11/20/2011

महाभारत से - मनुष्य के स्वाभाव की पहचान



 महाभारत से 
मनुष्य के स्वाभाव की पहचान 
एक सियार आचारवान था उसके आचार विचार की चर्चा चारो और फ़ैल गयी. फिर एक व्याघ्र ने स्वयं आकर उसका विशेष सम्मान किया और उसे शुद्ध तथा बुद्धिमान समझकर अपना मंत्रित्व स्वीकार करने के लिए उससे प्रार्थना की.
व्याघ्र बोला - मै तुम्हारे स्वरुप से परिचित हूँ, तुम मेरे साथ चलकर रहो और मनमाने भोग भोगो. एक बात तुम्हे सूचित कर देते है, हमारी जाती स्वभाव कठोर होती  है - यह दुनिया जानती है. यदि तुम कोमलता पूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित साधन में लगे रहोगे तो तुम्हारा भी भला होगा.

सियार ने कहा-आपने मेरे लिए जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य है. तथा आप जो धर्म और अर्थ साधन में कुशल एवं शुद्ध स्वभाव वाले सहायक ढूढ़ रहे है यह भी उचित ही है. इसके लिए आपको चाहिए की जिनका आपके प्रति अनुराग हो. जिन्हें नीति का ज्ञान हो, जो संधि कराने में कुशल विज्याभिलाशी, लोभ रहित, बुद्धिमान, हितैषी तथा उदार ह्रदय वाले हो ऐसे व्यक्तियों को सहायक बनाकर पिता और गुरु के सामान उनका आदर करे. 

आप मेरे लिए जो सुविधाए दे रहे है उन्की मुझे इच्छा नहीं है. मै सुख भोग तथा उनके आधारभूत ऐश्वर्य को नहीं चाहता. आपके पुराने नौकरों के साथ मेरा स्वभाव भी नहीं मिलेगा. वे दुष्ट प्रकृति केजीव है, आपको मेरे विरुद्ध भड़काया करेगे. उनका प्रताप बढ़ा हुआ है अतः उनको मेरे अधीन होकर रहना अच्छा नहीं मालूम होगा. 
इधर मेरा स्वभाव भी कुछ विलक्षण है, मै पापियों पर भी कठोरताका वर्ताव नहीं  करता. दूरतक की बात सोचता हूँ. मेरा उत्साह कभी कम नहीं होता. मुझमे बल की मात्रा भी अधिक है. मै स्वयं कृतार्थ हूँ और प्रत्येक कार्य सफलता के साथ कर सकता हूँ.

 किसी की सेवा टहल का तो मुझे बिलकुल ज्ञान नहीं है. स्वच्छन्दतापूर्वक वन में विचरता रहता हूँ. मेरे जैसे वनवासियों का जीवन आसक्ति रहित और निर्भय होता है. एक जगह वेखटके पानी  मिलता हो और दूसरी जगह भय देने वाला स्वादिष्ट अन्न प्राप्त होता हो-इन दोनों को यदि विचार करके देखता हूँ तो मुझे वहा ही  सुख जान पड़ता है जहा कोई भय नहीं है. 

राजा के पास रहने में सदा भय ही भय है. राज्सेवको में से जितने लोग दूसरो के लगाए हुए झूठे कलंक के कारण राजा के हात से मारे गए है उतने सच्चे अपराधो  के कारण  नहीं. 
यदि मुझसे मंत्रित्व का कार्य लेना ही हो तो मै आपसे एक शर्त करना चाहता हूँ उसी के अनुसार आपको मेरे साथ बर्ताव करना पड़ेगा. मेरे आत्मीय व्यक्तियों का आप  सम्मान करे, उनकी हितकारी बाते सुने. मै आपके दुसरे मंत्रियो  के साथ कभी परामर्श नहीं करूगा. एकांत में सिर्फ आपके साथ अकेला ही मिलूएअ  और आपके हित की बाते बताया करूगा. आप भी अपने जाती भाईयो के कामो में मुझसे हिताहित की बात न पूछियेगा. मुझसे सलाह करने के बाद  यदि आपके पहले के मंत्रियो की भूल भी साबित हो तो  उन्हें प्राणदंड न दीजियेगा तथा कभी क्रोध में आकर मेरे आत्मीय जनों पर भी प्रहार न कीजियेगा.

शेर ने ऐसा ही होगा कहकर सियार का बड़ा आदर किया. सियार ने भी उसका मंत्री होना स्वीकार कर लिया. 

फिर तो उसका बड़ा स्वागत सत्कार होने लगा. प्रत्येक कार्य में उसकी प्रशंसा होने लगी. यह सब देख सुन कर पहले के सेवक और मंत्री जल भुन गए. सब उसके साथ द्वेष करने लगे. उनके मन में दुष्टता भरी थी. इसलिए झुण्ड बांधकर  बारम्बार सियार के पास आते और अपनी मित्रता जताते हुए उसको समझा-बुझाकर अपने ही सामान दोषी बनाने की कोशिश करते थे. 
सियार के आने से पहले उनका रहन सहन कुछ और ही था. दूसरो की बस्तु छीन  कर स्वयं उसका उपभोग करते थे. किन्तु अब उनकी दाल नहीं गलती थी.अब  वे किसी का भी धन लेने में असमर्थ थे. क्योकि सियार ने उन पर बड़ी कड़ी पाबंदी लगा रखी थी. वे चाहते  थे सियार भी डिग जाय इसलिए तरह-तरह की बातो में उसे फुसलाते और बहुत सा धन देने का लोभ दिखाते थे.
मगर सियार बड़ा बुद्धिमान था, वह उनके चक्कर में नहीं आया. उसने धैर्य नहीं छोड़ा. तब उन नौकरों ने उसका नाश करने की शपथ खाई और सबमिलकर इसके लिए प्रयत्न करने लगे,
 एक दिन उन्होंने  शेर के खाने के लिए जो मांस तैयार करके रखा गया था उसे उसके स्थान से चुरा लिया और सियार की मांद में ले जाकर रख दिया. सियार ने मंत्री पद पर आते  समय शेर से पहले ही ठहरा लिया था की यदि तुम मुझसे मित्रता चाहते हो तो किसी के बहकाए में आकर मेरा विनाश न करना.

उधर शेर को जब भूख लगी और वह भोजन के लिए उठा तो उसके खाने के लिए रखा हुआ मांस नहीं दिखाई पड़ा. शेर ने चोर का पता  लगाने लिए नौकरों को आज्ञा दी. तब जिनकी यह करतूत थी उन्ही लोगो ने शेर से उस मांस के बारे में बताया - महाराज! अपने  को बड़ा बुद्धिमान और पंडित मानने वाले सियार महोदय ने ही आपके मांस का अपहरण किया है. 
सियार की यह चपलता सुनकर शेर गुस्से से भर गया और उसको मार डालने का विचार करने लगा. उस समय सियार के प्रतिकूल कुछ कहने का मौका देखकर पहले के मंत्री लोग शेर से कहने लगे-राजन! वह तो बातो से ही धर्मात्मा बना हुआ है, स्वभाव का बड़ा कुटिल है. भीतर का पापी है, मगर ऊपर से धर्म का ढोंग बनाए हुए है. उसका सारा आचार-विचार दिखावे के लिए है. यह कहकर वे क्षण  भर में ही उस मांस को सियार की मांद से उठा ले आये . शेर ने उनकी बाते सूनी और जब निश्चय  हो गया के सियार ही मांस ले गया था तो उसने उसको मार डालने की आज्ञा दे दी.
शेर की यह बात जब उसकी माता को मालूम हुई तो वह हितकारी वचनों से उसे समझाने के लिए आयी  और कहने लगी - बेटा इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यंत्र हुआ  जान पड़ता है. तुम्हे इस पर विशवास नहीं करना चाहिए. 
काम में लाग डाट हो जाने से जिनके मन में पाप होता है वे निर्दोष को ही दोषी बताते है. 
किसी को अपने  से ऊची अवस्था में देखकर अक्सर लोगो को ईर्ष्या हो जाया करती  है, वे उसकी उन्नती  नहीं सह सकते . कोई कितना ही शुद्ध क्यों न हो, उस पर भी दोष लगा ही देते है.

 लोभी शुद्ध स्वभाव वाले व्यक्तियों से और आलसी तपस्वियों से द्वेष करते है. इसी प्रकार मूर्ख लोग पंडितो से, दरिद्र धनियों से, पापी  धर्मात्माओ से और कुरूप रूप वानो  से डाह रखते है. 
एक ओर तो जब घर में सुनसान था उस समय तुम्हारे मांस की चोरी हुई है दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है जो देने पर भी मांस भी नहीं लेना चाहता इन दोनों बातो पर अच्छी तरह विचार करो. संसार में बहुत से असभ्य प्राणी सभी की तरह और सभी असभ्य की तरह देके जाते है, इस प्रकार उनमे अनेको भाव द्रष्टिगोचर होते है,अतः उनकी परीक्षा कर लेनी  उचित है. 
आकाश औधा  कड़ाहा  के सामान और जुगनू  अग्नि के सामान दिखाई देते है किन्तु न तो आकाश में कड़ाही है और न जुगनू में आग ही है. इसलिए सामने दिखाई देती हुई वस्तु को भी जाँच करना चाहिए. जो जांचने बूझने के बाद किसी विषय में अपना विचार प्रकट करता है उसे पीछे पछतावा नहीं होता. राजा के लिए किसी को मरवा डालना कठिन काम नहीं है मगर इससे उसकी बडाई नहीं होती. शक्तिशाली पुरुष में यदि क्षमा हो तो उसकी प्रशंशा की जाती है. उसी से उसका यश बढ़ता  है. 

बेटा तुमने स्वयं ही सियार को मंत्री के आसन पर बिठाया है और तुम्हारे सामंतो में भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है. ऐसा सुपात्र मंत्री बड़ी मुश्किल से मिलता है, यह तुम्हारा बड़ा हितैषी है इसलिए तुम्हे इसकी रक्षा करनी चाहिए. जो दूसरो के मिथ्या  कलंक लगाने पर निर्दोष को भी अपराधी मानकर दंड देता है वह राजा दुष्ट मंत्रियो के साथ रहने के कारण शीघ्र ही मौत के मुख में पड़ता है.

शेर की माता इस प्रकार उपदेश दे ही रही थी की उस शत्रु समूह के भीतर से एक धर्मात्मा व्यक्ति उठकर शेर के पास आया. वह सियार का जासूस था. उसने जिस प्रकार कपट लीला की गयी थी उसका भन्दा फोड़  कर दिया. इससे शेर को सियार की सत्यता का पता चल गया और उसने मंत्री का सत्कार करके उसको इस अभियोग से मुक्त कर दिया तथा अत्यंत स्नेह के साथ उसे गले से लगाया.

सियार नीतिशास्त्र का ज्ञाता था, उसने शेर की आज्ञा लेकर उपवास करके प्राण त्याग देने का विचार किया. शेर ने उसे इस कार्य से रोका और उसका भली भाती आदर सत्कार किया. उस समय स्नेह के कारण उसका चित्त विकल हो रहा था. मालिक की यह अवस्था  देख सियार का भी गला भर आया और वह उसे प्रणाम करके गदगद कंठ से बोला-राजन पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रु सी स्थित में पंहुचा दिया. अब मै आपके पास रहने के योग्य नहीं हूँ.
 जो अपने पद से हटाये गए हो, सम्मानित स्थान से नीचे गिरा दिए गए हो, जिनका सर्वस्व छीन  लिया हो जो दुर्बल,लोभी, क्रोधी और डरपोक हो, जिन्हें धोखे में डाला गया हो, जिनका धन लूटा गया हो तथा जिन्हें क्लेश दिया गया हो ऐसे सेवक शत्रुओ का काम सिद्ध करते है. 

आपने परीक्षा लेकर योग्य समझकर मुझे मंत्री के आसन पर बिठाया था और फिर अपनी की हुई प्रतिज्ञा को तोड़कर मेरा अपमान किया है. ऐसी दशा में अब आपका मुझ पर विशवास नहीं रहेगा और मै भी आप पर विश्वास न होने से उद्वेग में पड़ा गहूगा. आप मुझ पर संदेह करेगे और मै सदा आपसे डरा रहूगा. इधर दूसरो के दोष ढूढने वाले आपके भरती  लोग मौजूद है इनका मुझसे तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिए बहुत कठिन है. 
प्रेम का बंधन जब एक बार टूट जाता है तो उसका जुड़ना मुश्किल हो जाता है. और जो जुड़ा हुआ होता है वह बड़ी कठिनाई से टूटता है. किन्तु जो बार-बार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमे स्नेह नहीं होता. 
राजाओं का चित्त चंचल होता है, उनके लिए सुयोग्य व्यक्ति को पहचानना बहुत कठिन  है. सैकड़ो में कोई एक ही ऐसा मिलता है जो सब तरह से समर्थ हो और किसी पर भी संदेह न करता हो.
इस प्रकार कहकर सियार जंगल में में चला गया और अपने प्राण त्याग दिए.

10/20/2011

प्रेरक कथा.



एक बार कौशिक नामक ब्राह्मण निर्जन वन में बैठा पूजन कर रहा था। वह जिस पेड़ के नीचे बैठा था, उसी पर एक बगुली भी बैठी थी। अचानक उसने ब्राह्मण पर बीट कर दी। ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे शाप दिया। देखते ही देखते वह बगुली जल कर भस्म हो गई। ब्राह्मण बहुत खुश हुआ, उसने सोचा उससे बड़ा तपस्वी दूसरा कोई नहीं। उसने इसका खूब प्रचार किया। कुछ दिनों बाद वह पास के एक गांव में भिक्षा मांगने गया। एक घर के सामने पहुंचकर उसने आवाज लगाई। घर की मालकिन अपने पति की सेवा में लगी हुई थी। वह बाहर निकल कर उसे कुछ देर रुकने के लिए कहा और पति की सेवा में लग गई। उसे बाहर आने में हुई देरी से ब्राह्मण काफी गुस्सा हुआ। जब वह भिक्षा लेकर बाहर आई तो ब्राह्मण ने गुस्से में कहा, “तुमने मुझे इतनी प्रतीक्षा क्यों करवाई?” औरत ने कहा- “ब्राह्मणदेव मैं कोई बगुली नहीं कि आपके शाप से भस्म हो जाऊंगी। मैं अपने कर्तव्यपालन में लगी हुई थी इसीलिए आपको जरा देर रुकना पड़ा। नहीं तो मैं आपको प्रतीक्षा नहीं करवाती। आप गुस्सा न करें, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं। किसी से कष्ट मिलने पर भी जो आदमी उसका जवाब हिंसा से नहीं देता वही ब्राह्मण है। इस बात की पुष्टि के लिए मैं आपको एक जगह बताती हूं। आप वहां जाएं और उससे मिलें।”

वह औरत की बताई जगह पर गया। वहां एक शिकारी रहता था। कौशिक ने उसे औरत की सारी बात सुनाई। शिकारी ने उसे बिठाया और कहा, “ब्राह्मण देव मैं जानवरों को मार कर उनका मांस बेचने का काम करता हूं। मुझे जानवरों की जान लेना अच्छा नहीं लगता पर यह मेरी मजबूरी है। अपने धर्म के पालन के लिए यह काम करता हूं। सबका अपना-अपना कर्तव्य एवं धर्म होता है और इसका पालन सभी को करना चाहिए।” कर्तव्य के महत्व की बात सुनकर कौशिक की आंखें खुल गई। उसे अपनी भूल का पता चल गया था।

10/17/2011

अच्युताष्टकं



अच्युतं केशवं राम नारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरा मन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं संदधे ॥२॥

विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिनी रागिने जानकी जानये ।
वल्लवी वल्लभायाऽर्चितायात्मने कंस विध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥३॥

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रिपते वासुदेवाचित श्रिनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारका नायक द्रौपदी रक्षक ॥४॥

राक्षसक्षोभितः सीतयाशोभितो दण्डकारण्य भू पुण्यता कारणः ।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्संपूजितो राघवः पातु माम् ॥५॥

धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् द्वेषिणां केशिहा कंसहृद् वंशिकावादकः ।
पूतनाकोपकः सूरजा खेलनो बाल गोपालकः पातु माम् सर्वदा ॥६॥


विद्युदुद्धयोतवान प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत् प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोरस्थलं लोहितांघ्रिदूयं वारिजाक्षं भजे ॥७॥

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजिमानाननं रत्नमौलिं लसत् कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरकं कङ्कण प्रोज्ज्वलं किङ्किणी मञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥८॥

10/16/2011

उनके अवयवो में सारे लोक कल्पित है



एक समय नारदजी विविध लोको में भ्रमण करते-करते ब्रह्मा जी के पास गए. वहा  उन्होंने ब्रह्माजी को नेत्र बंद  कर तपस्या  में मग्न  देखा. नारदजी ने विचार किया की मेरे  पिताजी जगत की स्रष्टि, पालन और संहार के करता है. इनसे बड़ा कौन देवता है जिसका ये ध्यान कर रहे है ?


ब्रह्माजी की समाधी टूटने पर नारदजी ने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा - पिताजी ! आज आपको ध्यानमग्न देखकर मुझे बड़ा संदेह हो रहा है. मै अभी तक आपको ही सर्वश्रेष्ठ जगत देवता समझता था, किन्तु आज मुझे ज्ञात हो रहा है की आपसे बड़ा कोई देवता और है, जिसका आप ध्यान करते है. कृपया यह भी बतलाइये की आत्मज्ञान का साधन  क्या है ? यह विश्व  किस से  प्रकाशित होता है ? किसके अधीन है और किस्मे लीन  होता है ? आपका विज्ञानदाता और आश्रय  कौन है ? आप किसके अधीन है एवं आपका स्वरूप क्या है ? 
ब्रह्माजी ने कहा - वत्स ! तुम्हारा संदेह ठीक है. मुझसे परे जो तत्व है, उसे तुम नहीं जानते, इसी से तुम्हे संदेह हो रहा है. उन भगवान् को नमस्कार है, जिनकी माया से मोहित लोग मुझे ही जगतगुरु कहते है - 
तस्मै नमो भगवते बासुदेवाय धीमहि
य्न्माय्या दुर्जयाया मम ब्रुवन्ति जगद्गुरुम 
पर वस्तुतः जगद्गुरु श्री नारायण  ही है. उन्ही से जगत की स्रष्टी होती है. मै तो निमित्त मात्र हूँ. उनके द्वारा प्रकाशित  स्रष्टि को ही मै प्रकाशित करता हूँ. जब भगवान् एक से बहुत होने की इच्छा करते है, तब प्रकृति और पुरुष प्रथक हो जाते है. उस समय पुरुष में काल, कर्म और स्वभाव ये तीनो उद्भूत होते है. काल से प्रकृति के गुणों का क्षोभ होता है, स्वभाव से उसमे परिणाम होता है और कर्म से महत्त्तत्व का जन्म होता है. महत्त्तव से अहंकार होता है. यह अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार है.
तामस अहंकार पंचतन्मात्रा और पञ्च महाभूतो की उत्पत्ति होती है. राजस अहंकार से इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता और मन की उत्पत्ति होती है.इन सब तत्वों ने मिलकर भगवान् की शक्ति से एक अंड की रचना की. वह अंड बहुत वर्षो तक जल में पडा रहा. ब्रह्मा ने उसमे प्रविष्ट होकर उसको चेतन किया.इसी से वह ब्रह्माण्ड कहा जाता है. फिर उसका भेदन कर वह स्वयं विराट रूप से प्रकट हुए. उनके अवयवो में सब लोक कल्पित है - चरणों में भूलोक, नाभि में भुवर्लोक और मस्तक में स्वर्ग लोक. उन्ही में सात भुवन एवं चौदह लोको के कल्पना की गई है.

10/15/2011

स्रष्टि विषयक प्रश्न देवर्षि नारद ने ब्रह्मा से पूछा

रजा परीक्षित ने शुकदेव जी के  आत्मतत्व का निश्चय कराने वाले वचन सुनकर भगवन श्रीकृष्ण में अपनी  मति स्थिर  की और स्त्री पुत्र  आदि तथा सम्पूर्ण राज्य में चिरकाल से निरूद्ध ममता का भी परित्याग किया. जैसे आपने मुझसे पूछा है वैसे ही भगवत्कथा के प्रेमी परीक्षित ने भी शुकदेवजी से भाग्वात्सम्बंधी लीलाओं  का प्रश्न किया था.
 परीक्षित ने कहा - हे ब्रह्मन ! आपके  वचन सुनकर मुझे बड़ी शांति मिलती है और अज्ञान की निवृत्ति होती है जब आप यह बताये की भगवान् श्रष्टि, पालन और संहार कैसे करते है? इस बारे में बड़े-बड़े विद्वानों की भी मति चकरा जाती है. अतः आप हमारे इस संदेह का निवारण करे, क्योकि आप शब्द ब्रह्म तथा परब्रह्म के पूर्ण ज्ञाता है.
शूतजी कहते है - हे शौनक राजा परीक्षित का प्रश्न सुनकर शुकदेवजी ध्यानमग्न हो भगवान् का स्तवन करते हुए बोले -  हे भगवन ! आप पुराण पुरुष है. आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप धारण कर श्रष्टि , पालन और संहार करते है. सबके अन्तर्यामी होते हुए भी आपको यथार्थ रूप से कोई जान नहीं सकता. आप भक्तो का अज्ञान दूर करते है. परम हंसो को ज्ञान देते है. आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ.
जिनके नामो का कीर्तन, जिनके स्वरूप का स्मरण जिनकी प्रतिमाओं का दर्शन, जिनके चरणों का वंदन, जिनकी कथा का श्रवण तथा जिनके श्रीविग्रह का पूजन सम्पूर्ण लोको की पापराशी को भस्म कर डालता है उन परम मंगलमय यशोमूरती  भगवान् को मै बार-बार नमन करता हूँ. पापी पुरुष भी जिन आपके भक्तो के आश्रय से पवित्र हो जाते है, ब्रह्मा आदि देवता भी जिन आपकी मूर्ती का दर्शन कर चकित रह जाते है और उसका पार नहीं पाते, वह दुर्ज्ञेय भगवान् मुझपर प्रसन्न हो मै प्रणाम करता हूँ.
जो लक्ष्मी के स्वामी, यज्ञो के फल दाता, प्रजा के रक्षक, बुद्धि के प्रवर्तक, लोको के अधिष्ठाता, प्रथ्वी के उद्धर्ता, भक्तो  के मानदाता तथा यदुवंशियो के रक्षक है, वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् मुझ पर प्रसन्न हो. मै सर झुका कर नमन करता हूँ.
जिन भगवान् के चरण कमलो के ध्यान से निर्मल हुई बुद्धि से योगी  जन आत्मतत्व का साक्षात्कार करते है एवं अपनी रूचि के अनुसार उन्कामहत्व गान करते है वे सर्वविध संकटों से मुक्ति देनेवाले भगवान् मुझ पर प्रसन्न हो मै उनको नमन करता हूँ.
हे भगवान् ! इन आपकी ही प्रेरणा से सरस्वती ने ब्रह्मा के मुख से आविर्भूत होकर उनकी स्रष्टि विषयक स्मृति जाग्रति के, जो महाभूतो द्वारा शरीरो की रचना कर अन्तर्यामी रूप से उनमे निवास कर इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करते है वह भगवान्  इस समय मेरी वाणी को अलंकारों से युक्त कर दे जिससे मै प्रवचन करने में समर्थ हो सकू. मै आपके चरणों में बारम्बार नमस्कार करता हूँ.
इस प्रकार १२ श्लोको से शुकदेवजी ने भगवान् की स्तुति की.. अनंतर अपने पिता श्री वेदव्यास जी को प्रणाम कर वे परीक्षित से बोले -  हे राजन ! तुमने मुझसे जो स्रष्टि विषयक प्रश्न किया था, वही देवर्षि नारद  ने  ब्रह्मा जी से पूछा था. वही प्रसंग मै आपसे कहता हूँ, ध्यान पूर्वक सुने.
...क्रमशः अगले अंक में पढ़े 

10/12/2011

जय राम रमारमनं समनं

छं0- जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
दो0-बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।।
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।।14(ख)।।
–*–*–

10/08/2011

मैक्स्मूलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण - क्या, क्यों और कैसे


भारत के लोगों को फ्रेडरिक मैक्समूलर का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने उसे एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है। वास्तव में वह हिन्दुओं और हिन्दू धर्मशास्त्रों का एक महान शखु था। लेकिन दुर्भाग्य से, उस समय के ही नहीं, बल्कि आज के हिन्दू भी उसके उद्‌देश्य व कार्य के दूरगामी प्रभाव को समझने में असफल रहे हैं क्योंकि मैक्समूलर ने अपनी लेखनी की चतुराई द्वाराअपने वास्तविक स्वरूप और वेद भाष्य के विकृतीकरण के उद्‌देश्य को बड़े योजनाबद्ध तरीके से छिपाए रखा, यहाँ तक कि उसके निधन के बाद सन्‌ १९०१ में प्रकाशित स्वलिखित जीवनी में भी उसे उजागर नहीं किया।

इस सन्दर्भ में श्री ब्रह्मदत्त भारती ने अपनी पुस्तक 'मैक्समूलर-ए लाइफ लौंग मास्करेड' में इस प्रकार लिखा हैः

"Max Muller's effectiveness as the arch enemy of Hinduism lay dangerously hidden in his subtle equivocations and in his ability, which seemed congenital, successfully to pass a counterfeit coin without being caught while performing the feat. His capacity to look honest and sound sincere on surface was prodigious. the Hindus, of the nineteenth century failed to discover and understand Max Muller and his Max Mullerism, because, by and large, being, too gullible, they believed whatever max Muller wrote and said. "Since he had been, in addition, convertly supported and encouraged by the Englishmen who then ruled Hindustan, he was able to mount his veiled attacks on Hinduism again and again from behind the convenient cover of philological research."                                                                                          
 (p. 194)
अर्थात्‌ ''मैक्समूलर की हिन्दूधर्म के प्रति कट्‌टर शत्रुता का प्रभावीपन उसकी लेखनी की बहुअर्थी शैली में भयंकर रूप से छिपा हुआ है। इस सफलता का रहस्य उसकी इस योग्यता से भी आसानी से समझा जा सकता है, जैसे कोई चालाक व्यक्ति खोटे सिक्के को चला देने पर भी पकड़ा नहीं जाता है। उसका ऊपर से हिन्दू धर्म शास्त्रों- वेदों आदि के प्रति सच्चा और निष्ठावान दिखलाई देना उसकी आश्चर्यजनक रहस्यमयी लेखनशैली की क्षमता का परिचायक है। उन्नीसवी सदी के हिन्दू मैक्समूलर और उसके मैक्समूलरवाद को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं क्योंकि हिन्दुओं के आमतौर पर अत्यंत सीधे-सादे होने के कारण उन्होंने उसे ही सच मान लिया जो कि मैक्समूलर ने कहा और लिखा। इसके अतिरिक्त उसे आजीवन अप्रत्यक्ष रूप् से अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन और सहयोग मिलता रहा जो कि उस समय भारत के शासक थे। इसी कारण वह भाषा विज्ञान-शोध की आड़ में छिपकर लगातार हिन्दू धर्म एवं वेदों पर प्रहार करता रहा।'' 
(पृ. १९४)
इसी के साथ-साथ अंग्रेज शासक लगातार यही प्रचार करते रहे कि मैक्समूलर तो वेदों का महान विद्वान और हिन्दू धर्म तथाहिन्दुआअें का शुभचिंतक है। वे इस कथन की पुष्टि इस बात से करते हैं कि उसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में १८४६ से १९०० तक वेदों और हिन्दू धर्मशास्त्रों पर एक विशाल साहित्य स्वंय लिखा तथा अपने जैसे सहयोगी लेखकों द्वारा लिखवाकर उसे स्वयं संपादित किया।
मैक्समूलर ने अपनी बहुअर्थी लेखनी की आड़ में आजीवन वेदों को विरूपित किया, फिर भी वह अपने को हिन्दू धर्म का हितैषी होने का ढोंग रचता रहा। इस बात के इतने पक्के, सच्चे और आश्चर्यजनक प्रमाण हैं कि कोई भी तर्क उसे वेदों के विकृतीकरण के दोष से बचा नहीं सकता।
मैक्समूलर की दूसरी जीवनी में असली स्वरूप
इसके लिए हमें बाहर के किसी दूसरे प्रमाणों की आवश्यकता नहीें है क्योंकि मैक्समूलर द्वारा लिखित साहित्य और अपने मित्रों, परिवारीजनों आदि को लिखे उसके पत्रों में ही र्प्याप्त सामग्री मिलती है। हालांकि मैक्समूलर की स्वलिखित जीवनी १९०१ में ही प्रकाशित हुई थी, परन्तु उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसके फौरन बाद १९०२, में उसकी एक और जीवनी ''दी लाइफ एण्ड लैटर्स ऑफ दी आनरेबिल फ्रेडरिक मैक्समूलर'' के नाम से प्रकाशित की। इसमें अन्य विवरणों के सहित मैक्समूलर द्वारा लिखें पत्रोंका संकलन भी है। उसके प्रकाशन का उद्‌देश्य स्पष्ट करते हुए श्रीमती जोर्जिना नपे पुस्तक की भूमिका में लिखाः
"It may be thought that the publication of these volumes is superfluous after two works 'Auld Lang Syne' and the 'Autobiography (2 Vols.) written by Max Muller himself. But it seemed that something more wanted to show the innermost character of the real man…. The plan pursued throughout these volumes has been to let Max Muller's letters and the testimony of friends to his mind and character speak for themselves, whilst the whole is connected by a slight thread of necessary narrative. The selection from the letters has been made with a view to bring the man rather the scholar before the world."
 (preface to November,1902, New York Edition; Bharti, p. IX).
अर्थात्‌ ''ऐसा सोचा जा सकता है किस्वयं मैक्समूलर द्वारा लिखित ''औल्ड लैंग सायने'' और ''आत्मजीवनी'' (२ खंडों में) प्रकाशित हो जाने के बाद, इन खंडों के प्रकाशन की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि उस मनुष्य के आन्तरिक चरित्र की वास्तविकताको दिखाने के जिए कुछ और अधिक करने की आवश्यकता है। इन खंडों में जो योजन लगातार अपनाई गई है वह मैक्समूलर के पत्रों और उसके मित्रों के प्रमाणस्वरूप् दिए गए कथन, उस मनुष्य की सोच और चरित्र को स्वयं उजागर करते हैं, जबकि समस्त सामग्री आवश्यक आत्मकथा के धागे से बांी हुई हैं। यहाँ उद्धत पत्रों का चुनाव इस उद्‌देश्य से किया गया है ताकि विश्व के सामने एक विद्वान की अपेक्षा उस मनुष्य का सही स्वरूप प्रस्तुत किया जा सके।''
 (न्यूयार्क संस्करण, १९०२, प्राक्कथन पृ. प्ग्)
इसलिए यहाँ हमारा उद्‌देश्य यह समझने का है कि क्या वह वास्तव में वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों का प्रशंसक और भारत का मित्र था? क्या वह वेदों, उपनिषदों, दर्शनों आदि के उदात्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रभावित था, और उन्हें वह अंग्रेजी माध्यम से विश्वभर में फैलाना चाहता था? क्या वह भारतीय धर्मशास्त्रों का जिज्ञासु था? क्या उसने ऋग्वेद का भाष्य भारतीय प्राचनी यास्कीय-पाणिनीय पद्धति के अनुसार किया था? उसने सायण-भाष्य को ही आधार क्यों माना? क्या उसने सायण के सभी मापदण्डों को अपनाया? यदि नहीं, तो क्यो? आखिर उसे वेदों में क्या मिला?
क्या वह तुलनात्मकभाषा विज्ञान और गाथावाद के शोध की आड़ में एक पक्षपाती, पूर्वाग्रही और छद्‌मवेशी सैक्यूलर ईसाई मिशनरी था? जो वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों के भ्रामक अर्थ करके हिन्दू धर्म को समूल नष्ट करना चाहता था। कया वह वेदों को बाईबिल से निचले स्तर का दिखाकर भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करना और भारत में ब्रिटिश राज को सुदृढ़ करना चाहता था? आखिर उसने वेदों और भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में अनेक कपोल-कल्पित मान्यताएं क्यों स्थापित कीं? इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी अंग्रेजी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के ज्ञान में अधकचरे, चौबीस वर्षीय, अनुभवहीन गैर-ब्रिटिश, जर्मन युवक मैक्समूलर को ही वेदभाष्य के लिए क्यों चुना?
उसने वेदों का विकृतीकरण क्या, क्यों और कैसे किया? इन्हीं कुछ प्रश्नों को यहाँ संक्षेप में विश्लेषण किया जाएगा ताकि अधकचरे ज्ञानी हिन्दू और सैक्यूलरवादी, जो उसके विकृत साहित्य के आधार पर समय-समय पर हिन्दू धर्म की निंदा करते रहते हैं, उसकी वास्तविकता तथा उसके निहित उद्‌देश्य को समझ सकें। इसके लिए हमें तत्कालीन ब्रिटिश शासित भारत की धार्मिक व राजनैतिक स्थितियों कोसमझना होगा, जिनके कारण उन्हें एक मैक्समूलर की तलाश करनी पड़ी। 

10/07/2011

बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग


बजरंग बाण


भौतिक मनोकामनाओं की पुर्ति के लिये बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग 


अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमानजी का एक चित्र या मूर्ति जप करते समय सामने रख लें। ऊनी अथवा कुशासन बैठने के लिए प्रयोग करें। अनुष्ठान के लिये शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण आवश्यक है। घर में यदि यह सुलभ न हो तो कहीं एकान्त स्थान अथवा एकान्त में स्थित हनुमानजी के मन्दिर में प्रयोग करें।
हनुमान जी के अनुष्ठान मे अथवा पूजा आदि में दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। पाँच अनाजों (गेहूँ, चावल, मूँग, उड़द और काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुट्ठी प्रमाण में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगो दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीया बनाएँ। बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक तार लें अथवा एक कच्चे सूत को लम्बाई के बराबर काटकर लाल रंग में रंग लें। इस धागे को पाँच बार मोड़ लें। इस प्रकार के धागे की बत्ती को सुगन्धित तिल के तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजा काल में यह दिया जलता रहना चाहिए। हनुमानजी के लिये गूगुल की धूनी की भी व्यवस्था रखें।

जप के प्रारम्भ में यह संकल्प अवश्य लें कि आपका कार्य जब भी होगा, हनुमानजी के निमित्त नियमित कुछ भी करते रहेंगे। अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण का जाप प्रारम्भ करें। “श्रीराम–” से लेकर “–सिद्ध करैं हनुमान” तक एक बैठक में ही इसकी एक माला जप करनी है।
गूगुल की सुगन्धि देकर जिस घर में बगरंग बाण का नियमित पाठ होता है, वहाँ दुर्भाग्य, दारिद्रय, भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य शारीरिक कष्ट आ ही नहीं पाते। समयाभाव में जो व्यक्ति नित्य पाठ करने में असमर्थ हो, उन्हें कम से कम प्रत्येक मंगलवार को यह जप अवश्य करना चाहिए।

बजरंग बाण ध्यान

श्रीराम
अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं।
दनुज वन कृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।


दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।


चौपाई
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।
बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।
अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।
जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।
गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।
सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।
जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।
वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।
जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।
इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।
जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।
उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।
ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।
हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।
जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।
जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।
जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।
जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।
विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।
एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।
मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।
प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।
आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।
दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।
यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।
शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

मानस के मन्त्र


मानस के मन्त्र

१॰ प्रभु की कृपा पाने का मन्त्र
“मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवहु सकल कलिमल-दहन।।”



विधि-प्रभु राम की पूजा करके गुरूवार के दिन से कमलगट्टे की माला पर २१ दिन तक प्रातः और सांय नित्य एक माला (१०८ बार) जप करें।
लाभ-प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। दुर्भाग्य का अन्त हो जाता है।



२॰ रामजी की अनुकम्पा पाने का मन्त्र
“बन्दउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।”


विधि-रविवार के दिन से रुद्राक्ष की माला पर १००० बार प्रतिदिन ४० दिन तक जप करें।
लाभ- निष्काम भक्तों के लिये प्रभु श्रीराम की अनुकम्पा पाने का अमोघ मन्त्र है।



३॰ हनुमान जी की कृपा पाने का मन्त्र
“प्रनउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।”


विधि- भगवान् हनुमानजी की सिन्दूर युक्त प्रतिमा की पूजा करके लाल चन्दन की माला से मंगलवार से प्रारम्भ करके २१ दिन तक नित्य १००० जप करें।
लाभ- हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अला-बला, किये-कराये अभिचार का अन्त होता है।



४॰ वशीकरण के लिये मन्त्र
“जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेहि।।”


विधि- सूर्यग्रहण के समय पूर्ण ‘पर्वकाल’ के दौरान इस मन्त्र को जपता रहे, तो मन्त्र सिद्ध हो जायेगा। इसके पश्चात् जब भी आवश्यकता हो इस मन्त्र को सात बार पढ़ कर गोरोचन का तिलक लगा लें।
लाभ- इस प्रकार करने से वशीकरण होता है।



५॰ सफलता पाने का मन्त्र
“प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देव।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।”

विधि- प्रतिदिन इस मन्त्र के १००८ पाठ करने चाहियें। इस मन्त्र के प्रभाव से सभी कार्यों में अपुर्व सफलता मिलती है।


६॰ रामजी की पूजा अर्चना का मन्त्र
“अब नाथ करि करुना, बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहिं जोनि जन्मौं कर्म, बस तहँ रामपद अनुरागऊँ।।”


विधि- प्रतिदिन मात्र ७ बार पाठ करने मात्र से ही लाभ मिलता है।
लाभ- इस मन्त्र से जन्म-जन्मान्तर में श्रीराम की पूजा-अर्चना का अधिकार प्राप्त हो जाता है।



७॰ मन की शांति के लिये राम मन्त्र
“राम राम कहि राम कहि। राम राम कहि राम।।”


विधि- जिस आसन में सुगमता से बैठ सकते हैं, बैठ कर ध्यान प्रभु श्रीराम में केन्द्रित कर यथाशक्ति अधिक-से-अधिक जप करें। इस प्रयोग को २१ दिन तक करते रहें।
लाभ- मन को शांति मिलती है।



८॰ पापों के क्षय के लिये मन्त्र
“मोहि समान को पापनिवासू।।”


विधि- रुद्राक्ष की माला पर प्रतिदिन १००० बार ४० दिन तक जप करें तथा अपने नाते-रिश्तेदारों से कुछ सिक्के भिक्षा के रुप में प्राप्त करके गुरुवार के दिन विष्णुजी के मन्दिर में चढ़ा दें।
लाभ- मन्त्र प्रयोग से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।



९॰ श्रीराम प्रसन्नता का मन्त्र
“अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदान न आन।।”


विधि- इस मन्त्र को यथाशक्ति अधिक-से-अधिक संख्या में ४० दिन तक जप करते रहें और प्रतिदिन प्रभु श्रीराम की प्रतिमा के सन्मुख भी सात बार जप अवश्य करें।
लाभ- जन्म-जन्मान्तर तक श्रीरामजी की पूजा का स्मरण रहता है और प्रभुश्रीराम प्रसन्न होते हैं।



१०॰ संकट नाशन मन्त्र
“दीन दयाल बिरिदु सम्भारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”


विधि- लाल चन्दन की माला पर २१ दिन तक निरन्तर १०००० बार जप करें।
लाभ- विकट-से-विकट संकट भी प्रभु श्रीराम की कृपा से दूर हो जाते हैं।



११॰ विघ्ननाशक गणेश मन्त्र
“जो सुमिरत सिधि होइ, गननायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोई बुद्धिरासी सुभ गुन सदन।।”


विधि- गणेशजी को सिन्दूर का चोला चढ़ायें और प्रतिदिन लाल चन्दन की माला से प्रातःकाल १०८० (१० माला) इस मन्त्र का जाप ४० दिन तक करते रहें।
लाभ- सभी विघ्नों का अन्त होकर गणेशजी का अनुग्रह प्राप्त होता है।

मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग




मानस के सिद्ध स्तोत्रों के अनुभूत प्रयोग



१॰ ऐश्वर्य प्राप्ति
‘माता सीता की स्तुति’ का नित्य श्रद्धा-विश्वासपूर्वक पाठ करें।




“उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ५)”


अर्थः- उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली, क्लेशों की हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों की करने वाली श्रीरामचन्द्र की प्रियतमा श्रीसीता को मैं नमस्कार करता हूँ।।



२॰ दुःख-नाश
‘भगवान् राम की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।




“यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।” (बालकाण्ड, श्लो॰ ६)


अर्थः- सारा विश्व जिनकी माया के वश में है और ब्रह्मादि देवता एवं असुर भी जिनकी माया के वश-वर्ती हैं। यह सब सत्य जगत् जिनकी सत्ता से ही भासमान है, जैसे कि रस्सी में सर्प की प्रतीति होती है। भव-सागर के तरने की इच्छा करनेवालों के लिये जिनके चरण निश्चय ही एक-मात्र प्लव-रुप हैं, जो सम्पूर्ण कारणों से परे हैं, उन समर्थ, दुःख हरने वाले, श्रीराम है नाम जिनका, मैं उनकी वन्दना करता हूँ।



३॰ सर्व-रक्षा
‘भगवान् शिव की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।




“यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके 
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट, 
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः 
सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम ||” (अयोध्याकाण्ड, श्लो॰१)


अर्थः- जिनकी गोद में हिमाचल-सुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहार-कर्त्ता, सर्व-व्यापक, कल्याण-रुप, चन्द्रमा के समान शुभ्र-वर्ण श्रीशंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।



४॰ सुखमय पारिवारिक जीवन
‘श्रीसीता जी के सहित भगवान् राम की स्तुति’ का नित्य पाठ करें।




“नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम, 
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम ||” (अयोध्याकाण्ड, श्लो॰ ३)


अर्थः- नीले कमल के समान श्याम और कोमल जिनके अंग हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम-भाग में विराजमान हैं और जिनके हाथों में (क्रमशः) अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है, उन रघुवंश के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को मैं नमस्कार करता हूँ।।



५॰ सर्वोच्च पद प्राप्ति
श्री अत्रि मुनि द्वारा ‘श्रीराम-स्तुति’ का नित्य पाठ करें।
छंदः-
“नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु शील कोमलं ॥
भजामि ते पदांबुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥
निकाम श्याम सुंदरं । भवाम्बुनाथ मंदरं ॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं । मदादि दोष मोचनं ॥
प्रलंब बाहु विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं ॥
निषंग चाप सायकं । धरं त्रिलोक नायकं ॥
दिनेश वंश मंडनं । महेश चाप खंडनं ॥
मुनींद्र संत रंजनं । सुरारि वृंद भंजनं ॥
मनोज वैरि वंदितं । अजादि देव सेवितं ॥
विशुद्ध बोध विग्रहं । समस्त दूषणापहं ॥
नमामि इंदिरा पतिं । सुखाकरं सतां गतिं ॥
भजे सशक्ति सानुजं । शची पतिं प्रियानुजं ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः । भजंति हीन मत्सरा ॥
पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥
विविक्त वासिनः सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥
निरस्य इंद्रियादिकं । प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥
तमेकमभ्दुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं ॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं । तुरीयमेव केवलं ॥
भजामि भाव वल्लभं । कुयोगिनां सुदुर्लभं ॥
स्वभक्त कल्प पादपं । समं सुसेव्यमन्वहं ॥
अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं ॥
प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥
पठंति ये स्तवं इदं । नरादरेण ते पदं ॥
व्रजंति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुता ॥” (अरण्यकाण्ड)


‘मानस-पीयूष’ के अनुसार यह ‘रामचरितमानस’ की नवीं स्तुति है और नक्षत्रों में नवाँ नक्षत्र अश्लेषा है। अतः जीवन में जिनको सर्वोच्च आसन पर जाने की कामना हो, वे इस स्तोत्र को भगवान् श्रीराम के चित्र या मूर्ति के सामने बैठकर नित्य पढ़ा करें। वे अवश्य ही अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी कर लेंगे।



६॰ प्रतियोगिता में सफलता-प्राप्ति
श्री सुतीक्ष्ण मुनि द्वारा श्रीराम-स्तुति का नित्य पाठ करें।




“श्याम तामरस दाम शरीरं । जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥
पाणि चाप शर कटि तूणीरं । नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥१॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः । संत सरोरुह कानन भानुः ॥
निशिचर करि वरूथ मृगराजः । त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥२॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं । सीता नयन चकोर निशेशं ॥
हर ह्रदि मानस बाल मरालं । नौमि राम उर बाहु विशालं ॥३॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः । शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः । त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥४॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं । ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं ॥
अमलमखिलमनवद्यमपारं । नौमि राम भंजन महि भारं ॥५॥
भक्त कल्पपादप आरामः । तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥
अति नागर भव सागर सेतुः । त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥६॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः । कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः । संतत शं तनोतु मम रामः ॥७॥” (अरण्यकाण्ड)




विशेषः 
“संशय-सर्प-ग्रसन-उरगादः, शमन-सुकर्कश-तर्क-विषादः।
भव-भञ्जन रञ्जन-सुर-यूथः, त्रातु सदा मे कृपा-वरुथः।।”
उपर्युक्त श्लोक अमोघ फल-दाता है। किसी भी प्रतियोगिता के साक्षात्कार में सफलता सुनिश्चित है।





७॰ सर्व अभिलाषा-पूर्ति
‘श्रीहनुमान जी कि स्तुति’ का नित्य पाठ करें।




“अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।” (सुन्दरकाण्ड, श्लो॰३)





८॰ सर्व-संकट-निवारण
‘रुद्राष्टक’ का नित्य पाठ करें।



॥ श्रीरुद्राष्टकम् ॥


नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १॥




निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ २॥




तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३॥




चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४॥




प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५॥




कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६॥




न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७॥




न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८॥




रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥




॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं संपूर्णम् ॥
विशेषः- उक्त ‘रुद्राष्टक’ को स्नानोपरान्त भीगे कपड़े सहित शिवजी के सामने सस्वर पाठ करने से किसी भी प्रकार का शाप या संकट कट जाता है। यदि भीगे कपड़े सहित पाठ की सुविधा न हो, तो घर पर या शिव-मन्दिर में भी तीन बार, पाचँ बार, आठ बार पाठ करके मनोवाञ्छित फल पाया जा सकता है। यह सिद्ध प्रयोग है। विशेषकर ‘नाग-पञ्चमी’ पर रुद्राष्टक का पाठ विशेष फलदायी है।

श्रीरामरक्षास्तोत्रम्




अथ ध्यानम्‌
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
स्तोत्रम्
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्‌।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥५॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥६॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्‌।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌॥१०॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न दृष्टुमति शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥११॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्‌।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१३॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्‌ ॥१४॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥१५॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्‌।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्सनः प्रभुः ॥१६॥
तरुणौ रूप सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥१९॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्‌॥२०॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥२२॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयाऽन्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥२४॥
रामं दूवार्दलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्‌।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥२५॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌॥२६॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥२७॥
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्‌ ॥३१॥
लोकाभिरामं रणरङ्धीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्‌।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम्
इस पोस्ट को संक्षिप्त करें

10/06/2011

रावण रचित शिव तांडव स्त्रोत



जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

और बौद्ध धर्म अपना लिया


मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर धर्म प्रचार में लगता तब वह वास्तव में महान होता । परन्तु अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया। सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो में भारत विजय के पश्चात् में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लूँगा। बौद्ध गुरुओं ने राष्ट्र द्रोह किया तथा भारत पर आक्रमण के लिए एक विदेशी शासक का साथ दिया। सीमा पर स्थित बौद्ध मठ राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए। बोद्ध भिक्षुओ का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ साथ हथियार भी छुपा दिए गए।
दूसरी तरफ़ सम्राट व्रहद्रथ की सेना का एक वीर सैनिक पुष्यमित्र शुंग अपनी वीरता व साहस के कारण मगध कि सेना का सेनापति बन चुका था । बौद्ध मठों में विदेशी सैनिको का आगमन उसकी नजरों से नही छुपा । पुष्यमित्र ने सम्राट से मठों कि तलाशी की आज्ञा मांगी। परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने मना कर दिया।किंतु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत शुंग , सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन करके बौद्ध मठों की तलाशी लेने पहुँच गया। मठों में स्थित सभी विदेशी सैनिको को पकड़ लिया गया,तथा उनको यमलोक पहुँचा दिया गया,और उनके हथियार कब्जे में कर लिए गए। राष्ट्रद्रोही बौद्धों को भी ग्रिफ्तार कर लिया गया। परन्तु वृहद्रथ को यह बात अच्छी नही लगी।
पुष्यमित्र जब मगध वापस आया तब उस समय सम्राट सैनिक परेड की जाँच कर रहा था। सैनिक परेड के स्थान पर hi सम्राट व पुष्यमित्र शुंग के बीच बौद्ध मठों को लेकर कहासुनी हो गई।सम्राट वृहद्रथ ने पुष्यमित्र पर हमला करना चाहा परंतु पुष्यमित्र ने पलटवार करते हुए सम्राट का वद्ध कर दिया। वैदिक सैनिको ने पुष्यमित्र का साथ दिया तथा पुष्यमित्र को मगध का सम्राट घोषित कर दिया। सबसे पहले मगध के नए सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य प्रबंध को प्रभावी बनाया, तथा एक सुगठित सेना का संगठन किया। पुष्यमित्र ने अपनी सेना के साथ भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीर सेना के सामने ग्रीक सैनिको की एक न चली। मिनिंदर की सेना पीछे हटती चली गई । पुष्यमित्र शुंग ने पिछले सम्राटों की तरह कोई गलती नही की तथा ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया। इसके पश्चात् ग्रीक कभी भी भारत पर आक्रमण नही कर पाये। सम्राट पुष्य मित्र ने सिकंदर के समय से ही भारत वर्ष को परेशानी में डालने वाले ग्रीको का समूल नाश ही कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वैदिक सभ्यता का जो ह्रास हुआ,पुन:ऋषिओं के आशीर्वाद से जाग्रत हुआ। डर से बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले पुन: वैदिक धर्म में लौट आए। कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है की पुष्यमित्र ने बौद्दों को सताया .किंतु यह पूरा सत्य नही है। सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी ,जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे। पुष्यमित्र ने जो वैदिक धर्म की पताका फहराई उसी के आधार को सम्राट विक्र्मद्वित्य व आगे चलकर गुप्त साम्रराज्य ने इस धर्म के ज्ञान को पूरे विश्व में फैलाया।

हिन्दू धर्म का इतिहास




हिन्दू धर्म का इतिहास बहुत प्राचीन है। यह परम्परा वेदकाल से पूर्व की मानी जाती है, क्योंकि वैदिककाल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है। सदियों से वाचिक परंपरा चली आ रही है फिर इसे लिपिबद्ध करने का काल भी बहुत लंबा रहा है।

जब हम इतिहास की बात करते हैं तो वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया।
दूसरी ओर कुछ लोगों का यह मानना है कि कृष्ण के समय में वेद व्यास ने वेदों का विभाग कर उन्हें लिपिबद्ध किया था। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5300 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए हैं।
हिंदू और जैन धर्म की उत्पत्ति पूर्व आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. मध्य एशिया से हिमालय तक फैले थे। आर्यों की ही एक शाखा ने पारसी धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमश: यहूदी धर्म दो हजार ई.पू., बौद्ध धर्म पाँच सौ ई.पू., ईसाई धर्म सिर्फ दो हजार वर्ष पूर्व, इस्लाम धर्म आज से 14 सौ वर्ष पूर्व हुआ।

काव्यमय इतिहास

दरअसल हिंदुओं ने अपने इतिहास को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर मुखाग्र जिंदा बनाए रखा। यही कारण रहा कि वह इतिहास धीरे-धीरे काव्यमय और श्रृंगारिक होता गया जिसे आज का आधुनिक मन इतिहास मानने को तैयार नहीं है।

लेकिन धार्मिक साहित्य अनुसार हिंदू धर्म की कुछ और धारणाएँ हैं। मान्यता यह भी है कि 90 हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत हुई थी। रामायण, महाभारत और पुराणों में सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं की वंश परम्परा का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा भी अनेक वंश की उत्पति और परम्परा का वर्णन है। उक्त सभी को इतिहास सम्मत क्रमबद्ध लिखना बहुत ही कठिन कार्य है, क्योंकि पुराणों में उक्त इतिहास को अलग-अलग तरह से व्यक्त किया गया है जिसके कारण इसके सूत्रों में बिखराव और भ्रम निर्मित जान पड़ता है किंतु जानकारों के लिए यह भ्रम नहीं है।
दरअसल हिंदुओं ने अपने इतिहास को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर मुखाग्र जिंदा बनाए रखा। यही कारण रहा कि वह इतिहास धीरे-धीरे काव्यमय और श्रृंगारिक होता गया जिसे आज का आधुनिक मन इतिहास मानने को तैयार नहीं है। वह दौर ऐसा था जबकि कागज और कलम नहीं होते थे। इतिहास लिखा जाता था शिलाओं पर, पत्थरों पर और मन पर।
जब हम हिंदू धर्म के इतिहास ग्रंथ पढ़ते हैं तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम मानव का नाम स्वायंभव मनु था और प्रथम ‍स्त्री थी शतरूपा। महाभारत में आठ मनुओं का उल्लेख है। इस वक्त धरती पर आठवें मनु वैवस्वत की ही संतानें हैं। आठवें मनु वैवस्वत के काल में ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था।
पुराणों में हिंदू इतिहास की शुरुआत सृष्टि उत्पत्ति से ही मानी जाती है। ऐसा कहना कि यहाँ से शुरुआत हुई यह ‍शायद उचित न होगा फिर भी हिंदू इतिहास ग्रंथ महाभारत और पुराणों में मनु (प्रथम मानव) से भगवान कृष्ण की पीढ़ी तक का उल्लेख मिलता है।
हिंदू धर्म के इस चैनल में हम आपको बताएँगे कि आखिर में हिंदू धर्म का क्रमश: इतिहास क्या है। क्या है वैदिक प्रतीकों और पौराणिक कथाओं का सच। क्या है सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय की धारणा के अलावा अब तक हुए राजाओं और धर्म पुरुषों की गाथा। इति।

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं




आम आदमी के लिए विजयदशमी अब रावण-दहन की तिथि बनकर रह गई है। यद्यपि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम द्वारा रावण-वध हो चुका है, तथापि दशानन दुर्गुण बनकर हमारी दसों इंद्रियों के माध्यम से आज भी मन-रूपी सीता का हरण करने को उद्यत है। हम जब आत्मा की आवाज की अनसुनी करके तथा विवेक-रूपी लक्ष्मण के निर्देश की अनदेखी करके विषय (कामना) रूपी मृग के पीछे दौड़ते है, तब दुर्गुणरूपी दशानन इंद्रियों को वशीभूत कर चित्त-स्वरूपा सीता का हरण कर लेता है। ऐसी स्थिति में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष, कपट, हिंसा और असत्य रूपी दस सिरों वाले दशानन का सदाचार रूपी रामबाण से ही वध हो सकता है। प्रत्येक स्थिति में सदाचरण करने के कारण ही श्रीराम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहलाए। जिस प्रकार शारदीय नवरात्र में दैवी शक्ति को जाग्रत कर श्रीरामचंद्र ने दशमी के दिन लंका पर चढ़ाई की थी, उसी तरह शारदीय साधना द्वारा जाग्रत मनोबल से हम यदि दुर्गुणरूपी रावण पर विजय प्राप्त कर लें, तो सही मायनों में विजयादशमी के महापर्व का मूल उद्देश्य पूर्ण होगा। सामाजिक दृष्टि से देखें, तो सदाचरण द्वारा ही भ्रष्टाचार रूपी रावण तथा दृढ़ इच्छाशक्ति से ही आतंकवाद रूपी मेघनाद को समाप्त किया जा सकता है। इस प्रकार विजयदशमी पर्व में निहित आध्यात्मिक संदेश को समझने की नितांत आवश्यकता है, क्योंकि तभी इस त्योहार को मनाना पूरी तरह से सार्थक सिद्ध होगा।

10/05/2011

इस तेज से ही देवी के विभिन्न अंग बने


पुराणों के अनुसार असुरों के अत्याचार से तंग आकर देवताओं ने जब ब्रह्माजी से सुना कि दैत्यराज को यह वर प्राप्त है कि उसकी मृत्यु किसी कुंवारी कन्या के हाथ से होगी, तो सब देवताओं ने अपने सम्मिलित तेज से देवी के इन रूपों को प्रकट किया। विभिन्न देवताओं की देह से निकले हुए इस तेज से ही देवी के विभिन्न अंग बने।

भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ।
यमराज के तेज से मस्तक के केश।
विष्णु के तेज से भुजाएं।
चंद्रमा के तेज से स्तन।
इंद्र के तेज से कमर।
वरुण के तेज से जंघा।
पृथ्वी के तेज से नितंब।
ब्रह्मा के तेज से चरण।
सूर्य के तेज से दोनों पौरों की ऊंगलियां,
प्रजापति के तेज से सारे दांत।
अग्नि के तेज से दोनों नेत्र।
संध्या के तेज से भौंहें।
वायु के तेज से कान।
अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने हैं।

‍कहा जाता है कि फिर शिवजी ने उस महाशक्ति को अपना त्रिशूल दिया, लक्ष्मीजी ने कमल का फूल, विष्णु ने चक्र, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमानजी ने गदा, शेषनागजी ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह को प्रदान किया।

इसके अतिरिक्त समुद्र ने बहुत उज्ज्वल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुंडल, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर तथा अंगूठियां भेंट कीं। इन सब वस्तुओं को देवी ने अपनी अठारह भुजाओं में धारण किया।


अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्




न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः .
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ..
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् .
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ..
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः .
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ..
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया .
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ..
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चा शीतेरधिकमपनीते तु वयसि .
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ..
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः .
तवापर्णे कर्णे विशति मनु वर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जननीयं जपविधौ ..
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः .
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ..
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः .
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ..
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः .
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ..
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि .
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ..
जगदम्ब विचित्र मत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि .
अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ..
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि .
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु .. ॐ ..