7/19/2014

बेल पत्र के औषधीय प्रयोग ----


- बेल पत्र के सेवन से शरीर में आहार के पोषक तत्व अधिकाधिक रूप से अवशोषित होने लगते है |
- मन एकाग्र रहता है और ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिलती है |
- इसके सेवन से शारीरिक वृद्धि होती है |
- इसके पत्तों का काढा पीने से ह्रदय मज़बूत होता है |
- बारिश के दिनों में अक्सर आँख आ जाती है यानी कंजक्टिवाईटीस हो जाता है . बेल पत्रों का रस आँखों में डालने से ; लेप करने से लाभ होता है |
- इसके पत्तों के १० ग्राम रस में १ ग्रा. काली मिर्च और १ ग्रा. सेंधा नमक मिला कर सुबह दोपहर और शाम में लेने से अजीर्ण में लाभ होता है |
- बेल पत्र , धनिया और सौंफ सामान मात्रा में ले कर कूटकर चूर्ण बना ले , शाम को १० -२० ग्रा. चूर्ण को १०० ग्रा. पानी में भिगो कर रखे , सुबह छानकर पिए | सुबह भिगोकर शाम को ले, इससे प्रमेह और प्रदर में लाभ होता है | शरीर की अत्याधिक गर्मी दूर होती है |
- बरसात के मौसम में होने वाले सर्दी , खांसी और बुखार के लिए बेल पत्र के रस में शहद मिलाकर ले |
- बेल के पत्तें पीसकर गुड मिलाकर गोलियां बनाकर रखे. इसे लेने से विषम ज्वर में लाभ होता है |
- दमा या अस्थमा के लिए बेल पत्तों का काढा लाभकारी है|
- सूखे हुए बेल पत्र धुप के साथ जलाने से वातावरण शुद्ध होता है|
- पेट के कीड़ें नष्ट करने के लिए बेल पत्र का रस लें|
- एक चम्मच रस पिलाने से बच्चों के दस्त तुरंत रुक जाते है |
- संधिवात में बेल पत्र गर्म कर बाँधने से लाभ मिलता है |
- महिलाओं में अधिक मासिक स्त्राव और श्वेत प्रदर के लिए और पुरुषों में धातुस्त्राव हो रोकने के लिए बेल पत्र और जीरा पीसकर दूध के साथ पीना चाहिए|

6/18/2014

ब्रह्म मुहूर्त क्या है ? इसका वैज्ञानिक लाभ क्या है ?



ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों? रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

धार्मिक महत्व - व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

पौराणिक महत्व - वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

इस तरह युवा पीढ़ी शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकती हैं।

8/18/2013

वेद को इश्वर की वाणी इसलिए कहते हैं

वेद को इश्वर की वाणी इसलिए कहते हैं, क्यूँकी वो योग मे स्थित होकर लिखा गया है. योग मे सहित होने का मतलब है कोई ब्यक्ति अपनी आत्मा को जानने के बाद जब परमात्मा से संपर्क मे होता है, तो सारे ज्ञान को पा लेता है. क्यूँकी परमात्मा समस्त ज्ञान का स्रोत है. उस स्थिति मे वो ज्ञान इन्द्रियों द्वारा प्राप्त न होने की वजह से पूर्ण सत्य होता है और ईश्वरीय वाणी होता है जिसमे गलती की कोई गुन्जायिस नहीं होती है. कोई भी व्यक्ती इस तरह से इस ज्ञान को योग के माध्यम से समाधी मे स्थित होकर प्राप्त कर सकता है. गीता भी योग मे स्थित होकर कही गयी थी इसलिए वो भी वेद के बराबर ही मान्यता रखती है .....

चौरासी लाख योनिया


आपने अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों के मुख से ये तो अवश्य ही सुना होगा :
"84 लाख योनियों के पश्चात ये मनुष्य जन्म प्राप्त होता है अतः मनुष्य को जीवन में उचित कर्म करने चाहिए"

पदम् पुराण में हमें एक श्लोक मिलता है,इस प्रथ्वी पर एककोशिकीय, बहुकोशिकीय, थल चर, जल चर तथा नभ चर आदि कोटि के जिव मिलते है। इनकी न केवल संख्या अपितु वर्गीकरण की जानकारी भी हमें पद्म पुराण में मिलती है ।

जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यकः
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशवः, चतुर लक्षाणी मानवः 

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जलज/ जलीय जिव/जलचर (Water based life forms) – 9 लाख (0.9 million)
स्थिर अर्थात पेड़ पोधे (Immobile implying plants and trees) – 20 लाख (2.0 million)
सरीसृप/कृमी/कीड़े-मकोड़े (Reptiles) – 11 लाख (1.1 million) 
पक्षी/नभचर (Birds) – 10 लाख 1.0 million
स्थलीय/थलचर (terrestrial animals) – 30 लाख (3.0 million)
मानवीय नस्ल के (human-like animals) – 4 लाख 0.4 million
कुल = 84 लाख । 

इस प्रकार हमें 7000 वर्ष पुराने मात्र एक ही श्लोक में न केवल पृथ्वी पर उपस्थित प्रजातियों की संख्या मिलती है वरन उनका वर्गीकरण भी मिलता है । 

आधुनिक विज्ञान का मत :

आधुनिक जीवविज्ञानी लगभग 13 लाख (1.3 million) पृथ्वी पर उपस्थित जीवों तथा प्रजातियों का नाम पता लगा चुके है तथा उनका ये भी कहना है की अभी भी हमारा आंकलन जारी है ऐसी लाखों प्रजातियाँ की खोज, नाम तथा अध्याय अभी शेष है जो धरती पर उपस्थित है । ये अनुमान के आधार पर प्रतिवर्ष लगभग 15000 नयी प्रजातियां सामने आ रही है । 
अभी तक लगभग 13 लाख की खोज की गई है ये लगभग पिछले 200 सालो की खोज है ।

10/27/2012

कुंभ के दौरान गंगा में नहीं गिरेगा अवजल


वाराणसी (एसएनबी)। महाकुंभ के दौरान गंगा का मूल प्रवाह कायम रहे और अवजल न गिरने पाये। इस मसले को लेकर गंगा सेवा अभियानम के संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शुक्रवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की। सीएम ने श्रद्धालुओं की आस्था का पूरा ख्याल रखने का आश्वासन दिया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बताया कि मुख्यमंत्री से हुई उनकी बातचीत अति सकारात्मक रही। उन्होंने मांग की कि कुम्भ के दौरान नदी में न्यूनतम प्रवाह 250 घनमीटर/सेकेंड, प्रमुख स्नान पवरे पर 300 घनमीटर/ सेकेंड करने की बात कही गयी है। इसके अलावा ईटीपी लगाये बगैर चल रहे उद्योगों को बंद करने तथा उद्योगों के शोधित जल का उपयोग सिंचाई के लिए करने को कहा। शोधित जल को गंगा में न मिलाया जाए। उन्होंने कहा कि सभी मांगों का निस्तारण अक्टूबर तक हर हाल में किये जाने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगले एक-दो दिन में वह अधिकारियों के साथ बैठक कर रणनीति तय कर लेंगे। नदी के प्रवाह व अवजल न गिरने की मानीटरिंग के सवाल पर सीएम ने कहा कि यह काम प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड करेगा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंगा सेवा अभियानम को भी साथ में मानीटरिंग करने की बात कही, जिस पर सीएम ने विचार विमर्श के बाद निर्णय लेने की बात कही। लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से वार्ता करते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सीएम से मुलाकात कर मांग पत्र सौंपा हरसंभव प्रयास का सीएम ने किया वादा

4/16/2012

*आदित्य हृदयस्तोत्रम्‌*

*आदित्य हृदयस्तोत्रम्‌* ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् l रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ll दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्l l उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ll राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् l येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ll आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् l जयावहं जपेन्नित्यं अक्ष्य्यं परमं शिवम् ll सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् l चिंताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ll रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् l पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ll सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः l एष देवासुरगणाँल्लोकां पाति गभस्तिभिः ll एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः l महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमोह्यपां पतिः ll पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः l वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ll आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् l सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ll हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् l तिमिरोन्मथनः शंभुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ll हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः l अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ll व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः l घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ll आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः l कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ll नक्ष्त्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः l तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ll नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः l ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ll जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः l नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ll नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः l नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ll ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे l भास्वते सर्वभक्षय रौद्राय वपुषे नमः ll तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने l कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ll तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे l नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ll नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः l पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ll एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः l एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ll वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च l यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ll एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च l कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ll पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् l एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ll अस्मिन्क्शणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि l एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ll एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा l धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ll आदित्यं प्रेक्श्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवां l त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ll रावणं प्रेक्श्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् l सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ll अथ रविरवदन्निरीक्श्य रामं l मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ll निशिचरपतिसंक्शयं विदित्वा l सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ll

3/16/2012

हिन्दू सनातन धर्र्म में मांसाहार बरजित है

हिन्दू सनातन धर्र्म में मांसाहार बरजित है ----- ऋग्वेद, यजुर्वेद, महाभारत, रामायण तथा अन्य वैदिक ग्रंथो में मदिरा सेवन व् मांसाहार की घोर निंदा की गई हे.और इसके कई सारे प्रमाण ग्रंथो में मिलते हे. दीर्घ द्रष्टा ऋषियो ने इसको दुर्व्यसन व् अधःपतन का प्रमुख कारण माना हे. मनुस्मृति, पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति में भी इसका निषेध किया गया हे. आर्य संस्कृति और सनातन धर्म ऐसे दुर्व्यसनो का हमेसा विरोधी रहा हे. यह बात का ध्यान रखा जाए. अगर कोई हिंद...ू वैदिक काल का प्रमाण देकर मदिरापान और मांसाहार करता हे तो वह गलत होगा. और साथ ही आज वर्तमान में भी कुछ देवी-देवताओ को मदिरा व् पशु बलि अर्पण की जाती हे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हे की इसका सम्बन्ध वैदिक संस्कृति से हे. यह एक अंधश्रद्धा मात्र हे. क्युकी देवी देवता को मांस और बलि अर्पण करना वैदिक संस्कृति में नहीं हे. जिसके कुछ प्रमाण यहाँ उपस्थित हे. - यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: यजुर्वेद ४०। ७ जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं | - ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च अथर्ववेद ६।१४०।२ हे दांतों की दोनों पंक्तियों ! चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ | यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं | उन्हें मत मारो जो माता – पिता बनने की योग्यता रखते हैं | - अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि - यजुर्वेद १।१ - हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो | धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा बंध की जाए... सनातन हिन्दू धर्म में हिंसा नहीं हे... म्लेच्छ एवं यवन जेसे अन्य जातिओ के लोगो ने वैदिक काल में हिंसा घुसाई हे... हिंसा करके अभक्ष्य खाने वाले लोग सनातनी नहीं हे. आर्य हिंसक नहीं थे. जिसका ज्वलंत उदहारण महाभारत में दर्शाया गया हे ..."सूरा- मत्स्या मधु -मांसमासवं क्रूसरौदनम धुर्तेह प्रवर्तितं ह्येत्न्नेताद वेदेषु कल्पितम" अर्थात - शराब, मछली आदि का यज्ञ में बलिदान धूर्तो द्वरा प्रवर्तित किया गया हे ! वेदों में मांस बलि का विधान निर्दिष्ट नहीं हे. (महा. शांति. २६४.९) "मांस पाक प्रतिशेधाश्च तद्वत" अर्थात वैदिक कर्मो में विहाराग्नी में मांस पकाने का निषेध हे, (मीमांसा. १२.२.२) और इसे कई प्रमाण भारतीय शास्त्र में हे... अगर इतने बड़े वैदिक शास्त्र बलि का विरोध करते हे तो आज के मंदिरों और खास कर माई मंदिरों और शाक्त उपासको द्वारा हो रहे बलि विधानों की प्रमाणिकता प्रश्नीय हे...में दावे के साथ उनको गलत, मुर्ख एवं ढोंगी कहता हु. वह धार्मिक न होकर पाखंडी हे. बलि निषेध हे. हमारा हिन्दू धर्म "सर्वं खल्विदं ब्रह्मं" मानने वाला हे... यह ध्यान रखा जाए... और एसे दुष्टों का विरोध किया जाए. सोमरस का नाम लेकर उसका प्रमाण दे कर वर्तमान में दारु का सेवन करने वाले और उसी तरह वैदिक काल में मांसाहार के प्रचलन का प्रमाण दे कर वर्तमान में मांसाहार करने वाले हिंदू समाज गलत रास्ते पर जा रहा हे और खास कर आज के हिंदू नव युवक "कभी-कभी" के नाद में जम कर दारु व् मांसाहार करते हे जो गलत हे. दुखद बात हे वर्तमान में समाज को सही रास्ता दिखने वाले ब्रह्मिन भी इससे अलिप्त नहीं रहे. हमारे वैदिक शास्त्र व् साहित्य हमेसा मदिरा-मांसाहार का निंदक रहा हे. और चूँकि सोमरस मदिरा नहीं थी सो उसके नाम पर मदिरा सेवन करना एक गलत बात हे.... हज़ार साल की ग़ुलामी किसी भी धर्म को मटियामेट कर देने के लिए काफ़ी होती है, लेकिन आज भी हम अस्सी प्रतिशत हैं तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हिंदु धर्म प्रगतिशील है, लचीला है, समय-देश-काल के अनुसार ख़ुद को ढाल लेता है। सबसे बड़ी बात, इतिहास में ऐसा एक भी... उदाहरण नहीं मिलेगा जो साबित करे कि हिंदु धर्म को तलवार के दम पर फैलाया गया था। इस्लाम के साथ ठीक उलटा है क्योंकि उसका "शुभारंभ" ही ख़ून-ख़राबे से हुआ था। इसके बावजूद मोहम्मद साहब, हज़रत अली और उनके बाद हुसैन साहब के साथ जो कुछ हुआ उसकी तरफ़ से आंखें मूंद लेना यहां मौजूद "ज्ञानी" पुरूषों की मजबूरी है, जिनके हिंदु पूर्वजों को कायरता का परिचय देते हुए, औरंगज़ेब की तलवार के आगे झुकना पड़ा था। अफ़सोस, कि उन्हें एक ऐसे धर्म को क़ुबूलना पड़ा जो आज भी 1400 साल पीछे ही अटका हुआ है, जिसमें सातवीं सदी से आगे बढ़ने की चाह रखने वालों को "सलमान तासीर" और "तसलीमा नसरीन" बना दिया जाता है और जिसके मानने वालों ने अपने झूठे विश्वास के चलते पूरी दुनिया को तबाह करने की ठानी हुई है। अंधेरी सुरंग में बंद करके रखे गए ऐसे धर्म के विषय में की गयी उपरोक्त भविष्यवाणी अगर कभी सही हो जाए तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है। उधर नास्त्रेदेमस के अनुसार भी ईसाईयत और इस्लाम के बीच युद्ध में इस्लाम का नामोनिशान मिट जाएगा जिसके बाद विश्व हिंदु दर्शन की पताका तले ही शांति की ओर अग्रसर होगा। ईसाईयत और इस्लाम के बीच युद्ध की शुरूआत अमेरिका पर हुए हमले के साथ हो ही चुकी है। अफगानिस्तान, इराक़ और लीबिया के बाद अब शायद इसका रूख़ ईरान की तरफ़ हो, और हो सकता है, ऐसे में जल्द ही तमाम भविष्यवाणियां हक़ीक़त का रूप ले लें!!! :):)तो हम सदियों से कायम है आज भी कायम रहेगे आगे भी कायम रहेगे ,,कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है हिन्दू सनातन धर्म का ,,चाहे कोई कितना भी चिला ले ......

वेद क्या हैं ?

''वेदो अखिलो धर्म मूलम '' ... ''वेद धर्म का मूल हैं'' ... राजऋषि मनु के अनुसार 'वेद' शब्द 'विद' मूल शब्द से बना है... 'विद' का अर्थ है... "ज्ञान"... वेद 1.97 बिल्लियन वर्ष पुराने हैं | वेदों के अनुसार यह वर्तमान सृष्टि 1 अरब, 96 करोड़, 8 लाख और लगभग 53000 वर्ष पुरानी है और इतने ही पुराने हैं वेद | जैसा की ऋग्वेद मन्त्र 10/191/3 में कहा गया है की यह सृष्टि , इससे पिछली सृष्टि के समान है और सृष्टि के चलने का क्रम शाश्वत है , इसलिए वेद भी शाश्वत हैं | '' वेदों का वास्तव में सृजन जा विनाश नहीं होता , वे तो केवल प्रकाशित और अप्रकाशित होते हैं , परन्तु , ईश्वर में सदैव रहते हैं''-आदि जगद्गुरु शंकराचार्य... ''वेद अपौरुषेय हैं''- कुमारीलभट्ट... वेद वास्तव में पुस्तकें नही हैं... बल्कि यह वो ज्ञान है जो ऋषियों के ह्रदय में प्रकाशित हुआ | ईश्वर वेदों के ज्ञान को सृष्टि के प्रारंभ के समय चार ऋषियों को देते हैं... जो जैविक सृष्टि के द्वारा पैदा नही होते हैं | इन ऋषियों के नाम हैं... अग्नि, वायु, आदित्य और अंगीरा | 1.ऋषि अग्नि ने ऋग्वेद को प्राप्त किया 2.ऋषि वायु ने यजुर्वेद को प्राप्त किया 3.ऋषि आदित्य ने सामवेद को प्राप्त किया और 4.ऋषि अंगीरा ने अथर्ववेद को प्राप्त किया... इसके बाद इन चार ऋषियों ने दुसरे लोगों को इस दिव्य ज्ञान को प्रदान किया... ऋग्वेद दिव्य मन्त्रों की संहिता है | इसमें १०१७ (1017) ऋचाएं अथवा सूक्त हैं जो कि १०६०० (10600) छंदों में पंक्तिबद्ध हैं | ये आठ "अष्टको" में विभाजित हैं एवं प्रत्येक अष्टक के क्रमानुसार आठ अध्याय एवं उप- अध्याय हैं | ऋग्वेद का ज्ञान मूलतः अत्रि, कन्व, वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदाग्नि, गौतम एवं भरद्वाज ऋषियों को प्राप्त हुआ | ऋग वेद की ऋचाएं एक सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर की उपासना अलग अलग विशेषणों से करती हैं... सामवेद संगीतमय ऋचाओं का संग्रह हैं | विश्व का समस्त संगीत सामवेद की ऋचाओं से ही उत्पन्न हुआ है | ऋग वेद के मूल तत्व का सामवेद संगीतात्मक सार हैं, प्रतिपादन हैं... यजुरवेद मानव सभ्यता के लिए नीयत कर्म एवं अनुष्ठानों का दैवी प्रतिपादन करते हैं | यजुर वेद का ज्ञान मद्यान्दीन, कान्व, तैत्तरीय, कथक, मैत्रायणी एवं कपिस्थ्ला ऋषियों को प्राप्त हुआ... अथर्ववेद ऋगवेद में निहित ज्ञान का व्यावहारिक कार्यान्वन प्रदान करता है ताकि मानव जाति उस परम ज्ञान से पूर्णतयः लाभान्वित हो सके | लोकप्रिय मत के विपरीत अथर्ववेद जादू और आकर्षण मन्त्रों एवं विद्या की पुस्तक नहीं है... वेद- संरचना... प्रत्येक वेद चार भागों में विभाजित हैं, क्रमशः : संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् | ऋचाओं एवं मन्त्रों के संग्रहण से संहिता, नीयत कर्मों और कर्तव्यों से ब्राह्मण , दार्शनिक पहलु से आरण्यक एवं ज्ञातव्य पक्ष से उपनिषदों का निर्माण हुआ है | आरण्यक समस्त योग का आधार हैं | उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है एवं ये वैदिक शिक्षाओं का सार हैं... वेद: समस्त ज्ञान के आधार हैं... अनंता वै वेदा: ... वेद अनंत हैं... वेद भगवान् की जय... ॐ नम: शिवाय..

3/13/2012

वाराणसी विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक

'वाराणसीतु भुवनत्रया सारभूत रम्या नृनाम सुगतिदाखिल सेव्यामना अत्रगाता विविधा दुष्कृतकारिणोपि पापाक्ष्ये वृजासहा सुमनाप्रकाशशः' - नारद पुराण गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित वाराणसी नगर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है तथा यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुशोभित है। इस नगर के हृदय में बसा है भगवान काशी विश्वनाथ का मंदिर जो प्रभु शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। स्त्री हो या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहाँ पर मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहाँ पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी ईष्ट इच्छा समर्पित करता है। फोटो गैलरी देखने के लिए क्लिक करें- धार्मिक महत्व- ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब प्रकाश की पहली किरण काशी की धरती पर पड़ी थी। तभी से काशी ज्ञान तथा आध्यात्म का केंद्र माना जाता है। यह भी माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था। काशी विश्वनाथ मंदिर- गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे 'ज्ञानवापी' की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है। ऐतिहासिक महत्व- ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर प्राक्-ऐतिहासिक काल में निर्मित हुआ था। सन् 1776 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया। पूजा-अर्चना - यह मंदिर प्रतिदिन 2.30 बजे भोर में मंगल आरती के लिए खोला जाता है जो सुबह 3 से 4 बजे तक होती है। दर्शनार्थी टिकट लेकर इस आरती में भाग ले सकते हैं। तत्पश्चात 4 बजे से सुबह 11 बजे तक सभी के लिए मंदिर के द्वार खुले होते हैं। 11.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोग आरती का आयोजन होता है। 12 बजे से शाम के 7 बजे तक पुनः इस मंदिर में सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था है। शाम 7 से 8.30 बजे तक सप्तऋषि आरती के पश्चात रात के 9 बजे तक सभी दर्शनार्थी मंदिर के भीतर दर्शन कर सकते हैं। 9 बजे के पश्चात मंदिर परिसर के बाहर ही दर्शन संभव होते हैं। अंत में 10.30 बजे रात्रि से शयन आरती प्रारंभ होती है, जो 11 बजे तक संपन्न होती है। चढ़ावे में चढ़ा प्रसाद, दूध, कपड़े व अन्य वस्तुएँ गरीबों व जरूरतमंदों में बाँट दी जाती हैं।

11/22/2011

प्रबल शत्रु से बचने का उपाय (महाभारत के शांति पर्व से )

प्रबल शत्रु से बचने का उपाय (महाभारत  के शांति पर्व से )

राजा युधिष्ठिर ने कहा - पितामह ! यदि कोई कमजोर मनुष्य मूर्खता से अपने पास रहने वाले किसी बलवान मनुष्य से बैर बाँध ले और वह क्रोध में भरकर आवे तो उसे उससे किस प्रकार अपना बचाव करना चाहिए.


भीष्मजी बोले - इस विषय में सेमल वृक्ष और वायु का संवाद रूप यह पुरातन ईतिहास प्रसिद्द है.

बहुत दिन हुए हिमालय के ऊपर एक बहुत बड़ा सेमल वृक्ष था. हरे-भरे पत्तो से लदी हुई उसकी लम्बी लम्बी शाखाए सब ओर फ़ैली हुई थी. उसके नीचे अनेको मतवाले हाथी और मृग आदि विश्राम करते थे. उसकी छाया बड़ी ही घनी थी तथा उसका घेरा चार सौ हाथ था. अनेको व्यापारी और वन में रहने वाले तपस्वी लोग मार्ग में जाते समय उसके नीचे ठहरते थे.
एक दिन नारदजी उधर से निकले. उन्होंने उसकी लम्बी-लम्बी शाखाए और चारो और झूमती हुई डालिया देखकर उसके पास जाकर कहा - तुम बड़े ही रमणीय और मनोहर हो. तुम्हारे कारण हमें नित्य ही बड़ा सुख मिलता है. तुम्हारी क्षत्रछाया में अनेको पक्षी, मृग और गज सर्वदा निवास करते है. मै देखता हूँ तुम्हारी लम्बी-लम्बी शाखा और सघन डालियों को वायु कभी नहीं तोड़ता. तो क्या पवन देव का तुम्हारे ऊपर विशेष प्रेम है अथवा वह तुम्हारे मित्र है, जिससे की इस वन में सदा ही तुम्हारी रक्षा करता रहता है. यह वायु तो जब वेग मारता है तो छोटे-बड़े सभी प्रकार के वृक्षों और पर्वतशिखरो को भी अपने स्थान से हिला देता है. अवश्य, भीषण होने पर भी तुमसे बंधुत्व या मैत्री मानने के कारण ही वायुदेव सर्वदा तुम्हारी रक्षा करता रहता है. मालूम होता है तुम वायु के सामने अत्यंत विनम्र होकर कहते होगे की मै तो आपही का हूँ इसी से वह तुम्हारी  रक्षा करता है.

सेमल हे कहा - ब्रह्मन ! वायु न मेरा मित्र है, न बंधू है और न सुह्रद है, वह ब्रह्मा भी नहीं है जो मेरी रक्षा करेगा किन्तु मेरे अन्दर जो भीषण बल और पराक्रम है, इसके आगे वायु की शक्ति अठारहवे अंश के बराबर भी नहीं है. जिस समय वह वृक्ष पर्वत तथा दूसरी वस्तुओ को तोड़ता फोड़ता मेरे पास पहुचता है उस समय मै अपने पराक्रम से उसकी गति रोक देता हूँ.

नारदजी ने कहा - इस विषय में तुम्हारी द्रष्टि निःसंदेह ठीक नहीं है. संसार में वायु के सामान तो; कोई भी बलवान नहीं है. उसकी बराबरी तो इंद्र, यम, कुबेर और वरुण भी नहीं कर सकते, फिर तुम्हारी तो बात ही क्या है?
संसार में जीव जितनीभी चेष्टाये करते है उन सबका हेतु प्राड्प्रद वायु ही है. वास्तव में तुम बड़े ही सारहीन और दुर्बुद्धि हो, केवल बहुत सी बाते बनाना जानते हो. इसी से ऐसा झूठ बोल रहे हो. चन्दन, स्पंदन, साल, सरल, देवदारू, बेंत  आदि जो तुमसे अधिक बलवान वृक्ष है वे भी वायु का एस  निरादर  नहीं करते. वे अपने और वायु के बल को अच्छी तरह जानते है इसी से वे सदा सर झुकाते है तुम जो वायु के अनंत बलों को नहीं जानते यह तुम्हारा मोह ही है. अच्छा तो अब मै अभी  वायु के पास जाकर तुम्हारी येबाते सुनाता हूँ,


भीष्मजी कहते है - राजन! शाल्मली को इस प्रकार डपटकर  ब्रह्वेत्ताओ में श्रेष्ठ नारद ने वायु के पास आकर उसकी सब बाते सुना दी. इससे उसे बड़ा क्रोध हुआ और वह उस सेमल के पास जाकर कहने लगा, शेमल! जिस समय नारदजी तेरे पास होकर निकले  थे उस समय क्या तूने  उनसे मेरी निंदा की थी ? तू जानता नहीं, मै साक्षात् वायुदेव हूँ. देख मै अभी तुझे अपनी शक्ति का परिचय कराये देता हूँ. ब्रह्माजी ने प्रजा की उत्पत्ति करते समय तेरी छाया में विश्राम किया था इसी से मै अब तक तुझ पर कृपा करता आ रहा था और तू मेरी झपट से बचा रहता था. परन्तु अब तो तू एक साधारण जीव के समान मेरी अवज्ञा करने लगा. अच्छा तो ले, मै तुझे अपना रूप दिखता हूँ, जिससे फिर कभी तुझे मेरा तिरस्कार करने का सहस न हो.


वायु के इस प्रकार कहने पर सेमल ने हसकर कहा, पवनदेव! यदि तुम मुझ पर कुपित हो तो अवश्य अपना रूप दिखाओ. देखे, क्रोध करके तुम मेरा क्या कर लेते हो. मै तुमसे बल में कही बढ़-चढ़कर हूँ, इसलिए तुमसे जरा भी नहीं डर सकता. अधिक बलवान तो वे ही होते है जिनके पास बुद्धिबल होता है. जिनमे केवल शारीरिक बल होता है उन्हें वास्तविक बलवान नहीं माना  जाता.


शेमल के ऐसा कहने पर पवन बोला अच्छा कल मै तुझे अपना पराक्रम दिखाऊगा. इतने ही में रात आ गयी. शेमल ने अपने को वायु के सामान बली न देखकर सोचा, मैंने  नारद से जो कुछ कहा था वह ठीक  नहीं था. बल में वायु के सामने  मै बहुत असमर्थ हूँ इसमें संदेह नहीं, मै तो दुसरे कई वृक्षों से भी दुर्बल हूँ. परन्तु बुद्धि में मेरे समान उनमेसे कोई नहीं है. अतः मै बुद्धि का आश्रय लेकर ही बायु के भय से छूटूगा . यदि दुसरे वृक्ष भी उसी प्रकार की बुध्धि का आश्रय लेकर वन में रहेगे तो निःसंदेह उन्हें कुपित वायु से किसी प्रकार की क्षति नहीं हो सकेगी.


भीष्मजी कहते है - सेमल ने ऐसा विचारकर स्वयं ही अपनी शाखा, डालिया और फूल  पते आदि गिरा दिया तथा प्रातःकाल आनेवाले वायु की प्रतीक्षा करने लगा. समय होने पर वायु क्रोध से सनसनाता और अनेको विशाल वृक्षों को धराशायी करता हुआ वहा  आया. जब उसने देखा की वह अपनी शाखा  और फूल पत्ते आदि गिराकर थोथ  बना खड़ा है तो उसका सारा  क्रोध उतर गया और उसने मुस्कराकर पूछा , अरे सेमल! मै भी क्रोध में भरकर तुझे ऐसा ही कर देना चाहता था. तेरे पुष्प, स्कंध और शाखादी नष्ट हो गए है तथा अंकुर और पत्ते भी झड चुके है.अपनी कुमति से ही तू मेरे बल पराक्रम का शिकार बना है.


वायु की ऐसी बात सुनकर सेमल को बड़ा संकोच हुआ और वह नारदजी की कही हुई बाते याद करके बहुत पछताने लगा.

राजन! इस प्रकार जो  व्यक्ति दुर्बल होकर भी अपने बलवान शत्रु से विरोध करता है उस मूर्ख को इस सेमल के समान ही संतप्त होना पड़ता है. इसलिए बलवान शत्रुओ से कभी वैर नहीं ठानना चाहिए क्योकि आग जैसे तिनको में बैठ जाती है उसी प्रकार बुद्धिमान की बुद्धि उसके नाश का कोई उपाय निकाल लेती है. वस्तुतः बुद्धि और बल के सामान पुरुष को बालक, मूर्ख, अंधे, बहरे और अपने से विशेष बलवान के व्यवहार को सर्वदा सहते रहा चाहिए. 

11/21/2011

मित्र और अमित्रो की पहचान (महाभारत के शांति पर्व से)

मित्र और अमित्रो की पहचान (महाभारत के शांति पर्व से)
युधिष्ठिर ने पूछा  -  पितामह ! छोटे से छोटा काम भी अकेले किसी की सहाया के बिना करना कठिन हो जाता है. फिर राजा का कार्य तो दूसरे की सहायता लिए बिना हो ही कैसे सकता है ? इसलिए मंत्री का होना  आवश्यक है. अब आप बताइए राजा का मंत्री कैसा होना चाहिए? उसका स्वभाव और आचरण किस तरह का हो, कैसे व्यक्ति पर विश्वास किया जाया और कैसे पर नहीं?


भीष्मजी ने कहा  -  राजा के चार प्रकार के मित्र होते है - सहार्थ (जो किसी शर्त पर एक दुसरे की सहायता के लिए मित्रता करते है ), भजमान (जिनके साथ पुश्तैनी मित्रता हो ), सहज ( जिनके के साथ नजदीकी रिश्तेदारी हो उन्हें सहज मित्र कहते है), और कृत्रिम (धन आदि देकर अपनाए हुए लोग होते है). पाचवा मित्र धर्मात्मा होता है, वह किसी एक का पक्षपाती नहीं होता और न दोनों पक्षों से वेतन लेकर कपटपूर्वक दोनों का ही मित्र बना रहता है. जिधर धर्म का पल्ला मजबूत रहता है उसी पक्ष का वह आश्रय ग्रहण करता है अथवा जो राजा धर्म में स्थित होता है वही उसे अपनी ओर खीच लेता है.


उपर्युक्त मित्रो में से भजमान और सहज श्रेष्ठ समझे जाते है शेष दो की ओर से तो सदा सशंक रहना चाहिए. वास्तव में अपने कार्य को द्रष्टि में रख सब प्रकार के मित्रो से ही सावधान रहना चाहिए. राजा को मित्रो की रक्षा करने में कभी असावधानी नहीं करनी चाहिए क्योकि असावधान राजा का सब लोग तिरस्कार करते है. 
मनुष्य का चित्त चंचल होता है, भला मनुष्य बुरा और बुरा भला हो जाया करता है, शत्रु मित्र और मित्र शत्रु बन जाता है, अतः किस पर कौन विश्वास करे? 


इसलिए मुख्य-मुख्य कार्यो को दूसरो पर न छोड़कर अपने  सामने ही करना चाहिए. किसी पर भी पूरा-पूरा विश्वास कर लेने से धर्म और अर्थ दोनों का नाश होता है. दूसरो पर पूरी तरह विश्वास करना अकाल म्रत्यु को मोल लेना है, अन्धविश्वासी को विपत्ति में पड़ना पड़ता है. वह जिस पर विश्वास करता है उसी की इच्छा  पर उसका जीना निर्भर रहता है. इसलिए राजा को कुछ लोगो पर विश्वास भी करना चाहिए और उनकी ओर से सतर्क भी रहना चाहिए. यही सनातन राजनीती है.


अपने अभाव में जिस मनुष्य का राज्य पर कब्ज़ा हो सकता हो उससे सदा चौकन्ना रहा चाहिए क्योकि विज्ञ पुरुषो ने उसकी शत्रुओ में गड़ना की है. 
जो मनुष्य रजा का अभुदय देख उसकीऔर भी अधिक उन्नति चाहे और अवनत होने पर बहुत दुखी हो जाय वही उत्तम मित्र है.
अपने न रहने पर जिस व्यक्ति को विशेष हानि पहुचने  की सम्भावना हो उस पर पिता के समान विश्वास करना चाहिए. और जब अपने धन की वृद्धि हुई  हो तो यथा शक्ति उसको भी सम्रद्ध शाली बनाना चाहिए. जो धर्म के कामो में भी राजा को नुकसान से बचने का ध्यान रखता है उसकी हानि देखकर जिसको भय होता है उस ही उत्तम मित्र समझो नुकसान चाहने वाले तो शत्रु भी बनाये गए है.
जो मित्र की उन्नति देखकर जलता नहीं और विपत्ति देखकर घबरा उठता है वह मित्र अपने आत्मा के सामान है.
जिसका रूप रंग सुन्दर और स्वर मीठा  हो जो क्षमाशील, ईर्ष्या रहित , प्रतिष्ठित और कुलीन हो उसकी  श्रेणी पूर्वोक्त मित्र से भी बढ़कर है. 
जिसकी बुद्धि अच्छी और स्मरण शक्ति  तीव्र हो, जो कार्य साधने  में कुशल और स्वभावतः दयालु हो, कभी मान या अपमान हो जाने पर जिसके ह्रदय में दुर्भाव नहीं आता ऐसा मनुष्य यदि अत्यंत सम्मानित मित्र हो तो उसे तुम अपने घर में मंत्री बनाकर रख सकते हो वह तुम्हारे विशेष आदर का पात्र है.. उसको राजकीय गुप्त विचारो तथा धर्म और अर्थ की प्रकृति से परिचित रखना. उसके ऊपर तुम्हारा पिता के सामान विश्वाह होना चाहिए. 
एक काम पर एक ही व्यक्ति को नियुक्त करना दो या तीन को नहीं, क्योकि उनमे परस्पर अनबन  हो जाने की सम्भावना रहती है  कारण की एक कार्य पर नियुक्त हुए अनेक व्यक्तियों में प्रायः मतभेद होता ही है.


जो कीर्ति को प्रधानता देता और मर्यादा के भीतर कायम रखता है, शक्तिशाली पुरुषो से द्वेष और अनर्थ नहीं करता, कामना, भय, लोभ अथवा क्रोध से भी जो धर्म का त्याग नहीं करता जिसमे कार्यकुशलता तथा आवश्कता के अनुरूप बातचीत करने की पूरी योग्यता हो उसे तुम अपना प्रधान मंत्री बनाना . जो कुलीन, शीलवान, शहनशील, डींग न मारनेवाले, शूरवीर, आर्य, विद्वान तथा कर्तव्य अकर्तव्य को समझने में कुशल हो उन्हें अमात्य के पद पर बैठाना  एवं सत्कारपूर्वक सुख और सुविधा देना. ये तुम्हारे अच्छे सहायक सिद्ध हे और सब तरह के कामो की देखभाल करेगे.


युधिष्ठिर तुम अपने कुटुम्बियो को म्रत्यु  के सामान समझकर उनसे सदा डरते रहना. जैसे पड़ोसी राजा अपने पास के राजा की उन्नति नहीं सह सकता, उसी प्रकार एक कुटुम्बी दुसरे कुटुम्बी का अभुदय नहीं देख सकता. जिसके कुटुम्बी या सगे संबंधी नहीं है  उसको भी सुख नहीं मिलता इसलिए कुटुम्बी जनों  की अवहेलना नहीं करना चाहिए. बंधू बांधव से हीन मनुष्य को दुसरे लोग दबाते है. यदि गैर आदमी अपने जातिवाले का अपमान कर रहा हो तो अपने जाती वाले के अपमान को वह अपना ही अपमान समझेगा. इस प्रकार कुटुम्बी जनों  के रहने में गुड भी है और अवगुड भी. कुटुंब का व्यक्ति न अनुग्रह मानता है न नमस्कार करता है. उनमे भलाई बुराई दोनों देखने में आती है.


राजा का कर्तव्य है की वह अपने जातीय बंधुओ का वाडी और क्रिया से सत्कार करे. सदा ही उनकी भलाई करता रहे, कभी कोई बुराई न होने दे. उनपर विश्वास तो न करे किन्तु विश्वास करनेवाले की भांति ही उनके साथ वर्ताव करे. उनमे दोष है या गुड इसकी चर्चा न करे. जो पुरुष सदा सावधान रहकर ऐसा बर्ताव करता है, उसके शत्रु भी  प्रसन्न होकर उसके साथ मित्रता का बर्ताव करने लगते है. जो कुटुम्बी, सगे संबंधी , मित्र, शत्रु तथा उदासीन व्यक्तियों के साथ इस नीति के अनुसार व्यवहार करता है, उसका सुयश चिर काल तक  बना रहता है.

11/20/2011

महाभारत से - मनुष्य के स्वाभाव की पहचान



 महाभारत से 
मनुष्य के स्वाभाव की पहचान 
एक सियार आचारवान था उसके आचार विचार की चर्चा चारो और फ़ैल गयी. फिर एक व्याघ्र ने स्वयं आकर उसका विशेष सम्मान किया और उसे शुद्ध तथा बुद्धिमान समझकर अपना मंत्रित्व स्वीकार करने के लिए उससे प्रार्थना की.
व्याघ्र बोला - मै तुम्हारे स्वरुप से परिचित हूँ, तुम मेरे साथ चलकर रहो और मनमाने भोग भोगो. एक बात तुम्हे सूचित कर देते है, हमारी जाती स्वभाव कठोर होती  है - यह दुनिया जानती है. यदि तुम कोमलता पूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित साधन में लगे रहोगे तो तुम्हारा भी भला होगा.

सियार ने कहा-आपने मेरे लिए जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य है. तथा आप जो धर्म और अर्थ साधन में कुशल एवं शुद्ध स्वभाव वाले सहायक ढूढ़ रहे है यह भी उचित ही है. इसके लिए आपको चाहिए की जिनका आपके प्रति अनुराग हो. जिन्हें नीति का ज्ञान हो, जो संधि कराने में कुशल विज्याभिलाशी, लोभ रहित, बुद्धिमान, हितैषी तथा उदार ह्रदय वाले हो ऐसे व्यक्तियों को सहायक बनाकर पिता और गुरु के सामान उनका आदर करे. 

आप मेरे लिए जो सुविधाए दे रहे है उन्की मुझे इच्छा नहीं है. मै सुख भोग तथा उनके आधारभूत ऐश्वर्य को नहीं चाहता. आपके पुराने नौकरों के साथ मेरा स्वभाव भी नहीं मिलेगा. वे दुष्ट प्रकृति केजीव है, आपको मेरे विरुद्ध भड़काया करेगे. उनका प्रताप बढ़ा हुआ है अतः उनको मेरे अधीन होकर रहना अच्छा नहीं मालूम होगा. 
इधर मेरा स्वभाव भी कुछ विलक्षण है, मै पापियों पर भी कठोरताका वर्ताव नहीं  करता. दूरतक की बात सोचता हूँ. मेरा उत्साह कभी कम नहीं होता. मुझमे बल की मात्रा भी अधिक है. मै स्वयं कृतार्थ हूँ और प्रत्येक कार्य सफलता के साथ कर सकता हूँ.

 किसी की सेवा टहल का तो मुझे बिलकुल ज्ञान नहीं है. स्वच्छन्दतापूर्वक वन में विचरता रहता हूँ. मेरे जैसे वनवासियों का जीवन आसक्ति रहित और निर्भय होता है. एक जगह वेखटके पानी  मिलता हो और दूसरी जगह भय देने वाला स्वादिष्ट अन्न प्राप्त होता हो-इन दोनों को यदि विचार करके देखता हूँ तो मुझे वहा ही  सुख जान पड़ता है जहा कोई भय नहीं है. 

राजा के पास रहने में सदा भय ही भय है. राज्सेवको में से जितने लोग दूसरो के लगाए हुए झूठे कलंक के कारण राजा के हात से मारे गए है उतने सच्चे अपराधो  के कारण  नहीं. 
यदि मुझसे मंत्रित्व का कार्य लेना ही हो तो मै आपसे एक शर्त करना चाहता हूँ उसी के अनुसार आपको मेरे साथ बर्ताव करना पड़ेगा. मेरे आत्मीय व्यक्तियों का आप  सम्मान करे, उनकी हितकारी बाते सुने. मै आपके दुसरे मंत्रियो  के साथ कभी परामर्श नहीं करूगा. एकांत में सिर्फ आपके साथ अकेला ही मिलूएअ  और आपके हित की बाते बताया करूगा. आप भी अपने जाती भाईयो के कामो में मुझसे हिताहित की बात न पूछियेगा. मुझसे सलाह करने के बाद  यदि आपके पहले के मंत्रियो की भूल भी साबित हो तो  उन्हें प्राणदंड न दीजियेगा तथा कभी क्रोध में आकर मेरे आत्मीय जनों पर भी प्रहार न कीजियेगा.

शेर ने ऐसा ही होगा कहकर सियार का बड़ा आदर किया. सियार ने भी उसका मंत्री होना स्वीकार कर लिया. 

फिर तो उसका बड़ा स्वागत सत्कार होने लगा. प्रत्येक कार्य में उसकी प्रशंसा होने लगी. यह सब देख सुन कर पहले के सेवक और मंत्री जल भुन गए. सब उसके साथ द्वेष करने लगे. उनके मन में दुष्टता भरी थी. इसलिए झुण्ड बांधकर  बारम्बार सियार के पास आते और अपनी मित्रता जताते हुए उसको समझा-बुझाकर अपने ही सामान दोषी बनाने की कोशिश करते थे. 
सियार के आने से पहले उनका रहन सहन कुछ और ही था. दूसरो की बस्तु छीन  कर स्वयं उसका उपभोग करते थे. किन्तु अब उनकी दाल नहीं गलती थी.अब  वे किसी का भी धन लेने में असमर्थ थे. क्योकि सियार ने उन पर बड़ी कड़ी पाबंदी लगा रखी थी. वे चाहते  थे सियार भी डिग जाय इसलिए तरह-तरह की बातो में उसे फुसलाते और बहुत सा धन देने का लोभ दिखाते थे.
मगर सियार बड़ा बुद्धिमान था, वह उनके चक्कर में नहीं आया. उसने धैर्य नहीं छोड़ा. तब उन नौकरों ने उसका नाश करने की शपथ खाई और सबमिलकर इसके लिए प्रयत्न करने लगे,
 एक दिन उन्होंने  शेर के खाने के लिए जो मांस तैयार करके रखा गया था उसे उसके स्थान से चुरा लिया और सियार की मांद में ले जाकर रख दिया. सियार ने मंत्री पद पर आते  समय शेर से पहले ही ठहरा लिया था की यदि तुम मुझसे मित्रता चाहते हो तो किसी के बहकाए में आकर मेरा विनाश न करना.

उधर शेर को जब भूख लगी और वह भोजन के लिए उठा तो उसके खाने के लिए रखा हुआ मांस नहीं दिखाई पड़ा. शेर ने चोर का पता  लगाने लिए नौकरों को आज्ञा दी. तब जिनकी यह करतूत थी उन्ही लोगो ने शेर से उस मांस के बारे में बताया - महाराज! अपने  को बड़ा बुद्धिमान और पंडित मानने वाले सियार महोदय ने ही आपके मांस का अपहरण किया है. 
सियार की यह चपलता सुनकर शेर गुस्से से भर गया और उसको मार डालने का विचार करने लगा. उस समय सियार के प्रतिकूल कुछ कहने का मौका देखकर पहले के मंत्री लोग शेर से कहने लगे-राजन! वह तो बातो से ही धर्मात्मा बना हुआ है, स्वभाव का बड़ा कुटिल है. भीतर का पापी है, मगर ऊपर से धर्म का ढोंग बनाए हुए है. उसका सारा आचार-विचार दिखावे के लिए है. यह कहकर वे क्षण  भर में ही उस मांस को सियार की मांद से उठा ले आये . शेर ने उनकी बाते सूनी और जब निश्चय  हो गया के सियार ही मांस ले गया था तो उसने उसको मार डालने की आज्ञा दे दी.
शेर की यह बात जब उसकी माता को मालूम हुई तो वह हितकारी वचनों से उसे समझाने के लिए आयी  और कहने लगी - बेटा इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यंत्र हुआ  जान पड़ता है. तुम्हे इस पर विशवास नहीं करना चाहिए. 
काम में लाग डाट हो जाने से जिनके मन में पाप होता है वे निर्दोष को ही दोषी बताते है. 
किसी को अपने  से ऊची अवस्था में देखकर अक्सर लोगो को ईर्ष्या हो जाया करती  है, वे उसकी उन्नती  नहीं सह सकते . कोई कितना ही शुद्ध क्यों न हो, उस पर भी दोष लगा ही देते है.

 लोभी शुद्ध स्वभाव वाले व्यक्तियों से और आलसी तपस्वियों से द्वेष करते है. इसी प्रकार मूर्ख लोग पंडितो से, दरिद्र धनियों से, पापी  धर्मात्माओ से और कुरूप रूप वानो  से डाह रखते है. 
एक ओर तो जब घर में सुनसान था उस समय तुम्हारे मांस की चोरी हुई है दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है जो देने पर भी मांस भी नहीं लेना चाहता इन दोनों बातो पर अच्छी तरह विचार करो. संसार में बहुत से असभ्य प्राणी सभी की तरह और सभी असभ्य की तरह देके जाते है, इस प्रकार उनमे अनेको भाव द्रष्टिगोचर होते है,अतः उनकी परीक्षा कर लेनी  उचित है. 
आकाश औधा  कड़ाहा  के सामान और जुगनू  अग्नि के सामान दिखाई देते है किन्तु न तो आकाश में कड़ाही है और न जुगनू में आग ही है. इसलिए सामने दिखाई देती हुई वस्तु को भी जाँच करना चाहिए. जो जांचने बूझने के बाद किसी विषय में अपना विचार प्रकट करता है उसे पीछे पछतावा नहीं होता. राजा के लिए किसी को मरवा डालना कठिन काम नहीं है मगर इससे उसकी बडाई नहीं होती. शक्तिशाली पुरुष में यदि क्षमा हो तो उसकी प्रशंशा की जाती है. उसी से उसका यश बढ़ता  है. 

बेटा तुमने स्वयं ही सियार को मंत्री के आसन पर बिठाया है और तुम्हारे सामंतो में भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है. ऐसा सुपात्र मंत्री बड़ी मुश्किल से मिलता है, यह तुम्हारा बड़ा हितैषी है इसलिए तुम्हे इसकी रक्षा करनी चाहिए. जो दूसरो के मिथ्या  कलंक लगाने पर निर्दोष को भी अपराधी मानकर दंड देता है वह राजा दुष्ट मंत्रियो के साथ रहने के कारण शीघ्र ही मौत के मुख में पड़ता है.

शेर की माता इस प्रकार उपदेश दे ही रही थी की उस शत्रु समूह के भीतर से एक धर्मात्मा व्यक्ति उठकर शेर के पास आया. वह सियार का जासूस था. उसने जिस प्रकार कपट लीला की गयी थी उसका भन्दा फोड़  कर दिया. इससे शेर को सियार की सत्यता का पता चल गया और उसने मंत्री का सत्कार करके उसको इस अभियोग से मुक्त कर दिया तथा अत्यंत स्नेह के साथ उसे गले से लगाया.

सियार नीतिशास्त्र का ज्ञाता था, उसने शेर की आज्ञा लेकर उपवास करके प्राण त्याग देने का विचार किया. शेर ने उसे इस कार्य से रोका और उसका भली भाती आदर सत्कार किया. उस समय स्नेह के कारण उसका चित्त विकल हो रहा था. मालिक की यह अवस्था  देख सियार का भी गला भर आया और वह उसे प्रणाम करके गदगद कंठ से बोला-राजन पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रु सी स्थित में पंहुचा दिया. अब मै आपके पास रहने के योग्य नहीं हूँ.
 जो अपने पद से हटाये गए हो, सम्मानित स्थान से नीचे गिरा दिए गए हो, जिनका सर्वस्व छीन  लिया हो जो दुर्बल,लोभी, क्रोधी और डरपोक हो, जिन्हें धोखे में डाला गया हो, जिनका धन लूटा गया हो तथा जिन्हें क्लेश दिया गया हो ऐसे सेवक शत्रुओ का काम सिद्ध करते है. 

आपने परीक्षा लेकर योग्य समझकर मुझे मंत्री के आसन पर बिठाया था और फिर अपनी की हुई प्रतिज्ञा को तोड़कर मेरा अपमान किया है. ऐसी दशा में अब आपका मुझ पर विशवास नहीं रहेगा और मै भी आप पर विश्वास न होने से उद्वेग में पड़ा गहूगा. आप मुझ पर संदेह करेगे और मै सदा आपसे डरा रहूगा. इधर दूसरो के दोष ढूढने वाले आपके भरती  लोग मौजूद है इनका मुझसे तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिए बहुत कठिन है. 
प्रेम का बंधन जब एक बार टूट जाता है तो उसका जुड़ना मुश्किल हो जाता है. और जो जुड़ा हुआ होता है वह बड़ी कठिनाई से टूटता है. किन्तु जो बार-बार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमे स्नेह नहीं होता. 
राजाओं का चित्त चंचल होता है, उनके लिए सुयोग्य व्यक्ति को पहचानना बहुत कठिन  है. सैकड़ो में कोई एक ही ऐसा मिलता है जो सब तरह से समर्थ हो और किसी पर भी संदेह न करता हो.
इस प्रकार कहकर सियार जंगल में में चला गया और अपने प्राण त्याग दिए.

10/20/2011

प्रेरक कथा.



एक बार कौशिक नामक ब्राह्मण निर्जन वन में बैठा पूजन कर रहा था। वह जिस पेड़ के नीचे बैठा था, उसी पर एक बगुली भी बैठी थी। अचानक उसने ब्राह्मण पर बीट कर दी। ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे शाप दिया। देखते ही देखते वह बगुली जल कर भस्म हो गई। ब्राह्मण बहुत खुश हुआ, उसने सोचा उससे बड़ा तपस्वी दूसरा कोई नहीं। उसने इसका खूब प्रचार किया। कुछ दिनों बाद वह पास के एक गांव में भिक्षा मांगने गया। एक घर के सामने पहुंचकर उसने आवाज लगाई। घर की मालकिन अपने पति की सेवा में लगी हुई थी। वह बाहर निकल कर उसे कुछ देर रुकने के लिए कहा और पति की सेवा में लग गई। उसे बाहर आने में हुई देरी से ब्राह्मण काफी गुस्सा हुआ। जब वह भिक्षा लेकर बाहर आई तो ब्राह्मण ने गुस्से में कहा, “तुमने मुझे इतनी प्रतीक्षा क्यों करवाई?” औरत ने कहा- “ब्राह्मणदेव मैं कोई बगुली नहीं कि आपके शाप से भस्म हो जाऊंगी। मैं अपने कर्तव्यपालन में लगी हुई थी इसीलिए आपको जरा देर रुकना पड़ा। नहीं तो मैं आपको प्रतीक्षा नहीं करवाती। आप गुस्सा न करें, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं। किसी से कष्ट मिलने पर भी जो आदमी उसका जवाब हिंसा से नहीं देता वही ब्राह्मण है। इस बात की पुष्टि के लिए मैं आपको एक जगह बताती हूं। आप वहां जाएं और उससे मिलें।”

वह औरत की बताई जगह पर गया। वहां एक शिकारी रहता था। कौशिक ने उसे औरत की सारी बात सुनाई। शिकारी ने उसे बिठाया और कहा, “ब्राह्मण देव मैं जानवरों को मार कर उनका मांस बेचने का काम करता हूं। मुझे जानवरों की जान लेना अच्छा नहीं लगता पर यह मेरी मजबूरी है। अपने धर्म के पालन के लिए यह काम करता हूं। सबका अपना-अपना कर्तव्य एवं धर्म होता है और इसका पालन सभी को करना चाहिए।” कर्तव्य के महत्व की बात सुनकर कौशिक की आंखें खुल गई। उसे अपनी भूल का पता चल गया था।

10/17/2011

अच्युताष्टकं



अच्युतं केशवं राम नारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरा मन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं संदधे ॥२॥

विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिनी रागिने जानकी जानये ।
वल्लवी वल्लभायाऽर्चितायात्मने कंस विध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥३॥

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रिपते वासुदेवाचित श्रिनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारका नायक द्रौपदी रक्षक ॥४॥

राक्षसक्षोभितः सीतयाशोभितो दण्डकारण्य भू पुण्यता कारणः ।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्संपूजितो राघवः पातु माम् ॥५॥

धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् द्वेषिणां केशिहा कंसहृद् वंशिकावादकः ।
पूतनाकोपकः सूरजा खेलनो बाल गोपालकः पातु माम् सर्वदा ॥६॥


विद्युदुद्धयोतवान प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत् प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोरस्थलं लोहितांघ्रिदूयं वारिजाक्षं भजे ॥७॥

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजिमानाननं रत्नमौलिं लसत् कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरकं कङ्कण प्रोज्ज्वलं किङ्किणी मञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥८॥

10/16/2011

उनके अवयवो में सारे लोक कल्पित है



एक समय नारदजी विविध लोको में भ्रमण करते-करते ब्रह्मा जी के पास गए. वहा  उन्होंने ब्रह्माजी को नेत्र बंद  कर तपस्या  में मग्न  देखा. नारदजी ने विचार किया की मेरे  पिताजी जगत की स्रष्टि, पालन और संहार के करता है. इनसे बड़ा कौन देवता है जिसका ये ध्यान कर रहे है ?


ब्रह्माजी की समाधी टूटने पर नारदजी ने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा - पिताजी ! आज आपको ध्यानमग्न देखकर मुझे बड़ा संदेह हो रहा है. मै अभी तक आपको ही सर्वश्रेष्ठ जगत देवता समझता था, किन्तु आज मुझे ज्ञात हो रहा है की आपसे बड़ा कोई देवता और है, जिसका आप ध्यान करते है. कृपया यह भी बतलाइये की आत्मज्ञान का साधन  क्या है ? यह विश्व  किस से  प्रकाशित होता है ? किसके अधीन है और किस्मे लीन  होता है ? आपका विज्ञानदाता और आश्रय  कौन है ? आप किसके अधीन है एवं आपका स्वरूप क्या है ? 
ब्रह्माजी ने कहा - वत्स ! तुम्हारा संदेह ठीक है. मुझसे परे जो तत्व है, उसे तुम नहीं जानते, इसी से तुम्हे संदेह हो रहा है. उन भगवान् को नमस्कार है, जिनकी माया से मोहित लोग मुझे ही जगतगुरु कहते है - 
तस्मै नमो भगवते बासुदेवाय धीमहि
य्न्माय्या दुर्जयाया मम ब्रुवन्ति जगद्गुरुम 
पर वस्तुतः जगद्गुरु श्री नारायण  ही है. उन्ही से जगत की स्रष्टी होती है. मै तो निमित्त मात्र हूँ. उनके द्वारा प्रकाशित  स्रष्टि को ही मै प्रकाशित करता हूँ. जब भगवान् एक से बहुत होने की इच्छा करते है, तब प्रकृति और पुरुष प्रथक हो जाते है. उस समय पुरुष में काल, कर्म और स्वभाव ये तीनो उद्भूत होते है. काल से प्रकृति के गुणों का क्षोभ होता है, स्वभाव से उसमे परिणाम होता है और कर्म से महत्त्तत्व का जन्म होता है. महत्त्तव से अहंकार होता है. यह अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार है.
तामस अहंकार पंचतन्मात्रा और पञ्च महाभूतो की उत्पत्ति होती है. राजस अहंकार से इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता और मन की उत्पत्ति होती है.इन सब तत्वों ने मिलकर भगवान् की शक्ति से एक अंड की रचना की. वह अंड बहुत वर्षो तक जल में पडा रहा. ब्रह्मा ने उसमे प्रविष्ट होकर उसको चेतन किया.इसी से वह ब्रह्माण्ड कहा जाता है. फिर उसका भेदन कर वह स्वयं विराट रूप से प्रकट हुए. उनके अवयवो में सब लोक कल्पित है - चरणों में भूलोक, नाभि में भुवर्लोक और मस्तक में स्वर्ग लोक. उन्ही में सात भुवन एवं चौदह लोको के कल्पना की गई है.

10/15/2011

स्रष्टि विषयक प्रश्न देवर्षि नारद ने ब्रह्मा से पूछा

रजा परीक्षित ने शुकदेव जी के  आत्मतत्व का निश्चय कराने वाले वचन सुनकर भगवन श्रीकृष्ण में अपनी  मति स्थिर  की और स्त्री पुत्र  आदि तथा सम्पूर्ण राज्य में चिरकाल से निरूद्ध ममता का भी परित्याग किया. जैसे आपने मुझसे पूछा है वैसे ही भगवत्कथा के प्रेमी परीक्षित ने भी शुकदेवजी से भाग्वात्सम्बंधी लीलाओं  का प्रश्न किया था.
 परीक्षित ने कहा - हे ब्रह्मन ! आपके  वचन सुनकर मुझे बड़ी शांति मिलती है और अज्ञान की निवृत्ति होती है जब आप यह बताये की भगवान् श्रष्टि, पालन और संहार कैसे करते है? इस बारे में बड़े-बड़े विद्वानों की भी मति चकरा जाती है. अतः आप हमारे इस संदेह का निवारण करे, क्योकि आप शब्द ब्रह्म तथा परब्रह्म के पूर्ण ज्ञाता है.
शूतजी कहते है - हे शौनक राजा परीक्षित का प्रश्न सुनकर शुकदेवजी ध्यानमग्न हो भगवान् का स्तवन करते हुए बोले -  हे भगवन ! आप पुराण पुरुष है. आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप धारण कर श्रष्टि , पालन और संहार करते है. सबके अन्तर्यामी होते हुए भी आपको यथार्थ रूप से कोई जान नहीं सकता. आप भक्तो का अज्ञान दूर करते है. परम हंसो को ज्ञान देते है. आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ.
जिनके नामो का कीर्तन, जिनके स्वरूप का स्मरण जिनकी प्रतिमाओं का दर्शन, जिनके चरणों का वंदन, जिनकी कथा का श्रवण तथा जिनके श्रीविग्रह का पूजन सम्पूर्ण लोको की पापराशी को भस्म कर डालता है उन परम मंगलमय यशोमूरती  भगवान् को मै बार-बार नमन करता हूँ. पापी पुरुष भी जिन आपके भक्तो के आश्रय से पवित्र हो जाते है, ब्रह्मा आदि देवता भी जिन आपकी मूर्ती का दर्शन कर चकित रह जाते है और उसका पार नहीं पाते, वह दुर्ज्ञेय भगवान् मुझपर प्रसन्न हो मै प्रणाम करता हूँ.
जो लक्ष्मी के स्वामी, यज्ञो के फल दाता, प्रजा के रक्षक, बुद्धि के प्रवर्तक, लोको के अधिष्ठाता, प्रथ्वी के उद्धर्ता, भक्तो  के मानदाता तथा यदुवंशियो के रक्षक है, वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् मुझ पर प्रसन्न हो. मै सर झुका कर नमन करता हूँ.
जिन भगवान् के चरण कमलो के ध्यान से निर्मल हुई बुद्धि से योगी  जन आत्मतत्व का साक्षात्कार करते है एवं अपनी रूचि के अनुसार उन्कामहत्व गान करते है वे सर्वविध संकटों से मुक्ति देनेवाले भगवान् मुझ पर प्रसन्न हो मै उनको नमन करता हूँ.
हे भगवान् ! इन आपकी ही प्रेरणा से सरस्वती ने ब्रह्मा के मुख से आविर्भूत होकर उनकी स्रष्टि विषयक स्मृति जाग्रति के, जो महाभूतो द्वारा शरीरो की रचना कर अन्तर्यामी रूप से उनमे निवास कर इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करते है वह भगवान्  इस समय मेरी वाणी को अलंकारों से युक्त कर दे जिससे मै प्रवचन करने में समर्थ हो सकू. मै आपके चरणों में बारम्बार नमस्कार करता हूँ.
इस प्रकार १२ श्लोको से शुकदेवजी ने भगवान् की स्तुति की.. अनंतर अपने पिता श्री वेदव्यास जी को प्रणाम कर वे परीक्षित से बोले -  हे राजन ! तुमने मुझसे जो स्रष्टि विषयक प्रश्न किया था, वही देवर्षि नारद  ने  ब्रह्मा जी से पूछा था. वही प्रसंग मै आपसे कहता हूँ, ध्यान पूर्वक सुने.
...क्रमशः अगले अंक में पढ़े 

10/12/2011

जय राम रमारमनं समनं

छं0- जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
दो0-बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।।
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।।14(ख)।।
–*–*–

10/08/2011

मैक्स्मूलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण - क्या, क्यों और कैसे


भारत के लोगों को फ्रेडरिक मैक्समूलर का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने उसे एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है। वास्तव में वह हिन्दुओं और हिन्दू धर्मशास्त्रों का एक महान शखु था। लेकिन दुर्भाग्य से, उस समय के ही नहीं, बल्कि आज के हिन्दू भी उसके उद्‌देश्य व कार्य के दूरगामी प्रभाव को समझने में असफल रहे हैं क्योंकि मैक्समूलर ने अपनी लेखनी की चतुराई द्वाराअपने वास्तविक स्वरूप और वेद भाष्य के विकृतीकरण के उद्‌देश्य को बड़े योजनाबद्ध तरीके से छिपाए रखा, यहाँ तक कि उसके निधन के बाद सन्‌ १९०१ में प्रकाशित स्वलिखित जीवनी में भी उसे उजागर नहीं किया।

इस सन्दर्भ में श्री ब्रह्मदत्त भारती ने अपनी पुस्तक 'मैक्समूलर-ए लाइफ लौंग मास्करेड' में इस प्रकार लिखा हैः

"Max Muller's effectiveness as the arch enemy of Hinduism lay dangerously hidden in his subtle equivocations and in his ability, which seemed congenital, successfully to pass a counterfeit coin without being caught while performing the feat. His capacity to look honest and sound sincere on surface was prodigious. the Hindus, of the nineteenth century failed to discover and understand Max Muller and his Max Mullerism, because, by and large, being, too gullible, they believed whatever max Muller wrote and said. "Since he had been, in addition, convertly supported and encouraged by the Englishmen who then ruled Hindustan, he was able to mount his veiled attacks on Hinduism again and again from behind the convenient cover of philological research."                                                                                          
 (p. 194)
अर्थात्‌ ''मैक्समूलर की हिन्दूधर्म के प्रति कट्‌टर शत्रुता का प्रभावीपन उसकी लेखनी की बहुअर्थी शैली में भयंकर रूप से छिपा हुआ है। इस सफलता का रहस्य उसकी इस योग्यता से भी आसानी से समझा जा सकता है, जैसे कोई चालाक व्यक्ति खोटे सिक्के को चला देने पर भी पकड़ा नहीं जाता है। उसका ऊपर से हिन्दू धर्म शास्त्रों- वेदों आदि के प्रति सच्चा और निष्ठावान दिखलाई देना उसकी आश्चर्यजनक रहस्यमयी लेखनशैली की क्षमता का परिचायक है। उन्नीसवी सदी के हिन्दू मैक्समूलर और उसके मैक्समूलरवाद को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं क्योंकि हिन्दुओं के आमतौर पर अत्यंत सीधे-सादे होने के कारण उन्होंने उसे ही सच मान लिया जो कि मैक्समूलर ने कहा और लिखा। इसके अतिरिक्त उसे आजीवन अप्रत्यक्ष रूप् से अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन और सहयोग मिलता रहा जो कि उस समय भारत के शासक थे। इसी कारण वह भाषा विज्ञान-शोध की आड़ में छिपकर लगातार हिन्दू धर्म एवं वेदों पर प्रहार करता रहा।'' 
(पृ. १९४)
इसी के साथ-साथ अंग्रेज शासक लगातार यही प्रचार करते रहे कि मैक्समूलर तो वेदों का महान विद्वान और हिन्दू धर्म तथाहिन्दुआअें का शुभचिंतक है। वे इस कथन की पुष्टि इस बात से करते हैं कि उसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में १८४६ से १९०० तक वेदों और हिन्दू धर्मशास्त्रों पर एक विशाल साहित्य स्वंय लिखा तथा अपने जैसे सहयोगी लेखकों द्वारा लिखवाकर उसे स्वयं संपादित किया।
मैक्समूलर ने अपनी बहुअर्थी लेखनी की आड़ में आजीवन वेदों को विरूपित किया, फिर भी वह अपने को हिन्दू धर्म का हितैषी होने का ढोंग रचता रहा। इस बात के इतने पक्के, सच्चे और आश्चर्यजनक प्रमाण हैं कि कोई भी तर्क उसे वेदों के विकृतीकरण के दोष से बचा नहीं सकता।
मैक्समूलर की दूसरी जीवनी में असली स्वरूप
इसके लिए हमें बाहर के किसी दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता नहीें है क्योंकि मैक्समूलर द्वारा लिखित साहित्य और अपने मित्रों, परिवारीजनों आदि को लिखे उसके पत्रों में ही र्प्याप्त सामग्री मिलती है। हालांकि मैक्समूलर की स्वलिखित जीवनी १९०१ में ही प्रकाशित हुई थी, परन्तु उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसके फौरन बाद १९०२, में उसकी एक और जीवनी ''दी लाइफ एण्ड लैटर्स ऑफ दी आनरेबिल फ्रेडरिक मैक्समूलर'' के नाम से प्रकाशित की। इसमें अन्य विवरणों के सहित मैक्समूलर द्वारा लिखें पत्रोंका संकलन भी है। उसके प्रकाशन का उद्‌देश्य स्पष्ट करते हुए श्रीमती जोर्जिना नपे पुस्तक की भूमिका में लिखाः
"It may be thought that the publication of these volumes is superfluous after two works 'Auld Lang Syne' and the 'Autobiography (2 Vols.) written by Max Muller himself. But it seemed that something more wanted to show the innermost character of the real man…. The plan pursued throughout these volumes has been to let Max Muller's letters and the testimony of friends to his mind and character speak for themselves, whilst the whole is connected by a slight thread of necessary narrative. The selection from the letters has been made with a view to bring the man rather the scholar before the world."
 (preface to November,1902, New York Edition; Bharti, p. IX).
अर्थात्‌ ''ऐसा सोचा जा सकता है किस्वयं मैक्समूलर द्वारा लिखित ''औल्ड लैंग सायने'' और ''आत्मजीवनी'' (२ खंडों में) प्रकाशित हो जाने के बाद, इन खंडों के प्रकाशन की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि उस मनुष्य के आन्तरिक चरित्र की वास्तविकताको दिखाने के जिए कुछ और अधिक करने की आवश्यकता है। इन खंडों में जो योजन लगातार अपनाई गई है वह मैक्समूलर के पत्रों और उसके मित्रों के प्रमाणस्वरूप् दिए गए कथन, उस मनुष्य की सोच और चरित्र को स्वयं उजागर करते हैं, जबकि समस्त सामग्री आवश्यक आत्मकथा के धागे से बांी हुई हैं। यहाँ उद्धत पत्रों का चुनाव इस उद्‌देश्य से किया गया है ताकि विश्व के सामने एक विद्वान की अपेक्षा उस मनुष्य का सही स्वरूप प्रस्तुत किया जा सके।''
 (न्यूयार्क संस्करण, १९०२, प्राक्कथन पृ. प्ग्)
इसलिए यहाँ हमारा उद्‌देश्य यह समझने का है कि क्या वह वास्तव में वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों का प्रशंसक और भारत का मित्र था? क्या वह वेदों, उपनिषदों, दर्शनों आदि के उदात्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रभावित था, और उन्हें वह अंग्रेजी माध्यम से विश्वभर में फैलाना चाहता था? क्या वह भारतीय धर्मशास्त्रों का जिज्ञासु था? क्या उसने ऋग्वेद का भाष्य भारतीय प्राचनी यास्कीय-पाणिनीय पद्धति के अनुसार किया था? उसने सायण-भाष्य को ही आधार क्यों माना? क्या उसने सायण के सभी मापदण्डों को अपनाया? यदि नहीं, तो क्यो? आखिर उसे वेदों में क्या मिला?
क्या वह तुलनात्मकभाषा विज्ञान और गाथावाद के शोध की आड़ में एक पक्षपाती, पूर्वाग्रही और छद्‌मवेशी सैक्यूलर ईसाई मिशनरी था? जो वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों के भ्रामक अर्थ करके हिन्दू धर्म को समूल नष्ट करना चाहता था। कया वह वेदों को बाईबिल से निचले स्तर का दिखाकर भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करना और भारत में ब्रिटिश राज को सुदृढ़ करना चाहता था? आखिर उसने वेदों और भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनेक कपोल-कल्पित मान्यताएं क्यों स्थापित कीं? इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अंग्रेजी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के ज्ञान में अधकचरे, चौबीस वर्षीय, अनुभवहीन गैर-ब्रिटिश, जर्मन युवक मैक्समूलर को ही वेदभाष्य के लिए क्यों चुना?
उसने वेदों का विकृतीकरण क्या, क्यों और कैसे किया? इन्हीं कुछ प्रश्नों को यहाँ संक्षेप में विश्लेषण किया जाएगा ताकि अधकचरे ज्ञानी हिन्दू और सैक्यूलरवादी, जो उसके विकृत साहित्य के आधार पर समय-समय पर हिन्दू धर्म की निंदा करते रहते हैं, उसकी वास्तविकता तथा उसके निहित उद्‌देश्य को समझ सकें। इसके लिए हमें तत्कालीन ब्रिटिश शासित भारत की धार्मिक व राजनैतिक स्थितियों कोसमझना होगा, जिनके कारण उन्हें एक मैक्समूलर की तलाश करनी पड़ी। 

10/07/2011

बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग


बजरंग बाण


भौतिक मनोकामनाओं की पुर्ति के लिये बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग 


अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमानजी का एक चित्र या मूर्ति जप करते समय सामने रख लें। ऊनी अथवा कुशासन बैठने के लिए प्रयोग करें। अनुष्ठान के लिये शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण आवश्यक है। घर में यदि यह सुलभ न हो तो कहीं एकान्त स्थान अथवा एकान्त में स्थित हनुमानजी के मन्दिर में प्रयोग करें।
हनुमान जी के अनुष्ठान मे अथवा पूजा आदि में दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। पाँच अनाजों (गेहूँ, चावल, मूँग, उड़द और काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुट्ठी प्रमाण में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगो दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीया बनाएँ। बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक तार लें अथवा एक कच्चे सूत को लम्बाई के बराबर काटकर लाल रंग में रंग लें। इस धागे को पाँच बार मोड़ लें। इस प्रकार के धागे की बत्ती को सुगन्धित तिल के तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजा काल में यह दिया जलता रहना चाहिए। हनुमानजी के लिये गूगुल की धूनी की भी व्यवस्था रखें।

जप के प्रारम्भ में यह संकल्प अवश्य लें कि आपका कार्य जब भी होगा, हनुमानजी के निमित्त नियमित कुछ भी करते रहेंगे। अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण का जाप प्रारम्भ करें। “श्रीराम–” से लेकर “–सिद्ध करैं हनुमान” तक एक बैठक में ही इसकी एक माला जप करनी है।
गूगुल की सुगन्धि देकर जिस घर में बगरंग बाण का नियमित पाठ होता है, वहाँ दुर्भाग्य, दारिद्रय, भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य शारीरिक कष्ट आ ही नहीं पाते। समयाभाव में जो व्यक्ति नित्य पाठ करने में असमर्थ हो, उन्हें कम से कम प्रत्येक मंगलवार को यह जप अवश्य करना चाहिए।

बजरंग बाण ध्यान

श्रीराम
अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं।
दनुज वन कृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।


दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।


चौपाई
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।
बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।
अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।
जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।
गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।
सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।
जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।
वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।
जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।
इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।
जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।
उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।
ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।
हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।
जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।
जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।
जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।
जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।
विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।
एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।
मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।
प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।
आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।
दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।
यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।
शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

मानस के मन्त्र


मानस के मन्त्र

१॰ प्रभु की कृपा पाने का मन्त्र
“मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवहु सकल कलिमल-दहन।।”



विधि-प्रभु राम की पूजा करके गुरूवार के दिन से कमलगट्टे की माला पर २१ दिन तक प्रातः और सांय नित्य एक माला (१०८ बार) जप करें।
लाभ-प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। दुर्भाग्य का अन्त हो जाता है।



२॰ रामजी की अनुकम्पा पाने का मन्त्र
“बन्दउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।”


विधि-रविवार के दिन से रुद्राक्ष की माला पर १००० बार प्रतिदिन ४० दिन तक जप करें।
लाभ- निष्काम भक्तों के लिये प्रभु श्रीराम की अनुकम्पा पाने का अमोघ मन्त्र है।



३॰ हनुमान जी की कृपा पाने का मन्त्र
“प्रनउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।”


विधि- भगवान् हनुमानजी की सिन्दूर युक्त प्रतिमा की पूजा करके लाल चन्दन की माला से मंगलवार से प्रारम्भ करके २१ दिन तक नित्य १००० जप करें।
लाभ- हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अला-बला, किये-कराये अभिचार का अन्त होता है।



४॰ वशीकरण के लिये मन्त्र
“जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेहि।।”


विधि- सूर्यग्रहण के समय पूर्ण ‘पर्वकाल’ के दौरान इस मन्त्र को जपता रहे, तो मन्त्र सिद्ध हो जायेगा। इसके पश्चात् जब भी आवश्यकता हो इस मन्त्र को सात बार पढ़ कर गोरोचन का तिलक लगा लें।
लाभ- इस प्रकार करने से वशीकरण होता है।



५॰ सफलता पाने का मन्त्र
“प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देव।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।”

विधि- प्रतिदिन इस मन्त्र के १००८ पाठ करने चाहियें। इस मन्त्र के प्रभाव से सभी कार्यों में अपुर्व सफलता मिलती है।


६॰ रामजी की पूजा अर्चना का मन्त्र
“अब नाथ करि करुना, बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहिं जोनि जन्मौं कर्म, बस तहँ रामपद अनुरागऊँ।।”


विधि- प्रतिदिन मात्र ७ बार पाठ करने मात्र से ही लाभ मिलता है।
लाभ- इस मन्त्र से जन्म-जन्मान्तर में श्रीराम की पूजा-अर्चना का अधिकार प्राप्त हो जाता है।



७॰ मन की शांति के लिये राम मन्त्र
“राम राम कहि राम कहि। राम राम कहि राम।।”


विधि- जिस आसन में सुगमता से बैठ सकते हैं, बैठ कर ध्यान प्रभु श्रीराम में केन्द्रित कर यथाशक्ति अधिक-से-अधिक जप करें। इस प्रयोग को २१ दिन तक करते रहें।
लाभ- मन को शांति मिलती है।



८॰ पापों के क्षय के लिये मन्त्र
“मोहि समान को पापनिवासू।।”


विधि- रुद्राक्ष की माला पर प्रतिदिन १००० बार ४० दिन तक जप करें तथा अपने नाते-रिश्तेदारों से कुछ सिक्के भिक्षा के रुप में प्राप्त करके गुरुवार के दिन विष्णुजी के मन्दिर में चढ़ा दें।
लाभ- मन्त्र प्रयोग से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।



९॰ श्रीराम प्रसन्नता का मन्त्र
“अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदान न आन।।”


विधि- इस मन्त्र को यथाशक्ति अधिक-से-अधिक संख्या में ४० दिन तक जप करते रहें और प्रतिदिन प्रभु श्रीराम की प्रतिमा के सन्मुख भी सात बार जप अवश्य करें।
लाभ- जन्म-जन्मान्तर तक श्रीरामजी की पूजा का स्मरण रहता है और प्रभुश्रीराम प्रसन्न होते हैं।



१०॰ संकट नाशन मन्त्र
“दीन दयाल बिरिदु सम्भारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”


विधि- लाल चन्दन की माला पर २१ दिन तक निरन्तर १०००० बार जप करें।
लाभ- विकट-से-विकट संकट भी प्रभु श्रीराम की कृपा से दूर हो जाते हैं।



११॰ विघ्ननाशक गणेश मन्त्र
“जो सुमिरत सिधि होइ, गननायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोई बुद्धिरासी सुभ गुन सदन।।”


विधि- गणेशजी को सिन्दूर का चोला चढ़ायें और प्रतिदिन लाल चन्दन की माला से प्रातःकाल १०८० (१० माला) इस मन्त्र का जाप ४० दिन तक करते रहें।
लाभ- सभी विघ्नों का अन्त होकर गणेशजी का अनुग्रह प्राप्त होता है।