीं है.
लंगोटी के लिए क्या मार्ग में चीथड़े नहीं पड़े है ? खाने को वृक्ष क्या भिक्षा नहीदेगे ? नदिया क्या सूख गई ? रहने को गुफाये क्या बंद है. शरणागत भक्तो की रक्षा क्या भगवान् नहीं करते ? दुःख है की फिर भी विद्वान् पुरुष लक्ष्मी  में मद से अंधे इन उन्मत्त धनिकों का सेवन न जाने क्यों करते है ? संसार के सभी पदार्थ नाशवान है. जीवो के प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण ही अविनाशी है और वे तुम्हारे ह्रदय में ही विराजमान है. तुम मन से उनकी  धारणा करो. वे बड़े ही सुन्दर है. उनकी चार भुजाये है, जिनमे वे शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये रहते है. मुख उनका हास्ययुक्त है, सब अंगो में वे दिव्य आभूषण धारण किये रहते है. उनकी चितवन अपूर्व स्नेहभरी है. चरण से लेकर मुख पर्यंत भगवान् के एक-एक अंग का प्रेम से ध्यान करते जाओ. जब मुख तक पहुच जाओ तब केवल उनके हास्य युक्त मुख का ही ध्यान करते रहो.

साप्ताहिक श्रीमद भागवत कथा लेखक आचार्य राममूर्ति शास्त्री से साभार 

10/02/2011

हिंदू धार्मिक जुलूस मुस्लिम इलाको से अनुमति नही है क्यों ?

केरल में विधायक, संसद और मंत्री अल्लाह,यीशु के नाम से सपथ लेते है | अगर हिंदू राम या कृष्ण के नाम से ले तो संबिधान के खिलाफ है ?

अरबी भाषा को प्रमोट करने के लिए सरकार पैसे खर्च कर रही है | लेकिन संस्कृत पर क्यों नही ? क्या अरबी भाषा, संस्कृत के तुलना में अधिक राष्ट्रीय है ?

IMTD Act क़ानूनी अधिकार से असम में बंगलादेशियो को भारत में बसने और नागरिक बनने का अधिकार देता है | तो जम्मू और कश्मीर में शेष भारतीय को बसने का अशिकर क्यों नही ? यह दोगली निति क्या है ?

जम्मू और कश्मीर कि जनसंख्या लगभग एक करोड है जिन्हें २४००० करोड रुपये कि सहायता दी गयी है | यानी कि पर हेड २४००० रुपये | जबकि शेष राज्यों को इनसे ५% कम कि सहायता दी जाती है |क्या यह राष्ट्र विरोशियो के लिए इनाम नही है ?

यदि पेंटिंग करना गैर- इस्लामिक है तो मुसलमानों ने एम् एफ हुसैन के खिलाफ कितने फतवे जारी किये गए थे ? क्या वो गैर- इस्लामिक कार्य नही किया था ?

यदि इस्लाम में गायन, संगीत और नृत्य गैर- इस्लामिक है ( क्योकि इस्लाम एक गंभीर धर्म है ) तो बहुत “खान” फिल्म में अभिनय करते है | इनके खिलाफ फतवा क्यों नही जारी किया गया ?

क्या आप को लगता है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश रहेगा यदि मुसलमानों का बहुमत हो जाय तो ?

हॉउस आफ कामंस, आस्ट्रेलिया संसद और ह्वाईट हॉउस आदि में जब दीपावली और जन्माष्टमी मनाया जाता है तो भारत के संसद में क्यों नही मनाया जाता है ? क्या हम संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया कि तुलना में अधिक धर्मनिरपेक्ष है ?

यदि सांप्रदायिक दंगे भारत में आर एस एस, विहिप, बजरंग दल आदि के कारन होता है तो “ पाकिस्तान, तुर्की, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, चेचन्या, चीन, रूस, ब्रिटेन, स्पेन, साईप्रस आदि में किसकी अजह से दंगे होते है ?” जब कि वहाँ पर आर एस एस / विहिप नही है |

एक पूर्व राष्ट्रपति, दो पूर्व प्रधानमंत्रियों, साधुओ,और संतो द्वारा कांची के संकराचार्य कि गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन किया है | लेकिन मिडिया का कहना है कि “वहाँ बिलकुल कोई विरोध नही हुआ है”| क्या आप को लगता है कि केवल हिन्=हिंसा ही लोगो की [पीड़ा मापने का पैमाना है ?

क्या आप को विश्वास है कि इस्लाम और ईसाईयत को सर्वधर्म समभाव में विश्वास है ? यदि हाँ, तो धर्म रूपांतरण में विश्वास क्यों करते है ?

ईश्वर अल्लाह तेरे नाम – आप मुझे एक मुसलमान दिखाए जो इससे सहमत हो ?

क्या आप को नही लगता है कि “ सेक्युलर मुस्लिम एक मिथ्या नाम है ? एक व्यक्ति या तो सेक्युलर या मुसलमान हो सकता है, दोनों नही ? एक मुस्लिम ( जो केवल अल्लाह में विश्वास करता है) धर्म-निरपेक्ष(कई परमेश्वर में विश्वास) नही हो सकता है |

क्या आप जानते है कि “ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष मौलाना वहीदुद्दीन, जब भारतीय सैनिक कारगिल में लड़ रहे थे तो, उनसे सैनिको के लिए प्रार्थना करने को कहा गया तो इंकार कर दिया ? क्योकि भारतीय सैनिक मुसलमानों से लड़ रहे थे ?” ( बाद में सोनिया और प्रियंका ने उसके अंतिम संस्कार में भाग ली थी )

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का कहना है कि “ अल्पसंख्यक का मतलब पूरी आबादी का अधिक से अधिक १०% होता है | मुसलमान, जो लगाभाग १८% से ऊपर है को एक अल्पसंख्यक कैसे कहा जा सकता है ?

क्या आप को विश्वास है कि “कम्युनिस्टों को भारत से प्यार है ?”, जब कि वे स्वीकार करने से मना करते है कि १९६२ में चीन भारत पर हमलावर था ?

ये कैसे होता है कि “ एक मुस्लिम परिवार मुख्य रूप से हिंदू इलाके में शांति से रहता है, जबकि एक मुस्लिम बस्ती में एक हिंदू परिवार ऐसा करने में सक्षम नही है ?

मुस्लिम बहुत क्षेत्रो में ईसाई मिशिनारिज क्यों नही सामाजिक सेवाए शुरू कराती है ? क्योकि वहाँ निवेश पर पर्याप्त फल नहीं मिलेगा |

क्या आप जानते है कि “ भारत एक मात्र देश है जो खुले तौर पर बंगलादेश के घुसपैठियों को आमंत्रित किया है | बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के सरकारों ने तत्काल उन्हें रासन कार्ड उपलब्ध कराके मतदाता बना दिया |”

दंगे शुक्रवार की नमाज के बाद ही ज्यादातर हुए है ( जैसे मरद, केरल) | क्या यह इमामों के ज्वलंत उपदेशो की वजह से नही है ?

सभी हिंदू बहुल क्षेत्र शांतिपूर्ण है, लेकिन सभी हिंदू अल्पसंख्यक क्षेत्र समस्याग्रस्त है – जम्मू और कश्मीर, उत्तर – पूर्वी भारत आदि | क्या आप इसकी व्याख्या कर सकते है कि ऐसा क्यों ?

एक विधायक, सी. पी. शाजी ने केरल विधानसभा में कहा कि “ वो हाथ काट दिया जायेगा, जो शरियत के एक अक्षर को छुयेगा” | क्या आप इससे सहमत है ?

क्या आप जानते है कि “भारत में अवैध रूप से आये मुस्लिम अप्रवाशी २५ लोकसभा और १२० विधानसभा सीटों के चुनाव में एक निर्णायक कारक बन गए है ? और वे एक विशेष पार्टी के लिए एकजुट हो के मतदान करते है – कंग्रस, राजद, सपा, एमएल, या साम्यवादी |”

एक पाकिस्तानी भारतीय हो सकता है ? जब वह जम्मू और कश्मीर के किसी एक लडकी से शादी कर ले, लेकिन इसके विपरीत जब वही लड़की भारत के किसी भी हिस्से के एक हिंदू से शादी करे तो वह जम्मू और कश्मीर की नागरिक नहीं हो सकते है, जम्मू और कश्मीर कि नागरिकाता खो देती है ? यह किस तरह का कानून है ?

अयोध्या मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने विश्व हिंदू परिषद पूछताछ की लेकिन बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड से सवाल नही की? क्या यह सुप्रीम कोर्ट का दुहरा मापदंड नही है ?

जब आप नरेन्द्र मोदी जैसे लोगो से तुच्छ आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांग रहे है तो आप क्यों नही जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री से इस्तीफा माँगते है ? जहां पर हजारों सैनिक आतंकवादियों द्वारा मार दिए गए है और तो और ४ लाख हिन्दुओ का सफाया कर दिया गया है |

जम्मू और कश्मीर का पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला एक ईसाई से शादी किया और वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला एक हिंदू लडकी से शादी करके आनंदित थे, लेकिन जब उसकी बेटी एक हिंदू लड़के से शादी कर ली तो उसका परित्याग कर दिया गया | क्या यही धर्मनिरपेक्षता का पहचान है ?

कानून के अनुसार “ मानव अंगों को किसी भी पार्टी के चुनाव चिन्ह के रूप में नही लिया जा सकता है” तो कैसे कांग्रेस पार्टी को ‘हाथ’ का प्रतिक आवंटित किया गया है ? यह कानून के खिलाफ नही है ?

दिल्ली इमाम सैयद बुखारी के घोषणा थी कि तालिबान सभी मुसलमानों के लिए आदर्श है और ओसामा बिन लादेन नायक ? क्या आप इस धर्मनिरपेक्षता पर विचार करेंगे ?

जम्मू और कश्मीर के संसदीय चुनाव के लिए २ लाख हिंदू वयस्क मतदाता है | लेकिन विधानसभा के लिए नही ? क्यों ?

जम्मू और कश्मीर विधानसभा की अवधि ६ साल और अन्य राज्यों की ५ साल| क्यों ?

बंगलादेश में हिंदू लड़किया पीटी जाती है, उनके साथ गैंग रैप किया जाता है | प्रतिदिन मंदिरों को जलने या नष्ट करने कि खबरे पढैते होंगे | क्या हमारे धर्मनिरपेक्षतावादी और मानवाधिकारी कार्यकर्ताओ को इनके लिए आवाज़ नही उठानी चाहिए ? क्या सिर्फ मुसलमानों के लिए ही मानवाधिकार है ?

क्या आप जानते है कि “ इस्लाम राष्ट्रवाद और राष्ट्रिय सीमाओ में विश्वास नही करता है | यह पूरी दुनिया को इस्लाम के तहत दारुल हरब से दारुल इस्लाम तक लाना चाहते है ?”

क्यों मुस्लिम मस्जिद और मदरसे में जाते है न कि स्कूल और कालेज में ? क्या मदरसा भी वैज्ञानिक और इंजिनियर तैयार करता है ? ( सेक्युलर नेताओ द्वारा मुसलमानों को अलग से आरक्षण के लिए अपना सर पिटने के सन्दर्भ में )

मुहर्रम जुलूस हिंदू बाहुल्य क्षेत्रो से लाया जारहा है लेकिन हिंदू धार्मिक जुलूस मुस्लिम इलाको से अनुमति नही है क्यों ? क्या यह सम्रदायिक बटवारे को स्थायी नही करता है ?

क्या आपको लगता है कि नेहरू परिवार ही एक परिवार है जो आजादी के लिए लड़े या अन्य स्वतंत्रता सेनानियों क भी थे? जैसे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदनलाल धींगरा ,वन्शिनाथान, चापेकर ब्रदर्स, वीर सावरकर, राज गुरु, सुभाष चंद्र बोस, उधम सिंह आदि |

मल्लापुरम ( केरल) में , एक डाक्टर ने पाया कि मुस्लिम महिलाओ कि तीन पीढियां बेटी-१३, माँ-२६ और दादी – ३९ सभी गर्भवती है तथा प्रसव के लिए भारती कराया | क्या आप को भी लगता है कि मुसलमानों के लिए परिवार नियोजन अनावश्यक है ?

रामायण के लेखक ऋषि वाल्मीकि एक डाकू थे, उसी तरह महाभारत के लेखक वेड व्यास एक मछुवारे थे | दोनों महाकाव्यो और लेखक हिन्दुओ द्वारा प्रतिष्ठित है | क्या अब भी लगता है कि हिंदू धर्म जातिवाद का समर्थन करता है ?

२००२ में कर्नाटक सरकार मंदिरों द्वारा प्राप्त ७२ करोड रुपयों में से ५० करोड मदरसों को, १० करोड चर्च को, १० करोड मंदिरों को दिया गया | मदरसो (आतंकवादी कारखाना ) और चर्चो के विकास के लिए हिन्दुओ का पैसा क्या देना चाहिए ?

जब अफगानिस्तान में तालिबान, बुद्ध प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया, तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि यह बाबरी मस्जिदके विध्वंस की प्रतिक्रिया में था. क्या आप टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा के इस औचित्य से सहमत? जैसे को तैसा के लिए ठीक है? तो फिर तुम क्यों गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में गुजरात दंगों की आलोचना करते हो ?

पांडिचेरी में एक मुस्लिम को दफनाने से इनकार कर दिया गया था क्योंकि वह प्रभु मुरुगा के लिए एक मंदिर का निर्माण किया था क्या आप को भी लगता है कि "धर्म एक दूसरे से नफरत नहीं सिखाते हैं"?

१९८९ में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में राजीव गाँधी ने घोषणा की कि “ अगर मिजोरम में कांग्रेस सत्ता में आई तो यहाँ बाईबल के अधर पर शिक्षाए दी जायेगी (?)” यदि यह सांप्रदायिक नही है तो क्या है ?

वर्ल्ड मुस्लिम अल्पसंख्य समुदाय के अध्यक्ष, कुवैत के शेख अल सईद युसूफ सयेद हासिम रिफाई को केरल में बिना वीजा के आने कि अनुमति दी गयी थी और उन्हें गिर्गिराफ्तर नही किया गया बल्कि केरल सर्कार के सरकारी दामाद की तरह खातिरदारी कि गयी और लेजाने लाने के लिए सरकारी कार कि व्यवस्था कि गयी थी | क्या यह राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला कार्य है ?

यदि ब्रिटेन और अमेरिका( एक धर्म निरपेक्ष देश) में एक से अधिक महिला से शादी करने कि अनुमति नही है तो क्या भारत में एक से अधिक औरतो से शादी करने कि अनुमति देनी चाहिए ?

पोप को भारत कि यात्रा को आमंत्रित किया गया था लेकिन नेपाल के राजा महेंद्र को नागपुर में १९६५ में मकरसंक्रांति समारोह में भाग लेने के लिए अनुमति नही दी गयी थी | क्या यही धर्म निरपेक्षता है ?

अशोक और कनिष्क अफगानिस्तान पर शासन किया. कंधारी जो की दुर्योधन की माँ, कंधार से आया है ( अब अफगानिस्तान में )| क्या आप मानते हैं कि अफगानिस्तान एकबार भारत का अभिन्न हिस्सा था?

त्रिपुरा में बैप्टिस्ट चर्च को न्यूजीलैंड से 60 साल पहले मिशनरियों द्वारा स्थापित किया गया था| क्या आपको लगता है कि चर्च राष्ट्रवाद को बढ़ावा देंगे?

पाकिस्तान में छात्रों को शुरू से ही सिखाया जाता है कि हिंदु हमारे दुश्मन हैं, हिंदू से मित्रता कभी नहीं किया जा सकता है काफिरो (हिंदुओं) को मार देना चाहिए. क्या आप को अब भी लगता है कि दोस्ती पाकिस्तान के साथ संभव है?

पाकिस्तान इस्लामी देश है,बायीं-पास सर्जरी या कैंसर के इलाज के लिए भारत आते है | पाकिस्तान कैसा एक देश है जिसके पास परमाणु विकशित करने की क्षमता है लेकिन एक अच्छे अस्पताल कि नही ?इसका मतलब है कि पाकिस्तानी सिर्फ ट्रिगर से खुश है विकास और स्वास्थ्य सीवाओ की कीमत पर |

कम्युनिस्ट नेता स्टालिन की बेटी, स्वेतलाना, दिनेश सिंह के भाई से शादी करने के लिए और भारत में बसने की कामना की| हमारे साम्यवादियों और इंदिरा गांधी ने इस का विरोध किया | वे अब कैसे एक इतालवी महिला का समर्थन करे ?

जब योगा संयुक्त राज्य अमेरिका में एक करोड़ों डॉलर का उद्योग है, हमारी सरकार क्यों अंधी बन गयी है इस तकनीक मानवविकास के लिए ? क्या इसलिए कि यह हिंदू संस्कृति का एक हिस्सा है ?

पूजा में 'संकल्प' "भारत वर्षे , भारत कंडे......... के साथ शुरू होता है ...". ये क्या हैं? क्या आप को अभी भी लगता है कि अध्यात्मवाद और राष्ट्रवाद अलग कर रहे हैं ? ये राष्ट्र की दो आंखें है?

अध्यात्मवाद और राष्ट्रवाद भारत में अविभाज्य हैं.क्या आपको नहीं लगता कि अध्यात्मवाद के बिना भारत बिना आत्मा के एक शरीर की तरह हो जाएगा?

हिंदू धर्म में आप को सुधारको कि संख्या बहुत मिल जायेगी | अन्य धर्मो में क्यों नही पाई जाती है ? क्या इन्हें सुधारने कि जरुरत नही है कि सुधारे हुए है ?

सच्चे संत देवरह बाबा

प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मथुरा के माठ इलाके में यमुना के किनारे एक साधु के दर्शन करने आना था। एसपीजी के साथ जिला और प्रदेश का सुरक्षा बल तैनात हो गया। प्रधानमंत्री के आगमन और यात्रा के लिए इलाके की मार्किंग कर ली गयी। आला सुरक्षा अफसरों ने हेलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड की डाल छांटने के निर्देश दिये। भनक लगते ही साधु ने एक बडे पुलिस अफसर को बुलाया और पूछ लिया- यह पेड क्‍यों छांटोगे। जवाब मिला- पीएम की सुरक्षा के लिए जरूरी है। बाबा- तुम यहां अपने पीएम को लाओगे और प्रशंसा पाओगे, पीएम का भी नाम होगा कि वह साधु-संतों के पास जाता है। लेकिन इसका दंड तो इस बेचारे पेड़ को ही भुगतना होगा। वह मुझसे इस बारे में पूछेगा तो मैं उसे क्‍या जवाब दूंगा। नहीं, यह पेड़ नहीं छांटा जाएगा।

प्रशासन में हडकंप मच गया। अफसरों ने अपनी मजबूरी बतायी कि दिल्‍ली से आये आला अफसरों ने यह फैसला लिया है, इसलिए इसे छांटा ही जाएगा। अब कुछ नहीं हो सकता। और फिर, पूरा पेड़ तो कटना है नहीं, केवल उसकी कुछ डाल काटी जाएगी। मगर साधु टस से मस नहीं हुआ। बोला- यह पेड़ होगा तुम्‍हारी निगाह में, मेरा तो सबसे पुराना शिष्‍य है। दिनरात मुझसे बतियाता है। यह पेड़ नहीं कटेगा। उधर अफसरों की घिग्‍घी बंधी हुई थी। साधु का दिल पसीज गया। बोले- और अगर यह कार्यक्रम टल जाए तो।

तयशुदा कार्यक्रम को टाल पाने में अफसरों ने भी असमर्थता व्‍यक्‍त कर दी। आखिरकार साधु बोला- जाओ चिंता मत करो। तुम्‍हारे पीएम का कार्यक्रम मैं कैंसिल करा देता हूं। और, आश्‍चर्य कि दो घंटे बाद ही पीएम आफिस से रेडियोग्राम आ गया कि पीएम का प्रोग्राम टल गया है। कुछ हफ्तों बाद राजीव गांधी वहां आये, लेकिन इस बार यह पेड़ नहीं छांटा गया।

यह थे देवराहा बाबा। न उम्र का पता और न अंदाजा। न कपड़ा पहनना और ना भोजन करना। उन्‍हें न तो किसी ने खाते देखा और ना ही पानी पीते। शौचादि का तो सवाल ही नहीं। हां, दिन में चार-पांच बार वे नदी में सीधे उतर जाते थे और प्रत्‍यक्षदर्शी बताते हैं कि आधा-आधा घंटा तक वे पानी में रहते थे। इसपर उठी जिज्ञासाओं पर उन्‍होंने शिष्‍यों से कहा- मैं जल से ही उत्‍पन्‍न हूं।

उनके भक्‍त उन्‍हें दया का महासमुंद बताते हैं। और अपनी यह सम्‍पत्ति बाबा ने मुक्‍त हस्‍त से लुटाई। जो भी आया, बाबा की भरपूर दया लेकर गया। वितरण में कोई विभेद नहीं। वर्षाजल की भांति बाबा का आशीर्वाद सब पर बरसा और खूब बरसा। मान्‍यता थी कि बाबा का आशीर्वाद हर मर्ज की दवाई है। कहा जाता है कि बाबा देखते ही समझ जाते थे कि सामने वाले का सवाल क्‍या है। दिव्‍यदृष्टि के साथ तेज नजर, कड़क आवाज, दिल खोल कर हंसना, खूब बतियाना बाबा की आदत थी। याददाश्‍त इतनी कि दशकों बाद भी मिले व्‍यक्ति को पहचान लेते और उसके दादा-परदादा तक का नाम व इतिहास तक बता देते, किसी तेज कम्‍प्‍यूटर की तरह। हां, बलिष्‍ठ कदकाठी भी थी। लेकिन देह त्‍यागने के समय तक वे कमर से आधा झुक कर चलने लगे थे।

ख्‍याति इतनी कि जार्ज पंचम जब भारत आया तो अपने पूरे लावलश्‍कर के साथ उनके दर्शन करने देवरिया जिले के दियरा इलाके में मइल गांव तक उनके आश्रम तक पहुंच गया। दरअसल, इंग्‍लैंड से रवाना होते समय उसने अपने भाई से पूछा था कि क्‍या वास्‍तव में इंडिया के साधु-संत महान होते हैं। प्रिंस फिलिप ने जवाब दिया- हां, कम से कम देवरहा बाबा से जरूर मिलना। यह सन 1911 की बात है। जार्ज पंचम की यह यात्रा तब विश्‍वयुद्ध के मंडरा रहे माहौल के चलते भारत के लोगों को बिरतानिया हुकूमत के पक्ष में करने की थी। उससे हुई बातचीत बाबा ने अपने कुछ शिष्‍यों को बतायी भी थी, लेकिन कोई भी उस बारे में बातचीत करने को आज भी तैयार नहीं।

डॉक्‍टर राजेंद्र प्रसाद तब रहे होंगे कोई दो-तीन साल के, जब अपने मातापिता के साथ वे बाबा के यहां गये थे। बाबा देखते ही बोल पडे- यह बच्‍चा तो राजा बनेगा। बाद में राष्‍ट्रपति बनने के बाद उन्‍होंने बाबा का एक पत्र लिखकर कृतज्ञता प्रकट की और सन 54 के प्रयाग कुंभ में बाकायदा बाबा का सार्वजनिक पूजन भी किया। बाबा के भक्‍तों में लालबहादुर शास्‍त्री, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी बाजपेई जैसी हस्तियां भी थीं। पुरूषोत्‍तम दास टंडन को तो उन्‍हें राजर्षि की उपाधि तक दे डाली।

तो शुरुआत फिर बाबा से ही। वे कब, कहां और किसके यहां जन्‍मे, कोई नहीं जानता। यह भी नहीं कोई नहीं जानता कि बाबा ने वस्‍त्र त्‍याग कर कब दिगम्‍बर चोला अपनाया। वरिष्‍ठ आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र बताते हैं कि उनकी परदादी के समय तक भी बाबा वैसे ही थे, जैसे सन 1990 में। हां, दियरा इलाके में रहने के चलते ही शायद उनका नाम देवरहा बाबा पड़ा होगा। लेकिन नर्मदा के अमरकंटक में आंवले के पेड़ होने के नाते वहां उनका नाम अमलहवा बाबा भी पड़ गया।

उनका पूरा जीवन मचान में ही बीता। लकड़ी के चार खंभों पर टिकी मचान ही उनका महल था, जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थे। महल में वे साल में आठ महीना बिताते थे। कुछ दिन बनारस के रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के माठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में एकांतवास भी करते थे। खुद कभी कुछ नहीं खाया, लेकिन भक्‍तगण जो कुछ भी लेकर पहुंचे, उसे भक्‍तों पर ही बरसा दिया। उनका बताशा-मखाना हासिल करने के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ हर जगह जुटती थी।

और फिर अचानक 11 जून 1990 को उन्‍होंने दर्शन देना बंद कर दिया। लगा जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है। मौसम तक का मिजाज बदल गया। यमुना की लहरें तक बेचैन होने लगीं। मचान पर बाबा त्रिबंध सिद्धासन पर बैठे ही रहे। डॉक्‍टरों की टीम ने थर्मामीटर पर देखा कि पारा अंतिम सीमा को तोड़ निकलने पर आमादा है। 19 तारीख को मंगलवार के दिन योगिनी एकादशी थी। आकाश में काले बादल छा गये, तेज आंधियां तूफान ले आयीं। यमुना जैसे समुंदर को मात करने पर उतावली थी। लहरों का उछाल बाबा की मचान तक पहुंचने लगा। और इन्‍हीं सबके बीच शाम चार बजे बाबा का शरीर स्‍पंदनरहित हो गया। भक्‍तों की अपार भीड़ भी प्रकृति के साथ हाहाकार करने लगी। बर्फ की सिल्लियां लगा कर बाबा की पार्थिव देह को सुरक्षित रखने का प्रयास कर दिया गया। अब तक देश-विदेश तक में बाबा के ब्रह्मलीन हो जाने की खबर फैल चुकी थी। लेकिन अचानक ही बाबा के सिर पर स्‍पंदन महसूस किया गया। कि अचानक ही बाबा का ब्रह्मरंध्र खुल गया। उनके शिष्‍य देवदास ने उस ब्रह्मरंध्र को भरने के लिए फूलों का सहारा लिया, लेकिन वह भर नहीं पाया। आखिरकार, दो दिन बाद बाबा की देह को उसी सिद्धासन-त्रिबंध की स्थिति में यमुना में प्रवाहित कर दिया गया।

9/30/2011

शास्त्र तो अनेक है किन्तु उनसे विशेष लाभ होना संभव नहीं...!

श्री शुकदेवजी बोले - यद्यपि संसार में सुनने योग्य शास्त्र अनेक है किन्तु उनसे विशेष  लाभ होना संभव नहीं है. मनुष्यों की आयु बहुतछोटी  है उसमे भी रात्रियाँ  निद्रा और स्त्री संग से बीत जाती है और दिन धन की चिंता एवं कुटुंब के भरण पोषण  से बीत जाते है. मिथ्याभूत, नश्वर देह, पुत्र, पत्नी आदि में आसक्त हो प्रमत्त  पुरुष संसार में सबका मरण देखता हुआ भी अपने  मरण पर विचार नहीं करता, इसलिए निश्छल मन से केवल एकमात्र भगवन ही श्रवण, मनन और चिंतन करना चाहिए. यद्यपि मेरी निर्गुण ब्रह्म में स्थिति थी  फिर भी भगवान् की लीलाओं से आकृष्ट होकर मैंने श्रीमद्भागवत का अध्ययन अपने  पिताजी से किया वही मै तुमको सुनाता हूँ क्योकि तुम भगवान के अनन्य भक्त हो. उसके श्रवण से शीघ्र ही भगवान में तुम्हारा अनुराग हो जाएगा.
        कामी पुरुषो के तत्तत फलो का साधन, मुमुक्षु पुरुषो के मोक्ष का साधन और योगी तथा ज्ञानी पुरुषो के जीवन का मुख्य फल भगवान नाम कीर्तन  ही बतलाया गया है. उसमे किसी प्रकार का भय नहीं है.
जो वर्ष बीत गए, उनकी चिंता छोड़ दो. राजा खट्वांग ने एक मुहूर्तमे ही अपना परलोक बना लिया था. तुहारे जीवन की अवधि तो अभी सात दिन शेष है. तुम सरलता से अपना परलक बना सकते हो. अन्तकाल आने पर मनुष्य को घबडाना नहीं चाहिए. देह, स्त्री और पुत्र की ममता त्यागकर किसी पुण्यतीर्थ में चला जाना चाहिए. वहा  स्नानादि से शुद्ध  होकर ओंकार का जप करना चाहिए और धीरे-धीरे विषयों से मन को हटाकर भगवान् के स्वरूप में लगा देना चाहिए.
         ब्रह्माण्ड में जो चौदह लोक है वे भगवन के शरीर के अवयव कहे गए है. विराट  पुरुष भगवन के पादमूल पाताल कहा गया है, एड़ी तथा पाद का अग्रभाग रसातल, दोनों गुल्फ महातल, जंघा तलातल, दो जानू सुतल, दो उरू वितल और अतल, जघन महीतल और नाभि  नभस्तल कहा गया है. विराट भगवन का वक्षस्थल स्वर्गलोक, वादन (मुख) जनलोक, ललाट तपोलोक और शिरोभाग सत्यलोक कहा गया है. तेजोमय इंद्र आदि देवता. भगवान् की भुजाये ,, दिशाए कर्ण, शब्द श्रोत्रेंद्रिय, अश्वनी कुमार नासिका पुट  , गंध घ्राण इन्द्रिय   तथा अग्नि भगवान् का मुख कहा गया है. भगवान् के शरीर की नाडिया नदिया है, रोम वृक्ष, श्वास  वायु गति काल तथा कर्म संसार कहा गया है.
        ब्राह्मण भगवान् के मुख, क्षत्रिय बाहू, वैश्य उरू तथा शूद्र पैर कहे गए है. इस प्रकार चन्द्र, सूर्य, गृह, नक्षत्र, तारा, समुद्र, द्वीप, पर्वत, पशु, पक्षी, कीट-पतंग सब भगवान् के शरीर के अवयव कहे गए है.
        इस प्रकार संक्षेप से मैंने विराट भगवन के शरीर अवयवो का सन्निवेस रचना तुमसे कही, जिसमे सम्पूर्ण लोगो की स्थिति है. तुम इसी स्थूल रूप में अपने मन को  स्थिर करो. इससे अन्य कोई वस्तु ध्येय नहीं है. इस धरना से तुम इस मिथ्या जगत में छिपे हुए आनंद निधि सत्यमूर्ति भगवन को प्राप्त कर लोगे और फिर संसार में तुम्हारा आवागमन न होगा.

स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।


भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।


याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्।।2।।



वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।3।।


सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।


वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ।।4।।



उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।


सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।5।।

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा


यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।



यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां

वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।6।।


नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्


रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।



स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-

भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7।।

9/28/2011

नमामि भक्त वत्सलं

छं0-नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।

भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।


निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।


प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।


प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।


निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।


दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।


मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।


मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।


विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।



नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।

भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।


त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।


पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।


विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।


निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।


तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।


जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।


भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।


स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।


अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।


प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।


पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।


व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।


दो0-बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।


चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि।।4।।

म्रियमाड़ पुरुष को क्या करना चाहिए ?

     राजा परीक्षित वन से लौटकर जब अपने भवन में आये तब उनके मन में बड़ा पश्चाताप हुआ और विचार आया की मैंने दुर्जनों  की भाति बड़ा ही नीच कर्म किया जो निरपराध ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया. हाय ! मेरी क्या गति होगी ? मुझे शीघ्र ही ऐसा दंड मिले जिससे इस पाप का प्रायश्चित हो जाय जिससे फिर गौ, ब्रह्मण तथा  देवताओं के प्रति मेरी वैसी पापमती कभी न हो. उस तेजस्वी ऋषि  बालक की क्रोधाग्नि आज ही मेरे सम्रद्ध राज्य तथा सेनासहित कोष को भस्म कर दे इससे मेरे नीच कर्म का समुचित प्रायश्चित हो जायगा और मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी. परीक्षित ऐसा  सोच ही रहे थे की शमीक मुनि के गौरवमुख नामक शिष्य ने आकर राजा को  श्रंगी के शाप का समाचार सुनाया. उसे सुनकर उनके मन में किसी प्रकार की  अशांति नहीं हुई. प्रत्युत इसे विरक्ति का कारण मानकर उन्होंने राज्य का सम्पूर्ण भार अपने पुत्र  जन्मेजय को सौप दिया और स्वयम सब कुछ त्याग कर भगवती श्रीगंगाजी के तट पर चले गए. वहा अन्न, जल का त्याग कर कुशासन पर बैठ भगवान् के श्रीचरणों का ध्यान करने लगे. उसी समय अत्री, वसिष्ठ, भ्रगु, अंगिरा, व्यास, नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि लोक को पवित्र करते हुए अपने-अपने शिष्यों सहित राजा के कल्याण के लिए वहा  आ पहुचे. 

     राजा  ने सब रिशित्यो  को सर झुककर प्रणाम  किया और अर्ध्य, पाद्य आदि  से उनका विधिवत पूजन किया. तत्पश्चात हाथ जोड़कर अपना अभीष्ट निवेदन किया. राजा ने कहा-हे मुनिव्रंद! आज मै धन्य हो गया, जो आप लोगो ने मुझपर कृपा की. शमीक मुनि के पुत्र का शाप भी मेरे लिए वरदान हो गया. मै आप लोगो की पुन्य सन्निधि में भगवती श्रीगंगाजी की गोद में बैठा हुआ हूँ. तक्षक आकर मुझे डसे  इसकी मुझे चिंता नहीं. आप मुझे भगवान् का गुडानुवाद सुनाये. यही मेरी  आप महानुभावो से विनम्र प्रार्थना है. मुझपर आप ऐसी अनुकम्पा करे  की मै जिस योनी में जाऊ उनमे भगवान् और उनके भक्तो में मेरा अनुराग सदा बना रहे. राजा के ऐसा कहने पर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी दुन्दुभिया बजने लगी. उपस्थित महर्षियों ने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा - हे राजन ! तुम धन्य हो, जो शरीर त्यागकर भगवान् की शरण में आ गए. जब तक तुम शरीर त्याग कर भगवान् के लोक को नहीं जाते तब तक हम लोग भी यही आप के समीप रहेगे यह सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई. राजा ने हाथ जोड़ कर विनीत भाव से पूछा - हे मुनिव्रंद ! कृपा कर आप यह बताये की म्रियमाड़  पुरुष को क्या करना चाहिए ?

इस प्रश्न पर मुनियों में यग्य, योग, जप, तप, दान को प्रथक-प्रथक साधन मानकर विवाद चल पड़ा और कोई निर्णय न हो सका.

 उसी समय व्यासजी के पुत्र श्रीशुकदेवजी प्रथवी पर भ्रमण करते हुए दैवयोग से सहसा वहा आ पहुचे. उनकी सोलह वर्ष की अवस्था थी. अंग प्रत्यंग अत्यंत सुन्दर थे. मधुर हास्य से और स्नेहभरी चितवन  से आकृष्ट होकर बहुत से स्त्रिया और बालक उनके पीछे हो लिए. उनका अवधूत वेश देखकर सभा में स्थित  मुनिव्रंद उठकर खड़े हो गए. राजा ने उनको बैठने के लिए एक सिंहासन दिया और सर झुकाकर प्रणाम किया और विधिवत उनका पूजन किया. बाद में राजा ने कहा - हे भगवन ! आज मेरा कुल पवित्र हो गया, जो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ. मालूम पड़ता है, भगवान् श्रीकृष्ण ने ही कृपाकर अप को यहाँ भेजा है. अन्यथा म्रियमाड़  पुरुष के लिए आप लोगो का दर्शनदुर्लभ है. 


     हे मुनियों, आप योगियों के भी गुरु है, कृपया यह बतलाईये की म्रियमाड़  पुरुषो को क्या सुनना चाहिए जिससे उसकी मुक्ति हो ? क्या करना चाचिए ? क्या स्मरण करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? 

     राजा के इस प्रकार प्रश्न करने पर शुकदेवजी ने बड़ी मधुर वाड़ी में म्रियमाड़  पुरुष के कर्तव्यो को कहना प्रारभ किया.

                                                                                                     शेष अगले अंक में पढ़े ...(क्रमशः)

9/26/2011

कलि में मानसिक पुण्यो का फल मिल जाता है पापो का नहीं,

 राजा परीक्षित माता के गर्भ में ही दग्ध हो चुके होते, पर भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से बच गए. उन्होंने यह विचार किया कलि में मानसिक पुण्यो का फल मिल जाता है पापो का नहीं, कलि के गुड के लिए  उसे छोड़ दिया, मारा नहीं. एक दिन वे शिकार खेलने के लिए धनुष बाड लेकर वन में गए.  मृगो के पीछे दौड़ते-दौड़ते वे बहुत थक गए और प्यास से कंठ सूखने पर व्याकुल हो उठे. जलाशय न मिलने पर वे शमीक मुनि के आश्रम में जा पहुचे वह मुनि समाधि में स्थित थे उनको बाहर का कुछ भी ज्ञान न था. ऐसी अवस्था में राजा ने उनसे जल मागा.


जब कुछ उत्तर न मिला, तब रोष में आकर एक मरा साँप ऋषि के गले में डालकर वे अपने नगर को लौट आये. मुनि का पुत्र श्रंगी कौशिकी नदी के तट  पर बालको के साथ खेल रहा था. यह समाचार सुनकर क्रोध से उसके नेत्र लाल हो गए. उसने नदी के जल का आचमनकर राजा को शाप दे डाला.


मर्यादा का उल्लंघन करने वाले इस दुष्ट राजा को सातवे दिन मुझसे प्रेरित होकर तक्षक  सर्प डसेगा. यह कहकर श्रंगी अपने आश्रम में आया और पिता के गले में लटकता सर्प देखकर दुखित हो जोर जोर से रोने  लगा. पुत्र के रोने के शब्द सुनकर मुनि की समाधि टूट गयी. 


उन्होंने आखे खोली तो गले में सर्प पड़ा देखा. उसे फेककर पुत्र सेपूछा- अरे बेटा ! तुम क्यों रोते हो ? किसने तुम्हारा अपमान किया ? पुत्र ने सारा ब्रत्तान्त कह सुनाया. मुनि को जब यह ज्ञात हुआ की पुत्र ने राजा को शाप दे दिया है, तब उन्होंने पुत्र की सराहना नहीं की. उसकी नादानी की भर्त्सना  करते हुए कहा-अरे अज्ञानी ! थोड़े से अपराध पर तूने इतना भारी दंड दिया ? 


राजा साधारण मनुष्यों की तुलना के योग्य नहीं वह विष्णु का अंश होता है. उससे रक्षित प्रजा अपने धर्म कर्म में लगी रहती है. उसके न रहने पर राज्य में चोरो  का साम्राज्य हो जाता है, प्रजा का धन लूटा जाता है. स्त्रियों का अपहरण होता है. परस्पर एक दुसरे को मारते है. सनातन धर्म भी नष्ट हो जाता  है. वर्णसंकर संताने पैदा होती है. इन सबका पाप नृप हन्ता  को लगता है. तूने बड़ा अनुचित किया. प्यास से व्याकुल राजा हमारे आश्रम में आया था. वह शाप के योग्य न था. इस प्रकार दुखित होकर मुनि ने भगवान् से प्रार्थना की.


हे भगवन! अपक्वबुद्धि मेरे पुत्र ने आपके भक्त राजा को शाप दे डाला, बालक होने के कारण आप उसके अपराध को क्षमा करे.

9/25/2011

कलियुग चार स्थानों में निवास करता है

सरस्वती नदी के तट पर रजा परीक्षित ने कलि को देखा जो डंडे से गौ और वृषभ को मार रहा था. वृषभ मारे भय के थोडा-थोडा मूतता हुआ काप रहा था. वह शूद्र रुपी कलि गौ को लातो से मार रहा था. जिससे वह रो रही थी. वह भूखी थी, खाने को भूसा चाहती भी थी. 


रथ पर बैठ राजा परीक्षित ने वह बीभत्स द्रश्य देखा, तो वे कड़क कर बोले-अरे दुष्ट! तू कौन है. इस प्रकार वृषभ और गौ को क्यों सता रहा है? साथ ही गौ और वृषभ से भी कहा - हे माता मेरे रहते तुम क्यों रोती हो? हे वृषभ तुम भी मत डरो. मै इस दुष्ट को दंड दूगा. तुम यह बताओ की तुम्हारे तीन पैर किसने काटे ? तुम्हे विरूप करने वालो ने मेरे पूर्वज पांडवो की धवल कीर्ति को कलंकित  किया है. मेरे रहते निरपराध प्राणी को सताने वाला साक्षात् ईंद्र ही क्यों न हो, मै उसकी भी भुजा जड़ से उखाड़ डालूगा.


वृषभ रूपी धर्म यह सुनकर बोला -  हे पुरुषश्रेष्ठ आप उन पांडवो के बंशधर है, जिनके विविध गुणों से रीझ कर भगवान् ने दूत सारथी आदि तक का काम किया था. आपका इस प्रकार भयभीतो को अभय देना उचित ही है किन्तु जिसने मुझे क्लेश दिया है , उसे आप ही स्वयं समझे. मै इस विषय में कुछ भी नहीं कह सकता क्योकि क्लेशदाता कौन है ?


अद्वैतवादी विद्वान् कहते है आत्मा के अज्ञान से विलसित यह सुख-दुःख रूप द्वैत मिथ्या है. अतः सुख-दुःख का कारण कोई नहीं है. तार्किक सुख दुःख का कारण आत्मा को मानते है. ज्योतिषी गृहादी देवताओं को मीमांसक कर्म को नास्तिक स्वभाव को साख्य्वादी  स्वभाव शब्द से गुण परिणाम को सुख दुःख कारण मानते है. अतः आप ही अपनी बुद्धि से क्लेशदाता का निर्णय कर लीजिये. 


राजा परीक्षित ने विचार किया की सुख-दुःख मिथ्या तो नहीं हो सकते क्योकि उनकी अनुभूति आत्मा में होती है. जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता क्योकि वह परतंत्र है. गृह भी कारण नहीं हो सकते क्योकि वे कालचक्र के अधीन है. कर्म भी कारण नहीं हो सकते है क्योकि वे जड़ कालचक्र के अधीन है. कर्म भी कारण नहीं हो सकते है क्योकि वे जड़ है. स्वभाव भी कारण नहीं हो सकता क्योकि वह व्यभिचार दूषित  है. अतः सुख दुःख के कारण ये कोई भी नहीं हो सकते है. 


तदनंतर राजा परीक्षित ने कहा - हे धर्म ! तुम ठीक कहते हो. तुम वृषभ रूपी  साक्षात् धर्म ही हो, इसलिए घातक को जानते हुए भी उसे बताना नहीं चाहते हो क्योकि अधर्म करनेवाले को जिस नरक आदि की प्राप्ति होती है वही प्राप्ति सूचना देने वाले  भी होते है.


यह विचार कर राजा ने अपनी बुद्धि से दुःख का कारण मन को जान लिया और प्रथ्वी रूप गौ तथा वृषभ रूप  धर्म  को आश्वासन देते हुए कलि को मारने के लिए तीक्ष्ण तलवार खीच ली.


राजा परीक्षित को मानरे के लिए आया देखकर कलि ने अपने सर से मुकुट उतारकर फेक दिया और भयभीत होकर उनके चरणों में जा गिरा उसे चरणों में पड़ा देखकर परीक्षित हँसते हुए बोले - 


मै पांडव वंशी  हूँ. मेरे समक्ष हाथ जोड़ने वाले शरणागत को फिर भय नहीं रहता कितु मेरे राज्य से निकल जा. तू यहाँ रह नहीं सकता क्योकि तेरे रहते राजाओं के शरीर में अधर्म के परिवार लोभ, अनृत,  कलह, दम्भादी प्रवेश करेगे. यह सुनकर हाथ जोड़ नतमस्तक हो कलि बोला - हे महाराज मै जहा कही भी क्यों न रहू वही मुझे आप धनुष बाड़ लिए खड़े दिखाई पड़ते है. मै कहा रहू ? यह आप ही बताये. 


कलि की ऐसी प्रार्थना करने पर राजा परीक्षित ने उसको रहने के लिए चार स्थान बताये -


द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्र अधर्मशचतुर्विधः 

१ द्युत स्थान, २ मदिरालय, ३ वेश्यालय और ४ वधस्थान (कसाई खाना) जिनमे वह अनृत, मद, काम, रजो मूल हिंसा और वैर के साथ रहता है. 


पुनः उसके प्रार्थना करने पर उसे रहने के लिए एक स्थान सुवर्ण और दिया. जिसमे इन चारो का तथा बैर का भी निवास है. इसलिए अभ्युदय  चाहने वाले पुरुषो को इन पांचो का सेवन नहीं करना चाहिए. बाद में राजा परीक्षित ने धर्म के शेष तीन पद तप, शौच और दया को जोड़कर उसके चारो पैर पूरे कर दिए. प्रथ्वी को भी आश्वासन देकर संतुष्ट किया. 

9/24/2011

राम चरित मानस में कलियुग के लक्षण





दो - कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सदग्रंथ
     दम्भिंह निज मति कल्पि करी प्रगट किये बहु पंथ


चो - भये लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म
     सुनु हरिजान ज्ञान निधि कहु कछुक कलिधर्म




बरन धर्म नहीं आश्रम चारी. श्रुति बिरोध रत सब नर नारी
द्विज श्रुति बेचक भूप  प्रजासन. कोऊ नहिमान निगम अनुसासन
मारग सोई जा कहू जोई भावा . पंडित सोई जो गाल बजावा
मिथ्यारंभ दंभ  रत जोई. ता  कहू संत कहई  सब कोई
सोई समान  जो परधन हारी. जो कर दंभ सो बड  आचारी.
जो कह झूठ मसखरी जाना. कलिजुग सोई गुनवंत बखाना
निराचार  जो श्रुति पथ त्यागी. कलिजुग सोई ज्ञानी सो बिरागी
जाके नख अरु जटा  बिसाला. सोई तापस प्रसिद्द कलिकाला.




दो - असुध बेश भूषन धरे भच्छाभच्छ जे खाही
     तेई जोगी तेई सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहि




सो - जे अपकारी  चार तिन्ह कर गौरव मान्य  तेई
       मन क्रम बचन लबार तेई बकता कलिकाल महू


चो- नारी बिबस नर सकल गोसाई. नाचहि नर मरकट  की नाई .
     सूद्र द्विजन्ह उपदेसहि गयाना.  मेली  जनेऊ लेही कुदाना.
    सब नर काम लोभ रत क्रोधी. देव विप्र  श्रुति संत बिरोधी.
    गुण मंदिर सुन्दर पति त्यागी. भजहि नारी पर पुरुष अभागी.
    सौभागिनी बिभूषण हीना. बिधवन्ह  के सिंगार नबीना.
    गुर सिष बधिर अंध का लेखा. एक न सुनी एक नहीं देखा.
    हरई शिष्य धन सोक न हरई. सो गुर घोर नरक महू परई.
    मातु पिता बालकन्हि  बोलावाही. उदार भरे  सोई धर्म सिखावाही.


दो - ब्रह्म ज्ञान बिनु नारी नर कहहि न दूसरी बात
      कौड़ी लागी लोभ बस कराही बिप्र गुर घात




    बादही सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटी.
    जानई ब्रह्म सो बिप्रबर आखी देखावाही डाटी


चो - पर त्रिय लम्पट कपट सयाने. मोह द्रोह ममता लपटाने.
तेई अभेदबादी ज्ञानी नर. देखा मै चरित्र कलिजुग कर.
आपु गए अरु तिन्हहू घालहि. जे कहू सत मारग प्रतिपालाही.
कल्प कल्प भरी एक एक नरका. परही जे दूषहि  श्रुति करी तरका.
जे बरनाध तेली कुम्हारा. स्वपच किरात कोल कलवारा.
नारी मुई गृह सम्पति नासी. मूड  मुडाई होही सन्यासी.
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावही. उभय लोक निज हाथ नासवाही.
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी. निराचार सठ   ब्रश्ली स्वामी.
सूद्र करहि जप तप ब्रत नाना. बैठी बरासन कहहि पुराना.
सब नर कल्पित करही अचारा. जाई न बरनी अनीति अपारा.




दो -  भये बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग.
       करही पाप पावही दुःख भय रुज सोक बियोग.


       श्रुति सम्मत हरी भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक.
      तेहि न चलहि नर मोह बस कल्पहि पंथ अनेक 


छ - बहु दाम सवारही धाम जती. विषया हरी लीन्हिन  रही बिरती .
     तपसी धन्वंत दरिद्र गृही. कलि कौतुक तात न जात कही.




    कुलवंत निकरही नारी सती. गृह आनहि चेरी निबेरी  गती.
    सुत मानही मातु पिता तब लौ. अबलानन दीख नहीं जब लौ.




    ससुरारी पिआरी लगी जब ते. रिपुरूप कुटुंब भये तब ते.
    नृप पाप परायण धर्म नहीं. करी दंड बिडम्ब प्रजा नितही.


   धन्वंत कुलीन मलीन अपी. द्विज चिन्ह जनेऊ उघार  तपी.
   नहीं मान पुराण न बेदहि जो. हरि सेवक संत सही कलि सो.


   कबी वृन्द उदार दुनी न सूनी. गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी.
   कलि बारही बार दुकाल परे . बिनु अन्न दुखी सब लोग मरे.


दो - सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड.
      मान मोह मारादी  मद ब्यापी  रहे ब्रहमांड.


     तामस धर्म करही नर जप तप ब्रत मख दान.
     देव न बरषही  धरनी बये न जामही धान.


छ- अबला कच भूषन भूरी छुधा. धनहीन दुखी ममता बहुधा.
     सुख चाहहि मूढ़ न धर्म रता. मति थोरी कठोरी न कोमलता.
     नर पीड़ित रोग न भोग कही. अभिमान बिरोध अकारनही.
     लघु जीवन संबतु पञ्च दसा कल्पांत न नास गुमान असा.
    कलिकाल बिहाल किये मनुजा. नहीं मानत क्वो अनुजा तनूजा.
    नहीं तोष बिचार न सीतलता. सब जाती कुजाती भये मगता.
    ईरिषा परुषाच्छर लोलुपता. भरी पूरी रही समता बिगता.
    सब लोग बियोग बिसोक हए. बरनाश्रम धर्म अचार गए. 
    दम दान दया नहीं जानपनी. जड़ता प्रबंचन्ताती  घनी.
     तनु पोषक नारी नरा सगरे. परनिंदक जे जग मो बगरे.


दो - सुनु ब्यालारी काल कलि मल अवगुन आगार.
     गुनऊ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार.
    क्रत्जुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग.
   जो गति होई सो कलि हरी नाम ते पावही लोग. 


क्रत्जुग सब जोगी बिग्याने. करी हरी ध्यान तरही भाव प्राणी.
त्रेता बिबिध जगी नर करही. प्रभुहि समर्पी  कर्म भाव तरही.
द्वापर करी रघुपति पद पूजा. नर भाव तरही  उपाय न दूजा.
कलिजुग केवल हरी गुन गाहा. गावत नर पावही भव थाहा.
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना. एक आधार  राम गुन गाना.
सब भरोस तजि जो भज रामही. प्रेम समेत गाव गुण ग्रामहि
सोई भव तर कछु संसय नाही. नाम प्रताप प्रगट कलि माही.
कलि कर एक पुनीत  प्रतापा  . मानस पुन्य होही नहीं पापा. 


दो - कलिजुग सम जुग आन नहीं जौ नर कर बिस्वास.
      गाई राम गुन गन बिमल भव तर बिनही प्रयास.
     प्रगट चारी पद धर्म के कलि महू एक  प्रधान.
     जेन केन बिधि दीन्हे दान करई कल्याण. 






     

9/23/2011

शास्त्र में अधम ब्राहमण का यही बध कहा गया है


सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर शम्याप्रास नाम का व्यासजी का आश्रम था. वह बद्री वृक्षों के समूह से मंडित था. वही व्यासजी ने आचमन  कर मन को निग्रह किया, तब उन्हे माया और पुरुष का दर्शन हुआ. 

यह माया ही समस्त अनर्थो की मूल है. अनर्थो की निवृत्ति भक्ति से होती है  और भक्ति भगवत चरित्रों  के श्रवण  से होती है ऐसा विचारकर उन्होंने भगवत चरित्रों से परिपूर्ण भागवत संहिता की रचना की.

यस्यं वै श्रूयमाड़ायाम  क्रश्ने    परम्पूरुशे
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोक्मोह्भयापहा 

जिसके श्रवण मात्र से भगवान् में मनुष्यों की भक्ति होती है  और शोक, मोह, भय आदि सब निवृत्ति हो जाते है. व्यासजी के पुत्र श्रीशुकदेवजी निवृत्ति मार्ग से निरत थे, ग्रंथो के अध्ययन और अध्यापन से  उनका कोई सम्बन्ध न था. फिर भी भगवान् के गुणों से आकृष्ट होकर उन्होंने अपने पिताजी से इस विशाल ग्रन्थ का  अध्ययन किया और परीक्षित को भी इसे सुनाया.

यदा म्रधे कौरव स्रंज्यानाम वीरेश्व्ठो वीर्गातिम गतेषु
व्रकोदाराविद्ध  गदाभिमर्ष भाग्नोरूदंडे  धृतराष्ट्र्पुत्रे 

जब महाभारत संग्राम में कौरव और पांडवो की सेना के बड़े-बड़े वीर मारे गए एवं भीम के गदा प्रहार से दुर्योधन के उरूदंड भी टूट गए तब अश्वत्थामा ने दुर्योधन के संतोषार्थ द्रौपदी के सोये हुए पुत्रो का सर काट डाला. यह देखकर विलाप करती हुई द्रौपदी को अर्जुन ने समझाया की  तू शोक न कर, मै अश्वत्थामा का सर काटकर लाता हूँ. ऐसा कहकर अर्जुन ने अश्वत्थामा का पीछा किया. अश्वत्थामा पीछा कर रहे अर्जुन को देखकर बहुत घबडाया और रथ पर चढ़कर बड़ी तेजी से भागा, जैसे रूद्र के भय से सूर्य भागे थे

जब अश्वत्थामा के घोड़े थक गए तब उसने अपने बचाव के लिए उपसंहार न जानते हुए भी अर्जुन पर ब्रह्मास्त छोड़ दिया. अर्जुन ने यह देखकर अपना भी ब्रहास्त्र छोड़ दिया. उन दोनों अस्त्रों के टकराने से महाप्रलय का सा द्रश्य उपस्थि हो गया चारो और हाहाकार मच गया. तब भगवन के आदेश से अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को खीचकर शांत कर दिया और अश्वत्थामा को रस्सी से बांधकर अपने डेरे ले गए.

मार्ग में भगवान् ने अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को देखते  हुए उसका वध कर डालने को कहा किन्तु अर्जुन ने उसे गुरुपुत्र  जानकार ऐसा नहीं किया. द्रौपदी ने जब पशुतुल्य रस्सी से बंधे अश्वत्थामा को देखा तब उसे दया आ गयी. वह उसे प्रणाम कर बोली

इसे छोड़ दो, यह गुरु पुत्र है. यह सर्वदा हमारे लिए वही  पूज्य गुरु है, जिसकी कृपा से तुमने  सारी  धनुर्विद्या सीखी, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया. पुत्र  रूप में यह साक्षात्  द्रोड़ाचार   ही विद्यमान है. इसे मत मारो छोड़ दो, मै तो पुत्र शोक से रोती ही हूँ अब इसकी माता को मेरी तरह पुत्र शोक से न रुलाओ 

द्रौपदी के इन वचनों का युधिशिथिर आदि सभी ने अनुमोदन किया किन्तु भीम को यह बात सहन न हुई. उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा इस दुष्ट का तो बध करना ही श्रेयस्कर है.

यह कहकर वह स्वयं अश्वत्थामा को मारने चले उधर द्रौपदी बचाने चली. तब भगवान् ने दोनों को रोका और अर्जुन से कहा - अधम ब्राहमण भी बधयोग्य नहीं है किन्तु आततायी शस्त्रधारी बध योग्य है, यह दोनों बाते मैंने ही कही है, इनका यथायोग्य पालन करो और भी ऐसा करो जिससे द्रोपदी को सांत्वना देते हुए तुमने  जो प्रतिज्ञा की थी, वह असत्य न हो और जो भीमसेन  को भी न अखरे. द्रौपदी को तथा मुझको भी प्रिय हो. 

अर्जुन ने सहसा प्रभु का अभिप्राय जानकार अश्वत्थामा के केश सहित मडी खंग से काटकर निकाल ली और धक्का देकर उसे अपने शिविर से बाहर कर दिया. 

शास्त्र में अधम ब्राहमण  का यही बध कहा गया है, प्राणदंड नहीं.  इस तरह सभी के वचनों की रक्षा हो गयी. 

मुंडन कर देना, धन छीन लेना  तथा स्थान से निकाल देना यही अधम ब्राह्मणों का वध कहा गया है. प्राणदंड नहीं.  बाद में पुत्र शोक से व्याकुल पांडवो ने अपने मृत पुत्रो के दाहसंस्कार आदि पारलौकिक कर्म किये.

9/22/2011

जीवन धर्म क्या है...?

 एक शरीर और उसके संबंधियों में क्रमशः अहंता और ममता करके जीव ने स्वयं ही अपने आपको संसार के बंधन में जकड लिया है. अब धर्म का काम यह है की जीव की अहंता और ममता को शिथिल करके उसे संसार के बंधन से सर्वदा के लिए छुड़ा दे. 


ऐसे धर्म का स्वरुप यही है की मनुष्य केवल अपने सुख से फूल न उठे और अपने ही दुःख से मुरझा न जाय. उसे चाहिए की वह समस्त प्राणियों के सुख-दुःख  के साथ अपना नाता जोड़ दे. सबके सुख में सुखी हो और सबके दुःख में दुखी. इससे अहंकार का बंधन कटता है और ममता भी शिथिल पड़ती है. परन्तु ईतना ही धर्म नहीं है. धर्म की गति इससे आगे भी है.


मनुष्य में  कुछ विशेषता होनी चाहिए वह विशेषता क्या है? 
बस इतनी ही की किसी को दुखी देखकर उसका ह्रदय दया से द्रवित हो जाय औ वह इसके प्रति सहानुभूति के भाव से भर जाय.


 यद्यपि  सहानुभूति भी एक बहुत बड़ा बल है, इससे दुखियो को बड़ी शक्ति प्राप्त होती है, तथापि जो सज्जन कुछ प्रत्यक्ष सहायता कर सकते है वे तन,मन, धन से दोनों की रक्षा करे,


जो दुखी प्राणियों की उपेक्षा करके अथवा किसी भी प्राणी से द्वेष भाव रखकर केवल सूखे पूजा पाठ में लगे रहते है उन्हें कभी सन्ति नहीं मिल सकती और न तो उन्हें परमात्मा के प्रसन्नता ही प्र्त्फो सकती है. भागवत के चौथे स्कंध इ कहा गया है की चारो वेदों का ज्ञाता और समदर्शी महात्मा भी यति दीं दुखियो की उपेक्षा करता है तो उसका सारा वेदज्ञान नष्ट और निष्फल हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे फूटे घड़े से पानी बह जाता है .


प्रशंशनीय तो वह है जो की अपने कष्टों को मिटाने की क्षमता होने पर भी उन्हें सहन करे अर्थात स्वयं दुःख सहन करके दूसरो का दुःख मिटावे अपनी इच्छा  अपूर्ण रखकर दुसरे की ईक्षा पूर्ण करे. यह सत्य है की ईससे अपनी साम्पत्तिक, पारिवारिक और शारीरिक हानि होने की संभावना है. परन्तु उस लाभ के सामने जो ईससे स्वयं होता है यह हानि कुछ भी नहीं है. क्योकि हानि तो होती है देवल सांसारिक पदार्थो की और लाभ होता है परमार्थ का. ऐसा मनुष्य अपने धर्म पालन के द्वारा परम कल्याण का अधिकारी  होता है. 


यह तो हुई जीव के सामान्य धर्म की बात. एक परम धर्म भी है.


परमधर्म का तो ज्ञान भी बड़े सौभाग्य से होता है. वह श्रीमद्भागवत में सुनिश्चित रूपसे बतलाया गया है. ब्रह्माजी बार-बार शास्त्रों का आलोचन करके ईसी निश्चय पर पहुचे की समस्त शास्त्रों का तात्पर्य भगवान् के नामो का जप, कीर्तन और अर्थ  चिंतन द्वारा परमात्मा के निरंतर स्मरण में ही है. शास्त्रों में ईसे ही परमधर्म के नाम से कहा गया है.

9/13/2011

उलटा नाम जपत जगा जाना वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना.

 वाल्मीकि जी महाराज  के जीवन  के सम्बन्ध में आध्यात्म रामायण, पद्मं पुराण, विष्णु  पुराण  , आदि में तरह-तरह की कथाये आती   है. अद्भुत बात यह है की उनका पूर्ण जीवन उत्तम कोटी   का नहीं बताया गया है. आध्यात्म रामायण   में बताया गया है - 
अहम् पूरा किरातेशु किरातैह सह वर्धितः
जन्म्मात्र द्विज्त्वं में शूद्रचार्रतः सदा. 
इसमें बाल्मीकी जी स्वयं कहते है की पहले मै जंगल में रहता था. जंगली लोगो के साथ ही मुझे पढने सीखने का अवसर मिला. वहा  मैंने बुरे-बुरे चरित्र किये. मै शूद्राचार परायण हो गया.


ब्रह्मसूत्र के शारीरिक भाष्य में शूद्र शब्द की व्याख्या ऐसे की गयी है - शुचा अभिदुद्रूवे ईति शूद्रः - जो बात-बात में स्वयं दुखी हो जाय और दूसरो को सुखी करे, रुलाये, उसका नाम शूद्र है.


बाल्मीकी जी कहते है की मै पहले ईसी तरह  के काम किया करता था. एक दिन मेरे सामने से सप्तर्षि निकले. मन में आया की उनके पास जो कमंडल  है, दंड है, वस्त्र है, उन सबको छीन लू और उनसे प्राप्त द्रव्य को अपने कुटुंब के पालन पोषण में लगाऊ


एक पुराण में तो  यह लिखा है  की वाल्मीकि जी को सप्तर्षि मिले और दुसरे पुराण में लिखा ही की केवल नारदजी मिले. 


जो भी हो, जब वाल्मीकिजी कमानल आदि को छीनने के लिए सप्तर्षियो अथवा नारदजी के पास पहुचे तब उन्होंने उनसे पूछा की तुम जो यह काम करने जा रहे हो, इसके फलभागी  तुम्हारे घरवाले होगे या नहीं?


 जानते हो की पाप का फल क्या होता है? केवल दुःख होता है. यदि तुम हमारा सामान  छीनकर हमें दुःख दोगे तो तुमको भी दुःख होगा. इसलिए पहले यह देख लो की तुम जो पाप कर रहे हो और जिसके फलस्वरूप तुम्हे दुःख मिलने वाला है, उसमे तुम्हारे घरवाले हिस्सेदार होगे या नहीं?


वाल्मीकि ने कहा की मुझे तो यह सब मालूम नहीं है. मै घरवालो से पूछकर जबाब दे सकता हूँ.. लेकिन मै यह बात पूछने घर जाऊ और तुम ईतने में भाग जाओ तो क्या होगा?


इस पर सातो  ने कहा की तुमको जिसने संतोष हो वह कर लो लेकिन घर जाकर पूछ जरूर आओ.


वाल्मीकिजी ने उनको पेड़   से बाढ़ दिया. वे खुशी से बांध  गए और बधे-बधे भगवान् का स्मरण करने लगे.
वाल्मीकिजी ने अपने घर जाकर अपनी पत्नी, पिता-माता और बंधू=बांधव सबसे पूछा की मै चोरी डकैती, बेईमानी, छल-कपट तथा दूसरो को दुःख पहुचाकर  धन संपत्ति ले आता हूँ उससे तुम लोगो का पालन पोषण होता हैलेकिन मुझे इस पाप कर्म का जो फल मिलेगा उसमे तुम लोग हिस्सेदार बनोगे या नहीं?


घरवालो ने एक स्वर में उत्तर दिया की-नहीं. तुम घर के मालिक  हो. तुम्हारा कर्तव्य  है की हमारा पालन पोषण करो. तूम कर्तव्य के अनुसार ही हमारे पालन-पोषण के लिए धन कमाकर ले आते हो. लेकिन हम यह नहीं जानते की तुम कहा से कैसे लाते हो. इसलिए यदि तुम्हारे कर्तव्य पालन का फल दुःख है तो हम उसको भोगने में हिस्सेदारी नहीं होगे.


यह सुनकर बाल्मीकी जी ने बड़े ग्लानी हुई. वे तुरंत सप्तर्षियो के पास पहुचे और उनको बंधन से मुक्त करके बोले की घरवाले तो दुःख में हिस्सेदार नहीं होगे.


इसके बाद सप्तर्षियो ने बाल्मीकी को समझाया की देखो दूसरो को तकलीफ पहुचकर धन बटोरना पाप है. फिर जब उस पाप में तुम्हारे परिवार के लोग ही सम्मिलित नहीं है तब तुम केवल अपने लिए दुःख की स्रष्टि क्यों कर रहे है?


अब वाल्मीकि सप्तर्षियो के सरनागत हो गए. उन्होंने उनको राम-राम जपने का उपदेश दिया लेकिन वाल्मिकी जी की स्थित ऐसी थी की उनके मुह से राम-राम निकले ही नहीं.


इस पर ऋषियों ने कहा अच्छा तुम सीधे  राम-राम नहीं जप सकते तो मरा- मरा जपो क्योकि मारा मारा जपने से भी राम राम क उच्चारण हो जाएगा. इसी आधार पर तुलसीदासजी ने कहा है-


उलटा नाम जपत जगा जाना 
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना. 


वाल्मीकिजी मारा-मारा जपने लगे और ऐसी तपस्या में सलग्न हुए की ब्रह्म के सामान हो गए. इसलिए वाल्मीकि रामायण के प्रारंभ में ही उनके लिए तपस्वी शब्द का प्रयोग किया गया है.





9/11/2011

अशांति की अवस्था में काम पैदा होता है

वास्तव में रूपये अच्छे नहीं है पर लोभ के कारण रूपये अच्छे लगते है. ऐसे ही मोह के कारण संसार, कुटुम्बी अच्छे लगते है. प्रेम के कारण भगवान् अच्छे, मीठे लगते है. गोपियों को मीराबाई को भगवान् मीठे  लगते थे. प्रेम के कारण ही मित्र से मिलने में आनंद आता है. गाय के प्रेम के कारण बछड़े को गाय के दूध से जो पुष्टि होती है वह केवल दूध से नहीं .

नाशवान मोह होता है, अविनाशी में प्रेम होता है. मूल में चीज एक है. मोह से पतन होता है.

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संसार का सुख हम छोड़ते नहीं और उसे छोड़े बिना पारमार्थिक सुख मिलता नहीं.

दुःख, अशांति की अवस्था में काम पैदा होता है. ममता रखने से वस्तुओ का सदुपयोग नहीं होता. अपना न मानने से ही वस्तुओ का सदुपयोग होता है. वस्तुओ को अपना न मानने  से और सबको अपना न  मानने से उदारता नहीं आती. वस्तु को चाहे संसार की मानो, चाहे प्रकृति मानो, चाहे भगवन की मानो. उसे अपनी मानना बेईमानी है. केवन तू और तेरा है मै और मेरा है ही नहीं.

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विचार से विवेक होता है और चिंतन से स्थिति होती है. चिंतन अभ्यास है. अभ्यास से विवेक तेज है. चिंतन मन से होता है. मन अपर प्रकृति है. शरीर को संसार से अलग मानना अविवेक है.

सत्संत सुनकर विचार नहीं करते. विचार करना वैराग्य में हेतु होता है और विचर उदय होना तत्व प्राप्ति में हेतु होता है.

अपने लिए कोई अपना नहीं है, पर सेवा के लिए सभी अपने है. चाहे किसी को अपना  मत मानो, चाहे संसार को अपना मानो दोनों का परिणाम एक होगा. अधूरी चीज ही बाधक होती है. अधूरा विधी रोगी को मार देता है. अतः या तो बिलकुल न माने या पूरा जाने. सुख लेने के लिए शरीर भी पाना नहीं है और सेवा करने के लिए पूरा संसार अपना है.

9/10/2011

धन से हानि


धन की सार्थकता उसे भगवान् की सेवा में लगाने में है. लक्ष्मी  भगवान् की सेविका है, उन्हें निरंतर भगवान् की सेवा में ही नियुक्त करते रहना चाहिए. इससे लक्ष्मी की प्रसन्नता पाप्त होती है और उनका विस्तार होता है. लक्ष्मीपति नारायण तो प्रसन्न होते ही है. संसार में जिसके पास जो कुछ भी है, सब भगवान् का है, हमने जो उस पर पाना अधिकार मान लिया है, यह तो हमारी बेईमानी है,

       हम सेवक है, हमारा काम है मालिक की संपत्ति की रक्षा करना और उनके आज्ञानुसार , उनकी माग के  अनुसार उनके सेवा में उसे समर्पित करते रहना. सारे जीव भगवान् के स्वरूप है - उनमे जहा जिस वस्तु  का अभाव है, वही भगवान् उस वस्तु को चाह रहे है. जिसके पास वह वस्तु है, उसे चाहिए की भगवान् की इस माग को ठुकराए नहीं और बड़े आदर के साथ उस  पर अपना कोई अधिकार न समझकर उसे यथायोग्य अभावग्रस्त प्राणियों को  अर्पण कर दे.

       अभावग्रस्त प्राणियों को दया का पात्र न समझे और न अपने को दाता समझकर मन में अभिमान  या उनपर अहसान करे. उन्हें भगवान् का स्वरूप समझे और भगवान् के नाते उस वस्तु पर उनका सहज अधिकार समझे यह समझे की मैंने भगवान् की वास्तु भगवान् को ही दी है.

       जो वस्तु का स्वामी है, उसी को वह वस्तु दी जाय इसमें हमारे लिए अभिमान की कोण सी बात है ? इस प्रकार निरभिमान होकर धन के द्वारा भगवान् की  सेवा करता रहे, इसी में धन की सार्थकता है और ऐसा करने से ही धन का उत्तम परिणाम होता है, नहीं तो धन केवल कष्टदायक होता है और नाना प्रकार के पाप उत्पन्न करके  नरको और दुखपूर्ण योनियों में पंहुचा देता है.

       प्रायः देखा जाता है के केवल  ईकट्ठा करने वाले क्रपड़ो को  धन से कभी सुख नहीं मिलता. यहाँ तो वे रात-दिन धन कमाने और उसकी रक्षा  करने की चिंता से जलते रहते है और मरने पर धन का सदुपयोग न करके उसे पापकर्म का कारणरूप बनाने के कारण घोर नरको में गिरते है.

      जैसे थोडा सा कोढ़ सर्वांगसुंदर शरीर के सौन्दर्य को बिगाड़ देता है वैसे ही धन का तनिक सा लोभ यशास्वियो के निर्मल यश में और गुडवानो के सद्गुदो  में कलंक लगा देता है. धन कमाने में, कमाकर उसे बढाने में, रक्षा करने में, खर्च करने में, भोगने में और नाश हो जाने दिन-रात परिश्रम, भय, चिंता और भ्रम डूबे रहना पड़ता है.

        चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दंभ, काम, क्रोध, गर्व, मद-अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अत्यंत जुआ और शराब - ये पंद्रह अनर्थ मनुष्यों में  धन से ही पैसा होते है. इसलिए अपना कल्याण चाहने वाले पुरुषो को ऐसे अनर्थ करनेवाले अर्थ को दूर से ही प्रणाम कर लेना चाहिए.

        स्नेह बंधन में बढ़कर सदा एक रहनेवाले सगे भाई बंधू, स्त्री-पुत्र, माता-पिता और सगे संबंधियों आदि में भी धन की कौड़ियो के कारण इतनी फूट पड़ जाती है की  वे एक दुसरे के वैरी बन जाते है. थोड़े से धन के लिए वे क्षुब्ध हो जाते है, उनके क्रोध की आग भड़क उठती है. वे आपस में लड़ने लगते है और पुराने प्रेम बंधन को तोड़कर सहसा एक दुसरे का गला काटने को तैयार हो जाते है.

        इसपर टीका-टिप्पड़ी व्यर्थ है. धनासक्ति, धन-कामना, धनप्राप्ति और धनसंग्रह का यह
परिणाम जगत में आज प्रत्यक्ष  हो रहा है. यह सत्य है-धन आवश्यक है, धन की सार्थकता भी है और धन कमाना भी चाहिए परन्तु  कमाना चाहिए उसे भगवान् की सेवा के लिए, भगवान् के नियमो  की रक्षा करते हुए, भगवान् के अनुकूल उपायों से ही और धन के प्राप्त होने पर उसका भगवान् के आज्ञानुसार सदुपयोग करना चाहिए. अपने धन पर जो गरीबो का अधिकार समझता है  और उनके हितार्थ उसका यथायोग्य उपयोग करता है, वही सच्चा धनी है.

        धन का वही उपयोग उत्तम है जो परिणाम में शांति, प्रसन्नता और सुख उत्पन्न करनेवाला हो, जो किसी को कुछ देकर पछताता है, वह या तो धन का दुरूपयोग करता है, अथवा धनासक्ति में फंसा हुआ प्राणी है जो  धन के नाम पर कमाता रहता है.

   

9/09/2011

मनुष्य संसार के संसाधनों में सुख खोज रहा है.



संसार का प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है. आज का मनुष्य संसार के संसाधनों में सुख खोज रहा है. सुख की प्रत्याशा में ही वह कर्म करता है, वह आशा करता है की उसे सुख अवश्य मिलेगा, पर ऐसा होता नहीं है, निराशा और सुख ही हाथ लगते है
सो परत्र दुःख पावै सिर धुनी धुनी पछिताई
एक संस्कृत सूक्ति में सुख और दुःख इस प्रकार परिभाषित किया गया है-
सर्वं परवशं दुखम सर्वमात्म्वषम सुखं 
अर्थात दुसरे के बंधन में अधीन रहना दुःख है, जबकि आत्माधीन या स्वतंत्र रहना सुख है. आज के मोहासक्त मानव ने सुख दुःख के अर्थ ही बदल लिए है. आज का मानव इच्छापूर्ती होने को सुख और पूर्ती न होने को दुःख मान बैठा है. हमारे धर्मग्रंथो में सुख के दो रूप बताये गए है-लौकिक सुख और अलौकिक सुख. लौकिक सुख आशय उस सुख से है जो संसार की किसी बस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति के संयोग से मिलता है


दुसरे शब्दों में आपको अपनी इक्षित वस्तुए, मकान, दूकान, सोना-चांदी मिले, आपको पति-पत्नी, संसार, भी-बहन आदि परिवारजन मिले, आपको अनुकूल परिस्थिति एवं सम्मान मिले-इन सबके मिलने से आपको जो आराम महसूस होता है, उसे लौकिक सुख कहते है. लौकिक सुख क्षणिक होते है. इन सुखो का अभाव तो संसारी प्राणी के लिए दुखकार होता ही है, इन सुखो की प्राप्ति भी दुखकार ही होती है. जैसे एक व्यक्ति के पास मकान नहीं है, वह दूसरो के मकानों को देखकर स्वयं मकान बनवाने के लिए कठिन परिश्रम करता है.


कर्माकर्म का विचार किये बिना वह धन कमाता है, मकान बनवा लेता है, किन्तु बाद में यह मकान उसे स्थाई सुख नहीं देता है. उसकी सुरक्षा की चिंता, पुत्रो के विवाद आदि विषय उसे दुःख देने लगते है. ईसी प्रकार पुत्र प्राप्ति का सुख भी दुखदायी हो जाता है. अर्थात लौकिक  सुख कष्टप्रद एवं दुख देनेवाले ही होते है. 


आजके मानव में लौकिक सुक्खो को जीवन का आधार मान लिया है. संत कवी तुलसी ने सांसारिक सुखो को दाद की खुजली के सामान बताया है -
ममता दादू कंडू इरषाई
हरष विषाद गरह बहुताई

लौकिक सुखजनित दुखनिव्रत्ति का एक ही उपाय है की इन सुखो में आसक्ति न रखे . इन सुखो को भगवत क्रपा  से प्राप्त हुआ माने तथा कर्तापन का अभिमान भुला दे. ऐसा मान लेने पर व्यक्ति इन सुखो के नष्ट हो जाने पर  दुःख का अनुभव नहीं होगा.


अलौकिक सुख, वह सुख है, जो संसार पर आधारित नहीं है. वह संसार की किसी वास्तु, व्यक्ति अथबा परिस्थिति से नहीं मिलता. अलौकिक सुख की विचित्रता यह है की वह मिलने के बाद निरंतर बढ़ता रहता है. उसके बढ़ने की कोई सीमा नहीं है. अलौकिक सुखो को तीन नामो से जाना जा सकता है -  भगवद्भक्ति, परम शांति और जीवन मुक्ति. इसी सुख का नाम है - परमानंद, निजानद, स्थायी प्रसन्नता, अलौकिक आनंद. 


कबीरदास के शब्दों में - 
मन मगन भया तब क्या बोले
हंसा पाया मान सरोवर, डाबर डाबर क्या डोले.

अलौकिक सुख शारीरिक एवं मानसिक बल, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार, धन-संपत्ति, सम्मान आदि से नहीं मिलेगा. अलौकिक सुख की प्राप्ति सरल उपाय है - सत्संग एवं ईश्वर में विशवास. अलौकिक सुख भगवत कृपा  से प्राप्त होता है. उस अनंत करुडामय परमात्मा के दिव्य चरित्रों में श्रद्धा-विशवास के साथ उनके श्रवण, चिंतन  एवं मनम से व्यक्ति को एक अपूर्व आनंद का अनुभव होने लगता है. इसी आनंद का नाम है-अलौकिक सुख. 


मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एवं उनके नाम को आनद सिन्धु   एवं सुखो का धाम कहा गया है. नामकरण करते हुए नहामुनी वसिष्ठ ने कहा है -
जो आनंद सिन्धु सुख राशी
सीकर तें त्रैलोक सुपासी
अलौकिक सुख की प्राप्ति के लिए हमें सत्संग की वृत्ति अपनानी होगी. आत्मचिंतन करना होगा, परमात्मा के उन अनंत उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना होगा, जो उसने हमें प्रदान किये है. स्मरण रहे अलौकिक सुख का आंड मानवजीवन में ही संभव है. निरंतर सत्संग एवं आत्मचिंतन प्राप्ति का संयोग बनाए. अपने जीवं इन उपायों की अवधारणा करते ही धीरे सांसारिक आसक्ति से विरक्ति हो जायगे. अंतःकरण आनंद का अजस्र निर्झर झरने लगेगा और अलौकिक सुख की अनुभूति होने लगेगी.

9/08/2011

गौसेवा के चमत्कार



अनादिकाल से मानवजाति गोमाता की सेवा कर अपने  जीवन को सुखी, सम्रद्ध, निरोग, ऐश्वर्यवान एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है. गोमाता की सेवा के माहात्म्य से शास्त्र भरे पड़े है. आईये शास्त्रों की गो महिमा की कुछ झलकिय देखे -


गौ को घास खिलाना कितना पुण्यदायी 
    तीर्थ स्थानों में जाकर स्नान दान से जो पुन्य प्राप्त होता है, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जिस पुन्य  की प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, तपस्या, महादान तथा हरी की आराधना करने पर जो पुन्य  प्राप्त होता है, सम्पूर्ण प्रथ्वी की परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदों के पढने तथा समस्त यज्ञो के करने से मनुष्य जिस पुन्य को पाता है, वही पुन्य  बुद्धिमान पुरुष गौओ को खिलाकर पा लेता है.


गौ सेवा से वरदान की प्राप्ति
    जो पुरुष गौओ की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौए उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती है.


गौ सेवा से मनोकामनाओ की पूर्ती
    गौ की सेवा याने गाय को चारा डालना, पानी पिलाना, गाय की पीठ सहलाना, रोगी गाय का ईलाज करवाना आदि करनेवाले मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि जिस-जिस वस्तु की ईच्छा करता है, वे सब उसे प्राप्त हो जाती है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती.


    भगवान् शिव कहते है-हे पार्वती! सम्पूर्ण गौए जगत में श्रेष्ठ है. वे लोगो को जीविका देने  के कार्य  में प्रवृत  हुई है. वे मेरे  अधीन  है और चन्द्रमा के अमृतमय द्रव से प्रकट हुई है. वे  सौम्य, पुन्मयी, कामनाओं की पूर्ती करने वाली तथा प्राणदायिनी है. इसलिए पुन्य प्राप्ति की इच्छा  वालो  को सदैव गायो की पूजा, सेवा (घास आदि खिलाना , पानी पिलाना, रोगी गाय का ईलाज कराना आदि-आदि) करनी चाहिए.


भूमि दोष समाप्त होते है
    गौओ का समुदाय जहा बैठकर  निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान की शोभा को बाधा देता है और वह के सारे पापो को खीच लेता है.


सबसे बड़ा तीर्थ गौ सेवा
    देवराज इंद्र कहते है- गौओ में सभी तीर्थ निवास करते है. जो मनुष्य गाय की पीठ छोटा है और उसकी पूछ को नमस्कार करता है वह मानो तीर्थो में तीन दिनों तक उपवास पूर्वक रहकर स्नान कर देता है.


असार संसार छेह सार पदार्थ
   भवान विष्णु, एकादशी व्रत, गंगानदी, तुलसी, ब्रह्मण और गौए - ये ६ इस दुर्गम असार संसार से मुक्ति दिलाने वाले है.


मंगल होगा
    जिसके घर बछड़े सहित एक भी गाय होती है, उसके समस्त पाप्नाष्ट हो जाते है और उसका मंगल होता है. जिसके घर में एक भी गौ दूध देने वाले न हो उसका मंगल कैसे हो सकता है और उसके अमंगल का नाश कैसे हो सकता है.


ऐसा न करे
    गौओ, ब्राह्मणों तथा रोगियों को जब  कुछ दिया  जाता  है उस समय  जो न देने की सलाह  देते है. वे मरकर प्रेत बनते है.


गोपूजा - विष्णुपूजा
    भगवान् विष्णु देवराज इन्द्र से कहते है के हे देवराज! जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष, गोरोचन और गौ की सदा पूजा सेवा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरो और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत की भी पूजा हो जाते है. उस रूप में उसके द्वारा की हुई पूजा को मई यथार्थ रूप से अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ.


गोधूली महान पापो की नाशक है.
    गायो के खुरो से उठी हुई धूलि, धान्यो की धूलि तथा पुट के शरीर में लगी धूलि अत्यंत पवित्र एवं महापापो का नाश करने वाले है.


चारो सामान है
    नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान् का चिंतन, तुलसी को सीचना और गौ की सेवा करना ये चारो सामान है


गो सेवा के चमत्कार
    गौओ के दर्शन, पूजन, नमस्कार, परिक्रमा, गाय को सहलाने, गोग्रास देने तथा जल पिलाने आदि सेवा के द्वारा मनुष्य दुर्लभ सिधिया प्राप्त होती है. 
    गो सेवा से मनुष्य की मनोकामनाए जल्द ही पूरी हो जाती है.
    गाय के शरीर में सभी देवी-देवता, ऋषि मुनि, गंगा आदि सभी नदिया तथा तीर्थ निवास करते है. इसीलिये गोसेवा से सभी की सेवा का फल मिल जाता है.
    गे को प्रणाम करने से - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो की प्राप्ति होती है. अतः सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को गायो को निरंतर प्रणाम करना चाहिए.
    ऋषियों ने सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रथम किया जाने वाला धर्म गोसेवा को ही बताया है.
    प्रातःकाल सर्वप्रथम गाय का दर्शन करने से जेवण उन्नत होता है.
    यात्रा पर जाने से पहले गाय का दर्शन करके जाने से यात्रा मंगलमय होती है.
    जिस स्थान पर गाये रहती है, उससे काफी दूरतक का वातावरण शुद्ध एवं पवित्र हो है, अतः गोपालन करना चाहिए.
    भगवान् विष्णु भी गोसेवा से सर्वाधिक प्रसन्न होते है, गोसेवा करनेवाले कोअनायास ही गोलोक की प्राप्ति हो जाती है.
    प्रातःकाल स्नान के पश्चात अर्व्प्रथम गाय का स्पर्श करने से पाप नष्ट होते है.


गोदुग्ध - धरती का अमृत
    गाय का दूश धरती का अमृत है. विश्व में गोद्म्ग्ध के सामान पौष्टिक आहार दूसरा कोई नहीं है. गाय के दूध को पूर्ण आहार माना गया है. यह रोगनिवारक भी है. गाय के दूध का कोई विकल्प नहीं है. यह एक दिव्य पदार्थ है.
    वैसे भी गाय के दूध का सेवन करना गोमाता की महान सेवा करना ही है. क्योकि इससे गोपालन को बढ़ावा मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से गाय की रक्षा ही होती है. गाय के दूध का सेवन कर गोमाता की रक्षा में योगदान तो सभी दे ही सकते है.


पंचगव्य
    गाय के दूध, दही, घी, गोबर रस, गो-मूत्र का एक निश्चित अनुपात में मिश्रण पंचगव्य कहलाता है. पंचगव्य का सेवन करने से मनुष्य के समस्त पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते है, जैसे जलती आग से लकड़ी भस्म हो जाते है.
    मानव शरीर ऐसा कोई रोग नहीं है, जिसका पंचगव्य से उपचार  नहीं हो   सकता. पंचगव्य से पापजनित  रोग भी नष्ट हो जाते है.


    यदि उपर्युक्त सूत्रों को एक बार में अथवा एक या दो करके दूरदर्शन आदि प्रसार माध्यमो के द्वारा लिखा हुआ दिखाया जाय और अन्य विज्ञापनों की तरह दिन में अनेक बार और कुछ लम्बे समय तक विज्ञापनों को जारी रखा जाय तो थोड़े समय में देश में गोक्रन्ती  हो सकती है और यदि गो-दुग्ध सेवन के प्रचार को अधिक महत्त्व दिया जाय तो गोवध तो अपने आप ही धीरे-धीरे बंद हो जायगा.