3/11/2011

गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है

वृन्दाबन में श्री  उडिया बाबाजी महाराज को एक विद्वान् ने पूछा-महाराज! 
यह गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है?
महराजजी ने उनसे उल्टा प्रश्न किया-तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो?
 उन्होंने कहा-जानकारी प्राप्त कनरे  के लिए 
महाराज जी- अबतक जो जानकारी तुम्हे प्राप्त है, उसमे कुछ संशय होगा तभी तो हमसे अपनी जानकारी की पुष्टि करवाना चाहते हो.
विद्वान्-महाराज! आप कह देगे तो निर्णय हो जायेग. 
महाराज जी बोले-तो यही तो गुरु की आवश्यकता है.
असल में जीवन में मनुष्य अपने आप कुछ इधर की कुछ उधर की छिटपुट हजारो बाते सुनता रहता है  हजारो अधिकारी के लिए हजारो शास्त्र वचनं अहि और साधना के एक-एक मार्ग को दिखने वाले हजरू ऋषि है. उनमे हमारे लिए कौन सा ठीक है , यह हम अपनी बुद्धि से निर्णय करना चाहे तो कुछ न कुछ दुविधा बनी रहेगी. इसलिए इसमें सद्गुरु की आवश्यकता है की वो हमारी बुद्धि की दुविधा मिटाकर हमको एक साधन भजन की पद्धति में 
निष्ठावान बना दे.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार 

3/10/2011

ये बाके बिहारी है.

भगवान् ने देखा की संसार के लोग दुखी है.
क्यों दुखी है?
कहा हमसे बिछुड़े हुए है.
जो अपने को आनंद स्वरूप अनुभव  करे और दुनिया में किसी को दुखी देखे तो उसका क्या ख्याल बनेगा ? यही न की मै आनंद स्वरूप, इन्होने मेरी और पीठ कर ली है इसलिए दुखी है. यही तो सोचेगे और क्या सोचेगे?

संसार में ज्यादा लोग दुखी है-अपना धन, अपना कर्म, अपना भोग, अपना शरीर, अपनी परिच्छिन्नता- इसी पर नजर बढ़ गयी है- इसके कारण संसार के लोग दुखी है. जरा सामने वाले पर जाने दो नजर-जो मंद-मंद मुस्करा रहा है, टेढ़ी टांगवाला ! टेढ़ी टांग वाले को आप जानते है......?
बाकेबिहारी........त्रिभंग ललित, टेढ़ी कमर वाला, टेढ़ा चिबुक, टेढ़ा पाँव, तीन जगह से टेढ़े, फिर भी ललित! यह बाके बिहारी है. मंद-मंद मुस्कान, आखो में प्रेम, भौहो में अनुग्रहवाले क्या तीर है! क्या बाड़ है!

वे सम्पूर्ण सौन्दर्य का आधार है. वक्षस्थल जिसपर लक्ष्मी निवास करती है, श्रीवत्स है. जिनका रोम-रोम पुकारता है, आओ, आओ! सुख चाहते हो तो हमारी ओर आओ! उसका चिबुक हिलता है तो कहता है हमारे पास आ जाओ, हाथ हिलाता है तो कहता है हमारे पास आ जाओ! आख हिलती है तो कहती है, हमारे पास आओ! भौह हिलती है तो कहती है हमारे पास आओ! आमंत्रण करने वाल देवता है, यह निमंत्रण करने वाला देवता है!

ये संसार के बिछुड़े हुए लोग, ये बिरही लोग, ये दुखी लोग संसार के विषयों से प्रेम करके दुखी हो गए. उनके दुःख निवारण के लिए ये परम कृपालु , ये करुणा वरुणालय. ये करुण नयन ह्रदय  में निमंत्रण दे रहे है की आओ-आओ-आओ तुम्हे गंध चाहिए तो गंध लो, रस चाहिए तो रस लो , रूप चाहिए तो रूप लो, स्पर्श चाहिए तो स्पर्श लो, शब्द चाहिए तो शब्द लो, दिल चाहिए तो दिल लो, दिमाग चाहिए तो दिमाग लो और कुछ न चाहिए तो हमको ही ले लो.

योगमायामुपश्रितः -अर्थात जीवो को ईश्वर की प्राप्ति हो जाय, उनको अविनाधी सत मिले, उनको स्वयं प्रकाश चित मिले, उनको अनायास नित्यानंद मिले, इसके लिए योगमाया का आश्रय लिया.

3/09/2011

ईश्वर की भक्ति का चमत्कार

भगवान् को शक्ल-सूरत से जानना, जानना नहीं होता, मानना   होता है. क्योकि जब हम एक साढ़े तीन हाथ का कोई ब्यक्ति देखते है तो इसी ने यह स्रष्टि बनाई है, यह सर्वागी है, ये सर्वशक्तिमान है- यह तो मानना  पड़ेगा.
जब हम एक छोटी सी  चीज में, छोटे से आकर में, भगवान् का भाव करेगे तो वह काल और द्रव्य की कल्पना उसके अन्दर, उसके एक कद में होती रहती है और मिट्टी रहती है. वह है क्या? उसका तत्व क्या है? जैसे आभूषण हम बहुत देखते है-छोटा बच्चा चमकता हुआ आभूषण देखता है, पहनता भी है लेकिन वह सोने को नहीं पहचानता है. उसी प्रकार भगवान् को जो लोग बहुत छोटे रूप मे देखते है, वे आभूषण तो पहनते है, परन्तु आभूषण स्वर्ण है, यह ज्ञान उनको नहीं होता.  जब सोने से प्रेम होगा तब पता लगायेगे की यह क्या है?
भगवत तत्व का ज्ञान तब होता है जब हमारे जीबन में भक्ति आती है. जब परमात्मा का ज्ञान होता  है तो जैसे आभूषण और स्वर्ण में फर्क नहीं है इसी तरह आत्मा और परमात्मा में कोई फर्क नहीं रह जाता.जब तक आप अपने अन्दर पूर्ण ज्ञान का और पूर्ण शक्ति का अनुभव नहीं करेगे तब तक आपके  सारे काम एवं संकल्प  तथा  सफलताये अधूरी रहेगी. लेकिन आप अपने में पूर्णता का अनुभव कर ले तो आप जो-जो करेगे वही पूर्ण होगा. आपके जीवन में उत्साह बना रहेगा , कभी टूटेगा नहीं. आपको हमेशा  सफलता मिलेगी, कही विफलता है ही नहीं. कही आप दुखी नहीं होगे. हमेशा सुखी रहेगे. कभी आप अपने को दीन-हीन महसूस नहीं करेगे.
यह जो ज्ञान है यह केवल समाधि लगाने के लिए नहीं है, हिमालय में जाने के लिए नहीं है या केवल मंदिर में बैठने के लिए नहीं है. यह केवल  यज्ञशाला में  रहने के लए नहीं है. भाव जहा रहे- रण में, वन में, आप पहाड़ पर रहे, एकाकी रहे. भीड़ में भले लोगो में रहे, बुरे लोगो में रहे, आप सबको आनंद बाटते रहे, सबको ज्ञान बाटते रहे, सबको जीवन दान करते रहेगे. यह तत्व ज्ञान भक्ति के द्वारा प्राप्त होता है.
अनन्य भक्ति का अर्थ होता है-ईश्वर के साथ भक्ति का सम्बन्ध रखे जो कभी बदलेगी नहीं. फिर आप परिवार में रहिये, ईश्वर कि भक्ति बनी है, समाज में जाईये, ईश्वर  की भक्ति बनी है. व्यापार में जाईये , राजनीती में जाईये-फसिये कही नहीं. दुनिया के सारे फसावो को, पक्षपातो को क्रूरताओ को मिटाने के लिए, हमारे ह्रदय में जब ईश्वर की भक्ति आती है तो वह ऐसा चमत्कार दिखाती है की मनुष्य के जीवन में कोई दुख  , कोई दीनता, कोई हीनता रहती ही नही है.

3/08/2011

अहंकार का दान


एक महात्मा किसी धार्मिक राजा के महल में पहुचे. उन्हें देखकर रजा बहुत प्रसन्न हुए और
 बोले- आज मेरी इच्छा है की मै आपको मुहमागा उपहार दू. महात्मा ने कहा आप स्वयं ही अपनी सर्वाधिक प्रिय वास्तु मुझे दान कर दे. मै क्या मागू ? 

रजा ने कहा- मै आपको राजकोष अर्पित करता हूँ. 

महात्मा ने कहा-वह तो प्रजाजनों का है, आप तो मात्र सरक्षक है.

 राजा ने दूसरी बार कहा-महल सवार आदि तो मेरे है, आप इन्हें ले लो. 

महात्मा हस पड़े और बोले-राजन आप क्यों भूलते है, यह सब प्रजाजनों का ही है, आपको कार्य की सुविधा के लिए दिए गए है. 

अब राजा ने कहा- मै यह शरीर दान कर दूगा, यह तो मेरा है. 

महात्मा ने कहा- यह भी आपका नहीं है, एक दिन आपको इसे भी छोड़ना होगा. यह पंचतत्व में विलीन हो जायगा, इसलिए इसे आप कैसे दे पायेगे?

अब राजा चिंता में पड़ गया. तब महात्मा  ने कहा- राजन मेरी एक बात माने आप अपने अहंकार का दान कर दे. अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है. 

अहकार दान में देकर राजा दुसरे दिन से अनासक्त योगी की भाति रहेने लगा, उसके जीवन में नए आनंद की वर्षा होने लगी. 

भगवान् की लीला का रहस्य

मत्स्य भगवान् ने कहा-राजन जिसके ह्रदय में दुखी प्राणियों के प्रति  दया नहीं है, उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता. वह कभी मुझे पहचान नहीं सकता. या यो कहिये की उसके सामने मै  कभी प्रकट नहीं हो सकता
मेरे अवतार का कोई कारण नहीं हुआ करता. मै  भक्तो की भलाई के लिए अपनी इच्छा से समय-समय पर स्वयं ही अवतीर्ण हुआ करता  हूँ. यह सम्पूर्ण संसार मेरी लीला है. यह सब मै  ही हूँ. इसी से चाहे किसी भी शरीर में प्रकट हो सकता हूँ. किसी भी समय किसी भी स्थान पर और किसी भी वास्तु के रूप में मुझे पहचाना जा सकता है और वास्तव में मै वही रहता हूँ. परन्तु जब लोग मुझे नहीं पहचान पाते तब मै अपने आप को स्वयं प्रकट करता  हूँ और किसी भी रूप में प्रकट करता  हूँ. मेरे लिए मनुष्य और मछली के शरीर  में भेद नहीं है. मै ही सब हूँ. जिसने सब रूपों में मुझे पहचान लिया  उसने मेरी लीला का रहस्य समझ लिया  कही से मुझे हटाया नहीं जा सकता. चाहे जिस रूप में मेरे अस्तित्व का विशवास किया जा सकता है.
बात असल में यह है की भगवान् की लीला का रहस्य कठिन  से कठिन और सरल  से सरल है.
कठिन इसलिए की सम्पूर्ण वेद, शास्त्र, पुराण  उनका वर्णन करते-करते हार गए, उन्हें ढूढते -ढूढते थक  गए, अंत में नेति-नेति कहकर चुप हो गए. भगवान् का रहस्य उतना ही दुर्बोध बना रहा. स्वयं भगवान् ने अपनी लीला का सहस्त्र-सहस्त्र मुख से वर्णन करने के लिए शेषनाग का रूप धारण किया. न जाने वे कब से वर्णन कर रहे है और न जाने कब तक करते रहेगे, परन्तु वे भी लीला के रहस्य का पार नहीं पा सके और न तो पाने की संभावना ही है. कारण भगवान् अनंत है उनकी लीला अनंत है, उनका रहस्य अनंत है. जब अंत है ही नहीं तब वे स्वयं अंत कैसे पा सकते है?
सरल इसलिए की वे इतने कृपालु है की उन्हें कभी ग्वाल बालो के साथ नाचना पड़ता है ग्वालिनो के घर माखन चोरी की लीला करनी पड़ती है और रस्सी से बंधकर  रोना पड़ता है. छोटे-छोटे राक्षसों को मारने के लिए उस अजन्मा भगवान् को जन्म लेना पड़ता है, जीने की संकल्प मात्र से सारी स्रष्टि का संहार हो सकता है. यह दया की बात इतनी सरस एवं अरल है की कोई भी सह्रदय व्यक्ति भगवान् की दया का स्मरण करके रोये बिना नहीं रह सकता.
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

3/07/2011

भागवत धर्म सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है


कोई भागवत धर्म का अर्थ यह न समझे की वह केवल मंदिर में बैठे रहने के लिए है या गुफा में बैठेने या जंगल में बैठने के लिए है. भले ही संन्यास धर्म, परमहंस धर्म जंगल में रहना आवश्यक हो, गुफा में जाना जरूरी हो , परन्तु भागवत धर्म में यह सब कुछ जरूरी नहीं है.
आप ध्रुव के जीवन में देखेगे की पहले मिले भगवान् और बाद में मिला राज्य. भगवान् की भक्ति और राज्य में कोई विरोध नहीं है. उसके बाद हुआ विवाह, तो भगवान् की भक्ति और विवाह में भी कोई विरोध नहीं है, अच्छा उसके बाद हुआ युद्ध तो आवश्यकता पड़ने पर भागवत धर्म में युद्ध के लिए भी विरोध नहीं है. भगवद इच्छा के अनुसार यदि युद्ध में कूदना पड़े तो हिंसा अहिंसा दोनों के निर्वाहक, संचालक एवं प्रेरक भगवान् ही है. ध्रुव के मन में कोई ग्लानी नहीं है वह जानते है की हमारे ह्रदय में बैठे हुए जो प्रभु है, उन्ही की यह सब लीला है.
भागवत धर्म केवल निवृत्ति परायण लोगो का धर्म नहीं है. निवृत्ति परायण शुकदेव भी भगवत धर्मी है और प्रवत्ति  परायण ध्रुव भी भगवत धर्मी है.
अब एक बात पर आपका ध्यान खीचता हूँ. ध्रुव ने भगवान् के पार्षदों से पूछा की हमको वैकुण्ठ में ले चलने के लिए तुम लोग विमान लेकर आये हो, पर हमारी माँ का क्या हुआ?
पार्षदों ने कहा-महाराज!आप बिलकुल फ़िक्र न करे. भगवान् ने आपकी माता की चिंता पहले ही की ,  जिस माता के ध्रुव सरीखा पुत्र हुआ उस माता को पहले वैकुण्ठ मिलना चाहिए. माँ के पुत्र के भक्त होने से माता का भी कल्याण हो जाता है. यह भगवत धर्म विशेषता है.
कभी भगवान् बड़ा विलक्षण विनोद करते है. मनुष्य चाहता कुछ है और होता कुछ है. इसमें भी भगवान् कि बड़ी भारी कृपा रहती है. बहुत पुरानी बात है, एक महात्मा ने हम को एक बार समझाया था कि मान लो तुम्हारी सब इच्छाए पूरी होने लग जाय जो  तुम चाहते हो वही होने  लग जाय तो क्या ईश्वर कि सत्ता महत्ता  पता लग सकता है? कोई मानेगा ही नहीं ईश्वर को! जब कोई ऐसा कहता  है जो कभी  कभी हमारी इच्छा के  विपरीत भी कर देता है, तब पता चलता है कि हा और कोई है. इसी से माँ को यह हक़ होता है कि अपने बच्चे को वासना के अनुसार चलने से रोके. पति पत्नी को भी परस्पर अधिआर होता है, क्योकि अपने ही मन, अपने मन कि हमेशा होवे तो मनुष्य इतना अहंकारी हो जायेगा कि वह ईश्वर को नही मानेगा. दूसरी बात यह भी है कि मनुष्य तो एक है नहीं अनेक है  और सबकी इच्छाए आपस में टकराएगी  फलस्वरूप स्रष्टि में दुःख और संघर्ष क़ी वृद्धि होगी तो इन इच्छाओ का एक नियंता है वह है ईश्वर.
भागवत धर्म  सिर्फ ब्रह्मण अथवा सन्यासी के लिए नहीं है जो भी भगवान् कि स्रष्टि में पैदा हुआ उन सबके कल्याण के लिए भागवत धर्म है. जैसे पिता कि संपत्ति अपने सब पुत्रो के लिए होती है वैसे भगवान् कि संपत्ति धर्म है और उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्रजा के लिए दिया है.

3/06/2011

दुःख भी कृपा

मूल बात यह है की जब हमारे मन के अनुसार होता है तब तो हम भगवान् की कृपा मानते  है और जब हमारे मन के विपरीत होता है, तब भगवान् की कृपा नही मानते है. इसका अर्थ यह हुआ की हम  कृपा को पहचानते नहीं है और उसको महत्त्व नहीं देते है, बल्कि अपनी वासना और अपनी इच्छा  को ही महत्त्व देते है.

भगवान् का जो विधान है  वह सर्वथा मंगलमय है. उसमे कमी तभी मालूम पड़ती है जब हम भगवान् की इच्छा को न देखकर अपनी वासना के अनुसार चाहते है की हमको जो पसंद है और जरूरी मालूम पड़ता है, वही काम भगवान् करे.

भगवान् की कृपा को यदि आप विशेष रूप से देखेगे की भगवान् इतना धन दे तो बड़े कृपालु, ऐसा तन दे तो बड़े कृपालु, ऐसा ऐश्वर्य दे तो बड़े कृपालु और ऐसा परिवार दे तो बड़े कृपालु, तो आप कृपा को नहीं पहचान सकेगे.

जब भगवान् हमारे मन का न करते है तब, उसमे हमारी ऐसी तैयारी होनी चाहिए हम अपने अहम् से, अपने अभिमान से, अपनी ममता से व अपनी इच्छा से भी ज्यादा, भगवान् की इच्छा का आदर करे और कहे की यह तो भगवान् ने बहुत बढ़िया किया जो आज अपने मन का तो किया.

भगवान् की ओर  से जो आता है उसमे भगवान् का हाथ देखिये. भगवान् तो सर्वग्य है, सर्वशक्ति है, परम दयालु है. वे जो क्रिया हमारे सामने भेजते है, जो वस्तु भेजते है, जो भोग भेजते है, जो परिवार भेजते है, उन सबमे उनकी कृपा ही भरपूर रही है. भगवान् की कृपा का आदर हर रूप में करने से भगवान् की कृपा का अनुभव होने लगेगा. उसमे अपनी इच्छा की प्रधानता न रखकर, भगवान् की इच्छा की प्रधानता रखनी  चाहिए. भक्ति सिद्धांत भी यही है और वेदांत का भी सिद्धांत यही है हम अपनी इच्छा जितना-जितना शिथिल करते  जायेगे, उतना-उतना अपने स्वरूप की अनुभूति के पास पहुचते जायेगे.

असलियत में प्रभु की कृपा को पहचानना ही कठिन है. जिनके मन में संसार से राग होता है, वे उनकी कृपा को नहीं पहचानते है और जिनके मन में संसार से वैराग्य होता है, वे प्रत्येक परिस्थिति में भगवान् का हाथ देखते है, भगवान् की कृपा देखते है.

प्रभु मूरत कृपामयी  है, इनके कृपामय  हाथो से कभी किसी का अमंगल होता ही नई है तो यह जो हम लोगो को दुःख  सरीखा मालूम  पड़ता है उसमे भी भगवान् की कृपा है और मंगल ही मंगल है.

2/26/2011

मार्कंडेय पुराण ब्रह्माजी ने पहले मार्कंडेय मुनि को सुनाया. यह पुराण पुण्यमय, पवित्र, आयुवर्द्धक तथा सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करनेवाला है. जो इसका पाठ और श्रवण करते है वे सब पापो से मुक्त हो जाते है.

जो मनुष्य इन पुरानो के प्रसंगों का श्रवण तथा जनसमुदाय में पाठ करता है, वह सब पापो से मुक्त होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है. पितामह ब्रह्माजी ने जो अठारह पुराण कहे है उनमे इस मार्कंडेय पुराण को सातवा पुराण समझना चाहिए.

उक्त उदगार मोहास में चल रहे अति लघु रूद्र  यग्य में वृन्दावन धाम से पधारे अष्टादश पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रजपाल शुक्ल जी महाराज ने  कही. शुक्रवार को मत्स्य पुराण की विषद व्याख्या करते हुए आचार्य जी ने जीवन की उत्पत्ति के बारे में बताया. शनिवार को वामन पुराण में वामन अवतार पर कथा हुई. नित्य नए पुराण पर आचार्य जी द्वारा कथा कही जा रही है.

मोहास में चल रहे इस धार्मिक आयोजन में बनारस, वृन्दावन से पधारे पंडितो के द्वारा अठारह पुराणों का पाठ चल रहा है. अपने सारगर्भित प्रवचनों में आचार्य व्रज्पाल्जी महाराज ने बताया की जो मनुष्य प्रतिदिन अठारह पुराणों का नाम लेता तथा प्रतिदिन तीनो समय उनका जप करता है उसे अश्वमेध यग्य का फल मिलता है.

मार्कंडेय पुराण चार प्रश्नों से युक्त है. इसके श्रवण से सौ करोड़ कल्प के किये हुए पाप नष्ट हो जाते है. ब्रह्म ह्त्या आदि पाप तथा अन्य अशुभ इसके श्रवण से उसी प्रकार नष्ट होते है जैसे हवा का झोका लगने से रुई ऊड जाती  है. इसके श्रवण से पुष्करतीर्थ में स्नान करने का पुन्य प्राप्त होता है.

बंध्या अथवा म्रत्वत्सा स्त्री यदि यथावत इस पुराण का श्रवण करे तो वह समस्त शुभ  लक्षणों से संपन्न पुत्र प्राप्त करती है. इसका श्रवण करने से मोक्ष, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, धान्य, पुत्र तथा अक्षय वंश प्राप्त करता है.

देश देशांतर से पधारे ब्राहमणों द्वारा हनुमात्धाम मोहस में चल रहे इस धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओ की भारी  भीड़ उमड़ रही है. आठ ही वेदांती जी महाराज द्वारा श्रीमद भागवत कथा का भी श्रोता आनंद उठा रहे है.

सरमन पटेल पंडा द्वारा आयोजित सिद्ध पीठ बजरंग धाम मोहास में चार मार्च तक इसी तरह भक्ति की धारा बहेगी. भण्डारा पाच मार्च को होगा. इस क्षेत्र  में यह पहली बार   है जब  इस तरह का बड़ा धार्मिक आयोज किया गया है.

2/20/2011

जीवन की सबसे बड़ी भूल और सबसे बड़ा दुःख

मनुष्य जो है वह साधारण रूप सइ देह में बंधा हुआ है. यह अपने को देह ही समझता है और देह के जो संबंधी है उनको समझता है मेरा. इसका फल क्या निकला ? एक व्यवहार की बात देखो. जब हम साढ़े तीन हाथ के शरीर को मै समझते है तो इस शरीर के सुख से सुखी और इस शरीर के दुःख से दुखी होते है और इस शरीर के लिए जो सुखकारक पदार्थ है, उनसे राग करते हो  और इस शरीर के लए जो दुख्कारक  पदार्थ है, उनसे द्वेष करते है, हमने अपने को एक सीमा में  बाध दिया. अब बोले भाई,  इतना मै हूँ और मेरे सिवाय और सब दूसरा द्वेष करते है हमने अपने को एक सीमा में बाढ़ दिया. अब बोले भाई, इतना मै हूँ और मेरे सिवाय और सब दूसरा है, जब हमने अपने को शरीर समझा, तब दुसरे भी हमको शरीर समझते है और संसार के सुख-दुःख इसी बात पर आते है.

एक बार मै रेलगाड़ी से यात्रा कर रहा था. बरसी से हरिद्वार जा रहा था. रात्रि  का समय था. एक पेशावरी उस डिब्बे में  सो रहा था. मैंने सोचा की यह पाँव फैलाकर सो रहा है तो मै इसके पाँव के पास बैठ जाऊ तो कोई कोई हर्ज नहीं है और  मै बैठ आया. अब बैठ गया तो वह बड़ा नाराज हुआ. नाराज होकर गाली भी देने लगा और पाँव  से मारने भी लगा. मै चुपचाप बैठा रहा. दुःख तो होता था. पर मै जब बहुत देर तक नहीं बोला तो वह कहने लगा की यह तो कोई गांधी का चेला मालूम पड़ता है. मै स्टेशन आने पर उतर गया. मन में दुःख तो बड़ा था.

एक महात्मा से मिलने गया और उनसे मैंने कहा की महाराज आप लोग तो समझाते हो की देह नहीं हो और इधर देह का कोई तिरस्कार करता है कोई गाली देता है तो बड़ा दुःख होता है. यह क्या बात है? उन्होंने कहा की भैया जिस समय तिरस्कार होता है, उस समय तुम ऐसी जगह पर बैठे रहते हो, जहा बैठने पर तिरस्कार होना ही चाहिए. जब-जब तुन्मे अपमान का अनुभा होता है, तब-तब तुम्हारी बैठक ऐसी जगह पर रहती है, जहा तुम अपमान के पात्र रहे हो.

अखान्दानद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार


2/07/2011

दान सुभाषितावाली

 दान सुभाषितावाली
यद्ददाति विशिश्तेभ्यो  याच्चाश्नाती दिने दिने
तच्च वित्त्महम मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति.
जो विशिष्ट सत्पात्रो को दान देता है और जो कुछ अपने भोजन आच्छादन में प्रतिदिन व्यवहृत  करता है, उसी को मै उस व्यक्ति का वास्तविक धन या संपत्ति मानता हूँ, अन्यथा शेष संपत्ति तो किसी अन्य की है, जिसकी वह रखवाली मात्र करता है.

यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनं
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि
दान में जो कुछ देता है और जितने मात्र का वह अपना धन है. अन्यथा म़र जाने पर उस व्यक्ति के स्त्री, धन आदि वस्तुओ से दूसरे लोग आनंद मनाते है. अर्थात मौज उड़ाते है, तात्पर्य यह है की सावधानीपूर्वक अपनी धन संपत्ति को दान आदि सत्कर्मो में व्यय करना  चाहिए.

2/06/2011

घर का भेदी लंका ढाए का समाधान

कुछ साहित्यकारों, निबंध लेखको ने भक्तिप्रधान ह्रदय को गौड़ समझने  के कारण "घर का भेदी लंका ढावे" यह मुहावरा ही बना दिया. यह मुहावरा प्रायः  अनभिग्य लोगो के मुख से सुना गया है. सहज आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति के साथ असुर भाव हजारो वर्षों तक रहा जा सकता है किन्तु असुर भाव से रहित सज्जन धर्म में सदा निरत व्यक्ति स्वधर्म की रक्षा करता हुआ एक वर्ष भी असुरो के मध्य व्यतीत कर ले फिर भी आसुरी संगती का प्रभाव न पड़ा हो, वह व्यक्तित्व कितना प्रबल तथा धैर्य और धर्म संपन्न होगा? लगता वुद्धिमानो ने इस पर विचार ही नहीं किया.

केसरी नंदन श्री हनुमानजी को तुलसी वन तथा शंख, चक्र, गदा पद्म भगवान् के इन आयुधो से अंकित भवन को देखकर यही तो आश्चर्य हुआ -
लंका निशिचर निकर निवास, यहाँ कहा सज्जन कर वासा

धर्म-सत्कर्म विहीन राजा के राज्य में सज्जन व्यक्ति धर्म का निर्वहन नहीं कर सकता क्योकि प्रजा को राजा के अनुकूल ही रहना  पड़ेगा. अन्यथा आचरण करने पर देश निषकासन हो जाएगा, अथवा प्राण दंड का भागी होगा. धन जन बली राजा प्रजा  को दमन पूर्वक अपने स्वभाव के अनुकूल नियमो से संचालित करता है.

हिरन्य्कशिपू के स्वभाव से विपरीत पुत्र  ही क्यों न हो-जीवित नहीं रहेगा. भक्त प्रहलाद को मारने के असफल प्रयास करता हुआ वह स्वयं म्रत्यु के अधीन हो गया. यहाँ विभीषण के स्वतंत्र  रावण स्वभाव के विरुद्ध आचरण से पवन पुत्र व्यक्ति की द्रढ़ता तथा निर्भीकता का अनुमान करके विभीषण  से हठ पूर्वक परिचय बढ़ाना चाहते है.
कामी, लोभी, मोही व्यक्ति शरीर प्रेमी होता है, इसलिए स्वभाव के विपरीत परस्थितियो का दास हो जाता है. आध्यात्म ज्ञान में परिनिष्ठित  भगवद्भक्त वीर के समान ही शरीर की आहुति देने को तैयार रहता है किन्तु सद्गुणों तथा सन्मार्ग का परित्याग नहीं करता. पापी का साथ देने वाला सद्गुणी व्यक्ति कायर होता है. भक्त तथा वीर अपने तथा वीर अपने श्रेष्ठ स्वभाव का त्याग नहीं करते, भले ही शरीर त्याग ही क्यों न करना पड़े.

परधन, परनारीहर्ता, अपना ही संबंधी बंधू गुरू माता-पिता कोई भी हो उसकी सहायता करके, समाज को निर्बल बनाने वाला आपकी बुद्धि के अनुसार श्रेष्ठ है? और त्याग करने वाला भेदी ?

असद्गुनो के त्यागी स्वधर्म परिपालानकर्ता के प्रति असद्बुद्धि का आरोप लगाने वाला विवेकहीन बुद्धिमत्ता का ढोगी है. आज भी बुरे भाई का साथी अच्छा भाई नहीं देखा जाता. सत स्वभाव रहित, चरित्रहीनता का पौषक साहित्कार धर्म-मर्म से रहित  स्वशरीर पोषक अविवेकी है. शूद्र में कदाचित सरस्वती का प्रादुर्भाव हो भी जाए तो भी अच्छे बुरे की विवेकिनी बुद्धी जाग्रत नहीं होती. भगवद्भक्त सद्गुनाग्रही, सत्य के पक्षपाती  विभीषण की वृत्ति और स्वभाव को तत्कालीन ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी के अनुसार जानने  के लिए पढ़े-
घर का भेदी  लंका ढाए का समाधान - विभीषण शरणागति.
लेखक - व्रजपाल शुक्ल, वृन्दावन  

1/29/2011

जनम कोटि लगी रगरि हमारी. बरौ संभु न त रहऊ कुमारी


मनुष्य जीवन में भूले होती है. भूल होना अपराध नहीं है. भूल न सुधारना दोष है. प्रयत्नपूर्वक साधन करते रहने से मनुष्य का मन शुद्ध हो जाता है और वह अपने परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है.

बचपन में पढने जाता था. गाँव का पगडण्डी का मर्ग था वर्षा में कई बार फिसलकर गिर पड़ता था. यदि गिरने पर उठकर स्कूल चला जाता तो ठीक यदि गिरनेपर घर लौटकर आता तो डांटा जाता था.

गिरना अपराध नहीं है. गिरकर न उठाना अपराध है. उठकर पीछे की ओर मुड़ना पीठ दिखाना कायरता है. उठो और बहादुरी के साथ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होवो. गिरते-उठते अनेक जन्मो में हम अपने लक्ष तक पहुच ही जायेगे हम परम गति को प्राप्त करके ही रहते यह ठीक है की पूर्वाभ्यास अपनी ओर खीचता है. जैसे धारा में पड़े मनुष्य को धारा बहाती है, वैसे पूर्व जन्म के अभ्यास से व्यक्ति विवश होकर खीचा जाता है. पूर्वाभ्यास रूचि  प्रवृत्ति देता है, किन्तु प्रयत्न किया जाए तो वह रूचि प्रवृत्ति नष्ट हो जायेगी.

आप व्यापार के लिए कितना प्रयत्न करते हो? भोग के लितने व्यस्त रहते हो? वासनापूर्ति के लिए क्या-क्या नहीं करते हो? क्या समाधि, भगवत प्राप्ति या ब्रह्म ज्ञान ही सबसे गया बीता है की आप उसके लिए कोई प्रयत नहीं करना चाहते हो? यदि आप प्रयत्न करना नहीं चाहते हो, तो परमार्थ में आपकी रूचि नहीं है, जब मनुष्य के मन में इच्छा होती है. तब वह प्रयत्न अवश्य करता है. जहा-चाह, वहा राह. यदि आपके मन में परमार्थ प्राप्ति की इच्छा का उदय हो जाएगा तो कही न कही से आपको मार्ग अवश्य मिलेगा. यदि आपको राह नहीं मिलती है, तो समझना की आपकी चाह  दुर्बल है. यदि आपके मन में समाधि लगाने की या इश्वर से मिलने की या पाने स्वरुप में अवस्थित होने की चाह है तो आप प्रयत्न करो, जब मनुष्य प्रयत्न करता है तो उसके पाप छूट जाते है. उसकी वासनाए दूर हो जाती है.उसका चित्त शुद्ध हो जाता है. अपना प्रयत्न करना चाहिए. अपने  मन में यह दृढ आग्रह होना चाहिए की हम परमात्मा को अवश्य पाकर ही रहेगे.

जनम कोटि  लगी रगरि हमारी. बरौ संभु न त रहऊ   कुमारी

1/10/2011

अपमान प्रसाद का जनक

शिष्य - भगवान! कई बार अपमान का बड़ा कटु अनुभव होता है, लोग तरह-तरह से अपमान कर देते है, क्या करू ?
गुरुदेव - जब तुम्हे  अपमान का अनुभव होता है, तब तुम ऐसी भूमि में उतर आये रहते हो जहा अपमान तुम्हारा स्पर्श कर सकता है. तुम ऐसी भूमि में ऐसी स्थिति में रहा करो जहा अपमान की पहुच ही नहीं है.
(मै सोचने लगा, जब मुझे अपमान की अनुभूति होती है, तब मै कहा रहता हूँ? अपमान होता ही किसका है?

(१)  मै उस समय  सम्मान या और किसी कामना के पाश में बद्ध रहता हूँ. उस समय मेरा निवास स्थान काम होता है, राम नहीं.
(२)  मै उस समय शरीर, मन और बुद्धि इनके अभिमान में मत्त रहता हूँ या इनके विलासों में भूला रहता हूँ.
(३)  मै अपने भगवान् को भूलकर, आत्मा को भूलकर अहंकार या ममकार के अधीन रहता हूँ.

अपना अपमान स्वयं मै ही करता हूँ, मुझे स्वयं अपने को ही दंड देना चाहिए. दूसरो के द्वारा हुआ अपमान मेरा स्पर्श नहीं कर सकता)

शिष्य- ठीक है गुरुदेव! अपमान मेरा स्पर्श नहीं करता.

गुरुदेव - इतना ही नहीं, बेटा! अपमान तो तुम्हारी आत्मज्योति को जाग्रत करने वाला है. तुम्हारी विस्मृति को नष्ट करके स्मृति को ताज़ी बनानेवाला है. अपमान क्षोभ का नहीं, प्रसाद का जनक है. अपमान होते ही प्रसन्नता से खिल उठना चाहिए की मेरी स्मृति ताजी करने के लिए साक्षात् भगवान् के दूत, नहीं-नहीं स्वयं भगवान् आये है. महान सौभाग्य है - जीवन में यह अपूर्व अवसर है.

शिष्य - ठीक है गुरुदेव! आपकी कृपा और आशीर्वचन सर्वदा मेरे साथ है.

अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/09/2011

मन की आवाज धोखेबाज है

एक महात्मा ने बचपन में एक बात सुनायी थी-यदि तुम्हारे सामने ईश्वर प्रकट हो और वैराग्य और निवृत्ति के विरुद्ध आदेश दे तो उससे कहना की मन में वासना रही होगी  उसे पूरी करने के लिए तुम ऐसा कह रहे हो. हमको वैराग्य और निवृत्ति के विरुद्ध क्यों चलाते  हो ? हमारे राग और वासना को मिटा दो. तुम्हारा सामर्थ्य हो, तुम कैसे हो की हमारे अंतःकरण की अशुद्धि को दूर नहीं करते ? उसको पूरी करने की सलाह देते हो. ईश्वर आवे तो ऐसे बात करना.

कहो की हमारा शुद्ध अंतःकरण है यह आवाज देता है.
तो कितने संस्कार है तुम्हारे अंतःकरण में  और कितनी वासनाए छिपी हुई है- यह तुम  नहीं जानते हो. इसलिए चलना चाहिए शास्त्रानुसार, गुरु अनुसार, अपने ईशदेव की प्राप्ति के लिए एवं जिससे वासना शांत हो, उसके लिए.
इस अंतःकरण की आवाज एक दिन ऐसा धोखा देती है की आदमी कही का नहीं रहता. इल्हाम-इल्हाम जो बोलते है न वह अन्तःप्रेरणा महात्माओं को होती है, सबको नहीं और वह कभी-कभी सच्ची भी होती है.
अपनी वासना के विपरीत इल्हाम हो तो उसे मानना और अपनी वासना के अनुकूल हो तो नहीं मानना. जैसे किसी के लिए पांच रूपये  देने का मन हो और अन्तःप्रेरणा आवे की मत दो तो आप क्या समझते है ? ईश्वर ने मना कर दिया है देने से ? ईश्वर ने मना नहीं किया है, लोभ ने मना किया है. उसको आप पहचानते नहीं.
अन्तःप्रेरणा से आवाज आवे की इस लड़की से ब्याह कर लो-तो ईश्वर ने आज्ञा दी है. ईश्वर ने नहीं काम ने आज्ञा दी है. यह नहीं पहचान सकता मनुष्य.
मन के कहने पर मत चलो. यह वासना दोनों तरफ से डुबोती है.
जब हम अपनी वासना के अनुसार काम करते है और सफल हो जाते है तो अभिमान  होता है की मेरी बुद्धिमानी से काम बन गया. इससे अपने में बुद्धिमान्पने का  अहंकार आता है. यह अहंकार फिर दूसरी, फिर तीसरी वासना में लगाता है. तब मनुष्य अहंकार और वासना के चक्कर में परमार्थ  से च्युत हो जाता है और
यदि वासना के अनुसार काम न हुआ तो, विषाद होता है. विषाद होगा की हाय, हाय हमारी वासना पूरी नहीं हुई. तो अंतःकरण जो प्रसाद (निर्मलता) है वह भंग हो जाता है- अशुद्ध हो जाता है अंतःकरण.
तो अपनी वासना के अनुसार जो कर्म करते है, वे सफलता मिले तब भी बुरे रास्ते पर जाते है और विफलता मिले तब भी बुरे रस्ते पर जाते है. क्योकि अहंकार और वासना की स्रष्टि ऐसी ही है.
स्वामी अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/08/2011

बयार की ओर पीठ करनी चाहिए

जैसे हवा की आंधी आती है वैसे ही दुनिया में भावनाओं की आंधी आती है. बयार की ओर पीठ करनी चाहिए, सामना नहीं करना चाहिए. धैर्य रखो-सह लो.
जैसे सोते समय सपना आता है वैसे ही जागते समय तुम निकम्मे बैठे हो इसलिए पिछली बाते याद आ आकर तुम्हे  परेशान कर रही है. उनमे धीर रहो.
अच्छा  कभी भविष्य की कल्पना आयी- हमको छेह महीने बाद यह काम करना है, तो तुम यह नहीं समझना की आज जो आया है, वह छेह महीने तक बना रहेगा, अरे वह घंटे-आध घंटे में ढीला पड़ेगा की दूसरा वेग आवेगा, फिर तीसरा वेग आवेगा-यह तो सपने पर सपने आते-जाते रहते है- धैर्य से इनको आने दो और मिट जाने दो, उनका मूल्यांकन मत करो-इसकी कोई कीमत नहीं है, यह नहीं की अच्छे ही अच्छे ही आवे. जो यह कोशिश करता है की हमारे मन में अच्छे ही अच्छे भाव, विचार आवे, उसको भी बहुत दुःख होता है. अरे बाबा, सपने पर जैसे किसी का नियंत्रण नहीं रहता है, सपना कभी अच्छा आता है, कभी बुरा आता है वैसे ही यह जो मनोराज्य होता है यह अनियंत्रित मन में होता है. अरे आयी धारा बह गयी-गंगाजी में कभी फूल माला बह गए, कभी मुर्दा बह गया, ऐसे ही अपने मन में भी दोनों प्रकार के द्रश्य आते है.

पहले ठाकुर साहब लोग होते थे न, तो अपने दरवाजे पर पलंग पर बैठे रहते और हुक्का गुडगुडाते रहते . किसी अछूत के घर में ब्याह था तो उसका लड़का घोड़े पर चढ़कर निकला. तो पूछा यह कौन जा रहा है घोड़े पर? पाता चला की अमुक अछूत है. तो बोले पकड़कर ले आओ - तुम हमारे दरवाजे के सामने से घोड़े पर चढ़कर निकलते हो ? और जूता लेकर के मारने लगे. तो उस जमीदार की जैसी मनोवृत्ति थी वैसी मनोवृत्ति उस साधक  की है जो मन में कोई खराब बात फुरफुरा गयी और लेकर जूता उसको मारने के लिए दौड़ पड़े. तो, एक तो गन्दी मनोवृत्ति आयी और दूसरे उस पर क्रोध ? धैर्य रखो

तुम्हारा जो ज्ञान है वह स्वच्छ है, निर्मल है, वह निर्विषय है, वह निर्द्वंद है, वह अविनाशी है, वह परिपूर्ण है. यह जो तुम्हारा ज्ञान है न, ज्ञानस्वरूप, इस पर द्रश्य की कोई छाप छूटनेवाली नहीं है-द्रश्य आवेगा और अपना तमाशा दिखाकर बह जाएगा, तुम कहे  को परेशान होते हो ? इसको धैर्य बोलते है.
धैर्य-बाहर कोई मरे चाहे  जरे, कोई आये चाहे जाए, चाहे गरीबी हो चाहे अमीरी हो बाहर और मन में चाहे कैसा भी सपना आये और कैसा भी मनोराज्य होवे, उसको मनोराज्य मात्रा समझो, उसको स्वप्नमात्र समझो. उसको यह मत समझो की तुम्हारे कलेजे में पहाड़ घुस गया. हलके रहो और अपनी जगह पर बैठे रहो  धीर.

तो इस प्रकार जो बाहर या भीतर परिस्थितिया आती-जाती है उनकी ओर से, उनकी चोट से बचकर-धीर होना है, उसकी चोट अपने ऊपर मत लगने दो-अरे आया आया, गया, गया.

स्वामी श्री अखान्दनद सरस्वती जी महाराज के आनंद रस रत्नाकर से साभार

1/07/2011

यग्य की गति

व्यक्तियों में कर्तापन है की मैंने यह किया, मैंने वह किया इसके मूल में अज्ञान है. यही अहंता मनुष्य की परिचिछ्न्न बनती है. जितनी चोट संसार में पड़ती है. वह सब करता और भोक्तापर ही पड़ती है. यदि अपने भीतर कर्तापन का अभिमान न हो तो चोट न पड़े. असल में महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागी जो परमेश्वर है, उसके कर्मपर उसके भोगपर उसके त्यागपर द्रष्टि रहे तो मनुष्य कभी अपने अभिमान के वश में न हो.

कर्तत्व की शिथिलता  होती है भगवान् की शरणागति  से जब तक अपना कर्तापन है, तबतक जीवन में ईश्वर का आविर्भाव नहीं होता.

देखो, यहाँ अधिकारी का भेद है. यदि एक निकम्मा अधिकारी है तो उसके लिए कहा गया है की काम करो. जब वह काम करने लगा तब कहा गया  की निषिद्ध कर्म मत करो, विहित कर्म करो. जब वह सकाम विहित कर्म करने लगा तब कहा गया निष्काम कर्म करो. जब वह निष्काम कर्म करने लगा तो इस उपदेश का अधिकारी हुआ की तुम कर्तापन का अभिमान मत करो. कर्तत्वाभिमानी के कर्तापन को तोड़ने के लिए ही शरणागति का उपदेश किया जाता है.

 असल में सब काम भगवान् की सत्ता महत्ता से ही हो रहे है. यदि सकाम को भी, बुरा काम करने वाले को भी कहे की भगवान् करा रहे है तो यह जो अध्यारोप हुआ वह बिलकुल गलत स्थान पर हो गया. वस्तुतः भगवान् किसी को निकम्मा नहीं रखते. निकम्मा तो मुर्दा रहता है. निषिद्ध कर्म भगवान् नहीं कराते, अपनी वासना कराती है. सकाम कर्म भगवान् नहीं कराते. अपना स्वार्थ कराता है. इसी तरह हमारे अन्दर जो कर्तापने का अभिमान है, वह भगवान् नहीं देते, हमारी मूर्खता देती है. इसलिए जो जिसका अधिकारी होता है , उसके लिए उसी प्रकार का उपदेश शास्त्र में आया है. यदि व्यभिचारी से कह दिया की इश्वर तुमसे व्यभिचार करा रहे है तो ये सब बाते अविवेकमूलक  है, मूर्खाताजन्य  है, मनुष्य को ईश्वर से प्रथक करने वाली है.

आप अनुभव करे, ईश्वर की कृपा से मेरे द्वारा अच्छा काम हो गया लेकिन हमसे जो बुरा काम हुआ वह हमारी भूल से हुआ. इसी द्रष्टि से तुलसीदास जी ने कहा -
 गुण तुम्हार समुझहि निज दोसा. जेहि सब भाति  तुम्हार भरोसा.

इसलिए कोई अच्छा काम हो तो अभिमान मत करो और समझो की वह इश्वर की प्रेरणा से हुआ है और बुरा काम हो तो मान लो अपनी त्रुटी से अपनी गलती से हुआ है.

अब यदि कहो हम करता नहीं रहे, ईश्वर करता रहा तो यह  ठीक है. भक्त के मन में ऐसा ही आता है. शरणागत कहता है की भगवान् मैंने  तो कुछ नहीं किया, तुमने किया, इसलिए तुम जानो. इस तरह कर्तत्व को उठाकर पूर्णतः परमेश्वर के ऊपर डाल देना, देखना और शरागत हो जाना. यह अभिमान को तोड़ने की युक्ति है. यदि बीच में ही कही पकड़कर बैठ जायेगे और कहेगे की भाई, अच्छा बुरा तो सबसे होता है, कामना तो सबके ह्रदय में ही रहती है, कर्ताप तो सबमे ही रहता है गलत काम तो सबसे ही होते है, तब क्या होगा की उन्नति की जो प्रक्रिया अपने जीवन शुरू होनी थी, प्रगति जो रसायन बनाना था, उसका द्वार बंद हो जायेगा, इसलिए कर्मारंभ से लेकर परिपूर्ण ब्रह्मपर्यंत यग्य की ही गति है.

स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज के आनद रास रत्नाकर से साभार

12/31/2010

विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता



शिव पार्वती विवाह का एक कारण तारकासुर का बध भी था क्योकि उसने वरदान में शिव पुत्र के द्वारा म्रत्यु मांगी थी. इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है की हम सदैव  समाज में भलाई करे. व अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा करे. अगर समाज के हित में कोई भी नियम तोडना पड़े तो कोई दोष नहीं होता.


 विवाह के बाद भगवान् आशुतोष व माँ पार्वती ने कैलाश  पर निवास किया. यह बात आज की गृहणियो को यह सन्देश देती है की  अपने पति के सुख में ही उसका वास्तविक सुख निहित है. विवाह सिर्फ भोग के लिए नहीं होता उक्त उदगार आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने शिवपुराण कथा के चौथे दिन के प्रवचन में कही. 


ढाना, सागर में चल रही श्री शिव पुराण कथा का आनंद लेने क्षेत्र की अपार भीड़ उमड़ रही है. अपने चौथे दिन के प्रवचन में वृन्दाबन धाम से पधारे अष्टादश पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रजपाल शुक्ल ने आज कार्तिकेय के जन्म का वृतांत सुनते हुए कहा की उनका जन्म देवताओं की पीड़ा हरने के लिए हुआ था.





 वरिष्ठ पत्रकार श्री दीपक तिवारी के निवास पर विगत वर्ष की तरह इस वर्ष भी आचार्य व्रजपाल शुक्ल  के द्वारा धर्म की धारा ढाना ग्राम में शिवपुराण के माध्यम से बह रही है.
 अपने सारगर्भित प्रवचनों में आचार्य जी ने समाज में आज माता-पिता एवं गुरु के प्रति उपेक्षा के भाव पर प्रकाश डालते हुए कहा की गुरु और पिता में एक समानता जरूर होती है और वह है की गुरु अपने शिष्य के वैभव व प्रसिद्धि को देखते हुए प्रसन्न होते है वैसे ही एक पिता अपने पुत्र के ऊचा बढ़ने एवं सम्रद्धि को देखते हुए प्रसन्न होता है.


धन के विषय में आचार्यजी ने कहा की धन से सच्चा यश नहीं मिलता अगर उससे सद्बुद्धि और विवेक शामिल न हो. भगवान् गजानंद का वृतांत सुनते हुए आचार्यजी ने कहा की किस तरह उनका जन्म हुआ और कैसे वे गणेश बने व उनके तेजमय गुणों के कारण ही उन्हें प्रथम पूज्यदेव का वरदान भगवान् भोलेनाथ से मिला.

12/24/2010

उड़ियाबाबा जी महाराज के उपदेश

 तत्वज्ञ  के जीवन में ब्रह्माकार वृत्ति निरंतर बनी रहती है.  तत्वज्ञ  पुरुष को यह अनुभव नहीं होता की अविद्या निवृत्ति हो गयी है. ऐसा तो तब होता जब अविद्या नाम की वस्तु पहले कोई सत्य होती और बाद में निवृत्त होती . तत्वज्ञ का अनुभव तो यह है की अविद्या कभी थी ही नहीं.

निरंतर अभ्यास करते रहने और वासनाओं का पूर्णतया नाश कर देने पर ही अनुभव की प्राप्ति होती है. केवल शस्त्र पढने से कुछ नहीं होता. वासना के रहते चित्त में शांति नहीं आ सकती. वासना रहित चित्त ही परम तत्व के चिंतन का अधिकारी  होता है. निरंतर अभ्यास करते रहने से ही वासनाओं का निर्मूलन होता है और तत्व की उपलब्द्धि  होती है. वासनाओं के उच्छेद के लिए विषयों से सर्वदा वैराग्य रखे और सर्वदा भाग्वादाकर  वृत्ति रखे .

वैराग्य का फल बोध और बोध का फल उपरति.
दोनों में अंतर यही है की वैराग्य होने पर विषयों में ग्लानी होने के  कारण उन्हें भोगा नहीं जाता. उपरति होने पर वस्तु सामने रहें पर भी उसे भोगने की प्रवृत्ति नहीं होती. इसके उपरांत उपरति का फल है आनंद और आनंद का फल है शांति.

राग-यदि किसी वस्तु से मन इस प्रकार फस जाय की किसी भी प्रकार का अपमान निरादर या दुःख होने  पर भी न हटे तो मानना चाहिए की उसमे राग है.
द्वेष-यदि किसी वस्तु से मन ऐसा हट जाय की उसमे दोष ही दोष दिखाई दे  कोई भी गुण न दीख पड़े तो मानना चाहिए की उसमे द्वेष है.
 राग-द्वेष की उत्पत्ति  गुण-दोष या निंदा-स्तुति के चिंतन से ही होती है. राग-द्वेष से मुक्ति, निंदा-स्तुति  के न करने की  प्रतिज्ञा से एवं पूर्ण ग्यानी  या भक्त जो राग-द्वेष से मुक्त होते है, उनका ध्यान करने से राग-द्वेष छूट सकते है. राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष वाला  व्यक्ति उन्नति की सुनहली पगडंडी पर नहीं बढ़ सकता. हा, राग-द्वेष की निवृत्ति केवल विवेक से नहीं होती. विवेक से तो राग-द्वेष से छुटकारा पाने की कुंजी मिल जाती है. उसकी पूर्ण निवृत्ति होती है. भगवत्प्रेम और आत्मप्रेम से.

प्रतिष्ठा और गर्व माया मोह में भटकाएगा उससे क्या लाभ होने वाला है ?
जिह्वा का  स्वाद ही सारे अनर्थो की जड़ है.
जीवन्मुक्ति क्या है ? जो जिस प्रकार अज्ञात भासा में तुम्हारी निंदा  या स्तुति की जाय तो तुम्हारा चित्त तनिक भी डावाडोल नहीं होगा, उसी प्रकार यदि तुम्हारी परिचित भाषा में तुम्हारी निंदा या स्तुति  की जाय तब भी तुम्हे क्षोभ न हो तो मानना चाहिए  की तुम जीवन्मुक्त हो.
स्वामी अखंडा नन्द सरस्वतीजी महाराज के आनंद रास रत्नाकर से साभार

12/20/2010

नारायण आपके साथ है

स्वामी अखान्दनान्दजी सरस्वती के आनंद रास रत्नाकर से

जो नारायण को अपने जीवन का संचालक बनाकर व्यवहार के रणक्षेत्र में अवतीर्ण होता है, वह सफल होता है और जो अकेले आता है, वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है.

यह आपके दैनिक जीवन की बात है. मालवीयजी कहा करते थे की आप घर से कोई काम करने के इए चले तो चार बार नारायण, नारायण, नारायण, नारायण बोलकर निकले. इससे क्या होगा की जिस प्रकार कोई नदी बहती है, कोई नहर चलती है और उसके मूल उद्गम से उसका सम्बन्ध बना रहता है तो वह नदी, वह नहर सूखती नहीं है. लेकिन यदि ऎसी कोई नदी या नहर हो जिसका अपने मूल उद्गम से कोई सम्बन्ध नहीं रहे तो वह नदी, वह नहर सूख जाएगी. ठीक इसी प्रकार जीवन की बात है. इसका मूल उद्गम है, नारायण परमेश्वर. यदि यह परमेश्वर के सम्बन्ध रखकर संसार के व्यवहार करेगा तो उसकी शक्ति बनी रहेगी.

परमेश्वर से सम्बन्ध बनाये रखने से तीन बात आपको हमेशा
मिलती रहती है -
 १ आपकी जीवन धारा कभी विछिन्न नहीं होगी.
२  आपकी बुद्धि कभी समाप्त नहीं होगी,
३ आपके जीवन में हमेशा आनंद आता रहेगा.

और इसके विपरीत यदि आप ईश्वर के साथ सम्बन्ध तोड़ देगे तो जीवन की धारा कट पिट जायेगी आपके ज्ञान की धारा, बुद्धि की धारा, आपकी प्रज्ञा क्षीण हो जाएगी और आपको भीतर से आनंद आता है वह बंद हो जाएगा और आप उधर आनंद लेने लग जायेगे. तब आप जीवन लेने लगेगे दवाओं से,  बुद्धि लेने लगेगे किताबो से और दूसरे लोगो से तथा आनंद लेने लगेगे विषय भोगो से यह इस बात का नमूना है की हमारे भीतर जो जीवन का , ज्ञान का और आनंद का मूल स्त्रोत है, उससे हम कट गए है.

हम और सब बाते भूल जाए तो भूल जाए परन्तु यह बात भूलने लायक नहीं है की यह जो हमारा मनुष्य शरीर दिखलायी पड़ता है, इसके भीतर जो समष्टि स्वामी है वह पमेश्वर बैठा हुआ है.

जो बड़े-बड़े लोग है, बड़े-बड़े व्यापारी है, बड़े-बड़े विचारक है, वे नारायण को भूल जाते है.. दुर्योधन गया रणभूमि में, तो नारायण को साथ लेकर नहीं गया, पर अर्जुन रणभूमि में नारायण को साथ
लेकर गया  हम आपसे यह निवेदन करते है की आप कोई भी काम करे तो अकेले, असहाय, दीन-हीन नर के रूप में न करे, नारायण को अपना साथी बनाकर उसकी मदद से अपना काम प्रारंभ करे. आप असहाय है, यह मत समझे, यह समझे की आप जो भी काम करने जा रहे है, नारायण आपके साथ है.

12/18/2010

ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था

द्वितीय स्कंध के अंतिम दसवे अध्याय में शुकदेवजी महाराज परीक्षित  को यह बताते है की इस भागवत महापुराण में दस वस्तुओ  द्वारा परमात्मा के स्वरुप का वर्णन किया गया है. वे दस वस्तुए क्या है ?
यह स्रष्टि कैसे हुई ?
स्रष्टि में विविध योनिया कैसे बनी ?
एक ही तत्व. एक ही पंचभूत है फिर उसमे मानुष, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि कैसे बन जाते है ?
विविधता कहा से आ जाती है ?
स्रष्टि किस स्थान में टिकी है ?
स्रष्टि के सूखने पर इसको सीचनेवाला कौन है ?
वासनाए कैसे-कैसे होती है ?
काल का विभाग  कैसे होता है ?
भक्तो के चरित्र  कैसे होते है ?
भगवान् के प्रेम में मनका निरोध कैसे होता है ?
मुक्ति क्या है ?
सबसे अधिष्ठान परमात्मा का स्वरुप क्या है ?

इन दस वस्तुओ के निरूपण द्वारा सारे श्रीमद्भागवत में एक ही तत्व, एक ही परमात्मा का वर्णन है.

पहले स्कंध में बताया गया है की भागवत के अधिकारी वक्ता-श्रोता सूत-शौनक, नारद-व्यास और शुकदेव-परीक्षित कैसे है तथा दूसरे स्कंध में यह प्रतिपादित किया गया है की भगवत्प्राप्ति के लिए श्रवण ही मुख्य साधन है और उसके इतने अंग है.

भागवत के तीसरे स्कंध में तैतीस अध्याय है. इनमे विसर्ग के द्वारा परमात्मा का वर्णन है विसर्ग का अर्थ है स्रष्टि की विविधता. ब्रह्म के प्रकाश में गुणों  की विषमता से जो विविध प्रकार की स्रष्टि होती है, उसको विसर्ग कहते है.
परन्तु यहाँ विसर्ग शब्द का अर्थ बहुत विलक्षण है आपने गीता में पढ़ा है  की इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग होते है-एक देव सर्ग और दूसरा आसुर सर्ग-
इसलिए तीसरे स्कंध के पूर्वार्द्ध के उन्नीस अध्यायों में आसुर विसर्ग का और उत्तरार्द्ध के  चौदह अध्यायों में देव विसर्ग का वर्णन है. आसुर विसर्ग में हिरण्याक्ष, हिरान्य्कशिपू की कथा है और देव विसर्ग में मनु-शतरूपा, कर्दम-देवहूति तथा कपिल-अदिति की वंश परंपरा का वर्णन है.

बात उस समय की है जब कौरव-पांडवो की ओर से महाभारत युद्ध की तैयारी हो रही थी. विदुर जी ध्रतराष्ट्र  के पास बुलाये गए. क्यों बुलाये गए ? इसलिए बुलाये गए की ध्रतराष्ट्र को चिन्ता के मारे नीद नहीं आ रही थी. उनको चिंता सता रही थी की अब कौरव पांडवो में युद्ध होगा और वंश का नाश हो जाएगा ऐसी श्तिति में  हमें क्या करना चाहिए ?
ध्रतराष्ट्र का माम बड़ा सार्थक था. उन्होंने दुनिया को बड़े जोर से पकड़ रखा था. उनको परमात्मा तो सूझता ही नहीं था, केवल दुनिया सूझती थी. वे परमात्मा के न सूझने के कारण अंधे थे और दुनिया को पकड़ रखने के कारण ध्रतराष्ट्र थे.
विदुरजी साक्षात् ज्ञान की मूर्ती और धर्मराज के अवतार थे. आप लोगो ने सुना होगा की जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवो के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे तब दुर्योधन ने उनके लिए अपने महल सजा दिए, उनको भेट में देने के लिए बहुमूल्य हीरे मोतियों का ढेर लगा दिया और उनसे प्रार्थना की की आप हमारे यहाँ विश्राम कीजिये और भोजनपर पधारिये.
परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया की दुर्योधन मुझे कोई प्रेम से खिलाता है तो मै उसके घर अवश्यखाता  हूँ. यदि भूखा होऊ तो कही मांगकर भी खा  लेता हूँ  लेकिन तुम न तो मुझे प्रेम से खिलाना चाहते हो और न मै भूखा हूँ  इसलिए मै तुम्हारे घर में न तो ठहरूगा और न ही भोजन करूगा.
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण बिना बुलाये ही विदुर के घर चले गए. भागवत के इसी तीसरे स्कंध के प्रारंभ में श्रीशुकदेवजी महाराज ने परीक्षित  से कहा की भगवान् विदुर के घर को अपना ही घर समझते थे इसलिए वे दुर्योधन के निमंत्रण को ठुकराकर अपने  आप वहा चले गए.
वही विदुरजी जब बुलाये जाने पर ध्रतराष्ट्र के पास गए तब उन्होंने उनको न्याय की, सत्य की, निष्पक्षता की बात समझाई और कहा की तुम्हे  अपने तथा पांडू के पुत्रो के साथ विषमता का व्यवहार नहीं करना चाहिए. तुम्हारे घर में दुर्योधन रूपी कलियुग का अवतार हुआ है और यह वंश का नाश करने के लिए आया है.
यह बात जब दुर्योधन को मालूम हुई तब वह विदुरजी पर बहुत नाराज  हुआ इस पर विदुरजी ने अपना धनुष बाण वही ध्रतराष्ट्र के दरवाजे पर रख दिया, जिससे की कोई यह न समझे की मै पांडव पक्ष में मिलकर कौरवो के साथ युद्ध करूगा और फिर वे घर नगर छोड़कर तीर्थाटन के लिए निकल पड़े. विभिन्न तीर्थो का भ्रमण करते हुए जब वे यमुना  तट पर पहुचे तब वहा उनकी भेट उद्धव जी से हो गयी उनसे विदुरजी ने द्वारका का कुशल मंगल पूछा.
तबतक भगवान् श्रीकृष्ण अंतर्धान हो चुके थे. सिर्फ उद्धवजी ही बचे थे. उद्धवजी विदुरजी द्वारा कुशल मंगल पूछने पर श्रीकृष्ण के स्मरण में मग्न हो गए, उनकी आखो से आँसू गिरने लगे और उनके शरीर में रोमांच हो गया.